कॉकरोच जनता पार्टी का ऑनलाइन संस्करण और आलसी विपक्ष
कॉकरोच जनता पार्टी का ऑनलाइन संस्करण और आलसी विपक्ष
विद्या भूषण अरोरा
जब से केंद्र में भाजपा सत्ता में आई है, बीच-बीच में कई बार ऐसे अवसर आए हैं जब हम साफ़ यह देख सकते हैं कि देश का विपक्ष आलसी और आरामपरस्त हो गया है। आम आदमी पार्टी के एक पूर्व समर्थक अभिजीत दीपके द्वारा कॉकरोच जनता पार्टी का ऑनलाइन संस्करण सोशल मीडिया पर बनाना और उसका अभूतपूर्व ढंग से वायरल हो जाना एक वैसी ही घटना है जो विपक्ष के आलसी होने को रेखांकित करता है। चाहे अधिकांश पाठकों को पहले से मालूम होगा लेकिन हम सन्दर्भ की खातिर अभिजित दीपके पर चली बात पूरी कर लें – वह एक राजनीतिक कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट हैं और बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र भी हैं, जो पहले AAP (आम आदमी पार्टी) के साथ सोशल मीडिया वर्कर के रूप में काम कर चुके हैं। इसका मतलब यह कि उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि सोशल मीडिया पर कैसे भारी संख्या में ‘लाइक्स’ मिलते हैं और कैसे धरातल बिना कोई चेला हुए भी वर्चुअल दुनिया में आपके लाखों 'फोलोअर्स' हो सकते हैं।
आपने बिलकुल सही सोचा कि इस बात का विपक्ष के आलस्य से भला क्या लेना-देना है? सीधे तौर पर तो कुछ नहीं लेकिन आप एक निगाह अपने आस-पास डालेंगे, ख़ास तौर पर सोशल मीडिया पर अपने ‘इको-चैंबर’ (echo-chamber) से बाहर आकर देखेगे तो पायेंगे कि प्रमुख विपक्षी दलों के बड़े नेताओं ने चाहे सामने आकर अपनी ख़ुशी प्रकट ना की हो लेकिन उनके समर्थकों ने जैसी बातें कही हैं, उनसे पता चलता है कि विपक्षी दलों में आशा की किरण फूटी है। वैसे इसमें कोई संदेह नहीं कि लोकतंत्र में यकीन रखने वाले किसी भी व्यक्ति को इस बात में संतोष होना चाहिए कि आखिर कहीं किसी कोने से तो कुछ ऐसी बात निकली कि जिससे ऐसा लगे कि व्यवस्था से सवाल पूछा जा रहा है और उसे चुनौती दी जा रही है। ज़ाहिर है कि आपके इस स्तंभकार को भी यह संतोष हुआ कि चलो, एक ख़राब टेस्ट में की गई टिप्पणी को ज़ोरदार चुनौती मिली। टिप्पणी तो ऐसी थी कि देश के बेरोजगार युवाओं की तो छोड़िए, स्वयं बेचारे कॉकरोच को भी बुरा लग रहा होगा।
फिर इस स्तंभकार ने उन लोगों की ओर भी थोड़ा हिचकिचाहट वाली ही सहमति से देखा जो कॉकरोच जनता पार्टी में यह संभावनाएं देख रहे थे (या देख रहे हैं) कि वो किसी बदलाव के लिए ‘कैटेलिस्ट’ का काम कर सकती है। कई लोगों को तो शायद इससे भी ज़्यादा उम्मीद हो सकती है। हमारे एक मित्र को बिना हमारे कुछ कहे यह अनुमान था कि हमें इसमें इतनी संभावनाएं देखने में कुछ दुविधा हो सकती है तो उसने हमें चेताया कि उम्मीद खो बैठना बुढ़ापे की निशानी है। मित्र का यह प्रहार था तो थोडा below the belt ही लेकिन अपनी बात मनवाने के लिए मित्रों में यह सब तो चलता है बल्कि इससे भी ज़्यादा दांव-पेच चले जाते हैं।
