कुंभ का अमृत और मूढ़मति - कुम्भ 2025
कुम्भ पर सत्येन्द्र प्रकाश का यह लेख हम इस वेबपत्रिका की किस कैटेगरी में रखें - अध्यात्म, साहित्य या विविध - हमें इस प्रश्न पर चर्चा करनी पड़ी क्योंकि इस लेख में व्यंग्य भी है (या शायद नहीं है), अध्यात्म भी है (या केवल व्यंग्य है) और एक प्यारा सा लगने वाला भोलापन भी है (या शायद वो बात को गोल-मोल ढंग से रखने की चतुराई है)! बहरहाल, आप यहाँ तक आए हैं तो इस लेख को पूरा पढ़िये और अपने निष्कर्ष निकालिए और चाहें तो अपने निष्कर्षों से हमें भी अवगत कराइए।
कुंभ का अमृत और मूढ़मति - कुम्भ 2025
सत्येन्द्र प्रकाश
इस मूढ़मति के मन में अचानक हलचल हुई। अब है तो जीवित ही, भले बुद्धि से वास्ता नहीं रहा है। जीवित है तो कभी जीवंत भी हो उठता है। हर दिन हर पल ना सही पर उसमें भी हरकत हो ही जाती है। हरकत की कौन कहे, कभी कभी तो हिल भी जाता है। हिलने से याद आया कि हाल ही में जब धरती हिली तो मूढ़मति को भी शायद हिला गई। कई दिनों से कुलबुलाहट हो ही रही थी। पहले मामूली सी हरकत हुई। फिर तो हलचल ही हो उठी।
उस हरकत-हलचल के मध्य राहू-केतु की उपस्थिति का आभास हुआ। एक दूसरे को कौतुक से देख रहे थे। सहसा उन्हें स्वरभानु याद हो आया। एक मंद मुस्कान उन दोनों के चेहरे पर पसर आई। स्वरभानु को विष्णु ने मार डाला था। आखिर उसने अमृत पीकर अमर होने की हिमाकत जो की थी, वो भी देवों का छद्म रूप धर कर! एक आम असुर की अमर होने की जुर्रत! वो बात और थी कि समुद्र-मंथन में देवता स्वयं अक्षम थे। और असुरों से बचाव के लिए अमरत्व जरूरी था जिसके लिए अमृत समुद्र-मंथन से मिलता। यद्यपि असुरों का समुद्र मंथन में सहयोग प्राप्त करने के लिए उनके राजा बलि से अमृत साझा करने का करार हुआ था, देवताओं की अमृत साझा करने की कोई मंशा थी नहीं।
राजा बलि को अमृत की क्या जरूरत! उन्हें तो सर्वस्व दान के प्रतिफल में विष्णु से अमरत्व का वरदान पहले मिल चुका था। तो क्या अपनी प्रजा अर्थात असुरों के हितार्थ ही उन्होनें अमृत मंथन में उनका सहयोग सुनिश्चित कराया। हाँ अवश्य ही उन जैसे विशाल हृदय राजा के मन में अपनी प्रजा का हित सर्वोपरि होगा।
दूसरी तरफ मोहिनी को यह काम मिला कि वह रूप-रस पान में भटका कर, असुरों को अमृत पान से हर हाल में रोके। तभी तो देवासुर संग्राम में असुरों की हार हो पाती। रूप-रस पान की साजिश स्वरभानु समझ गया और देव रूप धर देवताओं की पंगत में जा बैठा। उसका ध्यान मोहिनी के रूप-रस से अधिक अमृत कलश पर था। देवताओं की पंगत में बैठे स्वरभानु के असुर होने का बोध मोहनी रूपी विष्णु को जब तक हो, स्वरभानु के कंठ तक अमृत रिस गया। इस अनर्थ का आभास होते ही विष्णु का सुदर्शन का चल पड़ा और स्वरभानु का सिर धड़ से अलग हो गया। यह आवश्यक था, अन्यथा अमृत स्वरभानु के शरीर में प्रवेश कर जाता और वह वो अमर हो जाता। इसे तो रोकना ही था।
हलचल के बीच यह मूढ़मति राहू-केतु के कौतुक को समझने का प्रयास करने लगा। कौन हैं ये राहू-केतु। स्वरभानु के सिर और धड़ एक दूसरे से अलग स्वतंत्र अस्तित्व में राहू केतु बन बैठे। गलती से रिस कर कंठ में अटके अमृत से सिर और धड़ दोनों अमर हो गए। एक दूसरे से जुदा होने के बाद भी दोनों को अलग अलग स्वतंत्र अस्तित्व मिल गया। असुर वृति से संपोषित राहू-केतु पाप-ग्रह बन गए। अमृत का प्रभाव दोनों हिस्सों को जीवित रखे हुआ है। अमृत तो अमृत है। यह अक्षम किडनी वाले शरीर की धमनियों में दौड़ रहा विषाक्त रक्त नहीं जिसे शुद्धि के लिए बार बार डाइलिसिस की जरूरत हो। स्वरभानु बिना किसी उपचार अमृत के अचूक प्रभाव से दो स्वतंत्र ज़िंदगियाँ जी रहा है और उसकी आसुरी शक्तियों का दोहरा दुष्प्रभाव मनुष्य भुगतने को बाध्य है।
