डिजिटल थकान: क्या निरंतर कनेक्टिविटी हमें भीतर से खाली कर रही है?
आजकल हम सब अपने-अपने मोबाइल सेट हाथ में पकडे इस बात पर चर्चा तो करते हैं कि हमारा स्क्रीन टाइम कम होना चाहिए किन्तु सच में ऐसा हो नहीं पाता। हम अपने आप को यह बहाना देते हैं कि हम फलां काम के लिए फोन उठा रहे हैं लेकिन फिर रीलें देखने लगते हैं और या फिर व्हाट्सएप्प चेक करने लगते हैं। हाल ही में हमारे साथ जुड़े लेखक डॉ शैलेश शुक्ला ने अपनी पीएचडी के दौरान न्यू मीडिया का विशेष अध्ययन किया है और वह हमें बता रहे हैं कि हमें अपने मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए डिजिटल साधनों के उपयोग में समझदारी बरतनी होगी।
डिजिटल थकान: स्क्रीन की रोशनी में खोया मन, समझदारी की ढाल ही बचाव है
डॉ. शैलेश शुक्ला
डिजिटल युग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उसने दुनिया को एक क्लिक की दूरी पर ला दिया। संवाद तत्काल हो गया, सूचनाएँ सुलभ हो गईं, कार्यस्थल सीमाहीन हो गए और सामाजिक संपर्क भौगोलिक सीमाओं से मुक्त हो गए। लेकिन इसी निरंतर कनेक्टिविटी ने एक नई समस्या को जन्म दिया है—डिजिटल थकान यह थकान शारीरिक से अधिक मानसिक है। यह केवल स्क्रीन पर अधिक समय बिताने का परिणाम नहीं, बल्कि लगातार सक्रिय, जवाबदेह और उपलब्ध रहने के दबाव का प्रभाव है। प्रश्न यह है कि क्या डिजिटल सुविधा का यह निरंतर विस्तार हमें भीतर से थका रहा है?
विश्व स्तर पर स्मार्टफोन और इंटरनेट उपयोग का समय लगातार बढ़ा है। औसतन लोग प्रतिदिन कई घंटे स्क्रीन के सामने बिताते हैं—चाहे वह कार्य के लिए हो, समाचार पढ़ने के लिए, सोशल मीडिया देखने के लिए या मनोरंजन के लिए। डिजिटल प्लेटफॉर्म इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं कि वे उपयोगकर्ता का ध्यान अधिकतम समय तक बनाए रखें। नोटिफिकेशन, तुरंत प्रतिक्रिया, अंतहीन स्क्रॉलिंग और आपके अनुकूल सामग्री—ये सब आपके ध्यान को बाँधे रखने खूँटे हैं। इसका नतीजा यह होता है कि व्यक्ति में लगातार एक उत्तेजना सी बनी रहती है।
डिजिटल थकान का पहला संकेत है ध्यान की क्षीणता। निरंतर सूचना प्रवाह के कारण गहराई से सोचने की क्षमता प्रभावित होती है। व्यक्ति एक विषय पर केंद्रित रहने के बजाय लगातार नई सूचनाओं की ओर आकर्षित होता है। यह प्रवृत्ति कार्यकुशलता और अध्ययन दोनों को प्रभावित करती है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी, जो डिजिटल वातावरण में पली-बढ़ी है, इस चुनौती का सामना कर रही है।
कार्य संस्कृति में भी इसका प्रभाव स्पष्ट है। दूरस्थ कार्य और ऑनलाइन बैठकों ने सुविधा तो बढ़ाई है, लेकिन कार्य और निजी जीवन की सीमा धुंधली कर दी है। कर्मचारी अक्सर कार्य समय के बाहर भी संदेशों और ईमेल का उत्तर देने के दबाव में रहते हैं। यह स्थिति मानसिक तनाव को बढ़ाती है। लगातार उपलब्ध रहने की कोशिश व्यक्ति को ज़रूरी आराम और आत्ममंथन के अवसर से वंचित करती है।
इस सन्दर्भ में सोशल मीडिया के प्रभाव का भी उल्लेख आवश्यक है। वहाँ निरंतर तुलना की संस्कृति विकसित हो गई है। दूसरों की उपलब्धियों, जीवनशैली और सफलता के प्रदर्शन से व्यक्ति में असंतोष और चिंता उत्पन्न हो सकती है। यह तुलना वास्तविकता के बजाय चयनित और संपादित डिजिटल छवि पर आधारित होती है। फिर भी इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव गहरा होता है। आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन प्रभावित हो सकते हैं।
डिजिटल थकान केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक प्रवृत्ति बन चुकी है। संवाद की गति बढ़ने के साथ संवाद की गहराई कम हो सकती है। तुरत-फुरत प्रतिक्रियाओं की संस्कृति में धैर्य और सुनने की क्षमता कमजोर पड़ती है। परिवारों में भी यह देखा जा सकता है कि लोग एक ही कमरे में बैठकर अलग-अलग स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। तकनीक ने दूरी कम की है, परंतु निकटता की गुणवत्ता पर प्रश्न उठे हैं।
