AI काल में जीने का सबब – 1
वागीश कुमार झा*
सूचना तंत्र का संजाल मानव जीवन के हर पहलू को आच्छादित कर चुका है. दशकों पूर्व इंटरनेट ने इसको एक नई उड़ान दी. अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI – जिसे हिन्दी में कृत्रिम मेधा कहा गया है), अपने विविध रूपों में एक शांत सुनामी की तरह इस पूरे खेल को बदल देने वाली है. हमारे लिए, समाज एवं समुदाय के तौर पर और एक व्यक्ति के तौर पर, इन परिवर्तनों का मतलब क्या है? शैक्षिक तकनीक, इतिहास और संस्कृति के गंभीर अध्येता वागीश कुमार झा की यह लेख श्रृंखला इन्हीं पहलुओं पर ध्यान आकृष्ट करती है. श्रृंखला का पहला लेख “खुशी का एल्गोरिथम” प्रस्तुत है।
खुशी का एल्गोरिथम
सत्य की मृत्यु हुए कुछ अरसा हो गया. अब हम सत्यातीत काल में जी रहे हैं. आपको यह नाम पसंद न आए तो आप इसे सत्येतर काल कह लें. इसके कुछ ही दशक पहले फुकुयामा ने इतिहास के मृत्यु की खबर दी थी. लोग तब भी बहुत घबराए थे. बिना इतिहास के वर्तमान का क्या करें! इतिहासहीन वर्तमान की कल्पना भी कैसे करें! जब तक लोग इतिहास के मृत्यु पर संदेह व्यक्त करते, उनको पता चला कि इतिहास केवल श्रद्धा का विषय है. मानो तो देवता नहीं तो पत्थर.
वैसे आजकल आस्था के बिना जीना तो अभिशाप ही नहीं बल्कि अपराध हो चला है. वैसे भी विष और अमृत एक ही मां के बेटे हैं, तो भाई भाई ही हुए. तो इस तरह श्रद्धा का तांडव भी अपने उत्स पर है. भगवान तक कुसमय पैदा हो रहे हैं. कहते भी हैं कि भक्तों के सामने भगवान भी मजबूर हो जाते हैं. कुछ फितूरी लोग इसे श्रद्धा का श्राद्धकाल भी मानने लगे हैं.
उधर, देवता तो और पहले ही मर गए थे. जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने एक सदी पहले 1882 में अपनी किताब 'द गे साइंस' में यह घोषणा कर दी थी. बड़ी मुश्किल से भगवान को बचाया गया. कहा गया कि भगवान के मरने की खबर पश्चिम की अफवाह है. षड्यंत्र भी हो सकता है. कुछ आस्थावान लोगों ने स्पष्ट किया कि नीत्शे अपने भगवान यानी जीसस के बारे में कह रहे थे. हमारे यहां के भगवान के साथ सब ठीक ठाक है. और अगर कुछ ऐसा वैसा हो भी गया तो हमारे यहां पुनर्जन्म की सुविधा है. भगवान का पुनर्जन्म अवतार कहलाता है.
खैर, तो भगवान तो जैसे तैसे बचे, लेकिन सत्य की मृत्यु को सच कैसे माने? यह तो एक गंभीर दार्शनिक पहेली जैसी स्थिति है. ऐसे में तो सच स्वयं ही मुश्किल ही नहीं बल्कि एक असंभव कल्पना हो गई है. आज जब सत्य स्वर्गवासी हो गया हो और असत्य काल में जीना मानव जाति की मजबूरी हो तो इसे एक सुंदर नाम देना जरूरी है. आइए इसे अमृत काल कह लेते हैं. वैसे इस सत्यहंता काल का अंग्रेजी में आजकल एक और नया नाम प्रचलित हुआ है - डीप फेक.
हिंदी शब्दकोश में नए शब्दों का प्रवेश कठिन होता है. परंपरा के लठैत संस्कृति के द्वार पर लट्ठ भांजते आज हर चौक पर मिलते हैं. पर हम जैसे हठी लोग इस 'डीप फेक' की ध्वन्यात्मक विद्रूपता से निकल कर एक सुरीला पर्यायवाची बनाने की कोशिश में हैं. इसे गहन छल कहें? या प्रगाढ़ मिथ्या या फिर गाढ़ा कपट? सफेद झूठ अगर पहली फुरसत में पकड़ा जाने वाला कृत्य है तो इसे चटक झूठ भी कहा जा सकता है. जरा आप भी सोच कर बताइएगा. तत्काल हम डीप फेक के लिए ऊपर प्रस्तावित शब्दों का अंतर-परिवर्तनशील ढंग से उपयोग करेंगे. जीवन में विविधता का भी तो महत्व है.
