उत्तेजना, रोमांच, उल्लास और दिलों का टूटना
फीफा वर्ल्ड कप फुटबॉल के पहले-पहले मैच को बस हमने पूंछ से पकड़ लिया. कल देर शाम जब इतिहासकार एदुआर्दो गालेआनो की किताब 'सॉकर इन सन एंड शैडो’ पर आधारित मनोहर नायक का यह लेख आया तो किसी तरफ से कोई जल्द प्रकाशित करने का तकाज़ा नहीं थी. बस यह तो संयोग ही था कि हमारा ध्यान चला गया कि अरे हम तो शायद ओपनिंग मैच की तारीख ही मिस कर गए. फिर हड़बड़ी में समय चेक किया तो पता चला कि तारीख के हिसाब से तो हम लेट हो ही चुके हैं लेकिन अमेरिका के time-difference ने लाज रख ली है. भारतीय समय अनुसार आज रात साढ़े बारह बजे मेक्सिको और साउथ अफ्रीका के बीच यह मैच खेला जाएगा. अगर आप हमारी तरह फुटबॉल के बहुत फैन नहीं भी हैं तो यह लेख आपको आने वाले दिनों में रतजगा करा सकता है.
उत्तेजना, रोमांच, उल्लास और दिलों का टूटना
मनोहर नायक
अनोखा खेल है फ़ुटबॉल... इसके लिए दीवानगी का ओर-छोर नहीं। यह सिर चढ़ाकर बोलने वाला जादू है... इसके हज़ारों रंग हैं... भरपूर सस्पेंस, सनसनी, उत्तेजना। उम्मीद और बेपार ख़ुशी... निराशा और बेइंतिहा दुख। हमारे यहाँ टीवी आने के बाद से फ़ुटबॉल का क्रेज़ लगातार बढ़ता रहा है। सभी की तरह हम भी फ़ुटबॉल के जादू, रोमांच ऊर्जा और मस्ती से भरपूर विश्व कप का इंतज़ार करते हैं। ग्यारह जून को यह इंतज़ार ख़त्म हो रहा है। 19 जुलाई तक यह रंगारंग फ़ुटबॉल-कुम्भ चलेगा। इसके मेजबान अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको हैं। पहली बार 32 की जगह 48 टीमें तीनों देशों में फैले 16 स्टेडियमों में उतरेंगी। इनमें से 11 स्टेडियम अमेरिका में है। न्यू जर्सी में फ़ाइनल होगा। दुनिया में क़रीब एक महीने अब फ़ीफ़ा की सरकार होगी।
अंतहीन किवदंतियों, कथाओं, राष्ट्रीय व निजी आकाँक्षाओं, मंसूबों, अहमन्यताओं और सितारों के करतबों, क़िस्से-कहानियों, आँकड़ों, अफ़वाहों का चरमोत्कर्ष होता है विश्वकप। एक दुनिया इसका इंतज़ार करती है और महीने भर उत्कंठा, उल्लास, हैरत और हंगामे के साथ फ़ुटबॉल पिच की उथल-पुथल को अपने अंदर होती उथल-पुथल के साथ टकटकी बाँधे देखती रहती है। जैसा कि हर खेल के साथ उल्लसित और सुबकती यादें होती हैं, फ़ुटबॉल के साथ यह बेपनाह है। 1994 में इटली को अकेले दम पर फ़ाइनल में ले जाने वाले पोनीटेल वाले सितारा खिलाड़ी राबर्तो बैजियो ने इटली को सेमीफ़ाइनल में जब जिताया तब वे चोटिल थे। यह पूछने पर कि यह कारनामा कैसे किया, उन्होंने कहा 'यह शरीर तो पसीने और आँसुओं से बना है’। और देखिये राबर्तो फ़ाइनल में पेनाल्टी शूटआउट में अपना गोल दागने से चूक गए और ब्राज़ील से इटली हार गया।
अद्बितीय लेखक, पत्रकार, इतिहासकार एदुआर्दो गालेआनो की फ़ुटबॉल पर एक किताब है, 'सॉकर इन सन एंड शैडो’। विश्वकप जैसे आयोजन उसकी याद दिलाते हैं। वे मानते थे कि व्यापारिक ललक ने फ़ुटबॉल से उसकी नैसर्गिक सुंदरता छीन ली है। पर इससे उनकी उम्मीद कभी टूटी नहीं। वे लिखते हैं: ''कमाई की चाहत ने फ़ुटबॉल से खूबसूरती को जड़ों से उखाड़ दिया। खेल एक तमाशा हो गया है, जिसमें कुछ नायक हैं और अनेक तमाशबीन। फ़ुटबॉल अब देखने के लिए बन गया है और यह तमाशा दुनिया का सबसे मुनाफ़ादेह कारोबार है, जिसका ताना-बाना खेल को मुमकिन बनाने के लिए नहीं बल्कि इसमें रुकावट पैदा करने के लिए बना है। पेशेवर खेल की तकनीकी नौकरशाही ने बिजली जैसी तेज़ी और क्रूर ताक़त को फ़ुटबॉल पर थोपने में कामयाबी हासिल की है। यह फ़ुटबॉल ख़ुशियों को नकारता है, कल्पनाओं की हत्या करता है और ज़ुर्रत करने वालों को ग़ैरक़ानूनी ठहराता है।’’ फिर भी इसे वे गनीमत मानते हैं कि, ''ख़ुशक़िस्मती से मैदान पर अब भी आप कुछ गुस्ताख़ बदमाशों को देख सकते हैं, भले ही वे काफ़ी अंतराल में दिखें, जो रोमांच के आनंद के लिए अपह्रत स्वतंत्रता को गले लगाने के दुस्साहस से भरा हुआ, स्क्रिप्ट को दरकिनार कर वह पूरी विपक्षी टीम, रेफ़री और स्टैंडों में खड़ी भारी भीड़ को छका कर गोल मार देता है’’!
