कोरोना डायरी
आज की बात
इस स्तंभकार को कोरोना की देश में चिंता शुरू होते ना होते ये समझ आ गया था कि वह इस विषय पर कुछ नहीं लिख सकेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने आज से पहले भी कई बार भाषण दिया और हर बार मन में कुछ बातें आईं लेकिन हम अपने निश्चय पर कायम रहे। आज के भाषण से कुछ लिखने की प्रेरणा हो गई हो, ये कहना तो मुश्किल है लेकिन मन में आया कि कोरोना पर ना लिखने का निश्चय अपनी जगह सही है क्योंकि उस विषय में तो हमारे जैसा बाहरी आदमी क्या लिखेगा जब वह देख रहा है कि वैज्ञानिक और चिकित्सा क्षेत्र के जितने भी दिग्गज अपनी राय दे रहे हैं, उन सबके अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। लगभग वही हाल है कि छ: अर्थशास्त्री एक साथ बैठेंगे तो कम से कम सात मत तो आएंगे ही।
इस स्पष्टता के बाद कि कोरोना पर नहीं लिखना, फिर हमें ऐसी क्या मजबूरी आ गई कि आज ‘कोरोना डायरी’ ही लिखने की सोच ली? पहली बात तो ये स्पष्ट कर दें कि ये कोई वो डायरी नहीं जिससे आपको किसी की निजी ज़िंदगी में झाँकने का मौका मिले। वैसी डायरी तो मैंने बीस-बाईस की उम्र में ही लिखनी छोड़ दी थी जब पता चला कि आपकी डायरी को पढ़ने के बहुत से दावेदार हो सकते हैं और फिर शादी के बाद तो ये हालत हो जाती है कि आप कुछ लिखने की सोचें, इससे पहले ही आपको बता दिया जाता है कि आपको लिखना क्या है? ये गोदी मीडिया और सरकार का रिश्ता तो क्या मुक़ाबला करेगा पति-पत्नी के इस प्यारे रिश्ते का! खैर कुल मिलकर ये कि आज लिखी जाने वाली डायरी वैसी कोई चटपटी डायरी नहीं है!
कोरोना या तकनीकी तौर पर सही होना है तो COVID-19 कोई मज़ाक की चीज़ नहीं है लेकिन बात ये है कि इतनी गंभीर चीज़ है कि इसके डर से हर वक्त मरते रहना भी कोई अच्छी बात नहीं होगी। इसलिए आज प्रधानमंत्री जी भाषण सुनते हुए मन में आया कि कोरोना रोग पर ना सही, उससे उपजी परिस्थितियों पर आम आदमी भी कुछ ना कुछ लिख-पढ़ सकता है ना। और आहुत्ब सारे क्रिएटिव लोग ये सब कर भी रहे हैं। बस वो हमारी तरह पिछड़े हुए नहीं हैं कि कागज़-कलम-दवात (चलो लैप-टॉप ही सही) लेकर कुछ लिखने बैठें बल्कि वो ‘व्हाट्सएप्प’ का सही इस्तेमाल कर रहे हैं।
कोरोना डायरी लिखने का सबसे पहले मन तब हुआ था जब चार घंटे के नोटिस पर पहला लॉकडाउन घोषित हुआ तो भारत के हर बड़े शहर से खबरें आने लगीं कि प्रवासी मजदूर अपने-अपने कार्य-स्थल के शहर छोडकर अपने गाँव जाने को निकाल पड़े हैं और उनमें से बहुत सारे तो पैदल ही जाना चाहते हैं क्योंकि चार घंटे बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी बंद होने जा रहा था। तरह-तरह की तस्वीरें सामने आ रही थीं जिनमें सिर पर पोटलियाँ या कंधों पर बैग टाँगे तो सभी लोग थे ही, कुछ तस्वीरें बच्चों को कंधे या गोद में उठाए लोग भी थे।
स्वाभाविक था कि इन तस्वीरों के देखकर कोई भी विचलित होता लेकिन हम तो आनंद विहार के बिलकुल पास आई. पी. एक्सटैन्शन नामक जगह पर रहते हैं और हमसे दो-तीन किलोमीटर दूरी पर हज़ारों मजदूर उत्तर प्रदेश/दिल्ली और केंद्र – इन तीनों सरकारों में किसी से भी उम्मीद कर रहे थे कि शायद किसी को उनकी सुध लेनी याद आए और वो उनके लिए स्पेशल बसें चला दें ताकि वो अपने गाँव के पास यानि 100-50 किलोमीटर दूर कहीं तो पहुँच सकें। बाद में उत्तरप्रदेश और बिहार सरकार ने कुछ स्पेशल बसें चलाईं भी लेकिन जाने कितने ही लोग फिर भी पैदल ही पहुंचे।
