आज हुए हम 80 साल के...: नेमतें गिनने का वक्त है, शिकायतें करने का नहीं!
हमारी वेब-पत्रिका के शुरुआती दौर में अजीत सिंह के कई लेख इस मंच से प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने हमारे लिए हिंदी और इंग्लिश (Ajeet Singh) दोनों भाषाओं में लेख लिखे हैं जिन्हें आप उनके नाम पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं। आज जब उन्होंने अपनी जीवनयात्रा के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं तो उन्होंने यह रोचक लेख हमारे लिए भेजा है। यह लेख सभी के लिए उपयोगी है क्योंकि इसमें ऐसे कई संकेत हैं जिनसे हम अपने दैनंदिन जीवन को खुशनुमा बना सकते हैं। अस्सी वर्ष के चिर-युवा अजीत सिंह को उनके जन्मदिवस पर राग दिल्ली की बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं!
आज हुए हम 80 साल के...: नेमतें गिनने का वक्त है, शिकायतें करने का नहीं!
अजीत सिंह
सुना है, 80 साल की उम्र जिंदगी में खास अहमियत रखती है। सरकार आपको ‘सुपर सीनियर सिटीजन’ का दर्जा देती है। पेंशन में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है और सीजीएचएस वेलनेस सेंटर के बाहर बाकायदा लिखा होता है कि सुपर सीनियर सिटीजन्स को डॉक्टर पहले देखेंगे।
मुझे भी अब इन सुविधाओं का लाभ मिलने की उम्मीद है। अच्छी बात है। लेकिन मेरे लिए 80 साल की उम्र का सबसे बड़ा तोहफा यह है कि स्वास्थ्य कुल मिलाकर ठीक है।
शुगर है, सुबह-शाम गोली लेता हूं, नियमित सैर करता हूं और खानपान पर नियंत्रण रखता हूं। पिछले करीब 15 वर्षों में वजन 95 से घटकर 80 किलो रह गया है। अब पहले से ज्यादा चुस्त महसूस करता हूं। कभी हाई ब्लड प्रेशर भी परेशान करता था, लेकिन अब दवा की जरूरत नहीं रही। हर छह महीने या साल में दिल्ली अथवा चंडीगढ़ के किसी अस्पताल में जरूरी जांच करा लेता हूं। इससे तसल्ली रहती है।
मेरा मानना है कि स्वस्थ और प्रसन्न रहने के दो और बड़े कारण हैं—दोस्तों का साथ और रचनात्मक लेखन से जुड़ाव।
हिसार की वरिष्ठ नागरिक संस्था ‘वानप्रस्थ’ का मैं 19 वर्षों से संस्थापक सदस्य हूं। इसकी गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी रहती है। अभी हरियाणा दिवस समारोह में मैंने भी एक गीत प्रस्तुत किया था। मित्रों के बीच हंसी-मजाक, बातचीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और आपसी अपनापन जिंदगी में नई ऊर्जा भरते हैं।
रिटायरमेंट के बाद जिंदगी ने नया रास्ता दिखाया
सेवानिवृत्ति के बाद शुरू में मैं दुविधा में था कि अब क्या करूंगा। न कोई समाचार कार्यक्रमों में बुलाता था, न प्रेस नोट मिलते थे। एक पत्रकार के लिए यह स्थिति कुछ अजीब थी।
फिर मैंने खुद को एक चुनौती दी। तय किया कि अब आम आदमी की खास बातें तलाशूंगा और उनकी कहानियां लिखूंगा। मीडिया में आम आदमी अक्सर उपेक्षित रह जाता है, जबकि मेरा विश्वास है कि हर व्यक्ति के पास सुनाने के लिए कोई न कोई दिलचस्प कहानी जरूर होती है।
मैंने लोगों से मिलना, उनकी बातें सुनना और अपनी शैली में उन्हें लिखना शुरू किया। स्थानीय अखबारों और मित्रों के सोशल मीडिया समूहों में इन कहानियों को जगह मिली। पाठकों की सराहना ने मेरा उत्साह बढ़ाया और लेखन मेरे जीवन का नया आनंद बन गया।
