निर्भया के बाद भी अधूरी रही न्याय की लड़ाई
वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत कुमार हमारे साथ अपने इस पहले लेख के साथ आज ही जुड़ रहे हैं जिसे पढ़कर उसी प्रस्थापना को बल मिलता है कि कुछ सामजिक बुराइयाँ केवल कानून बनाकर समाप्त नहीं की जा सकती। महिलाओं के साथ दुर्व्यहार (सामान्य छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध तक) भी वैसी ही बुराइयों में शामिल है। प्रशांत पूछ रहे हैं कि जब महिलाओं के साथ दुष्कर्म के 96 फीसदी मामलों में आरोपी महिला की पहचान वाला होता है, तो समाज की सोच में बदलाव कैसे लाया जाए? यह लेख कुछ बहुत ही अहम् सवालों को उठता है जिनके उत्तर समाज को खोजने ही होंगे।
निर्भया के बाद भी अधूरी रही न्याय की लड़ाई
प्रशांत कुमार
16 दिसंबर 2012… देश की राजधानी दिल्ली की एक सर्द रात। एक चलती बस में हुई एक ऐसी दिल दहला देने वाली घटना, जिसने पूरे देश को हिला दिया। कुछ दरिंदों ने सामूहिक बलात्कार कर न केवल इंसानियत को शर्मसार किया, बल्कि देश की कानून-व्यवस्था और समाज की सोच पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए। यह मामला इतिहास में निर्भया कांड के नाम से दर्ज हुआ। इस शर्मनाक घटना के बाद भारत में यौन अपराधों की परिभाषा और कानूनी ढांचे में पूरी तरह बदलाव किया गया।
2012 तक देश में बलात्कार की परिभाषा काफी संकीर्ण थी। पहले के कानून के मुताबिक किसी भी महिला के साथ पेनिट्रेशन न होने पर उसे रेप नहीं माना जाता था। लेकिन निर्भया केस के बाद ये साफ हो गया कि महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की परिभाषा को कहीं ज्यादा व्यापक बनाने की जरूरत है। देश भर से इसकी मांग भी उठने लगी। निर्भया को न्याय दिलाने और दोषियों को फांसी देने के लिए देशव्यापी जोरदार प्रदर्शन हुए।
निर्भया केस के बाद सरकार और संसद ने भी माना कि कानून में बदलाव कर कठोर कदम उठाने की दरकार है। इसके लिए आपराधिक कानूनों में संशोधन किया गया और आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 लाया गया। इस अधिनियम के तहत भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPc) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में बदलाव किए। IPC की कई धाराओं में संशोधन कर रेप की परिभाषा का दायरा बढ़ाया गया। किसी भी महिला के साथ गलत तरीके से छेड़छाड़, आपत्तिजनक स्पर्श, एसिड अटैक, पीछा करना और किसी भी रूप में यौन शोषण को भी रेप की श्रेणी में शामिल किया गया। दोषी को मृत्युदंड देने तक का प्रावधान किया गया, जिससे समाज में भय पैदा हो सके।
निर्भया केस के बाद एक और बड़ी बहस शुरू हो गयी, कि क्या नाबालिग अपराधियों को भी वयस्क की तरह सजा मिलनी चाहिए ? ये बहस इसलिए शुरू हुई क्योंकि निर्भया कांड के दोषियों में एक नाबालिग था। जब बहस ने जोर पकड़ा, तो सरकार ने संसद में जुवेनाइल जस्टिस बिल पेश किया, जिसे 22 दिसंबर 2015 को संसद ने पारित कर दिया। इसके तहत, अगर कोई किशोर, जो 16 से 18 साल की उम्र का है और कोई जघन्य अपराध करता है, तो उसे वयस्क मानकर उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा। दोषी साबित होने पर उसे वयस्क की तरह ही सजा मिलेगी। आज भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर बेहद ही कड़े कानून हैं, लेकिन आज भी अपराधों में कोई कमी नजर नहीं आती।
कानून का दायरा बढ़ा, सजा के प्रावधान कड़े हुए, लेकिन हालात नहीं बदले। निर्भया कांड के बाद के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति चिंताजनक और भयावह दिखती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एन सीआर बी (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक 2013 के बाद बलात्कार के केस में इजाफा ही हुआ है। 2013 में 33,707 केस दर्ज हुए। 2014 में ये बढ़कर 36,735 हो गए। हालांकि 2015 की बात करें, तो केस में थोड़ी कमी आई और 34,651 मामले दर्ज हुए। लेकिन 2016 में फिर 38,947 मामले सामने आए। कुछ वर्षों के अन्तराल के बाद 2022 में 31,516 मामले दर्ज हुए जो पिछले वर्षों से कम थे किन्तु 2023 में फिर बढ़कर 40,393 के आंकड़े पर पहुंच गया।
