राग और विराग की अभिसंधि: एक आध्यात्मिक विमर्श
डॉ मधु कपूर के दर्शनशास्त्र के निबंधों में हमें अचानक ही ऐसे सवालों के उत्तर मिल जाते हैं जिन्हें हम कब से खोज रहे होते हैं। उदाहरण के लिए इस बार हमें इस प्रश्न का उत्तर मिला कि आध्यात्मिकता क्या होती है? यह कहना तो सही नहीं होगा कि हमें इस प्रश्न का उत्तर अभी तक मालूम नहीं था लेकिन यह कहना होगा कि जो उत्तर आज पता चला है, उससे काफी स्पष्टता बढ़ गई है। आध्यात्मिकता को उन्होंने हमारे लिए आसान बना दिया है। आध्यात्मिकता को प्रैक्टिस करना नहीं - वह तो हमें खुद ही करनी होगी लेकिन उसे समझें कैसे, यह आसान बना दिया है। अगर आपको लगता है कि आध्यात्मिकता क्या है, यह तो आप पहले से जानते हैं, तब तो इस लेख को अवश्य ही पढ़िए क्योंकि इससे शायद यह भी सिद्ध हो जाएगा कि जो आप जानते हैं, वह सही ही है क्योंकि वह तो आपकी व्यक्तिगत यात्रा है, उसमें सही गलत क्या होता है!
राग और विराग की अभिसंधि: एक आध्यात्मिक विमर्श
डॉ मधु कपूर
आज मै अपनी बात पराशर पुत्र वेदव्यास से शुरू करना चाहूंगी। यद्यपि जन्मलग्न से ही वे संसार त्याग चुके थे और ऋषि धर्म का पालन कर रहे थे तथापि अंत समय तक वे घोरतर सांसारिक ही बने रहे। माँ सत्यवती की एक पुकार पर व्यास दौड़ कर आते। कौरव और पांडव दोनों ही वंश के जन्मदाता होने के कारण महाभारत का रचनाकार हस्तिनापुर के प्रत्येक धर्म संकट में उपस्थित रहता है। व्यास एक ऐसा चरित्र है जो वैराग्य और संसार की अभिसंधि पर खड़ा है। महाकाव्य महाभारत में ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, छल, चतुराई अर्थात गृहस्थ जीवन की हर विडम्बना को उसके निकृष्टतम रूप में दिखाया गया है। यद्यपि वे मोक्ष का उपदेश नहीं देते है पर मोक्ष उसमे स्वयं दबे पैर आकर खड़ा हो जाता है। इसी तरह महाभारत काव्य का मूल रस भयंकर, वीभत्स, वीर इत्यादि है, पर अंत में शांत रस पीछे के दरवाज़े से घुसकर प्रधान रस हो जाता है। विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद सत्यवती को वे अपने साथ सांसारिक मोह से छुड़ा कर ले जाते हैं। विरागी होने पर भी वे ममत्वहीन नहीं है। महाभारत लिखने के पश्चात् वे अपनी असंतुष्टि नारद के सामने व्यक्त करते हैं। नारद की प्रेरणा से उन्होंने भक्ति रस से पूर्ण श्रीमद भागवत की रचना की, जो ‘सघनतम राग' और 'पूर्णतम विराग' का एक उत्कृष्ट दृष्टान्त है । क्या यही आध्यात्मिकता का लक्षण है?
आजकल दुनिया में अक्सर आध्यात्मिकता की चर्चा होने पर लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते है। इसका कारण है कि आध्यात्मिकता को दरअसल इतने फूहड़ तरीके से पेश किया जाता है कि इसे जीवन-विरोधी, जीवन से पलायन, बुढ़ापे का कर्म आदि कहा जाने लगता है। जबकि सच्चाई यह है कि आध्यात्मिक होने का अर्थ सांसारिक जीवन का बहिष्कार नहीं है। यह एक व्यक्तिगत यात्रा है, जहाँ व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप से जुड़ता है और जीवन के गहरे अर्थ और उद्देश्य की तलाश करता है, जो अक्सर आत्म-चिंतन, करुणा सहानुभूति और किसी कला के माध्यम से प्रकट होता है। यह किसी संगठित धर्म या बाहरी कर्मकांडों से बंधा नहीं होता। यह तो किसी भी कार्य जैसे झाड़ू लगाना, जूता सिलाई करना, खाना बनाना आदि को पूरी तन्मयता से करना है।