उनका यह कौतुक उनकी इन्हीं आसुरी वृतियों को इंगित कर रहा है। मूढ़मति उनके इस कौतुक को थोड़ा-थोड़ा समझने लगा। मति का मारा मूढ़मति अक्सर अपने ही दिल का शिकार हो जाता। उसका बिलखता दिल, दिमाग को बुरे संवाद प्रेषित करने लग पड़ता। समुद्र मंथन से अमृत कलश मिला, जिसे प्राप्त करने के उपक्रम में स्वरभानु अपने सिर और धड़ के अलग वजूद के साथ जीने को बाध्य है। उसी अमृत कुम्भ को बचने बचाने के उद्यम में चार स्थानों पर कलश से अमृत छलक पड़ा। इस मर्त्यलोक की धरा के वे चार स्थान अमरत्व-दायिनी शक्ति से संपुष्ट हो गए।
राहू-केतु के कौतुक का अनुमान मूढ़मति की मंद बुद्धि अपने ढंग से लगाने लगा। राहू-केतु अधूरा अमृत पान कर अमर हो चले हैं। हर छह या बारह साल में उन्हें अपनी अमरता को रिचार्ज नहीं करना पड़ता। जिन स्थानों को अमृत बूँद को निष्कंटक आत्मसात करने का अवसर मिला, उनकी इस क्षमता की पुनर्प्राप्ति छह या बारह सालों की प्रतीक्षा के बाद क्यों होती है! उन छह या बारह साल के अंतराल के बाद मिली पुण्यदायिनी शक्ति चंद दिनों में ही क्षीण कैसे होने लगती है।
अमृत कोई वाष्पशील या ज्वलनशील पदार्थ तो हैं नहीं कि क्षणिक उपस्थिति जता कर लुप्त हो जाए। यह विचार आते ही मूढ़मति के मन में विचार आया, हो न हो, यह राहू-केतु की मिलीभगत का ही परिणाम है! कुम्भ का आयोजन समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत बूँद के मर्त्यलोक को मिलने के स्मरण में होता है। और समुद्र मंथन से मिले अमृत के मात्र एक बूँद के हलक में जाने की कीमत स्वरभानु को अपना सिर अपने धड़ से जुदा कर चुकाना पड़ा, और राहू-केतु अस्तित्व में आए।
फिर जब जब उस अवसर को याद कर उत्सव का आयोजन मानव करता है, तब-तब देवों से बदला लेने की भावना का राहू केतु रूपी स्वरभानु के मन में बलवती हो उठना स्वाभाविक है। बदला लेने के लिए देव-भक्त मानवों से सुलभ और कौन हो सकता है।
अंग विच्छेदन के पश्चात विच्छेदित भाग जिसका अस्तित्व नहीं है, अक्सर “दिमागी फैन्टम” द्वारा उत्तेजित होते रहता है। विच्छेदित अंगों, जो शरीर के साथ अस्तित्व में नहीं है, में दर्द और खुजली की शिकायतों का कारण मस्तिष्क वैज्ञानिकों द्वारा “फॅन्टम इन द ब्रेन” को माना गया है। राहू जिसका धड़ नहीं है, अपने कुप्रभाव से मनुष्य शरीर के निचले हिस्से में दर्द, खुजली, फड़कन, आदि कई विकार और अस्थिरता पैदा करता है। केतु जिसका शरीर तो है पर सिर नहीं, वह गले के ऊपर के हिस्से को प्रभावित करता है। मानसिक उत्तेजना-जनित अति-सक्रियता राहू-केतु की करामात सा लगता है।
मूढ़मति की तंग बुद्धि को केतु कुरेदता है। पवित्र नदियों में स्नान पूजन आदि का महत्व शास्त्रों में वर्णित है। स्नान के लिए प्रख्यात तीर्थों में नदी स्नान का अधिक महत्व बताया जाना भी मूढ़मति के समझ की बात है। जिन स्थानों को अमृत संसर्ग का सौभाग्य है उनकी महत्ता का फिर क्या कहना। पर मूढ़मति की समझ से जो परे है वह यह कि जिस अमृत को पाकर राहू-केतु जैसे पाप-ग्रह चिरकालीन हो गए, उसी अमृत का इन पुण्य तीर्थों पर क्षणिक प्रभाव कैसे हो सकता है!
