सुबह की स्टीमर और सोंसों का संग
सत्येन्द्र प्रकाश की अधिकांश कहानियाँ अथवा संस्मरण, आप जैसे भी उनकी रचनाओं को देखना चाहें, समय काल और परिस्थितियों के बारे में बहुत कुछ बताती चलतीं हैं। आज की कहानी में उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला चार दशक से कुछ पुराना स्टीमर भी है और पटना शहर की गंगा के एक तट से दूसरे तट पर जाने की यात्रा में साथ चलते सोंसो और उसके शिशु भी हैं। सोंसो अर्थात गंगा डॉल्फिन अब विलुप्त प्राय है और इसे कुछ वर्ष पूर्व भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है। जैसा कि आपने इनकी पूर्व रचनाओं में देखा होगा, इनका गद्य भी कभी-कभी काव्यमय हो उठता है, इस विशेषता की बानगी भी आपको इस रचना में मिलेगी।
सुबह की स्टीमर और सोंसों का संग
सत्येन्द्र प्रकाश
भारतीय रेल के विरासत की कहानी पटना स्थित महेंद्र घाट और वहाँ से चलने वाली स्टीमर्स के बिना अधूरी रहेगी। महेंद्रू संभवतः रेलवे का एकमात्र पटरी विहीन स्टेशन रहा होगा। फिर भी प्रांत की राजधानी के प्रमुख स्टेशनों में शुमार था। बड़े अधिकारियों और राजनेताओं के आवभगत की सुविधाओं से सज्ज इस स्टेशन को रेलवे से पूरा मान सम्मान मिला था। आखिर मध्य बिहार के उत्तरी और दक्षिणी भाग साथ ले चलने का भार जो इसके कंधों पर था। बिहार में जब रेलवे का विकास हुआ तो पटना के रेलवे नेटवर्क को उत्तर बिहार के रेलवे नेटवर्क से जोड़ने के लिए महेंद्रू घाट से सोनपुर के पहलेजा घाट तक स्टीमर सेवा की नींव रेलवे ने ही रखी।
पटना के गुलजार बाग को हाजीपुर से जोड़ने वाले गाँधी सेतु के अस्तित्व में आने से पहले गर्दन के नीचे के बिहार के दो लगभग स्वतंत्र वजूद थे - उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार! उस समय बिहार के पूर्वी हिस्से में, उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला एक ही ब्रिज था - मोकामा का राजेन्द्र सेतु। अगर बिहार का दिल, अग्नाशय, गुर्दा आदि दक्षिणी बिहार में था तो जिगर, पिताशय, आँत वगैरह उत्तरी बिहार में। चिंतन केंद्र (दिमाग) भी जैसे दो धड़ों में बँटा रहा। भागलपुर (विक्रमशीला), मुजफ्फरपुर(वैशाली) शरीर के एक तरफ तो मगध(गया एवं बोध गया), नालंदा, पटना (पाटलीपुत्र) दूसरी ओर।
दिल को जिगर के करीब लाने वाले महेन्द्रू घाट को और भाप से चलने वाले स्टीमर को जो मान सम्मान मिला, ये दोनों अवश्य ही उसके हकदार हैं। कहते हैं कि सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र (महिंद) और पुत्री संघमित्रा ने इसी घाट से बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए प्रस्थान किया था। राजपुत्र महेंद्र के नाम से इस घाट को अपना नाम मिला है।
कालांतर में भी इस घाट का प्राचीन गौरव बना रहा। राज्य को उत्तर बिहार ने कई मुख्यमंत्री दिए। उन्हें उनके गाँव या शहर से मुख्यालय लाने ले जाने का गौरव इन्हें यानि महेन्द्रू घाट और स्टीमर दोनों को मिलता रहा है। बिन पटरी रेलवे स्टेशन होने का मलाल महेन्द्रू को कभी नहीं रहा। बल्कि अपने अनूठे अस्तित्व का अलख बजाना उसकी आदत बन गई थी।
