वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत कुमार हमारे साथ अपने इस पहले लेख के साथ आज ही जुड़ रहे हैं जिसे पढ़कर उसी प्रस्थापना को बल मिलता है कि कुछ सामजिक बुराइयाँ केवल कानून बनाकर समाप्त नहीं की जा सकती। महिलाओं के साथ दुर्व्यहार (सामान्य छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध तक) भी वैसी ही बुराइयों में शामिल है। प्रशांत पूछ रहे हैं कि जब महिलाओं के साथ दुष्कर्म के 96 फीसदी मामलों में आरोपी महिला की पहचान वाला होता है, तो समाज की सोच में बदलाव कैसे लाया जाए? यह लेख कुछ बहुत ही अहम् सवालों को उठता है जिनके उत्तर समाज को खोजने ही होंगे।












