मीडिया-मंच

मिशन से व्यवसाय की ओर गतिशील हुई 200 वर्षों की हिंदी पत्रकारिता

इसी माह हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे होने पर डॉ. शैलेश शुक्ला वर्तमान में पत्रकारिता के परिदृश्य पर और इसके विभिन्न आयामों पर हमारी इस वेब पत्रिका में लेख लिख रहे हैं। आज का लेख श्रृंखला का तीसरा लेख है जिसमें आपको कुछ बातें तो ऐसी मिलेंगी जो आप पिछले दो लेखों में पढ़ चुके होंगे लेकिन सन्दर्भ अधूरे ना रहें, शायद इसीलिए लेखक ने उन्हें दोहराया होगा। आज के लेख में  आप पेड न्यूज, 1990 से शुरू हुए उदारीकरण का पत्रकारिता पर प्रभाव और नई परिस्थितियों में संपादक की बदलती भूमिका जैसे बिंदुओं के बारे में पढ़ेंगे. 

उदन्त मार्तंड के 200 वर्ष : पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित करने की चुनौतियाँ

हमारे यहाँ पिछले कुछ माह से निरंतर लिख रहे डॉ शैलेश शुक्ला ने मई के अंत में हिंदी पत्रकारिता के २०० वर्ष पूरे होने के अवसर पर हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियाँ और उसके बदलते स्वरूप पर कुछ लेखों की श्रृंखला लिखने की पेशकश की जिसे हमने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस क्रम में उनका पहला लेख हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार और नई चुनौतियाँ आप कुछ दिन पहले पढ़ ही चुके हैं। आज का यह लेख उनके पिछले लेख का विस्तार ही है। इस लेख में भी उन्होंने पत्रकारिता के समक्ष आधुनिक तकनीक और संसाधनों की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद आ रही चुनौतियों की चर्चा की है. 

हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक विस्तार और नई चुनौतियाँ

हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 200 वर्ष पूर्व मई 1826 में उस समय हुई जब पंडित जुगल किशोर ने कलकत्ता से उदन्त मार्तण्ड नामक एक साप्ताहिक पत्र का  प्रकाशन प्रारंभ किया जो हर मंगलवार को निकलता था। दो सौ वर्ष पहले शुरू हुई यह यात्रा अनवरत जारी है और प्रौद्योगिकी एवं संसाधनों में आमूल-चूल परिवर्तनों के बावजूद पत्रकारिता के मूल सिद्धांत - सत्य, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व - अपरिवर्तित रहे हैं। अपने इस लेख में हिंदी पत्रकारिता के विस्तृत होते जा रहे क्षेत्र और भावी चुनौतियों की चर्चा कर रहे हैं।

 

The Receipt: A Letter to Readers in Delhi and in Berlin

The central argument of this article is that ownership, ideology, and editorial framing can shape journalism even in systems that claim to be neutral. Amandeep Midha places an old debate in a current context and raises questions that remain highly relevant today. For anyone interested in media, whether as a reader or a practitioner, this is a worthwhile article.

इंदौर में साहित्यिक पत्रिका समागम : एक रपट

ऐसा रोज़ रोज़ तो होता नहीं कि साहित्यिक पत्रिकाओं की समस्याओं पर बात करे, उनमें कार्यरत लोगों के (संपादक सहित) प्रशिक्षण की भी बात हो और कहीं-कहीं उनकी मुश्किलों को सरल ढंग से निपटाने के उपाय भी बताये जा रहे हों.जब हमें डॉ शैलेश शुक्ला से यह सूचना मिली कि वह  इंदौर में आयोजित दो दिवसीय ‘साहित्यिक पत्रिका समागम’ में भाग लेने गए हुए हैं तो हमने उनके सामने अपनी मांग रखी कि हमें इस कार्यक्रम की रपट भेज दीजिएगा तो उन्होंने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए यह रपट भेजी है. उम्मीद है कि आपको भी तनावपूर्ण माहौल में यह एक स्वागतयोग्य और उपयोगी लेख लगेगा.

डिजिटल थकान: क्या निरंतर कनेक्टिविटी हमें भीतर से खाली कर रही है?

आजकल हम सब अपने-अपने मोबाइल सेट हाथ में पकडे इस बात पर चर्चा तो करते हैं कि हमारा स्क्रीन टाइम कम होना चाहिए किन्तु सच में ऐसा हो नहीं पाता। हम अपने आप को यह बहाना देते हैं कि हम फलां काम के लिए फोन उठा रहे हैं लेकिन फिर रीलें देखने लगते हैं और या फिर व्हाट्सएप्प चेक करने लगते हैं। हाल ही में हमारे साथ जुड़े लेखक डॉ शैलेश शुक्ला ने अपनी पीएचडी के दौरान  न्यू मीडिया का विशेष अध्ययन किया है और वह हमें बता रहे हैं कि हमें अपने मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए डिजिटल साधनों के उपयोग में समझदारी बरतनी होगी। 

We are trying to create a platform where our readers will find a place to have their say on the subjects ranging from socio-political to culture and society. We do have our own views on politics and society but we expect friends from all shades-from moderate left to moderate right-to join the conversation. However, our only expectation would be that our contributors should have an abiding faith in the Constitution and in its basic tenets like freedom of speech, secularism and equality. We hope that this platform will continue to evolve and will help us understand the challenges of our fast changing times better and our role in these times.

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RaagDelhi: देश, समाज, संस्कृति और कला पर विचारों की संगत

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