घर जो ना हुआ अपना - नन्दिता मिश्र की नई कहानी
नन्दिता मिश्र हमारी वेब-पत्रिका में बहुत सी कहानियों और लेखों से अपना योगदान दे चुकी हैं. अभी पिछले कुछ सप्ताह पहले आपने उनकी कहानी एक दूसरे से दूर पढ़ी होगी जो काफी पसंद की गई थी. इससे पहले उनकी कई अन्य कहानियां जैसे लाइब्रेरी, बाबा का मसनद, आखिर क्यूँ, माँ, अंतर्मन का द्वन्द आदि भी काफी चर्चित रहीं. आज की कहानी स्त्री मन की उस पीड़ा को कहती है जो आम तौर पर भारतीय समाज में अव्यक्त रह जाती है. मध्पयमवर्गीय भारतीय परिवेश में रची गई यह कहानी कुछ ऐसा बताती है कि दाम्पत्य सम्बन्ध आमतौर पर कहीं ना कहीं अपूर्ण ही रह जाते हैं. पति को जहाँ लगता है कि वह पत्नी को सभी 'सुख-सुविधाएँ' दे रहा हैं, वहीँ पत्नी को लगता है कि उसका जीवन तो रीता ही रह गया. आइये, देखते हैं कि इस रिश्ते की इन शाश्वत समस्याओं पर बात करते हुए भी यह कहानी नया क्या कहती है.
घर जो ना हुआ अपना
नन्दिता मिश्र
प्रिय बिट्टी ,
बहुत सा प्यार।
तुम भी सोचोगी कि बुआ फोन करने की बजाय भला चिट्ठी क्यों लिख रही है! वो इसलिए कि कुछ बातें मैं अपने लिए भी दर्ज कर लेना चाहती हूँ ताकि कल को कुछ यादें धुंधली ना हो जाएँ और इसलिए भी कि मन में यह अफ़सोस भी ना रह जाए कि अपने जीवन के संचित अनुभवों के बारे में अपनी भतीजी को सही वक़्त पर बताने से चूक गई.
आज सुबह सुबह भैया का फोन आया। पूछते थे तुम अनन्त को जानती हो। कभी मिली हो क्या? बिट्टी उससे ब्याह करना चाहती है। बहुत परेशान थे। फिर कह रहे थे कि पापा तो बिल्कुल तैयार नहीं हैं। कहते हैं, इतिहास खुद को दोहरा रहा है। जब मैंने उनकी इतनी सारी बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और सिर्फ हूँ-हाँ करके रह गई तो भैया फिर शुरू हो गए और कहने लगे कि वैसे पापा की यह चिन्ता तो जायज़ है कि अनंत सिर्फ एक प्राइमरी टीचर है और उसका बड़ा परिवार है और चार भाई-बहन उससे छोटे हैं। फिर बोले कि तुम्हीं अब आकर पापा को समझाओ या फिर बिट्टी को ही समझाओ - कुछ तो करो। बिट्टी, मैंने भैया को तो नहीं कहा लेकिन तुम्हें लिख रही हूँ कि एक तरफ से तो मुझे सुनाकर 'इतिहास खुद को दोहरा रहा है' जैसी बात कही जा रही है और दूसरी तरफ यह उम्मीद की जा रही है कि मैं ही पापा को समझाऊं! बहरहाल, यह हम भाई-बहिनों का मामला है, हम निपट लेंगे.
