एक पीढ़ी का घर
ऐसा लगता है कि इस वेब-पत्रिका के लिए ढेर सारी निबंधात्मक कहानियाँ लिख चुके सत्येन्द्र प्रकाश अब कुछ नए साहित्यिक प्रयोग करना चाहते हैं। बच्चों का विदेश जाकर बस जाना और पीछे वृद्ध माता पिता का रहा जाना आज महानगरों में आम हो चला है। उच्च मध्यम वर्ग की इस शहरी प्रवृत्ति को गाँव से आया युवक कैसे देखता है, इस कहानी में रोचक ढंग से यह बताया गया है।
एक पीढ़ी का घर
सत्येन्द्र प्रकाश
धरमेस को बिहार के अपने गाँव से दिल्ली आए अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं। वह अकेले नहीं आया था। उसके साथ उसके और आस पास के गाँव के कई युवक काम की तलाश में आए थे। राम आसरे, बिकास, महेंदर, मुनीम, उस्मान, कलेन्डर, राजेश आदि कई युवक थे धरमेस के साथ।
पूरा गाँव धरमेस को धुरमुस बुलाता था। साथ दिल्ली आए दोस्तों के लिए भी धरमेस, धुरमुस ही था। गँवई परिवेश में, धरमेस से धुरमुस बन जाना आम बात होती। ऐसी बातें सहज ही हो जाती, बिना किसी प्रयास के। धरमेस के पिता बलिन्दर राज-मिस्त्री का काम करते थे। खुद अपने गाँव और इलाके के कई गाँवों में बलिन्दर ने कई मकान बनाए थे। उस एरिया में राज-मिस्त्रियों की कोई कमी नहीं थी पर बलिन्दर के हाथ में जो सफाई थी वो दूसरे किसी के हाथ में नहीं। तभी तो सभी चाहते कि उनका मकान बलिन्दर ही बनाए।
खैर कहानी तो धरमेस की चल रही थी। छुटपन में धरमेस अपने पिता जिसे वो बाबू बुलाता था, के साथ काम पर जाता। काफी छुटपन से अपने बाबू के धोती की खूँट पकड़े रहने की धरमेस की आदत थी। उनसे अलग होकर वह दिन में अपनी मईया(माँ) परबतिया के साथ भी खुश नहीं रहता। गाँव में बच्चे वैसे तो छोटी उम्र से ही अपने माई-बाप के साथ काम करना और मजदूरी कमाना शुरू कर देते। पर बलिन्दर धरमेस को पढ़ाना लिखाना चाहता था। काम पर धरमेस का उसके साथ जाना तो एक छोटे बच्चे की बाल सुलभ जिद थी, जो किसी भी बच्चे की उसके खेलने खाने की उम्र में होती है।
अपनी पिता की कर्म स्थली पर ही धरमेस धुरमुस बन गया। मक्खन की मुलायमियत जैसी मासूमियत से यह नामांतरण हो गया जो ना बलिन्दर को खटकता था, ना ही धरमेस को। सच तो यह है मासूम धरमेस को अपने बिगड़े नाम पर फख्र होता था, कम से कम अपने बचपन तक। बलिन्दर ने जब राज मिस्त्री का काम शुरू किया था, उस समय मकान बनाने के लिए पहले नींव खुदती थी और उसमें गिट्टी, ईंट के टुकड़े, आदि डाल कर उसकी कुटाई होती। कुटाई करने के लिए लोहे का एक भारी गोला होता है। इस गोले की निचली सतह फ्लैट होती है और ऊपर बाँस की लंबी मूठ(हैन्डल) लगी होती। मूठ मजदूर के सीने की ऊँचाई तक की होती है जिसे पकड़ कर मजदूर नींव के अंदर की गिट्टी और ईंट के टुकड़े आदि की कुटाई करते थे। यह औज़ार धुरमुस कहलाता था। राज मिस्त्री का बेटा फिर बड़ी सहजता से धुरमुस बन गया। धुरमुस से सटीक और प्यारा पुकार नाम शायद और कुछ हो नहीं सकता था। इस नाम में वजन भी था, बाबू के पेशे की पहचान भी। राज मिस्त्री के पेशे से जुड़ी ‘करनी’(टीन या लोहे का पतला पतर जिसे आगे से नुकीले और पीछे गोलाकार पत्ते के आकार में ढाला गया होता और काठ की मुठिया होती), बसूली (राजमिस्त्री की हथौड़ीनुमा औजार जिसका एक सिरा छेनी की तरह होता है), और ‘साहुल’ (लोहे की छोटे लट्टू की तरह का औजार जिसे लंबे धागे से लटकाया जाता था) में वो दम-खम नहीं थी। ‘करनी’ से सीमेंट और रेत के मिश्रण को ईंट जोड़ने के लिए फैलाया जाता और लेवल किया जाता। ‘बसूली’ से ईंटें तोड़ी और काटी जाती जबकि ‘साहुल’ धागे से लटका कर राज मिस्त्री दीवार सीधी बन रही है या नहीं यह जाँचता।
धरमेस जब थोड़ा बड़ा हुआ, लगभग पाँच साल का, तो उसके बाबू ने उसका नाम गाँव के ही स्कूल में दर्ज करवा दिया। बलिन्दर चाहता था कि धरमेस पढ़ लिख कर कोई छोटी मोटी सरकारी नौकरी करे। स्कूल के रजिस्टर में नाम धरमेश ही लिखा गया। पर सहपाठियों के बीच वह धुरमुस ही रहा। दोस्ती यारी में धुरमुस धुरमुसवा हो जाता। बाबू की इच्छा के मुताबिक धुरमुस स्कूल तो जाने लगा था, पर मन उसका नए बन रहे मकानों की ओर ही खींचा रहता। अतः स्कूल की छुट्टी होते ही वह भागता हुआ उसके बाबू जहाँ मकान बना रहे होते वहाँ पहुँच जाता। वह उन्हें बड़े ध्यान से देखता। दीवार जोड़ते। ईंटों की दो लेयर के बीच सीमेंट और रेत का मिश्रण फैलाते। काम करते करते बलिन्दर कुछ बुदबुदाता रहता। बलिन्दर ‘करनी, से मिश्रण को बराबर फैला उसके लेवल को चेक करता। दीवार सीधी बन रही है या नहीं लंबे धागे से लटक रहे लट्टू के आकार के ‘साहुल’ से जाँचता। बुदबुदाते हुए वह जैसे दीवार से पूछता तुम सीधी तो हो ना, कहीं कुछ टेढ़ा तो नहीं है। ‘साहुल’ से इशारा मिलते ही बलिन्दर ‘बसूली’ से ईंटों की ठोक पीट करता, कभी साइड से, कभी ऊपर से। फिर ‘साहुल’ को ताकता और पूछता दीवार सीधी हो गई न, अब तो खुश हो। बलिन्दर को धुरमुस ध्यान से देखते रहता। वह थोड़ा अचंभित भी होता, उसके बाबू निर्जीव ईंट की दीवारों और अपने औजारों से क्या बात करते। क्या ये निर्जीव चीजें कुछ कह भी पाती हैं!
