स्वतंत्रता दिवस पर विशेष : आज़ादी का दिन और गांधी
जब भी हम प्रथम स्वतंत्रता दिवस (1947) की बात करते हैं तो लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरु की सायास ही याद आ जाती है। साथ ही मन में प्रश्न उठता है कि उस दिन महात्मा गाँधी कहाँ थे और क्या कर रहे थे? यह तो मोटे तौर पर हम सब जानते हैं कि गाँधी उन दिनों देश के विभाजन से उपजी साम्प्रदायिक हिंसा की आग को बुझाने के काम में लगे थे। पराग मांदले अपने इस लेख में हमारे पाठकों के लिए यही जानकारी लेकर आ रहे हैं कि देश को स्वतंत्रता मिलने के अवसर पर गाँधी की क्या चिंताएं थीं और देश के लिए उनके क्या सपने थे। हम इसी लेख से गाँधी जी के इस कथन को यहीं उधृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं - जब पश्चिम बंगाल का पूरा मंत्रिमंडल उनका आशीर्वाद लेने के लिए पहुँचा तो गांधी ने उनसे कहा, “आज से आपको कांटों का ताज पहनना होगा। सत्य और अहिंसा की आप सतत साधना कीजिए। नम्र बनिए, सहिष्णु बनिए। ब्रिटिश राज्य ने आपके जीवट को बेशक परख लिया। परंतु अब आपकी पूरी-पूरी परीक्षा होगी। सत्ता से सावधान रहिये। सत्ता मनुष्य को भ्रष्ट करती है। इसकी तड़क-भड़क और आडंबर में मत फँसिए। याद रखिए कि आप भारत के गांवों में बसे गरीबों की सेवा करने के लिए पदारूढ़ हैं। ईश्वर आपकी सहायता करे।”
स्वतंत्रता दिवस पर विशेष : आज़ादी का दिन और गांधी
पराग मांदले
यह तो सब लोग जानते हैं कि तीन दशक से अधिक समय तक भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी 15 अगस्त 1947 को, जिस दिन भारत को औपचारिक रूप से स्वतंत्रता मिली, उसका उत्सव मनाने के लिए सत्ता के केंद्र दिल्ली में नहीं थे। मगर अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि उस दिन गांधी कहाँ थे और क्या कर रहे थे। कई लोग यह कहते-मानते हैं कि गांधी उस दिन पूर्वी बंगाल के नोआखली में थे, मगर यह सच नहीं है। हालाँकि यह जरूर सच है कि गांधी दरअसल निकले तो नोआखली जाने के लिए ही थे, जहाँ वे साम्प्रदायिक दंगों में पीड़ित अल्पसंख्यक हिंदुओं की रक्षा के लिए नवंबर 1946 से मार्च 1947 के दौरान रहे थे और गाँव-गाँव पैदल नापकर उन्होंने उन दंगों की आग को बुझाया था। मगर दरअसल वे नोआखली पहुँच नहीं पाए थे। परिस्थितिवश उन्हें कलकत्ता में बड़े पैमाने पर हो रही साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए रुकना पड़ा था।
मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन के आह्वान के बाद से ही कलकत्ता और नोआखली दोनों में भीषण दंगे हुए थे। नोआखली में हिंदू अल्पसंख्यक थे। वहाँ करीब चार माह रहकर गांधी जी ने शांति स्थापित करा दी थी, मगर जैसा कि श्री प्यारेलाल ने अपनी किताब द लास्ट फेज़ में लिखा है : ‘अगस्त 1946 के भीषण हत्याकांड के बाद कलकत्ता दरअसल कभी शांत नहीं रहा। सीधी कार्रवाई दिवस की कटु स्मृतियां और मुस्लिम लीग के शासन में हिंदुओं ने जो कष्ट सहे थे उनकी दुःखद स्मृतियां लोगों के दिलों में खटक रही थीं। साम्प्रदायिक उत्तेजना और पागलपन भीतर ही भीतर उबलता और सायं सायं करता रहा था। हत्या, आगजनी, लूटपाट, हथियारों का उपयोग और बमों तथा तेजाब के गोलों का फेंका जाना नगर के जीवन का नियमित अंग बन गया था।’
यूँ 3 जुलाई 1947 को पश्चिम बंगाल के नये मंत्रिमंडल ने डॉ. प्रफुल्लचंद्र घोष के नेतृत्व में शपथ ग्रहण कर ली थी, मगर 15 अगस्त तक तत्कालीन मुख्यमंत्री हसन शहीद सुहरावर्दी के नेतृत्व वाले मुस्लिम लीगी मंत्रिमंडल के हाथ में ही सारे बंगाल के विविध विभागों का वास्तविक प्रशासन था।
उस दौरान नोआखली में फिर से साम्प्रदायिक हिंसा भड़कने की खबरें आने लगी थीं। महात्मा गांधी उस समय पटना में थे। उन्होंने 7 अगस्त को मुख्यमंत्री सुहरावर्दी को तार भेजकर नोआखली में बढ़ रही अराजकता के संदर्भ में तुरंत कार्यवाही करने को कहा। वे सिर्फ इतने पर ही संतुष्ट न होकर खुद नोआखली जाने के लिए पटना से कलकत्ता रवाना हो गए। 9 अगस्त को गांधी कलकत्ता में पहुँचकर सोदपुर आश्रम में ठहरे।
