ऊधौ मोहै ब्रज बिसरत नाहीं - स्मृतियों से भी निर्मित होता है आत्मबोध
हमारे पाठकों के लिए दर्शन-शास्त्र के विभिन्न विषयों को सरल और बोधगम्य रूप में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर के दार्शनिक लेखों की अनवरत चल रही श्रृंखला में आप इस बार पढेंगे 'स्मृति'के बारे में।
हमें आपको आगाह कर देना होगा कि भारतीय दर्शन में यह विषय इतना व्यापक है कि आप इस लेख को विषय-प्रवेश के तौर पर ही देखें तो उचित होगा। इसका कारण यह है कि भारतीय दर्शन में स्मृति केवल “याद रखने” की मनोवैज्ञानिक क्रिया नहीं, बल्कि यह ज्ञान, धर्म, साधना और आत्मबोध – चारों स्तरों पर एक सेतु की तरह काम करती है। प्रस्तुत लेख में आपको इसके विभिन्न आयामों की बानगी मिल जाएगी। हमें यह जानकारी नहीं है कि डॉ मधु कपूर द्वारा यह विषय आगे बढ़ाया जाएगा या नहीं, किन्तु केवल इस लेख से भी आप 'स्मृति' के बारे में सचेत अवश्य हो जायेंगे।
ऊधौ मोहै ब्रज बिसरत नाहीं - स्मृतियों से भी निर्मित होता है आत्मबोध
डॉ मधु कपूर
ऊधौ मोहै ब्रज बिसरत नाहीं - इस शीर्षक पंक्ति में सूरदास कहते हैं — ‘हे उद्धव, मेरा मन ब्रज को भूल नहीं पा रहा है। यह पद कृष्ण के मन में बसे ब्रज के प्रति अटूट प्रेम और मधुर स्मृतियों का मार्मिक चित्रण है।
यूँ तो मनुष्य की याददाश्त अधिकांशत "किसने किसके साथ क्या किया, कब, कहाँ और क्यों" से संबंधित होती है, जो हमारे जीवन का प्रारूप गढ़ती हैं कुछ इस तरह कि वे समय के प्रभाव से थककर बर्फ की तरह जम जाती है। पर उष्णता का मृदु स्पर्श पाकर जैसे बर्फ की सिल्लियाँ टूटने लगती है, उसी तरह मानवीय स्मृतियों का जमाव भी फूटकर पिघलने लगता है। सुना है अमरनाथ का शिवलिंग, भक्तों की उष्णता से गलने लगता हैं। प्लेटो, एक ग्रीक दार्शनिक, स्मृतिज्ञान को केवल अनुकरण रूप मानते है। मन मोम की पट्टिका के समान है, जिसमें अनुभव की गई वस्तु की एक सटीक छाप स्मृति रूप में सहेज ली जाती है, जिसका का स्वरूप हूबहू होता है।
लेकिन संत ऑगस्टिन पहले दार्शनिक थे, जिन्होंने अपने ग्रन्थ 'कन्फेशंस' में यह विचार प्रस्तुत किया कि अतीत की घटनाएँ केवल स्मृति में एकत्रित नहीं रहती, बल्कि जीवित प्रतीक बनकर हमारे स्वत्व का एक हिस्सा बन जाती हैं। पुरानी यादों के साथ-साथ वे वर्तमान में रहकर भविष्य को संभालती है।
जैसे किसी वक्ता के द्वारा उच्चारित वाक्य श्रोता को क्रम से सुनाई देता है और अंतिम शब्द के साथ पूर्व के सभी अक्षरों को स्मृति में धारण कर वाक्य का अर्थ-बोध उसे हो जाता है। एक भजन गाने के समय जितना अंश गाया जा चुका है, वह अतीत के गर्त में समाता जाता है। भजन ख़त्म होने के साथ साथ वह अतीत का हिस्सा बन जाता है। लेकिन पुनः प्रयोजनानुसार भविष्य में उसे गाया जा सकता है इस तरह फिर वह वर्तमान का हिस्सा बन जाता है। मेरा बचपन, जो अब अतीत हो चुका है, उसकी स्मृतियां वर्तमान में सामने आ जाती है। इसी तरह जब व्यक्ति भविष्यवाणी करता हैं कि ‘कल सूरज ६.०५ मिनट में उदित होगा’ तो वह भी वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में ही किया जाता है जो प्रमाणित करता है कि अतीत हो या भविष्य दोनों ही कालों में घटनाएँ वर्तमान में उपस्थित होकर ही ज्ञान का विषय बनती है। ज्यां पाल सार्त्र, फ़्रांसिसी दार्शनिक, जिसे प्रत्याशा का नाम देते है।