तो इस 'गहन छल' काल में सत्य एक स्वाभाविक सा दिखने वाला मुखौटा है. अखबारों की खबर है कि तेंदुलकर ‘प्रगाढ़-मिथ्या’ के शिकार हो गए हैं. बाकी के सितारों की बारी आने वाली है. सचिन तेंदुलकर ने हाल ही में उस प्रचार वाले आपने आप को नकारते हुए प्रेस को बताया कि उस प्रचार में दिखाया जाने वाला सचिन तेंदुलकर सच्चा वाला तेंदुलकर नहीं है. लेकिन हम कैसे जानें? अखबार की ही तो खबर है.
ध्यान रहे कि इस स्पष्टीकरण में उन्होंने अपने एक खास प्रचार में प्रयुक्त उनके हमशक्ल पर सवाल उठाया है. उन्होंने प्रचार की सत्यता या उसके अभाव के बारे में कुछ नही कहा. अच्छा किया. वरना कल को उनके वास्तविक यानी स्वयं वाले तेंदुलकर या अन्य सितारों के प्रचार भी शक की जद में आ जाते.
बाजार का खेल विश्वास पर ही तो टिका है, उनके उत्पाद की गुणवत्ता के भरोसे नहीं. हम लोग उत्पाद की गुणवत्ता की ताकीद करने वाले सितारों, फिल्मी हस्तियों, खिलाड़ियों या अन्य के नाम पर छले जाते हैं. अच्छा हुआ, सत्य ने विश्वास के लिए अपनी सत्ता छोड़ दी. वरना कोई ये भी पूछ सकता था आपको फिल्मों में काम करने करने से कब फुरसत हुई कि आप पास्ता का स्वाद बताने लगे! अखबार में छपने वाले सभी प्रचार और उसमें इस्तेमाल वस्तुओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाना उनके लिए अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मरने जैसा होगा.
अब आज कोई लाला लाजपत राय या गणेश शंकर विद्यार्थी तो है नहीं जिनके लिए अखबार या पत्रकारिता देश की आजादी का साधन था. एक मिशन था. बिना विज्ञापन पत्रकारों को लाखों रुपए की तनख्वाह कैसे मिलेगी और रंग बिरंगे पेज वाले अखबार कैसे निकलेंगे? जैसे साबुन या कार बनाना एक व्यापार है, वैसे ही अखबार निकालना एक व्यवसाय है. जो पैसा देगा उससे सवाल पूछना तो अच्छा नहीं. सत्य और असत्य का सवाल व्यक्तिगत लाभ हानि के सवाल से कतई अलग नहीं है. मालिक से सवाल कब और किसने किया है?
यहां एक भूल सुधार. सवाल भी तरह तरह के होते हैं. मसलन, सवाल अगर मालिक से सवाल पूछना ही पड़े तो ये पूछें कि आप रसगुल्ला छील कर खाते हैं या बिना छीले? रसगुल्ले को एक ही बार समग्रता में अपने मुंह में स्थान देते हैं या उन्हें धीरे धीरे छोटे छोटे, छोटे छोटे रस बिंदुओं में खंडित कर के खाते हैं? इस तरह के प्रश्न में भी मिठास होना चाहिए ताकि प्रश्न सुनते ही इसका स्वाद जीभ से पहले चेहरे पर आई लाली से पता चल जाए.
बात खबरों की हो रही थी. तो आजकल अखबार पढ़ते वक्त बहुत सावधान रहने की जरूरत होती है. क्या पता कौन सी खबर सही निकल जाए. अखबार में सच्ची खबरों का छिड़काव पिज्जा पर ऑरिगेनो की तरह होता है. चटपटे स्वाद के आवरण से आपको पता नहीं चल पाता कि पिज्जा में इस्तेमाल किया गया प्याज, शिमला मिर्च, मोजर्रेला चीज़ और टमाटर का सॉस पुराना, एक्सपायरी डेट का है या नहीं. और अगर आप रेस्टोरेंट में खाने गए हैं, तो उन चमचमाते रेस्टोरेंट वालों से कभी पूछ मत बैठिएगा कि लाओ जरा इस्तेमाल की जा रही चीजों की सत्यता प्रमाणित करो. एक तो ऐसा 'सत्याग्रह' आपके स्टेटस के अनुरूप नहीं माना जाएगा. (कभी देखा है किसी को ऐसा करते!) आपके बच्चे ही आपके खिलाफ हो जाएंगे. घर में 5 रोटी खाने वाले को एक चौथाई रोटी के बराबर पिज्जा का टुकड़ा खा कर कैसे परम संतुष्टि प्राप्त हो जाती है. (नहीं तो फिर कितनी संख्या में पिज्जा मंगवाएंगे और उनका दाम तो जोड़िए जरा!)
दूसरे आप घर से इतनी इतनी दूर अपने घर में बनी बाजरे की रोटी और खेसारी का साग छोड़ कर सबके साथ एक रेस्टोरेंट में आए हैं कि पिज्जा खाना है. (व्हाट इज खेसरी? ये खेसरी कौन सा साग होता है? मेरे ही एक बच्चे ने मुंह बनाते हुए पूछा. और मेरे मुंह में आवाज नहीं थी. क्या कहूं? कैसे समझाऊं!!)