कृत्रिम मेधा या ए आई आधारित प्लेटफॉर्म इस संरचना को और जटिल बनाते हैं। एल्गोरिदम उपयोगकर्ता की रुचियों का विश्लेषण कर सामग्री प्रस्तुत करते हैं, जिससे स्क्रीन पर बिताया गया समय बढ़ता है। यह प्रक्रिया व्यावसायिक दृष्टि से तो लाभकारी है, लेकिन उपयोगकर्ता के मानसिक स्वास्थ्य पर इसके नकारात्मक प्रभाव पर भी चर्चाएँ हो रही हैं। जब तकनीक का उद्देश्य ही उपयोगकर्त्ता को अधिकतम समय तक अपने से जोड़े रखना हो तो संतुलन की जिम्मेदारी उपयोगकर्ता पर आ जाती है।
शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल उपकरणों ने नई संभावनाएँ खोली हैं। ऑनलाइन पाठ्यक्रम, वर्चुअल कक्षाएँ और डिजिटल संसाधन ज्ञान को सुलभ बना रहे हैं। लेकिन अत्यधिक स्क्रीन समय छात्रों में एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। शिक्षा को तकनीकी सुविधा और मानवीय संवाद के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों ने डिजिटल विश्राम की आवश्यकता पर बल दिया है। “डिजिटल डिटॉक्स” जैसे विचार लोकप्रिय हो रहे हैं, जहाँ व्यक्ति सीमित समय के लिए स्क्रीन से दूरी बनाता है। यह प्रवृत्ति बताती है कि समाज इस समस्या को पहचान रहा है। लेकिन दीर्घकालिक समाधान केवल अस्थायी दूरी नहीं, बल्कि डिजिटल आदतों में संरचनात्मक परिवर्तन है।
मीडिया और तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। यदि प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ता के समय और ध्यान को प्राथमिक संसाधन मानते हैं, तो उन्हें नैतिक संतुलन भी सुनिश्चित करना होगा। नोटिफिकेशन नियंत्रण, समय सीमा संकेत और पारदर्शी एल्गोरिदमिक संरचना जैसे उपाय सहायक हो सकते हैं।
अंततः डिजिटल थकान का प्रश्न आत्मनियंत्रण और सामाजिक नीति दोनों से जुड़ा है। तकनीक को पूरी तरह त्यागना संभव नहीं, न ही आवश्यक है। लेकिन उपयोग की सीमा और उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। यदि डिजिटल साधन हमारे जीवन को नियंत्रित करने लगें, तो सुविधा का लाभ तनाव में बदल सकता है।
मानव मस्तिष्क को विराम की आवश्यकता होती है। मौन, चिंतन और प्रत्यक्ष संवाद मानसिक संतुलन के लिए आवश्यक हैं। यदि हम निरंतर कनेक्टिविटी को ही सफलता का संकेत मान लें, तो भीतर की शांति धीरे-धीरे कम हो सकती है। डिजिटल युग का अगला चरण संभवतः संतुलन का होगा—जहाँ तकनीक और मानवता के बीच सामंजस्य स्थापित किया जाएगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वयं से पूछें—क्या हम डिजिटल साधनों का उपयोग कर रहे हैं, या वे हमें उपयोग कर रहे हैं? यदि उत्तर स्पष्ट नहीं है, तो यह आत्ममंथन का समय है। हमें सदैव यह बात अपने को याद दिलाते रहना चाहिए कि डिजिटल प्रगति का वास्तविक उद्देश्य जीवन को सरल बनाना था, जटिल नहीं। और जब हम जीवन को सरल बनाने की बात को ध्यान में रखेंगे तो स्वयं ही हम डिजिटल साधनों के उपयोग में एक आदर्श संतुलन बना सकेंगे।
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डॉ. शैलेश शुक्ला करीब ढाई दशक से मीडिया, राजभाषा, अनुवाद और अकादमिक जगत में सक्रिय हैं और एक दशक तक दिल्ली में पत्रकारिता एवं शिक्षण, सिक्किम विश्वविद्यालय के पहले राजभाषा अधिकारी और एक केन्द्रीय उपक्रम के राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्य करने का पश्चात वर्तमान में सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक समूह संपादक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और सिक्किम केंद्रीय विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया है। ‘न्यू मीडिया में हिंदी साहित्य’ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त डॉ. शैलेश शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय और इग्नू के पाठ्यक्रमों सहित विभिन्न पुस्तकों में 30 से अधिक अध्यायों का लेखन किया है। उन्होंने 20 से अधिक पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है तथा देश-विदेश के विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में 40 से अधिक शोध-पत्र, लेख, कविताएँ, कहानियाँ और व्यंग्य सहित 1000 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित की हैं। डॉ. शुक्ला को भारत सरकार, गृह मंत्रालय द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार 2019-20’ और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली की हिंदी अकादमी द्वारा ‘नवोदित लेखक पुरस्कार 2003-04’ सहित विभिन्न सम्मान प्राप्त हुए हैं।