दिल्ली के शाहदरा से एक हज़ार किलोमीटर पैदल चलकर कैसे कुछ श्रमिक पटना पहुंचे, इसकी खबर आप इस लिंक पर जाकर ज़रूर पढ़ें, आपका दिल पसीज जाएगा। हाँ, कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं, जिनकी संवेदनाएं मर चुकी होती हैं और इनमें से एक हैं भाजपा के राज्य सभा सांसद बलबीर पुंज जिन्होंने बाकायदा ट्वीट करके दुनिया भर को अपनी इस राय से अवगत कराया कि प्रवासी मज़दूर बिल्कुल गैर-ज़िम्मेवार हैं, उन्हें मामले की गंभीरता समझ नहीं आ रही और वह अपने परिवारों के पास छुट्टी मनाने जा रहे हैं। पता नहीं ऐसे लोगों को जब वैसी रिपोर्ट पढ़ने को मिलती होगी जिसका लिंक हमने ऊपर दिया है तो उन्हें नींद कैसे आती होगी।
निर्माण मज़दूरों के बीच दशकों से काम कर रहे सुभाष भटनागर जो निर्माण मज़दूर पंचायत संगम से संबद्ध हैं, मज़दूरों के पलायन के विषय में बताते हैं कि इनमें अधिसंख्य मज़दूर ऐसे थे जिनके पास अलग से रहने की कोई जगह नहीं थी और ये या तो अपने निर्माण स्थलों (कंस्ट्रकशन साइट) पर ही रहते थे और या जिन फैक्ट्रियों में ये कार्यरत थे, उन्हीं में नियोक्ताओं ने उनके रहने का इंतज़ाम किया हुआ था। ऐसे में लॉकडाउन की घोषणा होते ही उनके पास रहने की कोई जगह नहीं बची क्योंकि उनके नियोक्ताओं ने उन्हें जाने को कह दिया। इन विषम परिस्थितियों में फंसे मज़दूरों के विषय में ये कहना कि वो छुट्टी मनाने के मूड में अपने गाँव जा रहे थे, आपकी संवेदनहीनता को ही दर्शाता है। किसी को अगर इन “गैर-ज़िम्मेवार” श्रमिकों को छुट्टी मनाते देखना हो तो कश्मीरी गेट के पास यमुना के किनारे इन थके-हारे सैंकड़ों मज़दूरों को देख सकता है जिनके बारे में scroll.in की सम्पादक ने स्वयं दौरा करके यह लेख लिखा है जिसके अनुसार ये लोग दो दिन से भूखे हैं क्योंकि शेल्टर होम में आगजनी की घटना होने के बाद से सज़ा के तौर इन सब का खाना बंद है।
अब देखना ये है कि देश भर में राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन कैसे और कब तक इन मज़दूरों की देखभाल करता है क्योंकि देश भर में इनकी संख्या कम नहीं है। अभी कल ही सूरत में बेचैन और परेशान प्रवासी मज़दूर सड़कों पर उतार आए थे और उधर मुंबई में तो हज़ारों मज़दूर फेक न्यूज़ को सही मानकर बांद्रा रेलवे स्टेशन पर ही पहुँच गए कि शायद उन्हें भेजने के लिए स्पेशल ट्रेन चली जा रहीं हैं। ये सभी लोग ऐसे हैं जो रोज़ कमाने और रोज़ खाने वालों की श्रेणी में आते हैं और जो भी उनकी थोड़ी बहुत बचत थी, (जो उन्होंने अभी तक घर नहीं भेजी होगी) वो अब तक समाप्त हो गई होगी क्योंकि उन्हें पिछले तीन हफ्तों से भी ज़्यादा से कोई काम नहीं मिला है।
यहाँ ये याद रखना ज़रूरी है कि देश की अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र का हिस्सा कम से कम 50% से 60% तक का है और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लगभग सभी मज़दूर प्रवासी ही होते हैं। तो हमें हमेशा याद रखना कहिए कि राष्ट्र निर्माण में उनका योगदान समाज के किसी भी अन्य वर्ग से कम नहीं है। इसके बावजूद हम उनके कल्याण के लिए जीडीपी का एक छोटा हिस्सा भी अलग से सुरक्षित रखने को राज़ी नहीं होते। इंटरनेट की दुनिया खंगालें तो हम इस विषय पर बहुत सारे लेख पाएंगे कि इस विपदा के बाद दुनिया बिल्कुल बदल जाएगी। लेकिन लगता है कि कुछ लोगों के लिए कभी कुछ नहीं बदलेगा।

विद्या भूषण अरोरा