विभाजन के दौरान सरकारी नौकरों को यह छूट दी गई थी कि वे जिस देश में जाना चाहें, जा सकते हैं, इसलिए लगभग सभी मुसलमान अधिकारी और पुलिसवाले पूर्वी पाकिस्तान चले गए थे और उनकी जगह हिंदुओं ने ले ली थी। इसकी वजह से कलकत्ता के मुसलमान बुरी तरह से डरे हुए थे।
मुस्लिम नेताओं ने गांधी से मिलकर उनसे अनुरोध किया कि वे कुछ दिन कलकत्ता में ही ठहर जाएं। उन्होंने गांधी को याद दिलाया कि वे खुद यह कहते रहे हैं कि उन पर जितना अधिकार हिंदुओं का है, उतना ही मुसलमानों का भी। लेकिन उस समय गांधी के सामने बड़ा सवाल नोआखली पहुँचकर वहाँ के हिंदुओं की रक्षा करना था। इसलिए उन्होंने मुस्लिम नेताओं से कहा कि “मैं तैयार हूँ, परंतु फिर आपको नोआखली की शांति की गारंटी देनी होगी।” उन्होंने साथ ही यह चेतावनी भी दे डाली कि यदि इस दौरान नोआखली में कुछ गड़बड़ी होती है तो उन्हें गांधी के आमरण अनशन का सामना करना पड़ेगा।
जब कलकत्ता के पूर्व मेयर मुहम्मद उस्मान और अन्य नेताओं ने इसका आश्वासन दिया तब गांधी ने दो दिन के लिए अपना नोआखली जाना स्थगित कर दिया। इस बीच गांधी के कलकत्ता पहुँचने का समाचार सुनते ही सुहरावर्दी भी अपना दौरा छोड़कर कलकत्ता दौड़े आए और गांधी से मिले। उन्होंने गांधी से आग्रह किया कि कलकत्ता में सच्ची शांति कायम होने तक उन्हें शहर नहीं छोड़ना चाहिए।
इस बार गांधी ने नोआखली के हिंदुओं की रक्षा की अपनी शर्त में और भी बहुत कुछ जोड़ दिया। जैसा कि प्यारेलाल लिखते हैं, गांधी ने कहा : “मैं तैयार हूँ, अगर आप फिर से शांति कायम करने के लिए मेरे साथ मिलकर काम करने को तैयार हों। लेकिन यह सोलह आने सच्चाई के आधार पर ही हो सकता है। मेरा सुझाव है कि हम दोनों साथ-साथ एक ही मकान में उपद्रव-ग्रस्त क्षेत्र में रहें, पुलिस और सेना हमारे रक्षा न करे, हम साथ-साथ लोगों से मिलें, उनको समझाएं और बताएं कि जब आपसी समझौते से देश का विभाजन हो चुका है तो कोई कारण नहीं कि दोनों पक्ष आपस में लड़ते रहें। यदि आपको मेरा यह प्रस्ताव स्वीकार हो, तो मैं अपनी तरफ से अनिश्चित काल के लिए नोआखली जाना स्थगित करके जब तक जरूरी हो कलकत्ते में ठहरूंगा।”
जाहिर है कि सुहरावर्दी के लिए, जिनके मुख्यमंत्री रहते डायरेक्ट एक्शन डे में बड़े पैमाने पर हिंदुओं का कत्लेआम हुआ था, इन शर्तों को स्वीकार करना आसान नहीं था। लेकिन बड़े सोच-विचार के बाद सुहरावर्दी ने अंततः गांधी की सभी शर्तें मान लीं। हालाँकि हिंदुओं का सुहरावर्दी पर जरा-भी विश्वास नहीं था। यहाँ तक कि इस बात की जानकारी मिलने पर सरदार पटेल ने गांधी को 13 अगस्त को भेजे एक पत्र में लिखा था, ‘तो आप कलकत्ते में रोक लिये गये हैं और वह भी ऐसी जगह जो सचमुच कसाईखाने जैसी है और बदमाशों और गुंडों का बदनाम अड्डा है। और संगति भी आपको कैसी बढ़िया मिली है। यह तो भयंकर खतरा है।’
लेकिन अपनी अहिंसा की अमोघ शक्ति को सिद्ध करने के लिए इस तरह के खतरे उठाना गांधी के लिए कोई नयी बात नहीं थी। उन्होंने इसके लिए कई बार अपनी जान को दाँव पर लगाया था। वे जब अपनी शर्त के अनुसार 13 अगस्त को सुहरावर्दी के साथ रहने के लिए बेलियाघाटा इलाके की हैदरी मेंशन नामक इमारत में पहुँचे तो उत्तेजित हिंदू नौजवानों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया था। तब गांधी ने उन्हें समझाया कि किस तरह उन्होंने कलकत्ता में ठहरने की एवज में नोआखली के हिंदुओं की रक्षा की जिम्मेदारी सुहरावर्दी और गुलाम सरवर जैसे लोगों के कंधे पर डाल दी है।
नौजवान जल्दी मानने वाले नहीं थे, इसलिए यह बातचीत अगले दिन भी चली। अंततः गांधी उन्हें यह समझाने में सफल हुए कि पूरे इलाके में शांति स्थापित करने के लिए और मुस्लिमबहुल इलाकों में हिंदुओं की सुरक्षा के लिए उनका यह प्रयास कितना महत्वपूर्ण है। इसके बाद तो वे ही नौजवान गांधी के स्वयंसेवक बन गए और उन्होंने अपने मित्रों को शांति और सद्भावना के लिए काम करने के लिए मनाने की जिम्मेदारी ले ली। प्यारेलाल ने अपनी किताब में लिखा है : बाद में उनमें से एक ने दूसरे से कहा, “यह बूढ़ा कैसा जादूगर है। कितनी ही जबर्दस्त मुश्किलें क्यों न सामने हों, यह बूढ़ा हारना तो जानता ही नहीं!”