वह बाबू से पूछता, आप इन दीवारों और औजारों से क्या बोलते रहते हो! वे कुछ कहती भी हैं! बलिन्दर तुरंत जवाब देता, हाँ, वे मुझे बताती हैं कि मेरा काम ठीक है या नहीं। धुरमुस से वह कहता, ये बातें तुम्हें अभी समझ नहीं आएंगी। जब तुम काम करने लगोगे, तुम समझ जाओगे। काम कभी मौन नहीं होता! काम बोलता है!
धुरमुस भी कभी कभी उन दीवारों के समीप जा खड़ा होता जो उसके बाबू जोड़ रहे होते। उनसे पूछता, बाबू का काम ठीक है क्या? काम पर लगे बाकी कारीगर और मजदूर सही काम कर रहे है कि नहीं! धुरमुस को कोई जवाब नहीं मिलता। पर वह कोशिश करता रहता। जो मकान या घर उसके बाबू बना रहे हैं उनकी बाते अगर वे सुन सकते हैं, तो फिर किसी दिन इनकी बाते मुझे भी सुनाई देने लगेंगी, ऐसा वह सोचता।
धुरमुस दीवारों से बात करे, जीविका के लिए ‘बसूली’, ‘करनी’, ‘साहुल’ पकड़े, बलिन्दर बिल्कुल नहीं चाहता था। धुरमुस को उसका बाबू आए दिन वह हिदायत देता, पढ़ाई में दिल लगाओ, छोटी मोटी ही सही सरकारी नौकरी मिल जाएगी तो मेरे जैसा मेहनत मजदूरी तुम्हें नहीं करनी पड़ेगी। पर पता नहीं, स्कूल की बद्ध समय सीमा, मास्टर साहब का अनुशासन या व्यक्तिगत स्वच्छंदता में खलल, वो क्या बात थी जो धुरमुस को स्कूल से बाँध नहीं पाती। जैसे तैसे हाई स्कूल तक तो वह पहुँच गया, पर दसवीं दो बार में भी पास नहीं कर पाया। बलिन्दर का परिवार बड़ा होता जा रहा था। इस दरम्यान धुरमुस की छोटी बहन बिजली (बिजूरिया) और भाई जनक (जनकवा) का जन्म हो चुका था। बलिन्दर के पास अब कोई और विकल्प नहीं था। अपने साथ धुरमुस को राज मिस्त्री का काम सिखाने का निर्णय लिया। परिवार को अतिरिक्त आमदनी की जरूरत थी। धुरमुस के मन की जैसे भगवान ने सुन ली थी। उसे अपने बाबू का काम शुरू से ही पसंद था। वह यही काम करना चाहता था।
धुरमुस राज मिस्त्री का काम सीख चुका था। वह भी बाबू के साथ गाँव-जवार में मकान बनाने में बतौर राज मिस्त्री काम करने लगा। कम समय में ही धुरमुस के कार्य कुशलता की भी चर्चा होने लगी। धुरमुस की यही नियति थी, उसे राज मिस्त्री ही बनना था, सो बन गया। सरकारी नौकरी उसके किस्मत में थी ही नहीं। यही सोच कर बलिन्दर ने उसकी शादी कर दी। लछमिनिया(लक्ष्मी) से शादी के बाद धुरमुस काफी खुश था। वह पत्नी के साथ साथ बलिन्दर और परबतिया के पतोहू(बहु) के रूप में भी परिवार से अच्छी तरह घुल मिल गई थी। मजदूरी कर परिवार की आय में भी वह हाथ बटाती थी।
दो चार वर्षों तक सब कुछ सामान्य चलता रहा। बलिन्दर की उम्र ढल रही थी। धुरमुस के दो बच्चों का जन्म हो गया। बिजूरिया की उम्र देहाती मानदंडों के अनुसार शादी की हो चली थी। छोटा भाई जनकवा गाँव के स्कूल से ही पढ़ाई कर रहा था। जनक होनहार था। बलिन्दर की जो उम्मीदें धुरमुसवा से पूरी नहीं हुई थी, उसे वह जनक से पूरी होते हुए वह देख रहा था।
धुरमुस की मईया परबतिया, बाबू बलिन्दर, पत्नी लछमिनिया और उसके खुद के मेहनत मजदूरी से होने वाली कमाई इतनी नहीं थी कि बिजूरिया की अच्छी शादी हो सके और जनकवा (जनक) के स्कूल से आगे की पढ़ाई की व्यवस्था की जा सके। धुरमुस की बेटियाँ भी बड़ी हो रही थी। उनकी पढ़ाई लिखाई और आगे शादी बिआह का उसको ही सोचना था। यही समय था जब उसने दिल्ली में राज मिस्त्री का काम करने का फैसला लिया था और दोस्तों के साथ दिल्ली आ गया।
अपने इलाके के ही एक ठेकेदार जो दिल्ली में किसी बिल्डर के लिए काम करता था, धुरमुस ने चिरौरी की दिल्ली में उसे भी काम दिलवाए। उसी ठेकेदार ने इन सब को बुलाया था। इस आश्वासन के साथ कि वह इन्हें काम दिलाएगा। धुरमुस को अब अपना यह नाम खलने लगा था। धरमेस कितना अच्छा नाम है। अब उसे समझ हो आया था कि बचपन में उसका नाम लोगों ने बिगाड़ दिया था। अपने संगियों से उसने रास्ते भर मिन्नते की थी कि उसे वे सब अब सही नाम से बुलाएं। संगी साथियों ने धरमेस बुलाने का अभ्यास ट्रेन में ही शुरू कर दिया।
पूर्वाञ्चल से पूर्व में आए बहुत सारे कारीगरों मसलन राज मिस्त्री, बढ़ई, पेंटर, हेल्पर आदि दिल्ली के गोविंदपुरी के पास झुग्गियों में रहते थे। ठेकेदार ने धरमेस और उसके साथियों को अगली व्यवस्था तक गोविंदपुरी में ही ठहरा दिया। अगले दिन ठेकेदार ने सभी को साइट पर आने को कहा और वहाँ का पता बता दिया।