तुम्हें तो मालूम ही है कि बरसों पहले मेरा घर छूट गया था। मैंने अपने मन की शादी जो कर ली थी। लोक-राज के डर से अम्मा पापा ने शादी करवा दी थी पर यह समझा दिया था कि हमसे कम से कम सम्पर्क रखना। मेरी शादी के कुछ ही समय बाद तुम्हारा जन्म हुआ। भाभी जो मेरी हिमायती थीं, उन्होंने मुझे तुम्हारे जन्म के समय आग्रहपूर्वक बुलाया। हालाँकि अपने मायके जाकर भी लगा कि आ कर गलती की। भाभी के सिवा वहां सभी मुझसे कतराते रहे। अम्मा तो बोलीं तक नहीं। पापा ने पूछा" ठीक तो हो। क्या दामाद जी आयेंगे शाम को "। मैं चुप रही - जानती थी वो व्यंग्य ही कर रहे हैं। शाम होते-होते मैं वापस आ गयी। गिरीश नहीं आना चाहते थे। मैं तुम्हें ये सब अप्रिय बातें क्यों बता रही हूं। ज़रूरत है इसलिये। मुझे लगता था जीवन में अपने मन का साथी मिल जाये तो सब सध जाता है। पर ये खुशफहमी है। ऐसा नहीं होता। सुसराल में इधर-उधर ये बात जगह बनाती चलती है कि जो अपने मां बाप की नहीं हुई वो तुम्हारी कैसे रहेगी। एक दिन छोटी ननद करुणा ने पूछ ही लिया, भाभी ऐसी हिम्मत कैसे आती है। आप भैया को कितना जानती हो। मैं भला क्या कहती! मुस्कुरा दी और कहा "सोच समझ कर ही इतना बड़ा कदम उठाया है। अब देखेंगे।"
और बिट्टी तब से देख रहे हैं! 25 साल हो गये हैं हमारी शादी को। चौथाई सदी में भी अपने नये घर याने सुसराल को ,जो अब पुराना हो चुका है, उसे कभी अपना नहीं बना पाई। बहुत कोशिश की पर सब बेकार। अम्मा-बाबूजी को हमेशा ये शिकायत रही कि शादी में कुछ मिला नहीं। गिरीश हमारे मन से शादी करता तो दहेज मिलता - शायद कार भी। जो नकद आता, वो ननदों की शादी में काम आता। मौके-बेमौके ऐसा कुछ सुनने को मिल ही जाता है. सच कहूँ तो आज तक भी!
गिरीश के सामने इन सब बातों की कोई अहमियत नहीं रही। उनसे कुछ कहो तो वो कहते हैं, छोड़ो यार ये औरतों की बातें। क्या बुरा मानना। मैं ऐसा समझती हूं कि मैं एक अच्छी बहू ,अच्छी पत्नी
और अच्छी भाभी रही हूं। इनके कहने से नौकरी छोड़ दी। बस घर सम्हालने वाली बन गयी। ये कहते हैं तुम होम-मेकर हो। मैं सोचती हूं कौन सा होम।
सुबह 6 बजे उठ कर जो काम में लगती हूं तो 2 बजे दोपहर भोजन के बाद कमर सीधी करने का मौका मिलता है। वैसे हमारे यहां एक चौबीस घंटे की काम वाली है पर मेरी बात अलग है। मैं बहू हूं। सारी जिम्मेदारी मेरी है। शाम को गिरीश आफिस से आकर अम्मा के साथ चाय पीते हैं। जब हमारी शादी नहीं हुई थी तब मैं सोचती थी शादी के बाद मेरा एक छोटा सा घर होगा। उसमें एक बालकनी होगी। हम दोनों शाम की चाय वहां बैठ कर पियेंगे। गप्पें मारेंगे। हफ्ते में एक बार बाहर खाना खाया करेंगे। भोपाल सांस्कृतिक दृष्टि से बड़ा जीवन्त शहर है। शादी से पहले हमारे मिलने की जगह होती थीं भारत भवन की आर्ट गैलेरी और सांस्कृतिक कार्यक्रम या कभी गौहर महल या भोपाल हाट में लगी प्रदर्शनी। अब याद ही नहीं कि कब भारत भवन गयी कब गौहर महल। सपने तो बहुत देखे थे पर वे अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। होंगे भी या नहीं। पर मैंने ४५-४६ की उम्र में भी उन्हें सहेज कर रखा है। शायद कभी मौका मिल जाये।
खैर। इस तरह की बातों का और सपनों का कोई अन्त नहीं है। एक लम्बी लिस्ट है उसमें अभी भी कुछ जुड़ जाता है।