उस महेन्द्रू घाट से आते जाते उत्तर बिहारियों की कई यादें जुड़ी हैं। युवावस्था में यात्रा महज़ एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचने का उपक्रम नहीं होता। राह में अगर स्वतः संभव नहीं हुआ तो उपार्जित रोमांच की तलाश सदैव रहती। कुछ यही हाल पटना यूनिवर्सिटी के उन हॉस्टल-वासी विद्यार्थियों का होता जो किशोरावस्था से निकल कर युवावस्था की दहलीज़ पर दस्तक दे रहे होते! गंगा नदी पार करना अपने आप में रोमांचकारी होता। खासकर तब जब आप मैदानी इलाके से आते हों। नदी का विस्तार एक नजर में ही किसी को रोमांचित कर दे। उसे पार करने की कल्पना भर से तरुण हृदय अभिभूत हो उठता। तीव्र धारा और चौड़े पाट वाली नदी के उस पार सड़क मार्ग और पुल के अभाव में किस सवारी से जाएंगे! साधारण नाव से यह मुश्किल क्या असंभव लगता है! कुछ नाविक और मछुआरे नाव से पार करने का जोखिम मोल भी लें, आम जन के लिए यह बिल्कुल ही मुनासिब नहीं है, सुरक्षित नहीं है।
याद दिला दें कि बात तब की हो रही है जब पटना का गाँधी सेतु नहीं बना था। उस समय उत्तर बिहार से राजधानी पटना तक की यात्रा अक्सर रोमांचकारी हो जाती। कारण भिन्न हो सकते थे, पहली बार भाप से चलने वाली बड़ी नाव, जिसे स्टीमर कहा जाता था, की सवारी हो, या समान दूरी के बावजूद आने और जाने में लगने वाले समय में भिन्नता हो, या फिर मझधार में किसी तकनीकी वजह से स्टीमर का फंस जाना हो। रोमांच की वजह बिन बुलाए ही पैदा होतीं और वो क्या होंगी, उनका पहले अंदाज़ लगाना संभव ना होता! किसके हिस्से क्या आएगा, निरा उसके भाग्य की बात होती।
सुबह-सुबह की स्टीमर-यात्रा के कल्पना मात्र से रोमांच होता था। कॉलेज की छुट्टियों के समय यार-दोस्तों के साथ सुबह की स्टीमर पकड़ने की तैयारी अपने आप मन को उत्तेजित कर देती। उस उम्र में सुबह की कोई योजना विद्यार्थियों के लिए माउंट एवरेस्ट फतह करने से कम नहीं होती। ब्रह्म-मुहूर्त की पढ़ाई से पाठ जल्दी याद होता है! चित एकाग्र होता है, मन शांत रहता है! अतः पढ़ाई का उपयुक्त समय यही होता है! यह सब अब पुरानी बाते थीं। काल खंड के उस दौर में वही छात्र पढ़ाकू माना जाता जो देर रात तक पढ़ाई करता और सुबह देर से जागता। सुबह जो जितनी देर से उठता, उसे उतना ही काबिल समझा जाता। अभिवावक भले आसानी से इस गफ़लत में नहीं पड़ते। पर युवा इसे भ्रांति नहीं स्व-घोषित तथ्य के रूप में स्थापित करने में काफी हद तक सफल थे। हाँ रात में पढ़ना उतना जरूरी नहीं था जितना पढ़ते हुए दिखना। बिंदास या मस्त (जिसे आजकल आप ‘कूल’ कहते हैं) कहलवाने की यह शर्त होती, पढ़ते हुए जगो या बिन पढे, रात में देर तक जगो और सुबह यथा संभव देर से उठो। उठने में जितनी देर उतने ‘कूल’।
फिर देर से जग कर सुबह की स्टीमर कैसे पकड़ी जाय, एक बहुत बड़ी समस्या थी। देर की लत लगी हो, तो आवश्यकता अनुसार एक दिन भी जल्दी जगने की बात से दिल काँप उठता। ऐसे में सुबह के स्टीमर के ख्याल मात्र से शरीर में सुरसुरी होने लगती। लीक से हट कर कुछ अलग करना ही ‘कूल होना’ था। और ‘सुपर कूल’ बनने के लिए लीक से कुछ ज्यादा ही हटना होगा। तभी तो मस्तों का यह टोला (‘कूल ग्रुप’) सुबह की स्टीमर से यात्रा की योजना बनाता। आम विद्यार्थी दिन में चलने वाली किसी ना किसी स्टीमर से जाते।
भीड़ से अलग कुछ करने में ‘थ्रिल’ होता है, रोमांच होता है। इस रोमांच के लिए जीवट वाले छात्र रात में देर से सो कर सुबह जल्दी उठने की जोखिम नहीं उठाना चाहते। किसी भी तरह की अनिश्चितता ना रहे, इसके लिए पूरी रात जागने का कार्यक्रम बनता, और जागने की जुगत भी सोची जाती। सामान्यतः पढ़ने के लिए ही जागने का अभ्यास होता। उसके लिए जुगत भी बिठाई जाती, मसलन चाय कॉफी की या ऐसी ही किसी अन्य चीज का जुगाड़ किया जाता। पर जब छुट्टियाँ शुरू हो रही हों तब भी पढ़ाई कर ही जगा जाए, यह बिल्कुल सही नहीं है। वैसे भी पढ़ना व्यक्तिगत कार्य है, अलग अलग बैठ कर करना होता। पर झुंड में यात्रा के रोमांच का आनंद सामूहिक ‘जगराता’ के साथ ही आरंभ हो, वक्त का यही तकाज़ा होता।