अगली सुबह धरमेस अन्य साथियों के साथ नए बन रहे मकान के लोकेशन पर पहुँच गया। थोड़ी देर के इंतजार के बाद ठेकेदार भी वहाँ पहुँच गया। साउथ दिल्ली के पॉश इलाके में यह मकान बन रहा था। बेसमेंट की पिलर्स तैयार थीं। बिल्डर चाह रहा था आगे काम तेजी से हो। तभी उसने ठेकेदार से राजमिस्त्री और अन्य लेबर्स की संख्या बढ़ाने के लिए कहा था। धरमेस, राय आसरे, बिकास वगैरह को ठेकेदार ने तभी तो बुलाया था। आगे का काम तेजी से हो इसके लिए बिल्डिंग मेटिरियल , ईंट, सिमेन्ट, सरिया, रेत समय से पहले सुनिश्चित कर ली गई थी ताकि काम बीच में बंद करने की नौबत न आए। इन सामानों की सुरक्षा की व्यवस्था भी करनी थी। बन रहे घर के पीछे की सर्विस लेन में दो-तीन मजदूरों के रहने का अस्थाई इंतजाम किया गया था। ठेकेदार ने जानना चाहा, कौन कौन साइट पर रुकना चाहेगा! धरमेस यह अवसर बिल्कुल गँवाना नहीं चाहता था। अपनी जिम्मेदारियाँ का अहसास उसे हर घड़ी था। उसने सोचा यहीं साइट पर रुक जाएगा तो रोज आने जाने का खर्च बच जाएगा और झुग्गी का किराया भी।
ठेकेदार ने धरमेस के साथ राम आसरे और उस्मान को भी यहीं रुकने को कहा। सुरक्षा की दृष्टि से तीन लोगों का साइट पर साथ रहना बेहतर था। और तीन साथ रहेंगे तो उनका मन भी लग जाएगा। इस मकान के निर्माण में जो मजदूर-मिस्त्री पहले से काम कर रहे थे वे भी बिहार और बिहार से लगे यूपी के थे। बोली, रहन-सहन, आदतों आदि में काफी समानता थी। अतः धरमेस और उसके संगी बड़ी आसानी से उनसे घुल मिल गए। धरमेस को भी कोई जल्दी नहीं थी अपनी काबिलियत की डींग हाँकने की। पहले से जो मैसन काम कर रहे थे उनकी कदर करना ही उसने मुनासिब समझा। हाँ इस नई कर्म भूमि में धरमेस को पता चला बड़े शहरों में राजमिस्त्री को सब मैसन कहते हैं। इस नए नाम से उसे अपना काम एकदम से अधिक सम्मान जनक लगने लगा और पूरा मन लगाकर वह काम करने में जुट गया। हुनर उसके पास थी ही। जल्दी ही उसकी काबिलियत की अलग पहचान गई।
काम के बीच बातें भी होती। पहले से काम कर रहे लोगों से पता चला, यहाँ जो घर पहले था वह बहुत पुराना नहीं था। उसे रस्तोगी साहब ने बड़े प्यार से बनवाया था। रस्तोगी साहब यानि बिमलेश रस्तोगी। वही बिमलेश रस्तोगी जिनका दिल्ली में अच्छा खासा कारोबार था। देशी विदेशी गलीचों के आयात निर्यात का। भदोही, मिर्जापुर और कश्मीर के कालीनों के साथ मिस्र, तुर्की और ईरान जैसे देशों के कालीनों का व्यापार था। मिर्जापुर के रस्तोगी साहब की कई पीढ़ियाँ भदोही और मिर्जापुर में बने कालीनों का व्यापार करती रही थी। उन्होनें पुश्तैनी कारोबार को बढ़ाया था। दिल्ली आकार उन्होंने भदोही के कालीनों के साथ कश्मीर, मिस्र, ईरान और तुर्की के गलीचों को भी अपने व्यापार में शामिल किया। पूरे देश में इन कालीनों की माँग की आपूर्ति का नेटवर्क तैयार किया था।
अपने बुजुर्गों से उन्होंने सुना था कि घर पीढ़ियों के लिए बनता है। यह बात उनके दिलों-दिमाग में गाँठ बन कर बैठ गई थी। तभी तो साउथ दिल्ली के एक पॉश कॉलोनी में पाँच सौ गज के प्लॉट में अच्छी कोठी बनवाई थी। जाने-माने आर्किटेक्ट ने घर का नक्शा तैयार किया था। सिविल इंजीनियर की निगरानी में सब काम हुआ था। बेहतरीन घर बना था। भव्यता की दृष्टि से कॉलोनी के गिने-चुने घरों में गिनती थी इस घर की। रस्तोगी साहब और उनकी पत्नी अंबिका अपने मकान को लेकर काफी खुश थे।
रस्तोगी साहब ने अपने बच्चों को प्लस टू के बाद ही उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भेज दिया था। उनके पड़ोसियों के आपसी काना-फूसी से उनके परिवार के विषय में थोड़ी बहुत जानकारी इन मजदूरों को मिलते रही थी। अधकचरी सूचनाओं की पुष्टि उस एरिया में वर्षों से घर का काम करने वाले, कपड़े प्रेस करने वाले आदि से हो जाती थी। रस्तोगी साहब खुले विचारों वाले व्यक्ति थे। स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही अपना पुश्तैनी कारोबार संभाला था। वे चाहते थे उनके बच्चे विदेशों से तालीम हासिल कर उनका कारोबार संभालें। प्रबंधन और व्यवसायीकरण के नए गुर और तकनीक के प्रयोग से कारोबार को नए मुकाम पर ले जाएँ। देश के बाहर भी उनके व्यापार का विस्तार करें।
बेटा अमन १० वर्ष और बेटी सृष्टि सात साल के थे जब रस्तोगी साहब ने मकान बनवाया था। अमन और सृष्टि, रस्तोगी साहब और अंबिका के उन्हीं सपनों और उम्मीदों की कोठी में बड़े हुए थे। बच्चों की चहक और अंबिका के ममता की महक से उनका मकान घर बना था। इसे बड़ी शिद्दत से उन्होंने आने वाली अपनी कई पीढ़ियों की सोच कर बनवाया था।