कोविड-19 का दौर भी इस लिहाज से मेरे लिए उपयोगी साबित हुआ। भारतीय सूचना सेवा से सेवानिवृत्त कुछ मित्रों ने अपने अनुभवों पर आधारित लेखों की एक श्रृंखला शुरू की। बाद में ये लेख पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए, जिसमें मेरे भी दस लेख शामिल थे।
कभी-कभी सोचता हूं कि पत्रकारिता शायद नेमतों की गिनती कम करती है। वह दुखों, समस्याओं और संघर्षों पर ज्यादा केंद्रित रहती है। नतीजतन, कई बार संकटों को कम करने के बजाय उन्हें और बड़ा दिखाने लगती है। आम आदमी की छोटी-बड़ी खुशियों और उपलब्धियों को सामने लाना मुझे अधिक आनंद देता है। आखिर हर व्यक्ति की जिंदगी में कई दिलचस्प कहानियां छिपी होती हैं।
पीछे मुड़कर देखता हूं तो संतोष ही संतोष है
मेरा जीवन-दर्शन भी कुछ ऐसा ही है—मुसीबतों का हिसाब लगाने के बजाय जिंदगी की नेमतें गिननी चाहिए।
मैं अपने गांव से पहला स्नातक था। अपने सहपाठियों में भारतीय सूचना सेवा में पहुंचने वाला अकेला व्यक्ति। गांव से निकले एक साधारण लड़के का आकाशवाणी और दूरदर्शन में काम करते हुए निदेशक समाचार के पद तक पहुंचना मेरे लिए बड़ी उपलब्धि थी।
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के कठिन दौर में करीब 20 साल नौकरी की। हजरतबल दरगाह पर आतंकियों के कब्जे और कारगिल युद्ध की रिपोर्टिंग की। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति ए पी जे अबुल कलाम की विदेश यात्राओं को कवर करने का अवसर मिला। वर्ष 1991 में आकाशवाणी का ‘कॉरेस्पोंडेंट ऑफ द ईयर’ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
मेरे लिए जीवन-संतुष्टि के ये छोटे-मोटे नहीं, बल्कि बड़े कारण हैं।
और अब मित्रों का साथ तथा लेखन जीवन को लगातार खुशियों से भर रहे हैं। हर लेख पूरा होने पर एक आत्मसंतोष मिलता है और मित्रों-पाठकों की प्रशंसा उसे दोगुना कर देती है।
परिवार—मेरी सबसे बड़ी पूंजी
मेरी पत्नी सुमित्रा जी ने जीवन में मुझे असीम खुशियां दी हैं। उन पर भी मैंने कई लेख लिखे हैं। हमारे तीन बच्चे हैं—दो बेटियां, सुनीता और अनुराधा तथा एक बेटा, संजय सिंह । तीनों अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ रहे हैं और हमारा पूरा ख्याल रखते हैं।
अब और क्या चाहिए जिंदगी से!
पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि चारों तरफ से खुशियां ही खुशियां बरसी हैं। कुछ सपने पूरे हुए, कुछ अनुभव मिले, कुछ उपलब्धियां हासिल हुईं और सबसे बढ़कर अपनों का प्यार मिला।
80 साल की उम्र में मेरी यही कामना है कि मित्रों और शुभचिंतकों का स्नेह तथा आशीर्वाद इसी तरह बना रहे।
निरंतर, निर्बाध और हमेशा!

अजीत सिंह दूरदर्शन समाचार के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। इससे पहले उन्होंने कई वर्षों तक आकाशवाणी में वरिष्ठ संवाददाता के रूप में अपनी सेवाएं दीं। वर्तमान में वे एक सामाजिक सेवा संगठन से जुड़े हुए हैं और विभिन्न समाचार पत्रों के लिए लेखन भी करते हैं। उनसे ajeetsingh1946@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।