इसमें एक अध्याय है 'फ़ैन्स’: ''सप्ताह में एक बार फैन घर से भाग कर स्टेडियम पहुँच जाता है। हल्ला मचाने वालों के शोर से हवा भरी रहती है। ड्रम्स, पटाखे और बैनर। शहर ओझल हो जाता है, दिनचर्या भुला दी जाती है। मंदिर भर बच रहता है। फैन चाहें तो सब टीवी पर देख लें पर वह इस पवित्र जगह की तीर्थयात्रा करना पसंद करता है, जहाँ वह अपने देवताओं को उस दिन के राक्षसों के साथ साक्षात युद्ध करते देख सकता है। फैन निश्चित तौर पर जानता है रेफ़री धूर्त है और प्रतिद्बंद्बी बेइमान।" मेरे मित्र आलोक सिन्हा जो, 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में खेल के ग्रुप एडीटर थे, चेल्सी के फ़ैन थे और हमेशा कहते आज रात जागना पड़ेगा, आज मेरी टीम का मैच है। घर में ही पुत्र आनंद ने पढ़ाई-परीक्षा के सघन दिनों में भी मैसी, बार्सिलोना और स्पेन का, साथ ही जोकोविच का कोई मैच शायद ही मिस किया हो।
अपने देश उरुग्वे के अन्य बच्चों की तरह एदुआर्दो भी फ़ुटबॉल खिलाड़ी बनना चाहते थे... खिलाड़ी न बन पाये पर उसके जुनून की गिरफ़्त में ताउम्र रहे। पुस्तक के 'आत्म स्वीकृति’ अध्याय में वे लिखते हैं, ''सालों बीत गये और अंतत: अपने को स्वीकार करना मैंने सीख लिया, कि मैं कौन हूँ: ''अच्छी फ़ुटबॉल का एक भिखारी। मैं दुनिया भर में, स्टेडियमों में हाथ फैलाये जाता हूँ और कहता हूँ: 'भगवान के लिये एक सुंदर मूव।’ और जब बढ़िया फ़ुटबॉल होती है तो मैं धन्यवाद देता हूँ और मैं इसकी ख़ाक परवाह नहीं करता कि कौन सी टीम या देश यह कारनामा कर रहा है’’।
'खिलाड़ी’ के बारे में एदुआर्दो गालेआनो के उद्गार हैं: ''एक ओर स्वर्गिक वैभव उसका इंतज़ार करता है तो दूसरी तरफ़ रसातल का उजाड़। पड़ोसी उससे ईर्ष्या करते हैं। स्त्रियाँ उसके लिए आहें भरती हैं। बच्चे उसके जैसा होना चाहते हैं। पहले वह मज़े के लिए धूल और गर्द में खेलता था अब वह फ़र्ज़ के लिए स्टेडियमों में खेलता है, जहाँ उसके पास जीतने और जीतने के सिवा कोई विकल्प नहीं। व्यापारी उसे ख़रीदते हैं, बेचते हैं, उधार देते हैं शोहरत और पैसे के लिए वह यह होने देता है। उसे सैनिक अनुशासन में रखा जाता है।’’
'स्टेडियम’ शीर्षक अध्याय में वे लिखते हैं: 'क्या आपने कभी किसी ख़ाली स्टेडियम में प्रवेश किया है। कोशिश कीजिए। मैदान के बीचोंबीच खड़े होइये और सुनिये। एक ख़ाली स्टेडियम से ख़ाली और कोई चीज़ नहीं होती। दर्शक रहित स्टेडियम से ज़्यादा नि:शब्द और कुछ नहीं होता। वैम्बले में , 1966 के वर्ल्ड कप का शोर, जिसे इंग्लैंड ने जीता था, आज भी सुनाई देता है। और अगर आप ध्यान से सुनें तो 1953 की कराहें भी सुनाई देंगी, जब हंगोरियनों ने इंग्लैंड को हराया था। माटेंवीदियो का सेंटेनेरियो स्टेडियम अतीत राग में डूबा उरुग्वे फ़ुटबॉल के वैभव के दिनों की आहें भरता रहता है। ब्राज़ील की 1950 में हुई हार के लिए माराकाना आज भी रुआँसा है। ब्यूनस आयर्स से बॉमबोनेरा में आधी सदी पहले के ड्रम आज भी गूँजते रहते हैं। मिलान में गियूसेप्पे मिआज्जा का प्रेत गोल मारता रहता है, जिससे उसके नाम वाला स्टेडियम हिल उठता है। म्युनिख के ओलम्पिक स्टेडियम में 1974 का फ़ाइनल मैच, जो जर्मनी जीता, हर दिन, हर रात खेला जाता है। सऊदी अरेबिया के किंग फहद स्टेडियम में बैठने के संगमरमर और सोने के बाक्स हैं और स्टैंड में भी कालीन चढ़ा है, पर उसके पास कोई स्मृति नहीं है, ना ही बताने के लिए कुछ’’।...