साफ है कि कठोर कानून और फांसी की सज़ा का प्रावधान होने के बावजूद बलात्कार की घटनाएं कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही है। अब सवाल उठता है कि बलात्कार के मामले में आरोपी कौन होते हैं? यहां सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ज्यादातर केस में आरोपी पीड़िता के पहचान वाले ही होते हैं। 2022 में दर्ज 30,514 मामलों में करीब 96% में आरोपी पीड़िता का जानने वाला था। इनमें से 2,324 मामले परिवार के सदस्य से जुड़े थे, तो 14,558 मामलों में आरोपी प्रेमी, दोस्त या फिर शादी का झांसा देने वाला निकला। 13,548 केस में पड़ोसी, रिश्तेदार या परिचित आरोपी पाए गए। यानी स्पष्ट है कि खतरा घर और समाज के भीतर ही छिपा बैठा है।
दुष्कर्म के मामलों में कठोर कानूनी प्रावधानों के बावजूद आरोपियों को सजा दिलाने में न्याय व्यवस्था प्रभावी साबित नहीं हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2023 की रिपोर्ट इस सच्चाई की गवाही देती है। जारी आंकड़ों के अनुसार, दुष्कर्म के मामलों में अदालत से पांच में से केवल एक आरोपी को ही सजा मिली, जबकि चार आरोपी बरी हो गए। हालांकि हत्या जैसे गंभीर अपराधों में दोष साबित करने का प्रतिशत बेहतर रहा, जहां करीब तीन में से दो आरोपियों को सज़ा सुनाई गई।
2023 में दुष्कर्म के 40,393 नए मामले दर्ज हुए। पुलिस ने इनमें से 24,582 मामलों यानी 80.3 फीसदी में आरोप पत्र दाखिल कर दिया। लेकिन लंबित मामलों को मिलाकर, 2023 में देशभर की अदालतों में 2,03,067 केसों की सुनवाई चल रही थी। सुनवाई पूरी होने के बाद, अदालतों ने केवल 4,464 मामलों में आरोपियों को दोषी ठहराया और सज़ा सुनाई। यह कुल केस का महज 22.7 प्रतिशत है। यानी हर पांच मामलों में से चार में आरोपी सजा से बच निकलते हैं। हालांकि रिपोर्ट यह स्पष्ट नहीं है कि कितने मामलों में अदालतों ने आरोपियों को आरोप से मुक्त कर दिया। लेकिन आंकड़े साफ दिखाते हैं कि सख्त कानून और फांसी तक के प्रावधान के बावजूद, कन्विक्शन रेट बेहद कम है। यह न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार और सबूतों की कमजोर कड़ियों को उजागर करता है।
अब सवाल उठता है कि क्या सिर्फ कठोर कानून बना देने से अपराध रुक जाएंगे? जब 96 फीसदी मामलों में आरोपी पहचान वाला होता है, तो समाज की सोच में बदलाव कैसे लाया जाए? न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों है कि पीड़ित पक्ष वर्षों तक न्याय की राह देखता रह जाता है? क्या हमें कानून की सख्ती से आगे बढ़कर न्यायिक व्यवस्था में सुधार और सामाजिक मानसिकता में बदलाव की दिशा में काम नहीं करना चाहिए?
निर्भया कांड के बाद उम्मीद थी कि भारत में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और अपराधियों में भय पैदा होगा। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि हालात बहुत नहीं बदले हैं। हर 20 मिनट में एक महिला दुष्कर्म की शिकार होती है। यह समाज और सरकार दोनों के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति है।
देखा जाए तो कानून जरूरी है ही, लेकिन केवल कानून बना देना ही काफी नहीं है। आज जरूरत तेज और प्रभावी न्यायिक प्रक्रिया की भी है, जिससे पीड़िता को जल्दी से जल्दी न्याय मिल सके। पीड़िता के प्रति संवेदनशील पुलिस तंत्र की व्यवस्था भी बेहद जरूरी है। सबसे अहम है, समाज की मानसिकता में बदलाव। महिलाओं की सुरक्षा केवल उनका मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की गरिमा और सभ्यता का सवाल है। जब तक समाज अपराधी मानसिकता को ठुकराएगा नहीं, तब तक कठोर से कठोर कानून भी कारगर नहीं होंगे।
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प्रशांत कुमार 30 साल के अनुभव के साथ भारतीय पत्रकारिता जगत के एक प्रतिष्ठित नाम हैं। आज तक, एबीपी न्यूज और राज्यसभा टीवी जैसे संस्थानों से जुड़े रहे प्रशांत कुमार भारत एक्सप्रेस के संपादक रहे हैं। फिलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।