दिल से दिल की बात
वक्तृता अथवा भाषण देने की कला कोई साधारण गुण नहीं है और इसीलिए शायद दुर्लभ भी है। पिछले कुछ वर्षों में हमने अच्छे भाषण देने वाले आमतौर पर राजनीति में खूब देखे हैं। यह बात अलग है कि आम जनता के बीच बहुत लोकप्रिय वक्ता भी विश्वसनीयता के पैमाने पर संतोषजनक ऊँचाइयाँ भी नहीं छू पाते। वक्तृता पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार मनोहर नायक (विस्तृत परिचय नीचे देखें) जिस तरह से हमें गाँधी जी की वक्तृता की विशेषताओं के बारे में बताते हैं, वह बहुत ही 'टचिंग' है और इसे पढने के बाद हम गाँधी जी के प्रति एक बार फिर श्रद्धानवत हो जाते हैं। वरिष्ठ कथाकार नंदिता मिश्र के माध्यम से मनोहर नायक इस मंच से पहली बार जुड़े हैं। हम आशा कर रहे हैं कि भविष्य में भी हमें उनका सहयोग मिलता रहेगा।
दिल से दिल की बात
मनोहर नायक
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उस रोज़ सुबह कोई दसेक बजे इलाहाबाद की बैंक रोड वाले घर में फ़िराक़ साहब से मिलने फ़ैज़ साहब आने वाले थे। मैं साइकिल दौड़ाता कुछ पहले ही पहुँच गया। किसी अंजुमन के दो-तीन मेम्बर फ़िराक़ साहब के पास बैठे हुए थे,जो साफ़ नया-सा कुरता पहने थे,पलंग पर भी बढ़िया चादर बिछी थी और कमर तक की उनकी देह ऐसी ही स्वच्छ चादर से ढँकी हुई थी। वे सिगरेट के गहरे कश खींच रहे थे। मैं उनके पैताने के पास एक स्टूल पर बैठ गया। फिर शेरवानी परिवार की कुछ महिलायें आ गयीं और फिर आ गये देवीप्रसाद त्रिपाठी (डीपीटी), जश्ने फ़ैज़ कमेटी के अध्यक्ष। वे मेरे पास आकर बैठ गए। हम सब अंजुमन वालों और फ़िराक़ साहब की बातें सुनने लगे। एक सज्जन ने कहा, अरे साहब आप तो उर्दू के हक़ में लखनऊ में शानदार तक़रीर कर आये। फ़िराक़ साहब बोले, 'गुड ऑरेटॅरी इज़ नेवर डिफ़ीटिड '... कुछ देर चुप्पी छायी रही और फिर फ़िराक़ साहब की ही आवाज़ गूँजी, 'ऑरेटॅरी इज़ हार्लट ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स ' (वक्तृता ललित कलाओं की हरजाई है)।
वक्तृता बड़ा गुण है, उसकी महिमा अपरम्पार है। यह अलग बात है कि इधर कुछेक सालों से ऐसे तमाम गुणों के विलोम प्रचलन में हैं गोया उन पर कलिकाल प्रभाव व्याप गया हो, मसलन, 'जो कह झूंठ मसखरी जाना /कलजुग सोई गुणवंत बखाना', या फिर 'मन क्रम बचन लबार तेई बकता कलिकाल महुँ। यह समय वक्ता का नहीं, बकता का है... ख़ासतौर पर राजनीति में! मोटे तौर पर बकताओं का ही चलन और फ़ैशन है।
अभी ज़्यादा समय नहीं गुज़रा जब ऐसे वक्ता थे जिनको सुनते मन नहीं भरता था। गोष्ठियों, सेमिनारों में, सभाओं में वाग्विदग्ध अपनी वाणी से अतृप्त कर जाते थे। हमारे जीवन मामा, जो सुभद्रा कुमारी चौहान के लाडले थे, बताते थे कि सुधा चौहान और अमृत राय की शादी के समय सुभद्राजी के पति लक्ष्मण सिंह चौहान जेल से छूटे नहीं थे। माखनलाल चतुर्वेदी ने अभिभावक की भूमिका निभायी। आशीर्वचन देते हुए अमृत और सुधा दो शब्दों से उन्होंने उपमाओं-विशेषणों की ऐसी मनोहारी छटा बिखेरी कि लोग मंत्रमुग्ध हो गये। जबलपुर के भँवरताल उद्यान में रानी दुर्गावती की मूर्ति का अनावरण करने जब महादेवीजी आयीं थीं तो उन्हें सुनने के लिये सुबह ग्यारह बजे इतनी जनता आ गयी थी जो अब नेताओं को रुपया लुटाने पर भी नसीब नहीं होती।