यह मूढ़मति कयास ही लगा सकता है, उसकी बौद्धिक बिसात ही क्या कि किसी गूढ गहन शास्त्रीय विधानों के विषय में कुछ आधिकारिक बात कहे। सामूहिक प्रार्थना-पूजा अर्चना का शुभ प्रभाव ना सिर्फ कई गुणा बढ़ जाता है बल्कि उन शुभ लक्ष्यों की प्राप्ति में सहभागिता भी सुनिश्चित करता है। प्रकृति से सामंजस्य वैदिक पूजा में प्रमुखता से परिलक्षित हुआ है। जल, वायु, आकाश, पृथ्वी, आदि पूज्य रहे हैं। विशेष अवसरों पर सामूहिक यज्ञ पूजा शुभ मंगल के लिए सामुदायिक संकल्प को बल देता रहा होगा। वैदिक विमर्श में कुम्भ मेला का जिक्र होना प्रकृति से सामंजस्य हेतु सामुदायिक संकल्प की पुनरावृति का अवसर रहा होगा! नदी तीरे फलती फूलती वैदिक संस्कृति में नदियाँ अक्षुण्ण जीवन दायिनी, पूज्य और पवित्र रहीं हैं। अमृत बूँद के संसर्ग को पाकर गंगा, क्षिप्रा और गोदावरी की पुण्य-जीवनदायिनी शक्ति चिरंतन और शाश्वत है।
आदि शंकराचार्य द्वारा कुम्भ उत्सवों के आयोजन को पद्धतिबद्ध करना भविष्य में अनुशासित सामुदायिक संकल्प और पूजन अर्चन का शुभारंभ रहा होगा। सामुदायिक उत्सवों में सहभागिता का सौभाग्य अवश्य भगवतकृपा है। सामुदायिक सहभागिता का विनिर्दिष्ट उदेश्य प्रकृति से सामंजस्य और सहअस्तित्व सहभागिता की अघोषित शर्तों का ध्यान सदैव रहना चाहिए।
राहू-केतु का स्व-प्रकृति-अनुरूप ऐसे उत्सवों में बदले का विशेष अवसर दिखता है, ऐसी इस मूढ़मति की सोच है। अलग सिर अलग धड़ की जिंदगी अवश्य ही पाप-ग्रहों की दुष्टता को पुष्ट करती होंगी। कुम्भ का आयोजन अपने साथ घटित दुखद क्षणों का स्मरण भी इन पाप-ग्रहों को अवश्य कराती होंगी। फिर ऐसे अवसरों पर इनका ओवर-ड्राइव मोड (अति सक्रियता मोड) में होना भी स्वाभाविक है। दिमाग और शरीर को प्रभावित कर मनुष्यों से स्वयं अपना अनिष्ट करने के लिए उकसाने और क्रियाशील करने की क्षमता रखते हैं ये पाप-ग्रह।
दिमाग को दिग्भ्रमित करना राहू केतु की फितरत है। अति उत्तेजित मन आसन्न विपदा को गौण कर स्वहित भूल जाता है। मानवता बार बार अनेक बार सामुदायिक उत्सवों में ऐसी दुर्घटनाओं का शिकार होती रही हैं। प्रयागराज कुम्भ १९५४, हरिद्वार कुम्भ १९८६, उज्जैन सिंहस्थ कुम्भ १९९२, नासिक कुम्भ २००३, हरिद्वार कुम्भ २०१०, प्रयागराज कुम्भ २०१३, और अब प्रयागराज कुम्भ २०२५, दिग्भ्रमित मानव मन की स्वरचित स्वविनाश की कथा राहू-केतु को आनंदित करती हैं। इन दुर्घटनाओं में संभवतः अपने साथ हुए का प्रतिकार दिखता है इन पाप ग्रहों को।
इस वर्ष के आयोजन की दिव्यता की चर्चा से यह मूढ़मति भी बार बार उत्तेजित हुआ। यह अवसर कई पीढ़ियों के बाद उपलब्ध हुआ है। इसे गँवाना सामने आए सौभाग्य को ठुकराने जैसा है। पर इस मूढ़मति की दिमागी शिथिलता राहू-केतु की उत्तेजित करने की क्षमता के वश का नहीं। इन पवित्र स्थानों पर अमृत के चिरंतन और शाश्वत होने में अपनी अटूट आस्था की दुहाई दे इस दरम्यान स्नान का लोभ-संवरण कर लिया है। भविष्य में किसी शुभ तिथि के स्नान को अपने अमृत स्नान का संकल्प ले इस मूढ़मति ने संतोष कर लिया है।
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*सत्येन्द्र प्रकाश भारतीय सूचना सेवा के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। इन्होंने केन्द्रीय संचार ब्यूरो और पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के प्रधान महानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएँ दी है। रचनात्मक लेखन के साथ साथ आध्यात्म, फ़ोटोग्राफ़ी और वन तथा वन्यजीवों में भी इनकी रुचि रही है।
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