ननद करुणा मेरे सुख दुख की साथी है। अब उसकी शादी हो गयी है और मिलना बहुत कम होता है। एक बार आई थी तब कहने लगी "भाभी कभी कभी सोचती हूं तो हंसी आती है। भैया ने तुम्हारी नौकरी छुड़वा दी। तुमने मान लिया। कुछ नहीं कहा। मुझे बहुत ग़ुस्सा आया था। पर तुम सोच नहीं सकतीं कि तुम्हारा कितना भला हुआ है इस कदम से। मुझे देखो नौकरी करो और घर भी देखो। मरने की फुर्सत नहीं है। औरत के लिए विवाह किसी भी ढंग से हो, गति एक जैसी ही है।"
मैं तुम्हें अनन्त से शादी करने से नहीं रोकूंगी। बल्कि घर के लोग राज़ी न हों तो विवाह की जिम्मेदारी मेरी। बस ये कहूंगी शादी चाहे वो तुमने अपने मन से की हो या माता-पिता के मन से , दोनों ही परिस्थितियों में आपको कमोबेश वही वातावरण मिलता है। कुछ सुख कुछ दुख। कुछ अपनापन कुछ परायापन। कुछ अपवाद होते हैं। पिछले २५ सालों में समाज बहुत बदल गया है। प्रेम विवाह पहले जैसा अछूत रोग नहीं रहा है। पर बेसिक बातें नहीं बदली हैं।
शिक्षा और तथाकथित महिला सशक्तिकरण के कारण स्त्री पहले से मज़बूत हुई है। अब वो अपने अधिकारों की बात करते डरती नहीं। समय पड़ने पर विरोध करती है। अपने मन की करना जानती है। पर पूरी स्वतंत्र वो अभी भी नहीं है। ऐसा तभी होता है जब वो अकेली रहती हो। तुम अनन्त से शादी करो पर दृढ़ मन से कि उसे निभाओगी। जैसा मैंने किया है। क्योंकि वो तुम्हारा प्यार है। जब साथ रहोगी तब असली अनन्त दिखेगा। शादी होते ही पुरुषों में पति गुण एकदम मुखर होने लगते हैं। बराबरी से साथ निभाने वाला पति दुर्लभ होता है। जो होते हैं वे जोरू के गुलाम कहलाते हैं।
बेटा स्त्री का मन छुई-मुई होता है। उसे जो गुण ईश्वर ने दिये हैं वे पुरुष को नहीं। वो कैसी भी परिस्थिति वो खुद को उसमें ढाल लेती है। लोग इसे उसकी कमज़ोरी समझते हैं। हमारी अम्मा चाची, बुआ सबने कठिन समय बिताया है पर कभी विरोध नहीं किया। ये छोटी बातें हैं पर इनके बल पर सम्बन्ध तोड़ना बहुत बड़ी बात हो जाती है। तब वे आर्थिक दृष्टि से पति पर निर्भर होती थीं। अब आर्थिक स्वतंत्रता के बाद भी संबंध विच्छेद करने के लिये बड़ी हिम्मत चाहिये। पढ़ाई-वढ़ाई इसमें कुछ काम नहीं आती। ये मामला खुद के विवेक से जुड़ा हो ऐसा भी नहीं है। इसीलिए महिला संबंध विच्छेद का फैसला बहुत सोच समझ कर लेती है।
मुझे गिरीश से शिकायत कम थी पर परिवार वालों से मैं जुड़ नहीं सकी। मैंने एक-आध दो बार गिरीश से कहा कि किसी अच्छे शहर में ट्रांसफर करवा लो तो कहने लगे, यहां क्या कमी है। परिवार के साथ हैं और क्या चाहिये। सचमुच कोई कमी तो नहीं है। चुप रह गयी। क्योंकि मुझे जो कमी महसूस होती है वो गिरीश समझ नहीं सकते। मैं समझा नहीं सकती। स्त्री के लिये प्यार से भी ज्यादा ज़रूरी होता है सम्मान और अपनापन। इसके बगैर प्यार अधूरा रह जाता है।
कुछ दिनों के लिये घर आ जाओ। भैया याने अपने पापा और दादा जी के साथ बैठो, बात करो। अनन्त से मिलवाओ। मान जायेंगे। खुश रहना, सब ठीक होगा। ज़रूरत पड़ी तो मैं भी आ जाऊंगी।
खूब सारे प्यार और दुलार के साथ ..
तुम्हारी बुआ।

वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्यरत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।