धरमेस की कहानी में रस्तोगी साहब का कुछ यूँ अचानक आ जाना, अटपटा लग रहा होगा। किन्तु कहानी न तो धरमेस की है ना ही रस्तोगी साहब की। कहानी तो घर की है और संयोग से घर रस्तोगी साहब का है। उसी घर की बातें जब से धरमेस के कानों में पड़ी थी, वह सोचने को मजबूर हो गया था कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पीढ़ियों की कौन कहे, एक पीढ़ी ने भी अपनी पूरी जिंदगी उस घर में नहीं गुजारी और उसे तोड़ कर नया बनाने की आवश्यकता पड़ गई। रस्तोगी साहब अपनी लगभग आधी जिंदगी जी कर इस घर में आए, और उनके बच्चों ने अपनी जिंदगी की एक तिहाई भी बमुश्किल ही इस घर में बिताई।
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धरमेस को यह बात खाए जा रही थी। आखिर रस्तोगी साहब की सोच को क्या हुआ था। धरमेस ने जैसा सुना था पुराने वाले घर को बने कुछ अधिक दिन नहीं हुए थे। फिर रस्तोगी साहब ने तो हर दृष्टि से उसे आने वाली कई पीढ़ियों की सोचकर बनवाया था। आर्किटेक्ट ने बेहतरीन नक्शा बनाया था। दशकों बाद भी घर की सुंदरता नजरें बरबस अपनी ओर खींच लेतीं। मजबूती भी कुछ कम नहीं थी।
सोच के इस मोड़ पर धरमेस के मन में अचानक गाँव की बात याद आ गई। उसके बाबू अक्सर चर्चा करते थे ठाकुर साहब के घर की। ठाकुर बृजभूषण सिंह के दादा जी के बनवाए घर में ही उनकी तीसरी पीढ़ी अब बूढ़ी हो रही थी। बलिन्दर, धरमेस का बाबू, ठाकुर साहब के मकान के मरम्मत या उसके विस्तार के सिलसिले में जाता रहता था। बताता था, ठाकुर साहब के बेटे पढ़ लिख कर प्रोफेसर और डाक्टर बने थे। काम काज को लेकर उनका रहना शहरों में ही रहा था। पर परदादा के पुश्तैनी घर से नेह लगा रहा था।
गाँव से जुड़े अपने विचारों में धरमेस अभी खोया ही था कि किसी की तेज आवाज उसके कानों में पड़ी, ‘ओ धरमेसया कहाँ खो गया, कुछ काम धाम भी कर ले’। वह जैसे नींद से जागा हो, ‘हाँ भैया, काम ही कर रहा था कि गाँव की कोई बात याद आ गई। पहली बार घर से बाहर जो निकला हूँ।'
‘यहाँ काम में दिल नहीं लग रहा है तो वापस चला जा। तुम्हारी लछमिनिया तुम्हें ज्यादा ही याद कर रही है, हेड मैसन (राजमिस्त्री) ने कहा।‘ ‘ना भैया ना ऐसी बात नहीं है, धरमेस बोला। यही सोचने लगा था कि गाँव के ठाकुर साहब की चौथी पीढ़ी अपने पुश्तैनी मकान में अभी भी रह रही है तो फिर इस मकान को क्या हुआ कि अभी दूसरी पीढ़ी भी ठीक से नहीं रही और इसे तोड़ कर फिर बनाया जा रहा है।‘ हेड ने फिर डपट लगाई, फालतू की बातें मत सोच, इससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। काम में दिल लगा, कहीं कुछ नुक्स रह गया तो सुपरवाइजर जान नहीं बख्शेगा।
धरमेस दीवारों की जुड़ाई में लग गया। साथ में बुदबुदाता भी रहा। जैसे उसके बाबू काम करते करते बुदबुदाते थे। पर धरमेस दीवारों से अपनी दक्षता का प्रमाण नहीं माँग रहा था, जैसे उसके बाबू किया करते। बल्कि धरमेस सोचता, हो ना हो, इन दीवारों से ही रस्तोगी साहब और उनके बच्चों के बारें में कुछ और पता चल जाए। धरमेस की उत्सुकता उनकी निजी जिंदगी में कम, पुराने मकान के टूटने के विषय में अधिक थी। उसे लगता काश! नई दीवारें या बगल वाला मकान ही कुछ कह दें। एक उम्मीद में उसकी फुसफुसाहट चलते रहती। अपने बाबू का कहा भी याद आता, काम बोलता है, काम चुप नहीं बैठता।
पर धरमेस अभी काम के विषय में नहीं, उन दीवारों से कुछ और सुनना चाह रहा था। दीवारें, छत, फर्श, खिड़की, दरवाजे और मकान से जुड़े साजो-सामान, चारदीवारी के भीतर उभरी जिन भावनाओं और संवेदनाओं की साक्षी बनी थीं, धरमेस की रुचि उन्हें जानने में थी।
उसकी जिज्ञासा लगातार बढ़ रही थी। कन्स्ट्रक्शन साइट के अपने डेरा (अस्थायी घर) में उस्मान और राम आसरे के साथ सोते समय भी कुछ बड़बड़ाता रहता। राम आसरे और उस्मान उसे बड़बड़ाता देख अचंभित थे। राम आसरे लकड़ी का काम करता था और उस्मान पेंटिंग का, इसलिए उस समय उसी बिल्डर के किसी और प्रोजेक्ट पर वे काम कर रहे थे। उन्हें धरमेस की बेचैनी का कुछ अता-पता नहीं था। “शहरियन में ठीके-ठाक घर तोड़ के काहे लोग नया बनाने लगते हैं”, उनींदे धरमेस के मुँह से ऐसा ही कुछ निकलता रहता। उसकी बड़बड़ाहट को राम आसरे और उस्मान अनदेखा कर देते।
