पूछे मुझसे मेरा दर्पण - अनीता गोयल की नई कविता
कल्पना कीजिए कि एक नवजात बच्ची को उसकी नानी ने सीने से लगाया हुआ है और उसे लिए-लिए वह घर की ड्रेसिंग-टेबल के सामने या यूं कहें कि दर्पण के सामने पहुँच जाती है. तब नानी के मन में जो विचार-शृंखला बनती है, अनीता गोयल ने उसे ही कविता में ढाला है. हो सकता है कि कुछ लोगों को यह कविता से ज़्यादा वक्तव्य लगे लेकिन उससे क्या फर्क़ पड़ेगा - हमारे सामने इतना प्यारा संवाद तो आया ना! वैसे भी 8 मार्च आने वाला है जब महिला-दिवस के अवसर पर महिलाओं और साथ ही girl-child की चर्चाएं होनी ही हैं. दुनिया की सभी प्यारी-प्यारी बच्चियों के लिए अपनी शुभकामनाएं और दुआएं देते हुए इस कविता को पढें.
क्या तुम बन पाओगी अपनी माँ जैसी
पूछे मुझसे मेरा दर्पण!
पाषाण सी शक्ति मेरी कोमल काया को
क्या दे पायेगा तेरा आलिंगन!
तेरे स्नेहमयी आँचल में छिपकर
स्वप्नमृग क्या मेरे खेलेंगे निर्भय होकर
क्या छम-छम पग बढ़ेंगे हर सीढ़ी के ऊपर!
है माँ मेरी,साथ है मेरे,न होगा किसी का डर
क्या रख पाओगी मुझ पर दृष्टि
क्या मेरा होगा तेरा हर क्षण
क्या तुम बन पाओगी अपनी माँ जैसी
पूछे मुझसे मेरा दर्पण!
कौतुहलमय नैनों का
क्या करा दोगी नए विश्व से परिचय
तेरी निश्चल पुण्य थाप से बढ़े मेरा जीवन
ख़ुद तप कर क्या तपा सकोगी मेरा भी हर कण
क्या तुम बन पाओगी अपनी माँ जैसी
पूछे मुझसे मेरा दर्पण!
कितने कठिन प्रश्न है तेरे ए मेरे नन्हे दर्पण
नहीं कोई मेरी माँ सा दूजा
मुझसे कहता मेरा मन!
प्रेम करूँगी, स्नेह करूँगी,
तुझको दूँगी अपना हर क्षण
तप करूँगी, श्रम करूँगी,
चमकाऊँगी तेरा हर कण!
हर सुबह होगी मुस्कान भरी, विश्वास भरी
हर रात्रि होगी सुकून भरी, नई आस भरी
रोम-रोम मेरा यही कहे
अपनी माँ सी जाऊँ बन
जो सीखा होगा तुझको अर्पण,
अब तेरा ही है मेरा जीवन!
तू निश्चिन्त रह मेरे दर्पण, तू निश्चिन्त रह मेरे दर्पण!

अनीता गोयल, दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती महाविद्यालय में 12 साल इतिहास पढ़ाने के बाद, मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) जा कर बस गई। वहाँ उन्होंने विक्टोरियन स्कूल ऑफ़ लैंगुएजिज़ के प्रोग्राम के अंतर्गत कई बरस माध्यमिक स्तर पर हिंदी पढ़ाने का कार्य किया। अपने आस-पास के परिवेश के प्रति सजग उनकी कविताएं सामाजिक संवेदना से सरोबर होती हैं।