आध्यात्मिक होने का मतलब है, भौतिकता से परे का अनुभव करना, सृष्टि की विशालता के सामने खुद को नगण्य और क्षुद्रता का एहसास होना, जीवन के हर आयाम को पूरी जीवंतता के साथ जीना। अपने दुख, क्लेश के लिए स्वयं को जिम्मेदार समझना ही आध्यात्मिक प्रक्रिया की शुरुआत है। आध्यात्मिकता कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो बाहर घटित होती है। यह केवल अंदर ही घटित हो सकती है। हर इंसान अपने आप में अनूठा है और इसे पहचानना और इसका आनन्द लेना ही आध्यात्मिकता का सार है। किसी चीज को सतही तौर पर जानना सांसारिकता है, और उसी चीज़ को गहराई तक जानना आध्यात्मिकता है।
हमारी इंद्रियाँ सूचनाएँ इकट्ठा करने का काम करती है, जैसे आँखें लगातार देख रही हैं, कान लगातार सुन रहे हैं, मन लगातार विचार रहा है, यह सब सतही रूप से जानने के ही उपकरण हैं। इसके अतिरिक्त जानकारी हमें हासिल होती हैं विभिन्न स्रोतों से जैसे —अखबार, अड़ोस-पड़ोस, टी.वी. से, एक ही खबर तरह तरह से क्यों परोसी जाती है, इतिहास, साहित्य आदि। हमें लगातार ख़बर चाहिए — बैंक में कितना पैसा है, शेयर मार्केट में कितना नफ़ा-नुकसान, राजनीति की उठापटक, इतना धार्मिक उन्माद क्यों - इत्यादि । कहने का तात्पर्य है कि आध्यात्मिकता का इस वास्तविकता से कोई विरोध नहीं है। पर जैसे हम अधकचरे होते हैं, वैसे ही हमारा ज्ञान भी अधकचरा होता है। साक्षी भाव यानी चीजों को जस का तस घटित होते हुए देखना अर्थात अपने अहंकार, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, और पूर्वग्रहों को त्यागकर देखना ही आध्यात्मिकता है।
एक तरफ हम कहते हैं कि वस्तुएँ केवल प्रक्षेपण मात्र हैं अर्थात हमारी ही सृष्टि हैं। जब तक हम उन्हें देखते तभी तक उनका अस्तित्व है, अगर देखने वाला ना रहे, तो वो भी नहीं रहेंगी। पर तभी दूसरा तर्क आता है कि जब मैं नहीं देखता हूँ यानि सो रहा हूँ अथवा नहीं रहूँगा तब भी ये वस्तुएँ रहती है। हमारी अनुपस्थिति में भी घर का अस्तित्व ज्यों का त्यों ही बना रहता हैं।
इस तरह सभी वस्तुओं का अपना एक ‘मैं’ होता है। दरवाज़े का, पंखे का, फूलदानी का सबका अपना ‘मैं-पन’ होता है, जो हमारे ‘मैं’ से अलग है। सिर्फ जीवित वस्तुओं को लेकर ही नहीं, बेजान वस्तुएं भी मन में संवेदना पैदा करने लगती है। हम कब सोचते है कि टेबल पर अख़बार फेंक कर न रखे, निरंतर जल रहे बल्ब को विश्राम चाहिए या सामने रखे फूलों के गुच्छों को सम्मान के साथ सरकाना चाहिए? क्योंकि इन्हें भी आराम और सम्मान की जरूरत है? क्योंकि जब पीड़ा दूसरों को हो और दर्द का एहसास हमें हो, तो यही आध्यात्मिक संवेदना है। अध्यात्म को समझने का अर्थ है स्वयं में एक अंतर्दृष्टि जो सृष्टि से जुड़ाव को महसूस कराएँ।
हमारी सारी आध्यात्मिक खोज और साधना का सार जीवन को रूपांतरित करने में है । आध्यात्मिकता एक ऐसी अवधारणा है जिसे विभिन्न तरीकों से परिभाषित किया जा सकता है कुछ लोग प्रार्थना या ध्यान के माध्यम से आध्यात्मिकता का अनुभव करते हैं, अन्य कुछ लोग प्रकृति में समय बिताने या कला या संगीत के माध्यम से आध्यात्मिकता का अनुभव करते हैं और कुछ अन्य लोग दूसरों की सेवा करने या स्वयं को दूसरों के लिए समर्पित करने के माध्यम से आध्यात्मिकता का अनुभव करते हैं। आध्यात्मिकता सृजनशीलता है जो एक व्यक्तिगत अनुभव है, और इसका कोई एक सही या गलत पहलू नहीं है । जिस तरह सर्कस के जानवर स्वयं को अभ्यास से साधते है, उसी तरह मनुष्य भी स्वयं को किसी विशेष सन्दर्भ में साधकर उस दिशा से ही आध्यात्मिकता को उपलब्ध कर सकता है। जिस तरह फूटे घड़े में जल नहीं टिकता उसी तरह छिद्रान्वेषी मनुष्य भी साधना के अयोग्य ही ठहरता है। वासना, तृष्णा और अहंता- यही तीन छेद हैं, जो उसकी आध्यात्मिकता के आड़े आता है।