धरमेस के बड़बड़ाने का क्रम चलता जा रहा था, तभी एक रात उसे लगा साथ के मकान की दीवारें कुछ कह रही थीं। दीवारें वास्तव में धरमेस को कुछ बताना चाह रही हैं या चंचल मन की विकलता में बिन बात ही उसके कान कुलबुला रहे थे। या पड़ोस के घर में रह रहे अंकल आंटी की आपसी की बातें दीवारों से छन कर आ रही हैं। पड़ोसी अंकल आंटी को धरमेस ने एक-दो मर्तबा देखा था। वैसे तो उम्र के लिहाज से वे धरमेस के दादा-दादी दिखते थे, लेकिन पूरब से आए मजदूरों में उम्र की अनदेखी कर छोटे बड़े सभी पुरुषों को अंकल और स्त्रियों को आंटी बुलाने का रिवाज सा था।
अंकल-आंटी की आपसी गुफ्तगू थी या उनके घर की दीवारें बोल उठी थीं, जो भी हो, धरमेस के कान कुछ स्पष्ट सुन रहे थे। अंकल आंटी अपने बुढ़ापे को लेकर चिंतित थे। यद्यपि उनकी एकमात्र बेटी ने उनकी भावनाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप ही सब कुछ किया था। पेशे से डॉक्टर बेटी दामाद अबतक उनकी एक कॉल पर हाजिर हो जाते थे, बावजूद इसके कि वे लंदन में सेटल थे। अंकल आंटी भी साल में एक बार बेटी दामाद के वहाँ हो आते थे। पर मन का क्या, विश्वास से पहले कुशंकाएँ उन्हे अपनी चपेट में लेती हैं। रस्तोगी साहब और उनके घर का हश्र उन्हें अक्सर डरा जाता।
लगभग उनके साथ ही रस्तोगी साहब, अमन, सृष्टि और अपनी पत्नी अंबिका के साथ पड़ोस के प्लॉट पर बने अपने मकान में रहने आए थे। गृह-प्रवेश कहें या हाउस-वार्मिंग – बहुत धूमधाम से सम्पन्न हुआ था। उनकी आँखों के सामने अमन और सृष्टि बड़े हुए थे। उनकी बिटिया के साथ ही खेल, कूद कर रस्तोगी साहब के दोनों बच्चे बड़े हुए थे। अपनी हैसियत के मुताबिक अमन और सृष्टि को शहर के लब्ध-प्रतिष्ठ मॉडर्न स्कूल में पढ़ाया था। दोनों बच्चे होनहार थे। सुशील भी। पैरेंट टीचर्स मीटिंग में उनकी प्रशंसा हुआ करती थी। पड़ोसियों से या स्कूल से शायद ही कभी रस्तोगी साहब को अपने बच्चों की शिकायत सुननी पड़ी थी।
पड़ोस वाले अंकल आंटी के आँखों के सामने ही पहले अमन और फिर सृष्टि की बारहवीं (प्लस टू) का परिणाम आया था। अमेरिका में पढ़ाई के लिए सभी आवश्यक जाँच परीक्षाओं को पास कर बच्चों ने रस्तोगी साहब का मान बढ़ाया था। बातचीत के दरम्यान अमन और सृष्टि की कुशाग्रता की तारीफ के पुल बाँधते नहीं थकते।
अंकल, आंटी को कह रहे थे, आज भी वह दिन याद है, जब अमन पहली बार अमेरिका से दिल्ली आया था। उसके साथ क्रिस्टी (क्रिस्टीना गार्सिया) भी थी। वह अमन के साथ उसके घर पर नहीं रुकी थी। पास के किसी होटल में ठहरी थी। छुट्टियों में सृष्टि को भी आना था। अमन चाहता था कि जब वह क्रिस्टी को मम्मी पापा से मिलवाए तो सृष्टि भी साथ हो। लेकिन उसे किसी प्रोजेक्ट के संदर्भ में रुकना पड़ गया था। बहन के आने से पहले अमन क्रिस्टी को अपने पैरेंट्स से मिलवाना नहीं चाहता था, शायद ऐसी बात नहीं थी लेकिन सृष्टि की उपस्थिति उसका आत्मबल बढ़ाती।
धरमेस को अंकल की कई बातें समझ नहीं आती। उनकी गूढ बातें धरमेस की सोच के अनुरूप अपना स्वरूप बदल लेतीं या यूँ समझिए अंकल आंटी के आशंकित मन की व्यथा और धरमेस की रस्तोगी साहब के घर टूटने के रहस्य की खोज एकरूप हो स्वयं एक कहानी में तब्दील हो जाते।
धरमेस समझ गया था। अंकल आंटी का व्यथित मन ही इस रहस्य का खुलासा करेगी। उसका दिल करता कि वह किसी तरह अंकल आंटी से अपने ताल्लुकात बढ़ाए और उन्हीं से पूछ ले। पर यह संभव नहीं दिखता। आम तौर शहरी लोगों का मन मजदूरों को लेकर आशंकित ही रहता है। धरमेस फिर मौके की ताक में रहने लगा। इस विषय में अंकल फिर कब बात करेंगे। पर उसे अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा। एक शाम अंकल के कुछ दोस्त अपनी पत्नियों के साथ उनसे मिलने आए थे। खुशनुमा मौसम में दोस्तों के साथ अंकल ने घर की छत पर ही कुर्सियाँ लगवा ली थी। जब भी दोस्तों के साथ खाने पीने का, प्रोग्राम बनता, अंकल ऊपर ही बैठते। दिन का काम खत्म कर धरमेस भी अपने डेरा में आराम कर रहा था। उस्मान और राम आसरे अभी नहीं आए थे। वे जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे, वहाँ वुड-वर्क और पेंटिंग का काम चल रहा था। इन्हें अक्सर देर हो जाती।
बातों-बातों में रस्तोगी साहब की चर्चा अंकल ने अपने दोस्त से छेड़ दी। छत से उनकी बातें सर्विस लेन में बने धरमेस के डेरे में थोड़ी बहुत सुनाई दे रही थी। रस्तोगी साहब का नाम आते ही धरमेस के कान खड़े हो गए। ध्यान लगा धरमेस उनकी बातें सुनने लगा। वे कह रहे थे, रस्तोगी साहब का ध्यान आते ही कुछ अजीब सा लगने लगता है। सोचा नहीं था, इतनी उम्मीदों के साथ बना मकान इतनी जल्दी बिल्डर के हाथ चढ़ जाएगा। वे कहा करते थे, विचरण के लिए तो पूरा आसमाँ खुला है। पर पंछी अपना घोंसला नहीं भूलते। बच्चे की कर्म भूमि जो भी हो, घर से उनका नाता नहीं टूटेगा। इस विश्वास की डोर को उन्होंने बड़ी दृढ़ता से थाम रखा था।
