होली की मस्ती में - ओंकार केडिया की विवेकपूर्ण क्षणिकाएं
ओंकार केडिया (Onkar Kedia) की यह क्षणिकाएं बहुत स्पष्ट हैं और एकदम 'डायरेक्ट हिट' करती हैं. कई दशक पहले जब जापानी काव्य शैली के 'हाइकू' का हिंदी कविता से परिचय हुआ था तो जल्द ही यह हिंदी कविता में भी स्थापित हो गया और इस तरह की शैली को 'क्षणिका' कहा जाने लगा. ओंकार को यह शैली बहुत प्रिय हैं और उन्होंने बहुत सी ऐसी छोटी-छोटी कवितायेँ लिखी हैं जो खूब सारगर्भित होती हैं. ऐसे समय में जब विभाजनकारी ताकतें हमारे समाज को बांटने में लगीं हैं, ओंकार केडिया की यह विवेकपूर्ण कवितायेँ हौसला देती हैं कि अभी सब ख़त्म नहीं हुआ है.
होली की मस्ती में - ओंकार केडिया की विवेकपूर्ण क्षणिकाएं
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1.
एक ही रंग दिखाई दिया
हर तरफ़ हवाओं में,
कितना अच्छा होता,
जो इस साल भी मनाते
हम रंग-बिरंगी होली।
2.
होली खेल रहे थे
मंदिर और मस्जिद,
चर्च मुस्कुरा रहा था,
जानता था
कि दोनों मिलकर
रंगनेवाले हैं उसे भी।
3.
उसने गुब्बारा फेंका
भीड़ में किसी एक पर,
कितना अच्छा होता
जो वह नहीं चुनता किसी को
निशाना लगाने के लिए।
4.
मैं गुलाल लगाना चाहता हूँ,
पर उसके मुखौटे पर नहीं,
उसके चेहरे पर।
5.
रंगीन पानी फेंको,
तो ऐसे फेंकना
कि सब पर गिरे,
बच न जाए कोई भी
भीग जाने से।
6.
उन्हें रंग लगाना
तो इतना पक्का लगाना
कि उतारने में उतर जाए
उनका मुखौटा भी।
7.
रंग उड़ाओ,
तो ऊंचा उड़ाओ,
उन तक भी पहुँचो,
जिनके पाँव ज़मीं पर नहीं हैं।
8.
इस बार पिचकारियों में
रंगीन नहीं, सादा पानी भरना,
कम-से-कम होली-दिवाली तो दिखें
लोगों के असली चेहरे।
9.
गुलाल उड़ाओ,
तो दोनों हाथों से उड़ाओ,
ज़्यादा चेहरे रंग दो,
तो ज़्यादा अच्छा है।

ओंकार केडिया पूर्व सिविल सेवा अधिकारी हैं। भारत सरकार में उच्च पदों पर पदासीन रहने के बाद वह हाल तक असम रियल एस्टेट एपिलेट ट्राइब्यूनल के सदस्य रहे हैं और आजकल गुवाहाटी में रह रहे हैं। इनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.