मोहन राणा की कविताएँ : शब्द और चित्र
मोहन राणा को कलम के साथ कैमरे का प्रयोग भी प्रिय है। उन्होंने इस बार अपनी तीन लघु-कविताएँ तीन खूबसूरत तस्वीरों के साथ भेजी हैं। इनमें से दो तस्वीरें मोहन राणा द्वारा ही खींची गईं है जबकि एक तस्वीर लूबोमीर रोज़ेंश्ताइन की है। हमें नहीं मालूम कि उन्हें हिंदी साहित्य के अप्रतिम पुरुष अज्ञेय के फोटोग्राफी के शौक के बारे में मालूम है या नहीं - हमें अज्ञेय के एक कविता संग्रह 'सुनहरे शैवाल' की याद आ रही है जिसमें उनकी कविताएँ उन्हीं के द्वारा ली गई ब्लैक-एंड-व्हाईट फ़ोटोज़ के साथ प्रकाशित हुईं थीं। बहरहाल, मोहन राणा की इन कविताओं का ख़ासतौर पर इन खूबसूरत तस्वीरों के लिए लिखा जाना अपने आप में एक अनूठा प्रयोग है। इसलिए भी कि हिंदी साहित्य में कवि द्वारा ली गई तस्वीरों का प्रयोग अत्यंत दुर्लभ है।
मोहन राणा की कविताएँ : शब्द और चित्र
कविता - एक
कभी-कभी यूँही रुकना फिर चलना
ठिठक कर कुछ सोचना देखकर कि
आकाश किसी का नहीं फिर भी
हवा का मन है तो समुंदर भी होगा
किसी प्रतिबिम्ब में हिलता
कविता - दो
एक नीरव जगह तुम बेचारे पेड़ को अकेला छोड़ आईं!
जमे हुए विस्तार में जो वृद्ध हो चुके
ये पहाड़ लंबे शारदीय उत्सव का उपद्रव मचाते हैं
अपनी ढलानों पर उसके सपनों में,
दिन रात उन रास्तों पर जहाँ
वसंत के लिए कुछ रास्ता भूल जाते हैं पतझर को समेटते,
कुँहासे को अपनी साँसों में संभाले नींद की करवटों में
(इस तस्वीर के फोटोग्राफर लूबोमीर रोज़ेंश्ताइन हैं)
कविता - तीन
समय की ओट में हम - तुम
वह मौसम बहुत दूर नहीं
क्षितिज हमारी परछाईं में उपस्थित
भाषा में वे शब्द पर्याप्त नहीं
कालजयी जिनमें केवल मौन
होता है मन की दरारों में मर्मर
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दिल्ली में जन्मे मोहन राणा पिछले दो दशकों से भी ज़्यादा से ब्रिटेन के बाथ शहर में रह रहे हैं। हाल ही में प्रकाशित ‘एकांत में रोशनदान’ सहित, उनके दस कविता संग्रह निकल चुके हैं। इंग्लैंड की आर्ट्स काउंसिल के सहयोग से उनकी ढेर सारी चुनी हुई कविताओं का अँग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है। उनकी अनेक कवितायें यूरोप की कई भाषाओं में पढ़ी और अनुवाद की गईं हैं।