अंकल कह रहे थे, अभी उसी दिन तो हम बातें कर रहे थे, जब अमन क्रिस्टी को साथ लेकर आया था। अपने मम्मी-पापा के खुले विचारों और अपने प्रति उनके प्यार को जानते-समझते भी अमन थोड़ा डरा-सहमा था। शायद एक विदेशी के साथ संबंध की स्वीकृति आसान ना हो। अमन ने सहमे स्वर में पहले अपनी माँ अंबिका को बताया, अमरीका से उसकी दोस्त भी साथ आई है। वह उसे मिलवाना चाहता है। बातों की सकपकाहट से अंबिका ने तुरंत भाँप लिया। बात दोस्ती से आगे की है। अंतरराज्यीय और विजातीय रिश्तों की बात होती तो बिमलेश से अंबिका तुरंत बात कर लेती। किन्तु धर्मेतर अंतर्राष्ट्रीय रिश्ते को लेकर बिमलेश की प्रतिक्रिया के विषय में अंबिका दुविधा में थी। एकदम से इनकार ही ना कर दे।
अंबिका को जहाँ बेटे की भावनाओं की चिंता थी, वहीं एक अलग माहौल में पली-बढ़ी लड़की के साथ सुखी दाम्पत्य के प्रति आशंका भी थी। बिमलेश से अंबिका बात करे, इससे पहले उसने सोचा, एक बार अमन को ऐसे दाम्पत्य की संभावित कठिनाइयों से आगाह कराना उचित होगा। अपनी तरफ से अमन बिल्कुल आश्वस्त था क्रिस्टी को लेकर। माँ को भी उसने आश्वस्त किया। क्रिस्टी आसानी से अडजस्ट कर जाएगी अपने परिवार में। दरअसल वह भारतीय संस्कृति को समझती है और उसका आदर करती है।
भावनाओं के समक्ष तर्क और बुद्धि शीघ्र हथियार डाल देते हैं। इस सिलसिले में भी अंबिका और बिमलेश ने क्रिस्टी से मिलने का निर्णय लिया। आशा के विपरीत, क्रिस्टी उन्हें बहुत सरल और सहज स्वभाव की लगी। रहन-सहन, खान-पान, परंपरा आदि की भिन्नता और उसके वजह से दाम्पत्य की कठिनाइयों पर भी उन्होंने क्रिस्टी से चर्चा की। मिलनसार स्वभाव की क्रिस्टी से प्रभावित हुए बिना बिमलेश-अंबिका नहीं रह पाए। रस्तोगी साहब ने फिर भी अमन और क्रिस्टी दोनों को पहले पढ़ाई पूरी करने और एक दूसरे को बेहतर समझने के लिए रिश्ते को और वक्त देने को कहा।
अपने करिअर के संदर्भ में अमन और क्रिस्टी की राय थी कि पहले वे यूएस में ही कुछ शुरू करेंगे ताकि वे कारोबार को वैश्विक नजरिए से देख पाएं। भविष्य में क्या करना वे उसके बाद तय करेंगे। रस्तोगी साहब को अपने बिजनस के प्रति अमन का स्वाभाविक झुकाव नहीं दिखा। अमन और क्रिस्टी आश्वस्त हो कर यूएस वापस चले गए, पर रस्तोगी साहब के मन में एक कसक छोड़ गए। पहली बार ऐसा लगा शायद कालीन का पुश्तैनी व्यापार उन्हीं तक सिमट कर रह जाएगा।
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रस्तोगी साहब और उनके परिवार की कहानी कुछ आगे तो बढ़ी, पर उसकी रफ्तार धरमेस की अपेक्षा से बहुत कम थी। अमन और क्रिस्टी के संबंधों से धरमेस की रुचि उनके निजी जिंदगी में भी बढ़ गई थी। धरमेस को अब यह लगने लगा था कि पुराने घर का भविष्य रस्तोगी साहब के बच्चों के भविष्य के साथ जुड़ा था। वैसे होता भी यही है, रस्तोगी साहब ने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने की दृष्टि से ही इतना भव्य घर बनवाया था। पैरेंट्स के लिए बच्चों की खुशी और उनकी आने वाली जिंदगी की सुरक्षा सर्वोपरि होती है।
एक अमेरिकन लड़की का बिमलेश रस्तोगी के बेटे की जिंदगी में आने से कहानी ने नई मोड़ ले ली थी। कम से कम धरमेस के लिए तो ऐसा ही था। क्या इस अमेरिकन लड़की के कारण ही अमन ने वापस लौटने से मना कर दिया था? लेकिन उनकी बेटी सृष्टि का क्या हुआ? कहानी की गुत्थियाँ धरमेस के लिए सुलझने की बजाय और उलझती जा रहीं थीं।
धरमेस क्या करे कि पूरी कहानी एक बार में स्पष्ट हो जाए। क्या पता आंटी या दोस्तों के साथ अंकल की इस संदर्भ में अगली बात कब हो? इसकी अगली चर्चा जब हो उस समय धरमेस ना जाने कहाँ होगा? किन्तु इतना वह समझ गया था कि अंकल आंटी प्रमुख चिंताओं में रस्तोगी परिवार की चिंता ही थी। और ऐसा है तो जल्दी ही आगे की गुत्थी भी सुलझेगी।
काम करते समय धरमेस का एक कान अंकल आंटी के घर अंदर चल रहे क्रिया कलापों पर भी लगा रहता। दिमाग में कोई बात घर कर जाए तो इंसान उसकी चर्चा के बहाने ढूँढता है। रस्तोगी साहब के साथ जो भी घटा था वह अंकल आंटी के दिलों-दिमाग पर इस कदर हावी था कि पूछिए मत!