वक्ता की बड़ी महिमा गायी गयी है। एक श्लोक में तो यहाँ तक कहा गया है कि कई सौ में कोई ज्ञानी होता है, हज़ार में कोई लेखक होता है और दस हज़ार में कोई एक वक्ता होता है। सामने माइक और लोगों को पाकर एक अपरिहार्य बहक वक्ता को कब बकता बना दे यह हमेशा अनिश्चित होता है...अच्छे-अच्छे भाषण-पटु के लिए निर्विकार, सधा हुआ बोलना दुष्कर काम है | शायद इसके लिये बड़े संयम , विवेक और संतुलन की दरकार होती है। अनुपम मिश्र ने एक बड़ी दिलचस्प बात बतायी थी... किसी सेमिनार में एक विद्वान का परिचय देते हुए कहा गया कि पाँच भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार है, इन्हें वे लिख-बोल-पढ़ लेते हैं... लेकिन ख़ास बात यह है कि वे पाँचों ही भाषाओं में मौन भी रख सकते हैं।
एच वाई शारदा प्रसाद हर बुधवार को'एशियन ऐज'में एक कॉलम लिखते थे। एक बार उनका स्तम्भ वक्तृता पर ही था... उसी के आसपास 'द स्टेट्समैन' में भी दो किश्तों में 'डिके ऑफ़ इंडियन ऑरेटॅरी ' लेख छपे थे, पर शारदप्रसादजी के लेख में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान के नेताओं, सार्वजनिक जीवन के आला लोगों की वक्तृत्व कला पर रोशनी डाली गयी थी। इनमें वे ही लोग थे जिनके भाषण उन्होंने खुद सुने हुए थे। उत्तर-दक्षिण सब कहीं के विशिष्ट वक्ता उसमें शामिल थे। राजाजी, नेताजी, जेपी, निजलिंगप्पा से लेकर तमाम। नेहरुजी बहुत ऊँचे पर नहीं रखे गये थे। उनका भाषण ऐसा माना गया जैसे कि जैसे पचास हज़ार की क्लास ले रहे हों ,यानि सोचते-सोचते बोलना, लाउड थिंकिंग | हिंदी के अनोखे वक्ता में उसमें सिर्फ़ माखनलाल चतुर्वेदी ही थे| लेख की अंतिम पंक्तियों में शारदाप्रसाद ने सर्वश्रेष्ठ वक्ता के बारे में लिखा था। उनके हिसाब से यह शिरोमणि वक्ता मान्य कसौटियों पर खरा नहीं उतरता था। उस हिसाब से वह 'डल' था - शायद नीरस और उबाऊ भी। उनके हिसाब से यह अव्वलतरीन वक्ता महात्मा गाँधी थे। एच वाई के अनुसार उनकी ख़ूबी यह थी कि उनकी बात दिल से निकल कर सीधे लोगों के दिलों में उतरती थी। उनकी सभाएँ आत्मीय संवाद होती थीं |
सितम्बर 1931 में गाँधीजी गोलमेज़ सम्मेलन के लिये जब लंदन गये तो वह इंग्लैंड की नामी समाज-कर्मी मुरिएल लेस्टर (Muriel Lester) के आश्रम किंग्सले हॉल में बारह सप्ताह ठहरे थे। (चूँकि गोलमेज़ सम्मलेन के लिए गांधीजी ब्रिटिश सरकार के मेहमान थे, इस नाते उन्हें लन्दन के बहुत अच्छे होटलों में रुकने के प्रस्ताव थे किन्तु गाँधी जी ने किंग्सले हॉल को ही चुना. इसका कारण यह था कि किंग्सले हॉल रहने के लिए एक सादी जगह थी जो लन्दन के अपेक्षाकृत गरीब इलाके, पूर्वी लन्दन, में स्थित थी जहाँ गाँधी जी लन्दन के साधारण लोगों से आसानी से मिल सकते थे.) इससे पहले वर्ष 1926 में लेस्टर भी साबरमती आश्रम में रहीं थीं और अपने अनुभव से उन्हें लगता था कि गाँधीजी उनके आश्रम में सहजता से रह पायेंगे,और हुआ भी ऐसा ही। उन्होंने इस मेज़बानी पर किताब लिखी थी, जो कुछ साल पहले हिंदी में भी आयी। मुरिएल लेस्टर ने अनेक सभाओं में उन्हें बोलते सुना। वहाँ आश्रम से पहला भाषण अमेरिका में प्रसारण के लिये था। लेस्टर लिखतीं हैं कि वे लम्बे भाषण के लिये सावधानी से कुर्सी पर पालथी मारकर बैठ गए। लेस्टर ने उनका परिचय देने के बाद माइक्रोफोन उनकी ओर घुमा दिया, 'उन्होंने बहुत संकोच से उसे छुआ.... क्या मैं इसमें बोलूं --- उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा, जो फिर भी कैलिफ़ोर्निया में फैल गयी। फिर चुप्पी छा गयी।
