यथार्थ की सीमाएँ और विस्थापित स्वप्न का सत्य
स्वप्न को अक्सर हम भ्रम या कल्पना मानकर टाल देते हैं, परन्तु भारतीय दर्शन में वह यथार्थ का ही एक रूप है। विक्रमादित्य की कथा से लेकर श्रीमाध्वाचार्य के द्वैत दर्शन तक, यह लेख दिखाता है कि स्वप्न अपने नियमों और सत्य के साथ अलग जगत रचते हैं। यहाँ स्वप्न केवल मन की वासनाओं का खेल नहीं, बल्कि चेतना का प्रक्षेपण हैं—जहाँ अंधा देख सकता है, लंगड़ा पर्वत लांघ सकता है और भूख‑प्यास से मुक्त व्यक्ति भी तृष्णा अनुभव कर सकता है। ज़ेन गुरु की तितली‑दृष्टांत की तरह यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा रहता है: क्या हम जाग्रत हैं या स्वप्न में? डॉ मधु कपूर इस लेख में स्वप्न और यथार्थ की सीमाओं को खोलते हुए हमें चेतना के उस दर्पण तक ले जाती हैं, जो हर अनुभव को समेटता और छोड़ता चलता है।
यथार्थ की सीमाएँ और विस्थापित स्वप्न का सत्य
डॉ मधु कपूर
विक्रमादित्य अपने न्याय निर्णय के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन उनके पास एक व्यक्ति आया और उसने निवेदन किया कि स्वप्न में किसी को उसने सोने के सिक्के उधार दिए थे, और अब वह चाहता है कि राजा उसके वे सिक्के वापस दिलवाएँ। राजा ने उसे सिक्के वापस दिलवाने का वचन दिया। अगले दिन विक्रमादित्य ने उतने ही सोने के सिक्कों को एक थैली में बाँधकर ऊँचे खंभे पर लटका दिया। ज़मीन पर एक दर्पण रखा गया ताकि सिक्कों की थैली का प्रतिबिंब उसमें दिखाई दे।
तब राजा ने उस व्यक्ति से कहा— “जैसे तुमने स्वप्न में सिक्के उधार दिए थे, वैसे ही अब तुम दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब से अपने सिक्के वापस ले लो।” दर्पण का प्रतिबिंब यह दर्शाता है कि स्वप्न में किये गये लेन-देन का प्रतिफल भी स्वप्न में ही मिलता है। विक्रमादित्य ने न्याय केवल तर्क से नहीं, बल्कि यथार्थ अनुभव के आधार पर किया। यह कथा प्रमाणित करती है जिस तरह सभी खेलों के नियम अलग अलग होते हैं, वैसे ही स्वप्न के नियम स्वप्न में ही लागू होते हैं, जागरण कालीन अवस्था में वे नियम अनुपयोगी हो जाते हैं। यह तो वही बात हुई कि फुटबाल, क्रिकेट के नियमों से खेला जाना चाहिए।
श्रीमाध्वाचार्य के अनुसार स्वप्न वास्तव में सत्य और अर्थपूर्ण होते है। जैसे मिट्टी के बर्तनों का उपादान कारण मिट्टी है, वैसे ही सपनों का उपादान कारण वासना और स्मृति संस्कार इत्यादि है। बिना उपादान के न तो मिट्टी के बर्तन बन सकते है और न ही वासना संस्कार, स्मृति और कल्पना के बिना स्वप्न गढ़े जा सकते हैं। मिट्टी यदि सत्य है तो उसके बर्तन भी सत्य हैं, स्मृति कल्पना यदि सत्य है और उनसे निर्मित सपने भी। श्रीमाध्वाचार्य के द्वैत दर्शन में स्वप्नों को भ्रम नहीं, बल्कि वास्तविक और दैवी रूप से नियंत्रित माना जाता हैं। वे कहते हैं कि जहाँ जाग्रत जगत पंचभूतों से बना है, वहीं स्वप्न की वस्तुएँ वासनाओं और मानसिक संस्कारों से निर्मित होती हैं, जिन्हें भगवान विष्णु (परम चैतन्य) बाहर की ओर प्रक्षेपित करते हैं और स्वप्न बहिर्जगत के रूप में दिखाई देते हैं। यदि कोई नास्तिक व्यक्ति विष्णु की सत्ता को स्वीकार न करे तो अंततः अपनी चेतन सत्ता को तो अवश्य ही स्वीकार करेगा, फलस्वरूप उसके लिए स्वप्न उसके चैतन्य का ही प्रक्षेपण होता है।