भारतीय परम्परा में वेदों को ‘श्रुति’ ग्रंथ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसे श्रवण के पश्चात स्मृति में धारणकर स्मृतिग्रन्थ के रूप में सुरक्षित रखा जाता हैं, जो सत्य की खोज का मार्ग प्रशस्त करता है। अनेक ग्रंथ यथा रामायण, महाभारत, बौद्ध ग्रन्थ ‘त्रिपिटक’, कल्हणकृत ‘राजतरंगिणी’, कौटिल्य का अर्थशास्त्र और पाणिनी का ‘अष्टाध्यायी’ इत्यादि सभी साहित्यिक और ऐतिहासिक ग्रन्थ स्मृति की धरोहर कही जाती हैं। सिर्फ इतना ही नहीं हमारा व्यावहारिक आचरण भी स्मृति के अधीन होता है । उदाहरण के लिए यदि मुझे दस बजे आफिस जाना है तो स्मृति उसे धारण कर निर्देश देती रहती है।
यद्यपि भारतीय दार्शनिक चिंतन में स्मृति को सर्वोच्च श्रेणी के प्रमा ज्ञान की पंक्ति में नहीं रखा जाता है। क्योंकि स्मृति पूर्वानुभव का पुनरावर्तन ही होता है, नवीनता का सर्वथा उसमें अभाव होता है। स्मृति में विकृति और विस्मरण की संभावना बहुत अधिक होती है, जिससे इसकी विश्वसनीयता कम हो जाती है। तथापि यहाँ स्मृति की उपयोगिता और महत्व को ठुकराया नहीं गया है। पुराण, लोकगीत, नाट्यकर्म, यज्ञ, और कथावाचन स्मृति परंपरा को जीवित रखने का साधन है। यह ज्ञान की निरंतरता और पहचान की क्षमता को बनाए रखता है। स्मृति ज्ञान, धर्म, और मोक्ष के मार्ग में एक आवश्यक भूमिका निभाती है। स्मृति साधक को अपने पथ से विचलित या भटकने से रोकती है । केवल अतीत की घटनाओं को याद करना नहीं, बल्कि वर्तमान क्षण में सजग रहना भी स्मृति ही संभव कर सकती है। यह संस्कारों को धारण करती है, जिससे व्यक्ति पुनःउन घटनाओं को दोहरा सके।
उत्तर-आधुनिक चिंतन स्मृति को प्लेटो के विपरीत हुबहू रूप में नहीं स्वीकारता है। वह मानता है कि स्मृतियों का गठन अनेक दृष्टिकोणों और अनुभवों से निर्मित होता है। स्मृति सिर्फ संचय नहीं, सृजन की प्रक्रिया का भी हिस्सा होती है। जैसे कोई व्यक्ति गाड़ी चलाना, शतरंज खेलना, बर्तन धोना, खाना बनाना, पढ़ाना जानता है, नींद में ये सभी क्रियाएं उसके संग्रहालय में इकठ्ठा रहती है, जिन्हें वह जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल करता है और प्रकरण के अनुसार उसमें बदलाव भी लाता है। उदाहरण के लिए कब किस रास्ते से गाड़ी कैसे चलानी है वह उसकी सृजन क्षमता पर निर्भर करती है। सृजन क्षमता अनंत है, इसलिए स्मृति चेतना जितना पीछे ले जाती है, उतना ही आगे भी ले जाती है, क्योंकि कल्पना की उड़াन से सामंजस्य रखकर अनंत काल तक उसका विस्तार किया जा सकता है।
इतिहास हिटलर को ‘होलोकास्ट’ के लिए और कुमार गन्धर्व को उनकी शास्त्रीय कला के लिए याद करता हैं। अपनी पुस्तक ‘इतिहास, स्मृति और आकांक्षा’ में निर्मल वर्मा लिखते हैं कि व्यक्ति का आत्मबोध केवल इतिहास से नहीं, बल्कि स्मृति और आकांक्षा से भी निर्मित होता है। ‘अंतिम अरण्य’ उपन्यास में उनके पात्र अपने अतीत की स्मृतियों से जूझते हैं। उनके अनुसार स्मृति के बिना अनुभव एक अराजक स्थिति है। वे आधुनिक मनुष्य को इतिहास और स्मृति के दो छोरों पर अटका हुआ देखते हैं। उनके लिए स्मृति कोई मृत वस्तु नहीं है जिसे पीछे छोड़ दिया गया हो, बल्कि वह हमारे भीतर वर्तमान को जीवित रखती है। स्मृति केवल अतीत का पुनरावर्तन नहीं, बल्कि आत्मा की पुनर्रचना है। अच्छी स्मृति जीवन को सार्थक बनाती है, जबकि 'स्मृतिविभ्रंश' एक रोग है, जो समस्यायें उत्पन्न कर देता है। आयुर्वेद में स्मृति को 'प्रज्ञा' का एक स्वरूप माना जाता है और इसे मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक बताया गया है। प्रह्लाद ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान विष्णु का स्मरण किया और यही उनकी मुक्ति का कारण बना। अक्सर संकट में स्मरण शक्ति ही सहारा देती है।