तय होता कि पूरी रात कार्ड्स (ताश) खेला जाए। तीन पत्ती या कोई अन्य पैसे वाला गेम नहीं, बुद्धिजीवियों वाला ब्रिज भी नहीं। ‘ट्वेंटी-नाइन’ या ‘कोट-पीस’ जिससे ‘नींद तोड़’ मनोरंजन तो हो, पर दिमाग या बजट का कचूमर ना हो। सुबह चार-साढ़े चार तक खेल चले, फिर फटाफट तैयार हो महेन्द्रू घाट के लिए निकल लो। तैयार भी क्या होना, पैंट तो देह पर ही होता, नहाने के समय को छोड़ दें तो तैयारी में हाथ मुँह धोना और एक शर्ट डालना ही तो होता था। सुबह की 5.40 वाली स्टीमर के लिए हॉस्टल से साढ़े चार-पौने पाँच निकलना भी सेफ होता। थोड़ी जल्दी पहुँच कर जेटी पर आगे जगह भी लेनी होती थी, अगर जेटी पर आगे नहीं खड़े हुए तो स्टीमर यात्रियों की भीड़ बढ़ जाएगी और स्टीमर में चढ़ना भी दुष्कर हो जाएगा। भीड़ से बचना भी सुबह की स्टीमर पकड़ने की एक महत्वपूर्ण वजह होती।
सुबह का स्टीमर पकड़ने की तैयारी पूरी गणितीय निपुणता के साथ की जाती। स्टीमर में चढ़ते ही आगे की दिशा में डेक पर ऐसी जगह सुरक्षित की जाती जहाँ से महेन्द्रू से पहलेजा घाट तक का अढ़ाई घंटे के सफर में गंगा मैया का पूरा ‘व्यू’ मिले। सत्र शुरू होने के बाद पहली लंबी छुट्टी दुर्गा पूजा से छठ तक की होती। बरसात के चातुर्मास के बाद गंगा मैया में पानी का उफान तो थम गया होता, पर पाट का फैलाव सर्वाधिक होता। नदी का प्रवाह भी काफी तेज रहता। महेन्द्रू घाट से पहलेजा की यात्रा धारा की विपरीत दिशा में होती। दुर्गा पूजा के समय के चौड़े पाट की दूरी स्टीमर सर्वाधिक समय में तय कर पाती। इस समय पहलेजा से महेन्द्रू की वापसी की यात्रा मात्र पौन घंटे में पूरी हो जाती क्योंकि धारा का प्रवाह यात्रा की दिशा में होता। साल के दौरान यह एक ऐसा समय होता जब महेन्द्रू से पहलेजा की दूरी तय करने में सर्वाधिक समय लगता और पहलेजा से महेन्द्रू की वापसी सबसे कम वक्त में पूरी होती।
महेन्द्रू घाट से पहलेजा तक की यात्रा दुर्गा पूजा के समय से बेहतर हो ही नहीं सकती। बारिश का मौसम खत्म हुआ होता है, आसमान और धरती के बीच का अंतराल इतना स्वच्छ किसी और समय शायद ही हो। सुबह की अरुणिमा एक लय हो चली माँ गंगा की तरंगों के साथ एकात्म हो जाती। मचलती हिलोरें सुबह की किरणों को माँ गंगा की पल्लू पर यूँ बिखरती मानों माँ ने सोने की जरी बूटों वाली बनारसी साड़ी पहन रखा है।
सफर जल्दी खत्म ना हो, मन बस इसके लिए मचल उठता है। अरुणोदय की लालिमा और सुर्ख ना हो, बस अपनी मद्धम कोमलता से गंगा की रुपहली सतह को छूती सहलाती रहे। समय ठहर जाए और या स्टीमर और सूर्य दोनों की गति टेक्निकल स्नैग के कारण मझधार में रुक जाए।
प्रकृति की इस अनुपम भेंट को आँखों ने अभी पूरी तरह सँजोया भी नहीं होता, कि माँ गंगा के पहलू में लहरों को चीरता हुआ एक चंचल बच्चा अठखेलियाँ करने लग पड़ता। माँ की आगोश से मचलकर बाहर निकलता और पलक झपकते आँचल में मुँह छुपा लेता। पल भर में ही माँ गंगा की तरंगों का आँचल उस बच्चे को पूरी तरह से ढक लेती।
माँ के पहलू में ये क्रीड़ा लगातार चलती रहती। उछल उछल माँ की पहलू के बाहर झाँकना और छुपना चलते रहता। पानी की दीवार (जैसे छाती) से मुँह टिका कर पीठ ऊपर इस तरह से उठाता जैसे कि अधोमुखश्वानासन कर रहा हो। धारा को बीच से चीरती उसकी विपरीत दिशा में इस क्रिया को दुहराता यह बच्चा स्टीमर से रेस लगाता हुआ दिखता। गंगा मैया के सीने पर अठखेलिया करता यह बच्चा कभी तो अकेला होता और या रोमांच की तलाश वाले विद्यार्थियों की तरह इनका भी झुंड साथ चलता।
