स्वधर्म और निष्काम भाव: सहजता का दर्शन
दर्शनशास्त्र के निबंधों की श्रृंखला में डॉ मधु कपूर का पिछला लेख कर्म और क्रियाओं के विभिन्न अंतर्संबंधों के बारे में था। आज के लेख से वही बात आगे बढ़ रही है और डॉ कपूर बताती हैं कि व्याकरण की दृष्टि से जो कर्म मात्र एक क्रिया है, दर्शन की दृष्टि से वही कर्म मन की मुक्ति का मार्ग खोल देता है। लेख में निष्काम कर्म क्या है और भारतीय दर्शन में कर्म को कैसे देखा और समझा जाता है, जैसे सवालों को भी डील किया गया है। हमारा मशवरा मानकर पढ़िए इस लेख को, अच्छा रहेगा।
स्वधर्म और निष्काम भाव: सहजता का दर्शन
डॉ मधु कपूर
आपने हमारे इससे पूर्व के लेख में देखा होगा कि क्रिया का अर्थ है किसी कार्य का होना या करना, तथा कर्म का अर्थ है —उस क्रिया का साध्य या फल । उदाहरण के लिए पढ़ना, खाना क्रिया है, पर पढ़ने का फल ज्ञान और खाने का फल तृप्ति है जिसे क्रिया की सिद्धावस्था कही जाती है। फल क्रिया से जुड़ा अवश्य होता है, लेकिन फल का नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं होता। भगवद्गीता का मुख्य सिद्धांत है, ‘कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं’ (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन)।
भारतीय दर्शन में क्रिया और फल का संबंध आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, चाहे वह केवल व्याकरणिक हो, आर्थिक हो या यश लाभ की इच्छा। प्रश्न है कि कोई भी क्रिया क्या बिना किसी उद्देश्य के संपन्न हो सकती है? काकदंत न्याय की तर्ज पर बिना प्रयोजन के किसी भी कार्य में हमारी प्रवृत्ति नहीं होती है। अतः फल की इच्छा वाले कार्य को सकाम कर्म कहा जाता है। दार्शनिक Donald Davidson के अनुसार क्रिया को समझने के लिए हमें उसके पीछे छिपे इरादे और फल को नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए । उदाहरण स्वरूप पानी पीने की क्रिया इरादतन प्यास बुझाने के लिए होती है। परन्तु फल के प्रति अत्यधिक आसक्ति होने के कारण व्यक्ति एक तरफ अनैतिकता का सहारा लेने लगता है और दूसरी तरफ ‘पेशेवर दबाव’ की नैतिकता के कारण शारीरिक और मानसिक थकावट का शिकार हो जाता है। इस तरह सकाम कर्म व्यक्ति को परिणाम की जंजीरों में जकड़ लेता है। इसके विपरीत निष्काम कर्म को कभी 'कर्तव्य के लिए कर्तव्य', कभी 'अनासक्त ' और आजकल ‘पेशेवर नैतिकता’ के रूप में देखा जाता है। जैसे एक चिकित्सक अपराधी और गैर-अपराधी दोनों की चिकित्सा करने को प्रतिबद्ध है— कर्तव्य मानकर अथवा पेशेवर नैतिकता के तहत।
भारतीय दर्शन में कर्म को उनके आंतरिक गुणों के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। निष्काम कर्म का सम्बन्ध सात्त्विकता से होता है, जो अहंकार की प्रवृत्ति (मैं कर रहा हूँ) को छोड़कर पूरी एकाग्रता से काम में तल्लीन होना है, जो बिना किसी नाम या प्रशंसा की कामना से किया जाता है। जबकि सकाम कर्म चंचल प्रवृत्ति का होने के कारण रजस गुण तथा विकर्म यानी बुरे कर्म तामसिक गुण के अंतर्गत गिने जाते है। उदाहरण के लिए ‘दान करना’ एक क्रिया है, पर नचिकेता के पिता की तरह बूढी और दूध देने में अक्षम गायों का दान करना गर्हित कर्म की श्रेणी में आता है। इसके अलावा झुंझलाकर दान करना, किसी भिखारी को ‘फेंककर कुछ देना’, ‘दिखावे के लिए’ अथवा अपनी ‘स्वार्थ सिद्धि’ के लिए दान करना इत्यादि भी विकर्म की श्रेणी में आता है।