गालेआनो की नज़रों से कुछ ओझल नहीं होता। 1930 के विश्व कप का जायज़ा लेते हुए वे लिखते हैं, ''मर्लिन डाइटरिच 'फ़ालिग इन लव अगेन’ गा रही थीं, मायकोव्स्की इस समय आत्महत्या कर रहे थे, वहीं अँग्रेज़ गाँधी को जेल में डाल रहे थे, क्योंकि वे अपने प्यारे देश के लिये आज़ादी माँग रहे थे।’’ ...
'मैनेजरों’ के अध्याय में लिखते हैं, ''मैनेजर फ़ुटबॉल को विज्ञान और मैदान को प्रयोगशाला मानते हैं, लेकिन इन मालिकों के लिये आइंस्टीन की मेधा और फ्रायड की सूक्ष्मदर्शिता काफ़ी नहीं। उन्हें तो गाँधी जैसी सामर्थ्य के साथ 'लेडी ऑफ़ लॉर्ड्स’ जैसी चमत्कारी शक्ति भी चाहिए’’।
ख़ैर गालेआनो साहब के फ़ुटबॉल, खेल, खिलाड़ी, मैनेजर को लेकर जो भी विचार हों, दुनिया एक महीने फ़ुटबॉल में डूबी रहेगी। बेहद युवा हुनरमंद खिलाड़ियों से लैस हैं फ्रांस, स्पेन, इंग्लैंड और ब्राज़ील की टीमें। यही इस बार फ़ेवरिट हैं, ख़ासतौर पर स्पेन और फ्रांस। देखना होगा कि अंतिम विश्व कप खेल रहे लियोन मैसी दूसरा कप जीत पाते हैं या नहीं, या पुर्तगाल की जोशीली टीम क्रिश्चियानो रोनाल्डो का कप जीतने का सपना पूरा करती है या नहीं। ये भी देखना है कि तीन देशों के 16 स्टेडियम क्या खेल की कोई सुदीर्घ और गहन स्मृति संजो पाते हैं ! एक ज़माने में सबकी तरह ब्राज़ील ही पसंदीदा टीम थी। अब तो एदुआर्दो गालेआनो की तरह यही कहते हुए देखना होता है कि, ''भगवान के लिए एक सुंदर मूव।’’
****************

मनोहर नायक : जबलपुर, मध्य प्रदेश में १९५४ में जन्म। वहीं के स्कूल, कॉलेजों, विश्वविद्यालय में शुरू से अंत तक की पढ़ाई। दिसम्बर 1977 से पत्रकारिता में प्रवेश। इलाहाबाद से नव प्रकाशित 'अमृत प्रभात' पहला अख़बार। अंतिम अख़बार दिल्ली का 'आज समाज'। इनके दरम्यान कई पत्र- पत्रिकाओं में विभिन्न पदों पर नौकरियाँ, जिसमें सबसे अधिक समय, अठारह साल, बीता 'जनसत्ता' में। जबलपुर के 'ज्ञानयुग प्रभात' के लिए भोपाल रहा। दिल्ली में साप्ताहिक 'सहारा समय' में , पाक्षिक 'प्रथम प्रवक्ता' में भी काम किया। दिल्ली में घर-परिवार। साप्ताहिक 'समय की चर्चा' का साथ और स्वतंत्र लेखन। मोबाइल नम्बर : 9811511800.