आज प्रस्तुत है प्रार्थना शृंखला का तीसरा लेख जिसमें वह बता रहे हैं कि आगे चलकर 12वीं शताब्दी के आस-पास से धीरे-धीरे धर्म और अध्यात्म में संस्कृत और (प्राकृत/पाली) के स्थान पर भारतीय भाषाओं की पैठ बढ़ती गई जिससे प्रार्थनाओं का भी विस्तार और लोकतंत्रीकरण हुआ।











