क्या विश्व अभी अभी एक आणविक युद्ध देखने से बच गया है?
अभी कुछ घंटे पहले ही अमेरिका और ईरान दोनों ने अलग-अलग घोषणाओं में युद्ध-विराम स्वीकार कर लिया है. दोनों ने अपनी शर्तें एक दूसरे से अलग दोहराईं हैं लेकिन माना जा सकता है कि यह वुद्ध विराम अब सभी पक्षों को कुछ समय देगा और आने वाले दिनों में सभी पक्ष स्थाई शांति का रास्ता खोजेंगे.
क्या विश्व अभी अभी एक आणविक युद्ध देखने से बच गया है?
विद्या भूषण अरोरा
खाड़ी युद्ध में पंद्रह दिन के लिए ही सही, युद्ध विराम की घोषणा से सभी ने राहत की सांस ली है. युद्ध विराम की घोषणा से करीब १२ घंटे पहले आई ट्रम्प की धमकी निस्संदेह डरावनी थी कि होरमुज़ की खाड़ी ना खोली गई तो वह एक प्राचीन सभ्यता को पूरी तरह मिटा देगा. यह समझने में किसी को मुश्किल नहीं हुई कि ट्रम्प आणविक हमले की बात कह रहे हैं. ईरानी जनता और सेना ने सैंतीस दिनों तक अमेरिका-इज़राइल का जिस बहादुरी से मुकाबला किया, निस्संदेह वह भी वैश्विक इतिहास में एक मिसाल की तरह दर्ज होगा. बहरहाल उस पर चर्चा के और भी अवसर आएँगे. अभी तो हमें इस पर चर्चा करनी है कि पंद्रह दिन बाद क्या होगा या बल्कि ट्रम्प जैसे सनकी नेता के चलते इन पंद्रह दिनों में भी क्या होगा! अगर आप यह सोच रहे हैं कि इसका अनुमान आप भला कैसे लगा लेंगे तो ठीक ही सोच रहे हैं. इसका अनुमान तो स्वयम ट्रम्प को भी पता नहीं होगा या नहीं.
स्थिति का आकलन करने के लिए हम सबसे पहले यह देखने की कोशिश करें कि दोनों पक्ष इस समझौते के लिए राज़ी कैसे हुए होंगे. इसमें सबसे पहले आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि जो ऊपर से दिख रहा है और कहा जा रहा है, बात उससे आगे की है. ऊपर से तो दोनों ही पक्षों द्वारा यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ और पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने मध्यस्थता की और उनके कहने से दोनों पक्ष पंद्रह दिनों के युद्ध विराम के लिए तैयार हो गए लेकिन हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान के पास ऐसा कोई दबाव या लीवर नहीं है जिसका इस्तेमाल वह अमेरिका और ईरान पर कर ले और युद्ध विराम करवा ले. परदे के पीछे दसियों तरह की चीज़ें हुईं होंगी जिनका खुलासा समय समय पर होता रहेगा लेकिन अगर हम तुरंत कोई लीवर खोजना चाहें तो सबसे पहले हमारी नज़र चीन पर पड़ती है. जब हम यह लिख रहे हैं तो एक-दो वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा भी यह संकेत किया गया है कि चीन ने ईरान पर दबाव बनाया कि वह फिलहाल इस अस्थायी युद्धविराम पर राज़ी हो जाए. उधर अमेरिका की राजनीति पर नज़र रखने वाले लोगों का मानना है कि ट्रम्प को मनवाने में अमरीकी उपराष्ट्रपति जे डी वांस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. फिर यह कहने वाले भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं कि उपराष्ट्रपति वांस २०२८ में राष्ट्रपति के लिए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार होंगे और इस युद्ध में, जिसका अमेरिका में घनघोर विरोध हो रहा है, वांस को शुरू से ही तटस्थ भूमिका में दिखाया जा रहा है.
बहरहाल, महत्वपूर्ण यह नहीं है कि युद्धविराम का श्रेय किसे मिलना चाहिए – महत्वपूर्ण यह है कि युद्धविराम हो गया है और अब यह किसी भी सूरत में टूटना नहीं चाहिए अर्थात इस पंद्रह दिन को युद्धविराम को पश्चिम एशिया में स्थाई शांति वार्ता के रूप में बदलना चाहिए. पश्चिम एशिया (या जिसे पश्चिम के देश मिडिल ईस्ट कहते हैं) में शांति पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण है, यह बात इन सैंतीस दिनों में भी अच्छे से साबित हो चुकी है. हमें लगता है कि इस क्षेत्र में स्थाई शान्ति के आगामी प्रयासों में यूरोप, रूस, चीन और भारत को भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और भविष्य के लिए एक ऐसा सर्व-स्वीकार्य फ्रेमवर्क तैयार करना चाहिए जिसमें पश्चिम एशिया के साथ-साथ अन्य ऐसे हॉट-स्पॉट्स जहाँ युद्ध चल रहे हैं या हो सकते हैं, उन सब जगहों पर भी शांति स्थापित हो, इसके लिए व्यावहारिक प्रस्ताव बनाने चाहियें.
आने वाले दिनों के बारे में एक बात जो निश्चयपूर्वक कही जा सकती है, वह यह है कि हम आने वाले वर्षों में एक बिलकुल ही बदली हुई दुनिया देखने वाले हैं और कोई भी बदलाव बिना पीड़ा के तो नहीं आता, इसलिए हमें (यहाँ हमें का अर्थ भारत नहीं है बल्कि दुनिया है) आने वाले समय में कुछ ऐसी परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ सकता है जिनके बारे में हमने पहले कभी नहीं सोचा था. यदि युद्ध रुक भी गए तो दुनिया भर में संसाधनों पर जो दबाव पड़ रहा है और उसके चलते विभिन्न समुदायों के बीच जो आपसी संघर्ष बढ़ रहे हैं, वो सब चिंता पैदा कर रहे हैं.
इस बदलती दुनिया में एक बदलाव यह भी देखने को मिल रहा है कि पिछले कुछ दशकों में विश्व ने जिन जीवन-मूल्यों को बेहतर मानकर स्वीकार किया था, उन्हीं मूल्यों को अब बेशर्मी से नकारा जा रहा है. लोकतंत्र, समानता, आपसी भाईचारा, अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे मूल्य पिछले कुछ दशकों में सर्वमान्य हो चलते थे किन्तु सबसे बड़ा विरोधाभास यह था कि जहाँ ज़बानी जमाखर्च तो इन मूल्यों पर किया जा रहा है, वहीँ दुनिया भर में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है, अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं पर भी तरह तरह के प्रतिबन्ध सामने आ रहे हैं. क्या यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सीमित युद्ध से जो आणविक युद्ध में बदलने से कुछ ही घंटे दूर रह गया था, पूरा विश्व सबक लेगा और गंभीरता से विचार करेगा कि ऐसे कौनसे उपाय किये जाएँ जिससे दुबारा ऐसी परिस्थिति कभी ना आए?
अगर पश्चिम एशिया में कुछ घंटे पहले घोषित हुए इस युद्धविराम से दुनिया को यह दिशा मिल सके कि लालच और अहंकार छोड़कर सबको एक वृहत्त परिवार की तरह रहना है और विश्व अब स्थाई शान्ति की ओर बढ़ सके तो इससे बेहतर और क्या होगा.
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विद्या भूषण स्वतंत्र लेखन करते हैं और इस वेबपत्रिका का संचालन भी।