कहानी कुछ यूँ आगे बढ़ी। हल्की ठंड थी। आंटी छत पर धूप सेंक रही थी। काम वाली ऊपर के कमरे और छत की सफाई कर रही थी। काम वाली ने उस दिन काम करते करते अंकल की उदासी की बात आंटी से छेड़ दी। ‘आजकल अंकल परेशान दिखते है, क्या बात है आंटी।‘ आंटी तो अवसर ही तलाश रही थीं। ‘क्या बताऊँ, जब से पड़ोस का घर या मकान जो भी कहो, तोड़ कर नया बनना शुरू हुआ, इन्हें कुछ हो गया।‘ अभी 10 दिन भी नहीं हुए, इनके दोस्तों के बीच चर्चा छिड़ गई थी। ‘तुम्हें तो सब पता है, ये घर जब बने थे तब से इधर तुम्ही काम कर रही हो।‘ अमन और क्रिस्टी का बता रहे थे। बोलते-बोलते भावुक हो जाते। रस्तोगी साहब ने उन्हें स्वीकार कर लिया था। वे दोनों प्रसन्न चित वापस चले गए थे।
उसके बाद अमन, सृष्टि और क्रिस्टी का साल में एक बार दिल्ली आना हो ही जाता था। एक दो बार तो क्रिस्टी सिर्फ सृष्टि के साथ ही आई थी। अब वह सृष्टि के साथ रस्तोगी साहब के घर पर ही रुकने लगी थी। कभी लगा ही नहीं कि वह परिवार की सदस्य नहीं है। हम सब से भी तो वह घुल-मिल गई थी। कहती थी, ‘इंडिया उसे बहुत पसंद है, यहाँ के लोग, उनकी गर्मजोशी, परिवार में आपसी प्रेम-भाव, यहाँ की खिली हुई धूप, गुलाबी ठंड आदि उसे बलात अपनी ओर खींचती थी’। रस्तोगी साहब, अंबिका, सृष्टि सब का दिल उसने जीत लिया।
उधर अमन ने जेनेरेटिव एआई और रोबाटिक साइंस तथा क्रिस्टी ने गेमिंग व गेमिंग एप और वी एफ एक्स की अपनी पढ़ाई पूरी कर यू एस में ही जॉब करने लगे। फिर धूम धाम से इनकी शादी भी हो गई। सृष्टि ने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और शादी के बाद पति के साथ टोरोन्टो शिफ्ट कर गई।
आंटी बता रहीं थी, सब ठीक चल रहा था, कुछ भी असामान्य नहीं था। हाँ, एक बात अब रस्तोगी साहब को स्पष्ट होने लगी थी। अमन की उनके बिजनस में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कालीन-गलीचों की नफ़ासत एआई, गेमिंग, वीएफएक्स की बढ़ती चकाचौंध के सामने फ़ीकी पड़ रही थी। क्रिस्टी ने भी गेमिंग एप में निपुणता हासिल की थी। पति-पत्नी दोनों को खानदानी व्यापार पिछड़ेपन की निशानी लग रहे थे। वे समय के साथ दौड़ना-भागना चाह रहे थे, ना कि लकीर का फकीर बन कर जीना।
वैश्विक नजरिया प्राप्त कर पुश्तैनी धंधे के विस्तार की बात याद दिलाने पर अमन उत्तेजित हो जाता। नया पुराना साथ ले कर चलने का मशवरा भी उसे रास नहीं आता। वैश्विक गाँव की अवधारणा की दुहाई देकर क्रिस्टी एक बार इंडिया और अमरीका के कारोबार के बीच सामंजस्य की बात सोच भी लेती, अमन इस मुद्दे पर कोई विचार ही नहीं करना चाहता। एक मुकाम पर पहुँच कर वापसी उसे अपनी तौहीन लगती थी। देशी आबोहवा अमन को दूषित लगने लगी थी। क्रिस्टी से पहले वह बोल उठता, यहाँ की भीड़ दमघोंटू है। इंडिया में सिविक सेन्स तो लोगों में है ही नहीं। बड़ी आसानी से कह डालता, मैं अपने बच्चों को जहरीली हवा में साँस लेने को मजबूर नहीं कर सकता, वह भी तब जब विकल्प है।
रस्तोगी साहब को सन्न मार गया जब अमन की बातें उनके कान में पड़ी। और तो और अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए अमन कहने लगा, बेहतर एजुकेशन भी तो अमेरिका में ही उपलब्ध है। नहीं तो इंडिया में रहते हुए आप मुझे और सृष्टि को पढ़ाई के लिए अमेरिका क्यों भेजते? अमन कह रहा था, अगर हम अमेरिका में रहेंगे तो बच्चों को अच्छी शिक्षा स्वतः मिल जाएगी। अमन के तर्कों ने रस्तोगी साहब को निरुत्तर कर दिया। अमन उन्हें दिलासा जरूर दे रहा था कि डायरेक्ट फ्लाइट के कारण न्यूयॉर्क और दिल्ली की दूरी भी सिमट गई है। हम आते जाते रहेंगे। बच्चों की छुट्टियाँ तो आप लोगों के साथ ही गुजारेंगे।
बिमलेश रस्तोगी को अमन की बातें अब झूठी दिलासा से अधिक कुछ नहीं लग रही थी। आकांक्षी जीवन के सपने बच्चों को माता पिता ही दिखाते हैं। फिर जब उनकी महत्वाकांक्षाएँ उन्हीं माता पिता की उम्मीदों को रौंदती आगे बढ़ जाती हैं तो ‘कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे’ के अतिरिक्त हाथ कुछ नहीं लगता।
सृष्टि की ससुराल के लोग पिछली तीन पीढ़ियों से कनाडा में रह रहे थे। फिर उसके स्वदेश वापसी की गुंजाइश रस्तोगी साहब ने उसकी शादी के साथ ही समाप्त कर दी थी।
आंटी की बातों की ओर कान रखते हुए धरमेस मुस्तैदी से अपने हिस्से की दीवार जोड़ता जा रहा था। मन का कुतूहल शांत हो, धरमेस यही चाहता था। पर काम में कोई नुक्स रह जाए उसे बिल्कुल मंजूर नहीं था। अतः बात सुनने के साथ काम पर भी धरमेस का पूरा ध्यान था। आंटी की बात सुनते सुनते काम वाली कहने लगी, ‘आंटी इसमें तो उदास होने वाली कोई बात ना है। अगर बच्चे पढ़ लिख कर काबिल बनेंगे तो देश क्या और विदेश क्या। जहां अच्छा काम मिलेगा वहीं न रहेंगे।‘ काम वाली अपने समझ कि हद से आगे की बात कर रही थी। लेकिन धरमेस के भेजे में उसकी बातें साफ थी। आखिर उसका दिल भी तो करता है अरब जाने का। उसके गाँव गिराव के कई लोग पैसे कमाने के लिए ही तो सऊदिया, अबू धाबी, दुबई और पता नहीं कौन कौन देश भटकते हैं।
आंटी की काम वाली यही बात बोलते बोलते निकल गई। आंटी फिर जब आऊँगी तो बताना। अभी और दो घर का काम बाकी है। देर होगी तो डाँट पिटेगी।