दरअसल सच कहें तो कॉकरोच जनता पार्टी से भला हमें क्या आपत्ति हो सकती है लेकिन इस सम्बन्ध में हम कुछ चीज़ों को अनदेखा नहीं कर सकते। वैसे अगर यह घटना इस देश के लोकतंत्र को मज़बूत बनाने में किसी भी तरह योगदान कर रही है तो उसका स्वागत ही होना चाहिए। लेकिन हमारा मानना है कि किसी भी किस्म के बदलाव के लिए यदि हम ‘शार्टकट’ तलाशेंगे तो उसका परिणाम सही निकले, इसकी सम्भावना बहुत कम है। सबसे पहले तो इस सन्दर्भ में हम देश के गैर-जिम्मेवार विपक्ष की भूमिका पर ही सवाल उठाना चाहेंगे। अगर हाल की घटनाओं का ज़िक्र करें तो मेडिकल में दाखिले के लिए होने वाली ‘नीट – परीक्षा’ में 23 लाख परीक्षार्थी बैठे जिन्हें इतनी कठिन परीक्षा में बैठने का मानसिक संताप फिर से भुगतना होगा। ऐसी घटनाओं पर विरोध प्रकट करने के लिए सिर्फ ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर निन्दा करते हुए एक-आध वक्तव्य दे देने से विपक्ष अपना काम पूरा हुआ मान लेता है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आजकल विपक्ष के विरोध को सरकार उस तरह नहीं लेती कि आपने कहीं नारे लगाए और आप कुछ घंटे के लिए हिरासत में रहे और फिर रिहा हो गए। आजकल मामला लम्बा चल सकता है। किस्मत ख़राब हुई तो यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के तहत भी आन्दोलनकारियों को नज़रबंद किया जा सकता है। अगर हाल ही की बात करें तो लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक लगभग छह महीने NSA के तहत नज़रबंद रहे। सितंबर 2025 में लेह में लद्दाख को राज्य का दर्जा और Sixth Schedule का संरक्षण दिलाने की माँग को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई और 90 लोग घायल हुए। इसके बाद वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें राजस्थान के जोधपुर जेल में भेज दिया गया। उन्हें मार्च महीने में रिहा किया गया। वांगचुक हिमालय में जल संरक्षण परियोजनाओं के लिए जाने जाते हैं। उन्हें 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला था।
कुल मिलाकर यह कि विपक्ष के पास यह वैध दिखने वाला बहाना तो है कि हमारे कैडर की हिम्मत तोड़ दी गई है। लेकिन असल में यह बहाना वैध है नहीं। महात्मा गाँधी और पंडित नेहरु जैसे नेताओं ने वर्षों अंग्रेजी राज में जेल में बिताये। गोविन्द बल्लभ पन्त को साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की लाठियों का ऐसा आक्रमण सहना पड़ा कि जीवन भर वह सीधे नहीं बैठ सके। आज़ादी के बाद भी कई सारे विपक्षी नेताओं ने और कार्यकर्ताओं ने जेल की हवा खाई। आपातकाल के दौरान तो सभी बड़े विरोधी पक्ष के नेता धर दबोचे गए थे। उसके जे पी आन्दोलन में हिस्सेदारी के कारण जाने कितने ही नेता और उनके युवा अनुयायी जेलों में रहे। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन आन्दोलनकारियों में आज की भाजपा के लोग भी बड़ी संख्या में होते थे।
समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया का तो यह एक प्रसिद्ध राजनीतिक सूत्र था कि जेल, फावड़ा और वोट सच्चे राजनीतिक कर्म के तीन स्तंभ हैं। जेल को वह सत्ता के अन्याय के विरुद्ध अहिंसात्मक सविनय अवज्ञा और कारावास भुगतने की तैयारी का हिस्सा मानते थे। फावड़ा (राजनीतिक कर्म का दूसरा स्तम्भ) को वह जमीनी रचनात्मक काम, यानी श्रमदान और समाज-निर्माण का प्रतीक मानते थे और चुनावी लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी को वोट के रूप में तीसरा स्तम्भ मानते थे। लोहिया का मानना था कि केवल चुनाव लड़ना काफी नहीं है — असली राजनेता वही है जो सड़क पर उतरे, जेल जाने से न डरे, और हाथ से काम भी करे। यह गाँधी जी की रचनात्मक कार्यक्रम की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली सोच थी, लेकिन उसमें चुनावी संघर्ष को भी बराबर का दर्जा दिया गया था। महात्मा गांधी स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों (ग्राम स्वराज, सत्य, अहिंसा, अंतिम व्यक्ति का उत्थान) को आज भी व्यवहार में उतारना होगा।
केवल गाँधी और लोहिया के प्रशंसक के तौर पर नहीं बल्कि एक व्यावहारिक सोच के कारण भी इस स्तंभकार का दृढ़ मत है कि विपक्षी दलों को ‘शॉर्टकट’ ढूंढने बंद करने चाहिएं और उन्हें अपने कार्यकर्त्ताओं को लोकतान्त्रिक सिद्धांतों और आदर्शों से परिचित करवाना चाहिए, अपने गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिन उच्च आदर्शों (लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता)को हमने आज़ाद भारत के लिए संजोया था, उनसे नई पीढ़ी को परिचित करने के उपाय सोचने होंगे। वैसे नई पीढ़ी के लिए ये सब शब्द और ये मूल्य इतने अनसुने भी नहीं हैं क्योंकि इन मूल्यों को बाद में भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से शामिल कर लिया गया था। हमें मालूम है कि यह रास्ता कठिन है, लम्बा है और अव्यावहारिक भी लग सकता है लेकिन यही एकमात्र रास्ता है।
वैसे आजकल ना तो ऐसे नेता कहीं होते हैं और ना ही ऐसे अनुयायी जो सत्ता के ‘अन्याय’ के खिलाफ अहिंसात्मक आन्दोलन करके जेल जाने को तैयार हों। ऐसे में कॉकरोच जनता पार्टी जैसा विरोध भी उम्मीद पैदा करता है। इस स्तंभकार को ऐसे विरोध से भी कोई असहमति नहीं है। हम तो केवल यह याद कराना चाह रहे हैं कि गाँधी जी ने कार्यकर्त्ताओं को आज़ादी के लिए अहिंसात्मक लड़ाई में प्रशिक्षित करने के लिए बरसों केवल रचनात्मक कार्यक्रम चलाये थे। आज क्या किसी भी राजनीतिक दल में रचनात्मक कार्यों के प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था है? गाँधी जी द्वारा चलाये गए रचनात्मक कार्यों के सन्दर्भ में हम इसी वेब-पत्रिका में कुछ वर्ष पहले भी लिख चुके हैं, आप “लोकतन्त्र का संरक्षण कैसे हो”, इस लिंक पर क्लिक करके यह लेख पढ़ सकते हैं।
कुल मिलाकर यह कि कॉकरोच जनता पार्टी के इस ऑनलाइन संस्करण को हम ख़ारिज नहीं कर रहे लेकिन अगर देश के विपक्षी दल इसके बहाने से अपनी अकर्मण्यता को जारी रखेंगे तो शायद भारतीय लोकतंत्र का वह स्वरुप जो हमें अपने स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद मिला था, उसे हम धीरे-धीरे खो बैठें। नई व्यवस्था का स्वरुप क्या होगा और वह कितने समय रहेगा, इसके बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कभी कभी इतिहास के कठिन दौर भी खूब लम्बे चलते हैं तो कभी पलक झपकते ही राजनीति बदल जाती है। इसलिए हम अपने उम्मीद लगाये दोस्तों से यही कहेंगे कि ‘ख्व़ाब देख मगर इस कदर प्यारे ना देख’ !
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विद्या भूषण अरोरा इस वेबपत्रिका की देखभाल करते हैं.