तत्त्व विनिर्णय पर आधारित अपने अनुव्याख्यान में श्रीमाध्वाचार्य कहते हैं कि स्वप्न में जो अनुभव और वस्तुएँ दिखाई देती हैं, वे आत्मा के संचित संस्कारों के द्वारा विष्णु (चैतन्य) ही रचते हैं। माध्व का द्वैतवादी दर्शन यथार्थवादी है, इसलिए वे मानते हैं कि स्वप्न की वस्तुओं का अस्तित्व स्वप्नद्रष्टा के मन में होता हैं। जाग्रत अवस्था में उन्हें न छुआ जा सकता है और न ही देखा जा सकता है, क्योंकि वे व्यक्तिनिष्ठ होते है। जैसे हम किसी का दुःख साझा नहीं कर सकते है वैसे ही स्वप्न भी साझा नहीं कर सकते है। दुःख भी सत्य है और सपने भी। श्रीमाध्वाचार्य स्वयं स्वप्न में प्राप्त दिव्य अनुभूतियों को अत्यंत महत्व देते थे। उदाहरण स्वरूप उडुपी में उन्होंने जो सुंदर नृत्यमय भगवान कृष्ण की मूर्ति प्रतिष्ठित की, वह उन्हें स्वप्न-सदृश अवस्था में गोपी-चंदन से भरी नाव में प्राप्त हुई थी। इस प्रकार श्रीमाध्वाचार्य का दृष्टिकोण स्वप्नों को दैवी विधान (चैतन्य) और यथार्थवाद से जोड़ता है, जिसके उपादान हमें अनुभव से ही प्राप्त होते हैं।
स्वप्न को सत्य मानने का अर्थ है कि उसका ताना-बाना मन की वासनाओं से निर्मित होता है, जिस तरह सूत से बुने कपड़े सत्य है तो सूत भी उतना ही सत्य होता है, यद्यपि सूत और कपड़ों का कार्य एक नहीं होता है। इसी तरह स्वप्न में दिखने वाली वस्तुओं को जाग्रत अवस्था की वस्तुओं से तुलना करना भोलापन है। जिस तरह जागरणकालीन सत्ता यथार्थ है, उसी तरह स्वप्न भी अपने काल्पनिक रचना विन्यास में यथार्थ माने जाते है। फिर उनकी तुलना जाग्रत अवस्था से क्यों की जाएँ? स्वप्नावस्था और जाग्रतवस्था के क्षेत्र पृथक-पृथक है। स्वप्न में द्रष्टा बिना आँखों के देखता है, बिना कानों के सुनता है, बिना नाक के सूंघता है, बिना जीभ के स्वाद लेता है, बिना त्वचा के स्पर्श अनुभव करता है। अंधा व्यक्ति स्वप्न में अंधा नहीं होता; लंगड़ा व्यक्ति स्वप्न में पर्वत लांघ सकता है। पेट भरकर खाने के बाद भी स्वप्न में भूख-प्यास लग सकती है। स्वप्नद्रष्टा एक ऐसा कलाकार है, जो जगत से प्राप्त अनुभव के आधार पर नाना प्रकार की काल्पनिक कलाकृतियों की रचना करता है। स्वप्न में व्यक्ति एक कलाकार की हैसियत से भिन्न जगत का निर्माण करता है और उसके लिए दोनों जगत ही सत्य होते हैं — स्वप्नेपि वासनारूपं सत्यमेव जगन्मनसि स्थितं बहिष्ठत्वेन दृश्यते।
श्रीमाध्वाचार्य कहते है हैं कि स्वप्न में दिखाई देने वाली वस्तुओं का निर्माण हमारे स्मृति-संस्कार करते हैं— स्वप्नकाले दर्शयति भ्रान्तिर्जाग्रत्वमेव हि —इसलिए उन्हें जाग्रत अवस्था में देखना या अनुभव करना भ्रान्ति कहा जाता है। वास्तव में यदि देखा जाएँ तो दोनों के स्तर भिन्न भिन्न है। श्री जगन्नाथ दास रचित हरिकथामृतसार के अनुसार विष्णु अपनी अचिन्त्य अद्भुत शक्ति से चिद्शरीर को भागों में विभाजित कर देते हैं। इस प्रकार वह जीव को स्वप्न में सुख और दुःख का अनुभव कराते हैं। इसमें इच्छाएँ, भय और पूर्वजन्मों के संस्कार अधिकांश लोगों के स्वप्नों के कारण बनते हैं। जाग्रत अवस्था में इंद्रियाँ विषयों को ग्रहण करती हैं। स्वप्न में ये इंद्रियाँ मन में विलीन हो जाती हैं, परंतु मन अभी बुद्धि में विलीन नहीं होता है। इसलिए मन अकेले ही सुख दुःख का अनुभव करता है। जाग्रत अवस्था में व्यक्ति इंद्रियों और मन के माध्यम से अपनी इच्छाओं का पीछा करता है, वही स्वप्न में सूक्ष्म-शरीर के माध्यम से उनको प्राप्त कर लेता है। यह अजीब लगता है, परंतु सत्य है—ईश्वर यानी चैतन्य अपनी “कुछ भी करने की क्षमता” (अन्यथा कर्तुम) का प्रदर्शन करता हैं।