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अब तो आप रेस्टोरेंट में बैठ कर चुपचाप विश्वास से पिज्जा मंगाइये और खाइए. और हां, इधर उधर देखते भी रहिए कि कोई जानने वाला देख रहा है या नहीं. आखिर यदि जानने वालों को पता ही नहीं चला कि आप भी डिनर पर जाते हैं तो फिर फायदा क्या! पारिवारिक इतिहास के स्वर्णिम मोड़ पर खड़े हो कर अगर आप इस बात की चिंता करने लगेंगे कि आपका मोजा फटा है तब तो हुआ आपका सामाजिक उत्थान. आगे देखिए, ऊपर देखिए...लेकिन उससे ज्यादा, नीचे देखिए. एक हिकारत भरी नजर से. खास कर उनको जो अब भी घर की ही रोटी तोड़ रहे हैं.
और हां, इस पिज्जा का फोटो ले कर सोशल मीडिया पर देना तुरंत जरूरी है. आखिर सबको पता तो चले कि वही नहीं, आप भी डिनर में पिज्जा लेते हैं. थोड़ी थोड़ी देर पर चेक भी करते जाना है कि कितने लाइक्स आए और किसने किया है. ये फुल टाइम काम है, अगर आपके पास समय है तो. अच्छा महसूस होते रहना चाहिए. खबरों में बने रहना एक उच्च कोटि की कला है. आपकी सामाजिक मान्यता और सम्मान आपके लाइक्स की संख्या का समानुपाती है.
तृप्ति के कई और कारण हैं. स्वाद के अलावा समय और पैसे की भी बचत. सोशल स्टेटस, अलग से. दो रोटी से भी कम आंटे और एक कटोरी सब्जी के इस्तेमाल से बने पिज्जा के लिए तीन सौ रुपए देते वक्त चेहरे पर शिकन नहीं बल्कि एक उपलब्धि का भाव आपकी सामाजिक स्थिति का द्योतक है. इधर हम तो बस इस बात से गदगद हैं कि हमारे बेटे का पसंदीदा थिन क्रस्टेड डबल चीज़ पिज्जा ऑनलाइन डिलीवरी से बीस मिनट में सामने हाजिर है. बना बनाया, गर्मा गरम. और उससे भी मजेदार बात ये कि 50 प्रतिशत के डिस्काउंट पर. यानी 600 रुपए का पिज्जा केवल 300 रुपए में. वो भी घर तक पहुंचा कर दे गए हैं. पैसे की कितनी बचत!
लेकिन ऐसा कैसे कर पाते हैं ये? आधे दाम में! हमारी सुविधा के लिए अपनी जेब से पैसे लगता है कोई?
कहां आप भी इस तरह के सवाल पूछने में वक्त ज़ाया कर रहे हैं. 10 रुपए किलो आलू से बना चिप्स की क़ीमत एक हजार रुपए किलो कैसे हो जाती है ये तो नहीं पूछा! न ही नमक इतना महंगा हुआ है. हां, हवा जो चिप्स के पैकेट में भरा है वो अगर शुद्ध हो तो फिर बेशकीमती है. चुपचाप आंख बंद करके पूरा परिवार मिल कर खाइए. तृप्ति मानसिक अवस्था है. डीप फेक नया शब्द होगा, अनुभूति पुरानी है.
आप समझें या ना समझें, इस कृत्रिम मेधा के द्वारा नियंत्रित सामाजिक आबोहवा के साथ साथ चलना समय के साथ रहना है, वरना आउटडेटेड हो जाएंगे. दूसरे शब्दों में, आत्म-मोहन या आत्म-छल की चरम अवस्था सामाजिक उत्थान की सीढ़ी पर आपके उर्ध्वगामी होने की आवश्यक शर्त है. लेकिन यदि आप स्वयं को ही छलें तो यह गहन-छल या डीप फेक माना जायेगा या नहीं?
खुशी एक एल्गोरिथम है, एक सॉफ्टवेयर, जो कैलिफोर्निया में बैठा कोई तय कर रहा है. तुर्रा ये कि उसे भी नहीं पता होगा कि वो जो कर रहा है, उसका क्या होगा. बाजार और कृत्रिम मेधा के व्यापार का नियंत्रण करने वालों की बहुस्तरीय साठ गांठ आम लोगों की समझ से बाहर की चीज है. कोई वीडियो वायरल कैसे हो जाता है? नही समझते हैं आप? मोए मोए...
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इन्हें भी पढ़ें :
AI काल में जीने का सबब – 2
AI काल में जीने का सबब – 3
(इस कड़ी में आगे भी लेख प्रकाशित होंगे, कृपया निगाह रखिएगा।)

*वागीश स्कूली शिक्षा, शैक्षिक तकनीक, इतिहास और संस्कृति के अध्येता हैं।
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