आप सोच रहे होंगे कि गंगा की लहरों में आखिर हम किसके बच्चों की बात कर रहे हैं? द्वापर युग के देवव्रत की तरह इन बच्चों ने भी गंगा मैया के कोख से जन्म लिया होता किन्तु इनका लालन पालन राजदरबार की बजाय गंगा माँ की गोद में ही होता है। माँ ने इन्हें सोंस नाम दिया है। शायद इनकी साँसों में माँ की साँसे मिली हैं। तभी माँ से यह नाम मिला है। सोंस काफी कुछ डॉल्फिन की तरह दिखते हैं, इसलिए बुद्धिजीवियों ने इन्हें ‘गंगा डॉल्फिन’ का नाम दे दिया है। अब क्या कहें - दिमागीन लोगों को संभवतः ‘सोंस’ गँवार जान पड़ता हो। या फिर इनके अस्तित्व को दिव्यता प्रदान करने की यह उनकी एक एक मामूली कोशिश है।
सुबह के स्टीमर से यात्रा कर रहे विद्यार्थियों की रोमांच में सोंसों की क्रीड़ा से एक अप्रत्याशित कड़ी जुड़ जाती। इन ‘सुपर कूल’ विद्यार्थियों को उगते सूर्य के दर्शन का अवसर ना जाने कितने लंबे समय बाद होता है। सूर्य की सुनहली किरणों का गंगा मैया के रुपहले आँचल के स्पर्श से इतरा कर छिटकना और सोंस की गीली भूरी पीठ को अपनी दिव्यता से अभिभूत करना, ये दृश्य दिलों दिमाग पर अमिट छाप छोड़ने वाले होते।
सुबह की स्टीमर यात्रा में उम्मीद से अधिक आनंद का अनुभव हो रहा था। माँ गंगा के इन गुमनाम पूतों को देखने और जानने का अवसर मिला। अपने खुशनसीब हमशकल ‘डॉल्फिन’ की तरह इन्हें ना तो देखने के लिए पर्यटकों की भीड़ इकट्ठी होती, ना ही इनकी तस्वीरें छपती। पानी से बाहर निकल अपने नामचीन दोस्तों की तरह रेतीले तट पर क्रीड़ा के कौतुक से लोगों को लुभाने की कला भी प्रकृति ने इन्हें नहीं दी है। ये नेत्रहीन जीव अपनी घ्राण शक्ति और अन्य संवेदी संकेतों से अपना शिकार करते हैं और शत्रुओं से स्वयं की रक्षा करते हैं। किन्तु विकास की विसंगतियों की मार इन्हें अवश्य झेलनी पड़ी। बांध और पुल, निर्माण, खनन, प्रदूषण और तस्करों की हवस का शिकार ये होते रहे। ये दीन-हीन प्राणी जिनमें अपनी ओर पर्यटकों तक को आकर्षित करने की क्षमता नहीं है, वे अपने संरक्षण की गुहार आखिर लगाएं तो लगाएं किससे। इनकी आबादी घट कर दो हज़ार से भी कम रह गई थी, अंततः तब सरकार का ध्यान इनकी दुर्दशा कीं ओर गया और मई 2010 में इन्हें राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया। आज इनकी तादाद छः हज़ार से कुछ अधिक है।
1982 में गाँधी सेतु के लोकार्पण के साथ ही महेंद्रू से पहलेजा घाट की स्टीमर सेवा बंद हो गई। अब विद्यार्थी गाँधी सेतु और कालांतर में बने जेपी सेतु से सड़क मार्ग से अपने घरों को आ जा सकते हैं। अपनी प्रासंगिकता खो बैठा ‘स्टीमर’ अब एक धरोहर है, और स्टीमर की यात्रा यादों की कैदी। सुबह की स्टीमर यात्रा का ‘थ्रिल’ और सोंसों की क्रीड़ा का कौतुक भी उन्हीं यादों में रच बस कर रह गया है।
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सत्येन्द्र प्रकाश भारतीय सूचना सेवा के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। इन्होंने केन्द्रीय संचार ब्यूरो और पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के प्रधान महानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएँ दी है। रचनात्मक लेखन के साथ साथ आध्यात्म, फ़ोटोग्राफ़ी और वन तथा वन्यजीवों में भी इनकी रुचि रही है।