भक्त के लिए स्मरण का अर्थ केवल कभी-कभी याद करना नहीं, बल्कि 'तैलधारावत्' स्मृति की निरंतरता को बनाये रखना है। जब भक्त हर समय ईश्वर को अपने विचारों में रखता है, तो वह क्रोध, लोभ, मोह विकारों से बचा रहता है। अपनी सभी क्रियाओं अर्थात उठना-बैठना, चलना-फिरना इत्यादि को करता हुआ भी वह अपने इष्ट का स्मरण कर सकता हैं। जब भक्त बार-बार ईश्वर की महिमा और उनकी कृपा का स्मरण करता है, तो उसे अपनी लघुता और ईश्वर की महानता का बोध होता है। इससे 'मैं' का भाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है और समर्पण भाव जाग्रत होता है। नवधा भक्ति का एक चरण स्मरण भी कहा गया है। हनुमानजी के हृदय में निरंतर राम नाम का स्मरण रहता था, जो उन्हें अपार शक्ति और शांति प्रदान करता था।
स्मृति से कटने का अर्थ है अपनी जड़ों से कटना, जिससे मनुष्य के भीतर एक खालीपन या अकेलापन पैदा होता है। इसके बिना मनुष्य का अस्तित्व एक बिखरे हुए पन्ने की तरह हो जाता है। मनुष्य चाहे कहीं भी जाए, उसकी पहचान, आदत, संस्कार प्रेम, कृतज्ञता, परंपरा स्मृतियों से बनती है। स्मृति की धरोहर अकेलेपन के लम्बे सफ़र में “तारे की तरह चमकता है’..."
अज्ञेय के चिंतन में, "स्मृति वह काल-कोठरी नहीं है जिसमें हम बंद हैं, बल्कि वह खिड़की है जिससे हम अपने गुजरे हुए समय को देख सकते हैं और वर्तमान को अर्थ दे सकते हैं।" उनका विचार है कि रचनाकार की स्मृति एक छननी की तरह होती है, जो व्यर्थ को बहा देती है और सत् को सहेज लेती है। उनकी कालजयी कविता 'असाध्य वीणा' में स्मृति का एक दार्शनिक रूप दिखता है। जब प्रियंवद वीणा बजाने के लिए मौन होता है, तो वह अपनी 'एकत्रित स्मृति' से उस किरीटी-तरु की स्मृतियों से जुड़ता है, उन वर्षा की बूंदों को याद करता है, जो उस वृक्ष पर गिरी थीं, ठिठुरती शीत और पक्षियों के कलरव को याद करता है जिसे वृक्ष ने सदियों तक जिया था। जब साधक अपनी स्मृतियों को उस वृक्ष और प्रकृति की स्मृतियों में विलीन कर देता है, तभी वीणा बज उठती है। जब वीणा बजती है, तो हर सुनने वाला उसे अपनी-अपनी स्मृतियों में पिरोकर सुनता है: राजा को उसमें अपनी विजय और वैभव की स्मृति सुनाई दी। रानी को उसमें अपने प्रेम और श्रृंगार की स्मृति मिली। साधारण जन को उसमें अपनी दैनिक सुख-दुख की यादें सुनाई देती है।
भारतीय दर्शन, विशेषकर कश्मीरी शैव दर्शन 'प्रत्यभिज्ञा' दर्शन कहलाता है। इसका अर्थ है—'पहचान लेना'। उनके अनुसार ईश्वर हमारे भीतर ही है, लेकिन हम उसे भूल गए हैं। साधना के माध्यम से उस खोई हुई स्मृति को वापस पाना है। यहाँ स्मृति का महत्व यह है कि वह हमें यह याद दिलाती है कि हम वास्तव में कौन हैं (सोऽहम् - मैं वही हूँ)।
इसलिए जब कोई दमनकारी शक्ति किसी समाज को गुलाम बनाना चाहती है, तो वह सबसे पहले उसके इतिहास और स्मृतियों को मिटाती है। अपनी स्मृतियों को बचाए रखना ही अपनी स्वतंत्रता को बचाए रखना है। कवि कुँवर नारायण सिंह स्मृति को 'आत्म-साक्षात्कार' का जरिया मानते हैं, जो हमें स्वयं से रूबरू कराती है। उनकी प्रसिद्ध रचना 'आत्मजयी', कठोपनिषद के नचिकेता के प्रसंग पर आधारित है। यम के द्बार पर पहुँचकर नचिकेता मृत्यु के रहस्य को जानना चाहता है, ताकि व्यक्ति आत्म-बोध और जीवन की सार्थकता को पा सके, जो आधुनिक मनुष्य के जीवन-विवेक और जिजीविषा की तलाश है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।