बात की तह तक वह जल्दी पहुँच जाएगा, धरमेस को अब विश्वास हो चला था। राम आसरे और उस्मान के आने पर उन्हें रस्तोगी साहब की बात बताने लगा। उन दोनों को भी उसकी बातों से रस मिल रहा था। पर छेड़ते हुए राम आसरे बोला ‘अरे उस्मान भाई जानते नहीं हो, धरमेसवा की आदत है फालतू में दिमाग खपाना।‘ अरे अपने काम से काम रखो, और ऐश करो। अब रस्तोगी का मकान काहे टूटा इसकी खबर भी धरमेस बाबू को होनी चाहिए। नहीं तो उसके पेट में दरद होने लगेगा।; राम आसरे की बात काटते हुए उस्मान बोला, ‘ए धरमेसवा बोल का बोल रहा था। रमअसरेवा को भी मजा मिल रहा था, पर झूठे तुम्हारी टाँग खींचने लगा।'
थोड़ी झेंप के साथ धरमेस ने वो सारी बातें दुहरा दीं, जो उसने अब तक सुना था। आगे क्या हुआ होगा इसका अंदाजा भी धरमेस को थोड़ा बहुत होने लगा था। अगली सुबह वह फिर उसी साइड की दीवार पर काम करने लगा जो आंटी के घर से सटा था। कल तो इत्तिफ़ाकन ही उधर का काम धरमेस को मिला था। आंटी जैसे कामवाली की बाट जोह ही रही थीं कि वह आ धमकी। बोलने लगी सोचा कि आपका काम पहले निपटा लूँ और आपसे अंकल की परेशानी वाली बात भी पूरी जान लूँ। इसीलिए जल्दी आ गई। आंटी ने उससे कहा नीचे का काम निपटा कर छत पर चल, मैं थोड़ी धूप में भी बैठ लूँगी और बाते भी हो जाएगी। अब इन बूढ़ी हड्डियों को धूप की काफी जरूरत है। धरमेस ने अपने कान उधर ही टिका रखा था। आंटी बताने लगी, कई वर्षों तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। अमन, क्रिस्टी और फिर उनके बच्चे भी साल में एक बार जरूर आते। सृष्टि भी कभी पति के साथ और कभी अकेले आती जाती रही। अमन, सृष्टि और उनके बच्चों के आने पर रस्तोगी परिवार चहक उठता। आए दिन पार्टियाँ होती। अमन और सृष्टि के स्कूल के दोस्तों के साथ रस्तोगी साहब अपने और अंबिका के मित्रों को बुलाना नहीं भूलते। सबको बच्चों से मिला कर खुश होते।
पर धीरे-धीरे ये क्रम टूटने लगा। अमन और सृष्टि के बच्चे बड़े होने लगे। कभी उनके छुट्टियों का हवाला दे कर तो कभी अपने जॉब की कोमीटमेंट बताकर उनका इंडिया आना टलने लगा। रस्तोगी साहब और अंबिका की उम्र भी बढ़ रही थी। फिर बच्चों से दूरी का तनाव और उम्र का असर उनके कारोबार पर भी दिखने लगा। अमन दबाव बनाने लगा कि वे अपना कारोबार धीरे धीरे समेटना शुरू कर दें। अन्यथा ऐसा ना हो कि घाटा उठाना पड़े। अक्सर ऐसा दबाव भावनाओं का भेष बदल लेता, और बुढ़ापा को उसके समक्ष घुटने टेकते देर नहीं लगती।
कारोबार सिमटने लगा, और खाली दिमाग चिंताओं को आश्रय देने लगा। फिर एक दिन रस्तोगी साहब के दिमाग की नसें जवाब दे गई। भारी ब्रेन हेमरेज का शिकार हो गए। अमन और सृष्टि के आने से पहले ही उनकी साँसे थम गईं। अंबिका ने शुरू में काफी हौसला दिखाया। बच्चों को उलटा दिलासा दिया, वे उनकी चिंता ना करें। वे अपने सोशल वर्क में खुद को व्यस्त रखेंगी। फिर बारी-बारी अमरीका और कनाडा भी आती जाती रहेंगी।
कई बार नियति आत्मबल को शिकस्त दे देती। रस्तोगी साहब को गुजरने के अगले साल ही अंबिका की याददाश्त अचानक चली गई। आंटी कुछ अग्रेजी में कह रही थीं। डिमेनसिया! हाँ डिमेनसिया जिसमें आदमी सब कुछ भूल जाता है। अपनी पहचान, अपना पता, अपने बच्चे कुछ भी तो याद नहीं रहता। खाने पीने तक की सुध चली जाती है। अमन और सृष्टि के लिए भी यह बड़ी विकट स्थिति थी। अमरीका, कनाडा की नागरिकता के अभाव में माँ को अपने साथ लेकर जा नहीं सकते। स्वयं लंबे समय के लिए इंडिया आकार रुकना भी उनके लिए संभव नहीं था। भाई बहन ने निर्णय लिया की कोई ऐसा वृद्धाश्रम हो जहाँ ऐसे वृद्धों की देखरेख संभव हो, तो माँ को वहीं छोड़ दिया जाए। खर्च की चिंता से अधिक माँ की अच्छी देख-भाल और अपनी बाध्यताओं की चिंता थीं।
इस हालात में अंबिका भी अधिक दिन नहीं जी पाई और अपने बच्चों को निश्चिंत कर गई। माँ के मरते ही भाई बहनों का बचा-खुचा लिहाज भी खत्म हो गया। एक घर के लिए पलट के लिए देश वापस आना अलाभकारी के साथ गैर-मुनासिब भी लगा। और वे शीघ्र बिल्डर के प्रलोभनों के प्रभाव में आ गए। आर्थिक रूप से उसे बेचना ही भाई-बहनों को उचित और समयानुकूल लगा। बिल्डर भी पुराने मकान को ध्वस्त कर नई नीति के अनुरूप बेसमेंट के साथ चार मंजिला मकान बना अधिकाधिक लाभ उठाने की योजना पर अमल करने की योजना बना रहा था।
आंटी बोलीं, अंकल की परेशानी की वजह यही कि उन्हें लगता है जैसे सब कुछ अपने साथ घटा हो या घटने वाला हो। डर तो मेरे मन में भी है, पर कल की चिंता में आज बर्बाद करना मुझे गवारा नहीं है। यही मैं उन्हें भी समझाती हूँ, किन्तु उन्हें जैसे चिंता करने की लत सी हो गई है।
धरमेस के सामने अब सब कुछ साफ था। सोचने लगा, पुराने की जगह नए मकान पहले भी बनते रहे हैं, पर पहले घर नहीं टूटते थे, ना ही परिवार बिखरते थे। माँ की ममता और पिता की छत्रछाया सब को साथ जोड़े रखती थी। धरमेस के दिल में भी एक भय पैठ गया, कहीं बड़े शहरों के नक्शे-कदम देश के गाँव भी चलने लगे तब क्या होगा। घर पीढ़ियों के लिए बनता है वाली बात क्या आज के युग में बकवास हो चली है।
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सत्येन्द्र प्रकाश भारतीय सूचना सेवा के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। इन्होंने केन्द्रीय संचार ब्यूरो और पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के प्रधान महानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएँ दी है। रचनात्मक लेखन के साथ साथ आध्यात्म, फ़ोटोग्राफ़ी और वन तथा वन्यजीवों में भी इनकी रुचि रही है।