सामरसेट मॉम (Somerset Maugham} की रचनाओं में आध्यात्मिकता सीधे तौर पर उनके पात्रों के माध्यम से जीवन के गहरे अर्थों, मृत्यु, नियति और मानवीय अस्तित्व की क्षणभंगुरता की खोज करती है। वे अक्सर दिखाते हैं कि कैसे भौतिक दुनिया की वास्तविकताएँ मानवीय अनुभवों को आकार देती हैं, जिससे व्यक्ति अपने अस्तित्व के आध्यात्मिक या दार्शनिक पहलुओं पर विचार करने लगता है। पूर्वी दर्शन का प्रभाव उनके लेखन में दिखाई देता है, जो जीवन के जैविक पहलुओं जन्म, मृत्यु को आध्यात्मिक नियति से जोड़ता है। जैसे 'Of Human Bondage' उपन्यास में फिलिप कैरी नामक एक अनाथ लड़के की जीवन कहानी है जो अपनी विकलांगता को कला (पेंटिंग), शिक्षा (चिकित्सा), और विभिन्न रिश्तों के माध्यम से अपना रास्ता तलाश करने की कोशिश करता है, अंत में वह अपने जुनून से मुक्ति पाने और जीवन में स्थिरता खोजने के मानवीय संघर्ष में कामयाब होता है। उपन्यास का शीर्षक दार्शनिक स्पिनोज़ा के विचारों से प्रेरित है कि अनियंत्रित जुनून ही मानव बंधन का कारण बनता हैं।
The Razor’s Edge उनका दूसरा उपन्यास है, जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद के समय में, एक अमेरिकी युवा लैरी डारेल की कहानी है, जो धन और सामाजिक सफलता को छोड़कर जीवन के अर्थ और आध्यात्मिक सत्य की खोज में भारत की यात्रा करता है, जहाँ उसकी तुलना उसके सांसारिक मित्रों से की जाती है, जो अलग-अलग रास्तों पर चलते हैं और अपने-अपने तरीकों से संतुष्टि पाने की कोशिश करते हैं। यह पुस्तक आत्म-खोज और आध्यात्मिकता के कठिन रास्ते पर केंद्रित है। यह शीर्षक कठोपनिषद से लिया गया है, जो बताता है कि मोक्ष का मार्ग 'उस्तरे की तेज धार' जितना कठिन है। लैरी अमेरिका लौटकर टैक्सी चलाकर एक साधारण जीवन जीता है, उसमें उसे सच्चा सुकून मिलता है।
अपने लेखन की समाप्ति भी मैं वेद व्यास के पुत्र स्नेह से करना चाहूंगी। उनके पुत्र शुकदेव जो जन्म से ही वैराग्य वृत्ति ग्रहण कर चुके थे, क्योंकि व्यासदेव ने स्वयं मुक्तिकामी पुत्र की अभिलाषा की थी। लेकिन जब संसार त्याग कर प्रस्थान करने लगे तो उनका पितृ स्नेह और माया जाग्रत हो उठी और वे विरह कातर होकर पुकार उठे —भो भोः पुत्र स्थीयतां तावदद्य यावच्चक्षुः प्रीणयामि त्वदर्थम् – अर्थात हे पुत्र! ठहर जाओ। जब तक मैं अपनी आँखों को तुम्हारे दर्शन से तृप्त नहीं कर लेता तब तक यहीं ठहरो।
व्यासदेव का चरित्र महाभारत का सबसे दुर्लभ चरित्र है, जो वैराग्य में जन्म लेकर भी उसी को अपना गंतव्य नहीं मान लेता हैं। वे संसार में रहकर उसकी गुत्थियों को सुलझाने में मदद करते हैं। वैराग्य का मार्ग चाहे जितना भी आकर्षक हो, अंततः पृथिवी पर पैर टिके रहना कितना आवश्यक होता है, जो उनके चरित्र को एक दुर्लभ आयाम देता है। शुकदेव मोक्ष मार्ग में आगे ही बढ़ते जाते है, लेकिन पिता के वाक्य उनके कानों में गूंजते है और उन्हें खींचते है। वे सोचते है पिता यदि मेरे पीछे पीछे इसी तरह पुकारते हुए आते रहे तो? तो वे देवताओं से प्रार्थना करते है कि ‘आप सब मिलकर उन्हें मेरा प्रत्युत्तर दे’। शुक की प्रार्थना सुनकर वन, नदी, पर्वत, समुद्र सब मिलकर चारो ओर से शोक-कातर पिता को शुकदेव की तरफ से उत्तर देते है— ’मैं हूँ पिता आपके साथ’! ‘मैं हूँ पिता आपके साथ’! और वे रुकते नहीं है ... चरैवेति मधुमन्त्र के साथ ...चलते रहते हैं!
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।