इस दृष्टि से देखा जाए तो सभी सपने हमारे रक्षक होते है, (जैसाकि फ्रायड ने भी भिन्न अर्थ में इसका उल्लेख किया था), जो अपने प्रारब्ध का भोग स्वप्न में ही संपन्न कर लेते हैं और अघटन घटना टल जाती है। जाग्रत अवस्था में किसी को खून करने की इच्छा स्वप्न में किसी की हत्या करके हम स्वयं को कानून के शिकंजे से बचा ले जाते है। यही तो सपनों की सार्थकता है, जिन्हें हम यथार्थ कहने में सकुचाते नहीं है। स्वप्नादेश के माध्यम से कई बार व्यक्ति द्वंद्वात्मक परिस्थिति से भी उबर जाता है। जब श्री सुब्बण्णाचार्य अपने पूर्वाश्रम से संन्यास लेकर श्री सुधीन्द्र तीर्थ के रूप में अगले पीठाधिपति बनने के विषय में द्विधाग्रस्त थे, तब उन्हें स्वप्न में स्वयं सरस्वती देवी ने आदेश दिया कि वे पीठ स्वीकार करें और द्वैत-तत्त्व की स्थापना करें।
चेतना स्वयं को अनंत रूपों में प्रकट करने की क्षमता रखती हैं। अपने स्थूल शरीर, इंद्रियों, बुद्धि, अहंकार और चित्त रूपी उपाधियों के साथ चेतना को जाग्रत अवस्था का द्रष्टा कहा जाता है। ब्रह्मांडीय स्तर (cosmic level) पर इसे 'विराट' कहा जाता है। सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, पंच प्राण, पंच कर्मेंद्रियाँ, पंच ज्ञानेंद्रियाँ की उपाधि से युक्त चेतना को व्यक्तिगत स्तर पर ‘तैजस’ और ब्रह्मांडीय स्तर (cosmic level) पर ‘हिरण्यगर्भ’ कहा जाता है। यह स्वप्नাवस्था का द्रष्टा है। अविद्या की उपाधि से युक्त चेतना को 'प्राज्ञ' कहा जाता है। ब्रह्मांडीय स्तर (cosmic level) पर इसे ‘ईश्वर’ कहा जाता है। तीनों अवस्थाओं में द्रष्टा स्वयं शुद्ध चेतनास्वरूप से साक्षी बना रहता है। जिस तरह सूर्य समुद्र के जल को वाष्पीकृत करता है, और बादलों का निर्माण करता है, परंतु वही बादल अपने रचनाकार सूर्य को ही ढक लेता है, ठीक इसी प्रकार, हमारा यह भौतिक शरीर, मन, इंद्रियाँ और बुद्धि आदि सहित संपूर्ण चैतन्य की ही अभिव्यक्ति है, लेकिन भिन्न भिन्न उपाधियों से युक्त होने के कारण वह अपने विशुद्ध चेतन रूप को भुला देता है।
इस प्रसंग में एक जेन गुरु का उल्लेख करना चाहूंगी। एक दिन प्रातःकाल उन्हें रोता देखकर शिष्यों ने उनके रोने का कारण पूछा। गुरु ने कहा— ‘रात मैंने स्वप्न देखा कि मैं एक तितली हूँ।’ शिष्यों ने कहा —वह तो केवल स्वप्न था!’ गुरु ने उत्तर दिया— ‘मूर्खों! यही तो समस्या है। मैं नहीं जानता कि मैं तितली हूँ जो ज़ेन गुरु होने का स्वप्न देख रही है, या ज़ेन गुरु हूँ जो तितली होने का स्वप्न देख रहा है। कौन-सा सत्य है, यही निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ—इसीलिए रो रहा हूँ।’
किसी भी क्षण हम यह नहीं जान सकते कि हम स्वप्न में हैं या जागरण में, क्योंकि दोनों अनुभव एक जैसे प्रतीत होते हैं। मन ही स्वप्न-जगत की रचना करता है, और वही मन जाग्रत-जगत की भी रचना करता है। जैसे जाग्रत अवस्था के अनुभव को हम सत्य मान लेते हैं, वैसे स्वप्न में रहते हुए हम उसे वास्तविक क्यों नहीं मान सकते—यही सबसे बड़ा सवाल है!
अपने वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए जाग्रत अवस्था अत्यंत मूल्यवान है। चेतन की तीनों अवस्थाएँ —जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति— अभिव्यक्त और अनभिव्यक्त हो सकती हैं। कहीं से भी सपने असत्य नहीं हो सकते है और सत्य का कभी अभाव नहीं हो सकता। तत्त्वदर्शियों के द्वारा इन तीनों के ही वास्तविक स्वरूप को इसी प्रकार देखा या अनुभव किया जाता है। चेतन एक दर्पण के समान है, जो सम्मुख स्थित किसी भी वस्तु का तिरस्कार नहीं करती है, बल्कि उसको समेटती और छोड़ती चलती है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। हाल ही में उनके दार्शनिक निबंधों का संग्रह "द्रष्टा, द्रश्य और दर्शन" प्रकाशित हुआ है. अंग्रेज़ी में दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance भी प्रकाशित हो चुका है।