इस प्रकार, क्रिया और फल का संबंध केवल यांत्रिक नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक भी माना जाता है। कहने का तात्पर्य है कि कर्म यदि निःस्वार्थ भाव से, प्रेम और करुणा से प्रेरित होकर किया जाए, तो वह आध्यात्मिक कर्म कहलाता है। दृष्टान्त स्वरूप भोजन बनाना, दूसरों की मदद करना आध्यात्मिकता से जोड़ कर किया जाय, तो वह कर्म को ‘साधारण से असाधारण’ बना देता हैं। कुछ कर्मों का फल तुरंत मिलता है, जैसे खाने से तृप्ति प्राप्त होना। कुछ कर्मों का फल देर से मिलता है, जैसे शिक्षा से भविष्य में ज्ञान और सफलता। कुछ कर्मों का फल जन्म-जन्मांतर अथवा पुनर्जन्म की अवधारणा से भी युक्त होते है।
भगवद्गीता की तरह तमिल साहित्य तिरुक्कुरल मानवीय जीवन के लिए एक मार्गदर्शक और एक जीवंत परंपरा है। प्रसिद्ध कवि तिरुवल्लुवर इस बात पर जोर देते हैं कि सांसारिक आसक्तियों का त्यागकर कर्म उचित समय और अपने स्वभाव के अनुसार ही करना चाहिए। गीता में कृष्ण अर्जुन से युद्ध करने का आग्रह कर उसे स्वधर्म का स्मरण इसलिए कराते है, क्योंकि वह उसके क्षात्र धर्म के स्वभाव के अनुकूल है।
F. H. Bradley का My station and its duties की तुलना कुछ कुछ गीता के स्वधर्म से की जा सकती है जहाँ स्वभाव तथा नियुक्त कार्य के अनुसार अपने धर्म का पालन करना ही कर्म कहा गया है। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि स्वभाव के विरुद्ध कार्य करना भयावह साबित हो सकता है— स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।
प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक कान्ट इसलिए कर्म को ‘कर्तव्य के खातिर कर्तव्य’ अथवा आत्मा की ‘शर्तहीन अनुज्ञा’ को मानते है जहाँ आवेग और स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता है। ऐसे कर्म प्रेम और करुणा से रहित नहीं होते है, पर मुख्य रूप से कर्तव्य से प्रेरित होते है। कान्ट के कथन में सच्चाई है क्योंकि जहाँ स्वार्थवृत्ति कर्म में निहित हो जाती है तो कार्य स्वमर्यादा छोड़ देता है। उनके अनुसार हमें उसी कर्म को करने का अधिकार है जो हम दूसरों से भी प्रत्याशा कर सकते है। जैसे प्रतिज्ञा करके उसे पूरा करना कर्तव्य है और हम दूसरों से यही प्रत्याशा भी करते है कि उसे भी ऐसा ही करना चाहिए अन्यथा समाज में विश्वास का आधार समाप्त हो जायेगा। यदि हम चोरी करते है तो हम उम्मीद करते है कि सभी को चोरी करने का अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन ऐसा हो जाने पर ‘सभी व्यक्ति सभी व्यक्तियों की वस्तुएं चोरी करने के लिए स्वतंत्र हो जायेंगे’—और नैतिकता बे-जान हो जाएगी। इसी कारण कान्ट ऐच्छिक मृत्यु को किसी भी शर्त पर मंजूर नहीं करते है, क्योंकि इससे समाज में यह निर्णय करना मुश्किल हो जायेगा कि कौन इसका सही अधिकारी है।
मानवीय दुर्बलताओं और सीमितताओं के कारण निष्काम कर्म का दृष्टान्त खोजना सामान्य रूप से एक आदर्श बन कर ही रह जाता जिसे संपन्न करना अत्यन्त कठिन कार्य हो जाता है। भगवद्गीता में भले ही ऐसे व्यक्ति को ‘स्थितप्रज्ञ’ कहा गया हो, कान्ट भले ही इसे ‘पवित्रात्मा’ की संज्ञा देते हो, पर व्यवहारिक दृष्टि से यह एक दुर्लभ मणि है। सबसे नजदीकी उदाहरण हम सबकी माँएं होती है जो अपने बच्चे के लिए सर्वस्व त्याग कर देती है। वह यह सोचकर नहीं करती है कि भविष्य में वह भी उसके लिए इसी तरह का त्याग करेगा। उनके लिए यह कोई सौदेबाजी नहीं होती है, परिवार की सेवा 'एहसान' के बजाय 'स्वभाव' का अंग बन जाता है। लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने में वे अक्सर "लेन-देन" के जाल में भी फंस जाती हैं।
