दीपावली पर तीन कवियों की कविताएं एक साथ
इस बार हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। दीपावली के अवसर पर हमें अपने तीन मित्रों (नन्दिता मिश्र, ओंकार केडिया और पूर्णिमा अरुण) से कुल मिलाकर छः कविताएँ प्राप्त हुई हैं। दीपावली पर केन्द्रित इन कविताओं को यदि हम अलग-अलग पोस्ट के तौर पर प्रकाशित करते तो यह अटपटा लगता. इसलिए हमने तय किया कि हम इनकी कविताओं को एक साथ प्रकाशित करेंगे, चाहे इसके लिए हमें एक बार के लिए अपने फॉर्मेट को ही क्यों ना बदलना पड़े। अब इन कविताओं के बारे में क्या कहें क्योंकि दीपावली को अलग-अलग कोण से देखने के बावजूद चेतना के स्तर पर तीनों ही की कविताएँ गहन मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत हैं। हाँ, यह बात है कि तीनों का अपनी बात कहने का एक विशिष्ट अंदाज़ है और अपनी बात को सही से सम्प्रेषित करने में यह कविताएँ खूब सफल हैं। आइए, दीपावली पर इन सरोकारों को भी सराहें जिनकी ओर हमारे इन कवि मित्रों ने ध्यान दिलाया है।
१. नन्दिता मिश्र की कविता
दीपावली
बीत गयी भागदौड़ में एक और दीपावली
किसी को पता नहीं चला ये पांच दिन कैसे बीते
थक कर हो गये चूर
एक दूसरे की होड़ में हजारों लुटा दिये
साज सज्जा में
मंहगे उपहारों में
उनके लिये
जिन्हें उनकी ज़रूरत न थी
बाकी बैठे रह गये
जो बैठे थे लगाये आस
कोई पा कर इनाम हुआ खुश
कोई उदास
रह गया है अब यही एक अर्थ दीवाली मनाने का
आस्था की जगह
ले ली है खन खनाते सिक्के और कागज़ के नोटों ने
कहते रहे गये अखबार
और समझदार
दिये खरीदना माटी के इस बार
ताकि कुम्हार के घर भी मने त्योहार
जलें दिये आशाओं के
पर इस बार बाजार भरा पड़ा था पिछली बार से भी ज्यादा
सुन्दर लुभावने
चमकते दमकते भगवान
और तरह तरह के लुभावने दियों और मोमबत्तियों से
खूब बिके
सिर्फ दिखने में सुन्दर पर रौशनी न कर सके घंटे भर भी
मिट्टी का जो एक दिया लगाया था मैंने
पूजा घर में
और एक तुलसी घरा में
वे दोनों रात भर टिमटिमाते रहे
अंधकार को चीर कर जलते रहे, उजाला फैलाते रहे
और दीपावली मनाते रहे
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वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्य-रत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।
२. ओंकार केडिया की तीन कविताएं
चकरी
घूमो, तो ऐसे घूमो,
जैसे घूमती है चकरी,
किसी के इर्द-गिर्द नहीं,
अपनी जगह।
इतना तेज़ घूमो,
इतनी देर तक घूमो
कि देखनेवाले सब कुछ छोड़कर
देखते रहें तुम्हारा घूमना।
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लाल पटाखे
हार मत मानो,
लड़ते रहो,
फटते रहो लगातार
लाल पटाखों की तरह।
धीमी आवाज़ में ही सही,
देर तक फटो,
तब तक फटो,
जब तक बचा रहे तुममें
थोड़ा-सा भी बारूद।
**
रॉकेट
फटना ही है,
तो रॉकेट की तरह फटो,
ज़मीन पर नहीं,
आसमान में जाकर फटो।
थोड़ा ज़ोर से फटो,
लोग देखें तो सही,
डरें तो सही,
कुछ तो असर छोड़ो
फुस्स होने से पहले।
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ओंकार केडिया पूर्व सिविल सेवा अधिकारी हैं। भारत सरकार में उच्च पदों पर पदासीन रहने के बाद वह हाल तक असम रियल एस्टेट एपिलेट ट्राइब्यूनल के सदस्य रहे हैं और आजकल गुवाहाटी में रह रहे हैं। इनका कविता संग्रह इंद्रधनुष काफी चर्चित हुआ। अंग्रेजी में इनकी कविताओं का पहला संग्रह Daddy भी काफी चर्चित रहा। कोरोना पर कविताओं का एक संग्रह भी आया है।
३. पूर्णिमा अरुण की दो कविताएँ
दिवाली कल और आज
एक पुरानी दिवाली
जब पकते ढेरों पकवान
बुआ अम्मा के हाथों
जब घर भरता बाबा चाचा के मेहमानों
जब चौखट पर बंधती
आम पत्तों की बंदनवार
जब दहलीज रंगोली से सजती
दीदी के हाथों
जब बाती बटती
दादी की हथेली
जब दिये जगमगाते आंगन और मुडेरों पर
जब थिरकती छुटकी नई फ्राक में
जब फुलझड़ी बिखेरता भय्या
जब दिवाली संदेश जाते रंगीन पत्रों पर
जब होता था
लाभ शुभ - लाभ
आज की दिवाली
बाज़ार के पकवानों से
मेज सजा ही देती है
रंग बिरंगी अनोखी बत्तियां
जला ही देती है
कारोबार का जश्न मनाती है
दिवाला निकाल ही देती है
फिर भी हर साल मनती है
औपचारिक या अनौपचारिक
मजबूरी या शोहरत को जगमगाती दिवाली
**
बात दिये की
दीवाली की रात
आओ करें
दियों की बात
दिया जो जलता है
बिखेरता है उजियारा
तोड़ता है अंधेरा
लेकिन सुनो !
दिया तले अंधेरा होता है
कितना ही चमक ले
कितना ही दमक ले
तले का अंधेरा
मिटाये नहीं मिटता
श्वाश्वत सच सा
लेकिन दिखाये नहीं दिखता
काले झूठ सा
क्योंकि
सबकी निगाहें
लौ खींच लेती है
चकाचौंध कर देती है
अच्छा ही है
अमावस्या की रात
दिवाली सजती है
लौ से लौ जलती है
तो तले का अंधेरा
उजागर नहीं होता
लेकिन सुनो
दिया क्या है?
बिन बाती बिन तेल
जो न हो दोनों का मेल?
फिर
दिया दिया नहीं
अंधकार ही अंधकार
दिया तले ही नहीं
चहुँ ओर घनघोर
सच है
उजाला तो
बाती से है
बाती तो
तेल से है
और
दिया तो
दोनों से है
सुनो...
दोनों को अलग न धर देना
दिये को खत्म न कर देना
क्योंकि
फिर न होगी
दियों की बात
और
ये दीवाली की रात
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पूर्णिमा अरुण पेशे से वैकल्पिक चिकित्सा क्षेत्र की विशेषज्ञ हैं। इसके अतिरिक्त सामाजिक गतिविधियों से भी जुड़ी रहती हैं और साहित्य में तो विशेष रुचि है।