आँखें बंद करके उन्होंने सर झुका लिया मानो अपने अंदर जाकर सारी शक्तियों को एकत्र कर रहे हों। उनके भाषणों को सुनने वाली लेस्टर उनकी शैली के बारे में एक जगह कुछ पंक्तियाँ लिखती हैं : "वे अपनी धीमी आवाज़ में अपनी बात शुरू करते.....पूरी तरह सुविचारित, तटस्थ और हर वक्तव्य सटीक, सत्य के पुजारी के लिए पूर्णतः उपयुक्त, जिसमें आवेश, सम्प्रदायगत निष्ठा या भावुकता का लेशमात्र भी नहीं होता; पूरे दो घंटे के दौरान कहीं भी वक्तृता, आवाज़ का उतार-चढ़ाव, आँगिक चेष्टायें या भंगिमायें.....यानि जोश और लोगों को कायल करने के लिए अपनाए जाने वाले सामान्य तरीक़ों की पूर्णतः अनुपस्थिति। वक़्त पूरा हो जाने पर वे उठकर कम से कम आंगिक चपलता और उद्गार के साथ चले जाते जो सभा के आयोजकों के लिए कुछ अजीब होता। लेकिन मेरे ख़याल से उन लोगों में यह प्रवृत्ति ही विकसित हो जाती है जिनके हर शब्द को सुना और क्रियान्वित किया जाता हो, जो कभी भी इसलिए आराम नहीं करते क्योंकि वे न कभी तनाव या दबाव में होते हैं और न ही उत्तेजित ... जिनकी आत्मा ,प्रार्थनाओं की ऊँचाइयों, दैनन्दिन जीवन, किसी कामगार के दो कमरों वाले घर की रसोई के पास बैठे हुए या जेल में भी सदा अविचलित और शान्त रहती है। .....एक दफ़ा उन्हें यह भी कहा गया कि इंग्लैंड की उनकी इस यात्रा की वास्तविक मूल्यवत्ता भारतीय समस्या का हल पाने के उनके प्रयत्नों में नहीं बल्कि हम यूरोपीय लोगों को यह समझा देने में है कि नर्वस ब्रेकडाउन की हमारी प्रवत्ति को कैसे मिटाया जाये"।
गाँधीजी जब स्वदेश लौटने वाले थे तब मुरिएल लेस्टर ने लिखा कि बापू को अलविदा कहने का सोचना भी अच्छा नहीं लग रहा... एक जगह लिखती हैं , कल से फिर जीवन नगण्य हो जायेगा... उन्होंने लिखा , "मैंने उन्हें प्रतिदिन साढ़े पाँच बजे ठण्डी, अँधेरी भोर वेला में, मुस्लिम प्रतिनिधियों से अनवरत विचार-विमर्श के उपरान्त अर्द्ध रात्रि में, बच्चों के झुँड से घिरे दोपहर में, एक पूर्व प्रधानमंत्री की बैठक में अलाव के पास घंटों बैठे, और सेन्ट जेम्स महल में लार्ड्स, लेडीज, राजकुमारी और कैबिनेट मंत्रियों से घिरे हुए, हर स्थिति में देखा है और हमेशा ही उन्हें वैसा ही पाया है - शान्त, प्रसन्नचित्त, विनोदप्रिय, विवेकी, नि:स्वार्थ, ईश्वर तथा मानव से एकात्म। मैंने बो (आश्रम) में उनका स्वागत एक ऐसे महान व्यक्ति के रूप में किया था जिनकी मैं बहुत प्रशंसक थी , लेकिन जिन्हें मैंने विदा दी, वह एक प्रिय, आनन्दप्रद तथा पूर्णतः विश्वसनीय मित्र थे"।
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मनोहर नायक : जबलपुर, मध्य प्रदेश में १९५४ में जन्म। वहीं के स्कूल, कॉलेजों, विश्वविद्यालय में शुरू से अंत तक की पढ़ाई। दिसम्बर 1977 से पत्रकारिता में प्रवेश। इलाहाबाद से नव प्रकाशित 'अमृत प्रभात' पहला अख़बार। अंतिम अख़बार दिल्ली का 'आज समाज'। इनके दरम्यान कई पत्र- पत्रिकाओं में विभिन्न पदों पर नौकरियाँ, जिसमें सबसे अधिक समय, अठारह साल, बीता 'जनसत्ता' में। जबलपुर के 'ज्ञानयुग प्रभात' के लिए भोपाल रहा। दिल्ली में साप्ताहिक 'सहारा समय' में , पाक्षिक 'प्रथम प्रवक्ता' में भी काम किया। दिल्ली में घर-परिवार। साप्ताहिक 'समय की चर्चा' का साथ और स्वतंत्र लेखन। मोबाइल नम्बर : 9811511800.