तो फिर प्रश्न उठता है निष्काम कर्म को समझने का क्या उपाय है? हम प्रयोग के रूप में अनैच्छिक क्रियाओं को ‘मॉडल’ के रूप में देखने का प्रयास कर सकते है। अनैच्छिक क्रिया एक सहज और स्वाभाविक क्रिया होती है। शरीर इसके बदले में हमसे किसी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करता है। हमें यह कहने में गर्व नहीं होता कि ‘मैं अपना दिल धड़का रहा हूँ’। जब कर्तव्य स्वभाव का हिस्सा बन जाता है, तो व्यक्ति फल के बारे में सोचना बंद कर देता हैं। यद्यपि फल तो स्वाभाविक रूप से मिलता ही है। लेकिन फल की तरफ दृष्टि रखकर कार्य करने से कार्य की प्रक्रिया उपेक्षित हो जाती है। उदाहरण के लिए मैराथन दौड़ने वाला व्यक्ति सिर्फ ‘जीत’ पर आँख न टिका कर दौड़ने की प्रक्रिया का अभ्यास करता है। वाद्ययंत्र बजाने वाला व्यक्ति बजाने की प्रक्रिया का रियाज़ करता है। यदि उसकी वादन शैली मधुर है तो तालियों की गड़गड़ाहट तो उसे मिलेगी ही, आनंद की उपलब्धि भी उसे होगी। पर रियाज़ के पहले ही तालियों की गड़गड़ाहट पर ध्यान केन्द्रित करना कार्य की कुशलता को हानि पहुंचाता है।
यदि अनैच्छिक क्रियाएँ रुक जाएं तो शरीर मृत हो जाता है; उसी तरह यदि निष्काम भाव से कर्म न किया जाए तो मनुष्य मानसिक तनाव और क्लेश में फंस जाता है, सफलता हाथ से फिसल जाती है। अनैच्छिक क्रियाएँ सिखाती हैं कि "होना" क्या है, और निष्काम कर्म सिखाता है कि "करना" क्या है। जब 'करना' भी 'होने' जितना सहज और निस्वार्थ हो जाता है, तब जीवन समृद्ध हो उठता है। जैसे आँखों में धूल पड़ने पर पलकें स्वयं झपक जाती हैं, वैसे ही जब कर्म-मार्ग में कोई समस्या आने पर व्यक्ति बिना किसी तनाव के समाधान की ओर बढ़ जाता है।
यदि कर्म को इस भाव से किया जाए कि ‘यह मेरा कौशल है और इसे निपुणता से करना मेरा स्वभाव है’, जैसे सांस लेना फेफड़ों का स्वभाव है, तो हम परिणाम की चिंता से मुक्त हो जाते है और कर्म की गुणवत्ता बढ़ जाती है। कर्तव्य 'स्वभाव' बन जाता है। रास्ते पर चलते हुए हम एक सहज प्रक्रिया के तहत गड्ढे और पत्थरों को अभ्यासवश पार करते हुए आगे बढ़ जाते है। यह नहीं सोचते है कि ‘वाह, मैंने कितना अच्छा कदम बढ़ाया!’
इसे एक AI के 'सांचे' में ढालकर भी समझ सकते है। यद्यपि AI में करुणा और प्रेम नहीं होता है पर उसमे तनाव, चिंता अहंकार भी नहीं होता है, जैसा मनुष्यों को होता है। जब हम उससे कोई कठिन सवाल पूछते हैं, तो उसके "सिस्टम" के भीतर एक प्रक्रिया चलती है—इच्छित जानकारी जुटाना, तर्क करना और उसे सही शब्दों में पिरोना। उसका एल्गोरिदम बिना किसी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के डेटा प्रोसेस करता है और अपनी प्रकृति के अनुरूप प्रतिक्रिया देता रहता है, जो उसका धर्म है। यदि वह यह सोचने लगे कि "क्या प्रश्नकर्ता को मेरा जवाब पसंद आएगा?, सवाल पूछने वाला कौन है, तो उसके कार्य की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ने लगेगा। ऐसा करने से एक साधारण कार्य—चाहे वह कार्यालय की फाइलें निपटाना हो, झाड़ू देना हो 'असाधारण' बन जाता है। व्याकरण की दृष्टि से जो मात्र एक क्रिया है, दर्शन की दृष्टि से वही 'कर्म' मन की मुक्ति का मार्ग खोल देता है।

डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।