उस शाम, यानि 14 अगस्त को हैदरी मेंशन के अहाते में आयोजित प्रार्थना सभा में गांधी ने कहा, “कल से हम अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी से मुक्त हो जाएंगे। परंतु आज आधी रात से भारत के टुकड़े भी हो जाएंगे। इसलिए कल का दिन आनंद का भी होगा और दुःख का भी होगा। इससे हम पर जिम्मेदारी का भारी बोझ आ जाएगा। आइये, हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें उस भार को अच्छी तरह उठाने की शक्ति दे।”
लेकिन ऐसा नहीं था कि सब कुछ ठीक हो गया था। इस प्रार्थना सभा के बाद भी एक उत्तेजित भीड़ सुहरावर्दी को मारना चाहती थी। इस पर गांधी ने भीड़ को फटकारा। गांधी के आश्वासन पर सुहरावर्दी न सिर्फ भीड़ के सामने आए बल्कि उन्होंने कलकत्ता के भीषण हत्याकांड के लिए अपनी पूरी जिम्मेदारी स्वीकार की। महात्मा के सानिध्य में दो दिन बिताने का यह असर था कि सुहरावर्दी जैसे अहंकारी और क्रूर व्यक्ति ने भी अपना अपराध असंदिग्ध तरीके से सीधे और स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया। इसका भीड पर गहरा प्रभाव पड़ा।
उस रात गांधी 11 बजे सो गए। उनके अनुरोध पर 15 अगस्त की अर्धरात्रि से उनके निवास-स्थान का सशस्त्र पहरा उठा लिया गया।
सामान्यतः गांधी हर दिन तड़के तीन बजे ही उठ जाया करते थे, मगर 15 अगस्त को गांधी अपने तय समय से एक घंटा पहले 2 बजे ही जाग गये। उस दिन उनके पुत्र समान प्रिय सचिव महादेव देसाई की पाँचवीं पुण्यतिथि थी। गांधी ने उस दिन उपवास रखा और संपूर्ण गीता का पाठ किया। जब गांधी सुबह की सैर के लिए निकले तो हजारों लोगों की भीड़ उनके दर्शनों के लिए खड़ी थी। उस दिन तो दिन भर ही गांधी के दर्शनों के लिए उत्सुक लोगों की भीड़ हैदरी मेंशन पर पहुंचती रही। गांधी को हर आधे घंटे बाद दर्शन देने के लिए बाहर आना पड़ रहा था।
जब पश्चिम बंगाल का पूरा मंत्रिमंडल उनका आशीर्वाद लेने के लिए पहुँचा तो गांधी ने उनसे कहा, “आज से आपको कांटों का ताज पहनना होगा। सत्य और अहिंसा की आप सतत साधना कीजिए। नम्र बनिए, सहिष्णु बनिए। ब्रिटिश राज्य ने आपके जीवट को बेशक परख लिया। परंतु अब आपकी पूरी-पूरी परीक्षा होगी। सत्ता से सावधान रहिये। सत्ता मनुष्य को भ्रष्ट करती है। इसकी तड़क-भड़क और आडंबर में मत फँसिए। याद रखिए कि आप भारत के गांवों में बसे गरीबों की सेवा करने के लिए पदारूढ़ हैं। ईश्वर आपकी सहायता करे।”
उस दिन गांधीजी ने उपवास तो रखा ही, साथ ही अतिरिक्त कताई भी की। कताई करते हुए उन्होंने बोलकर एगथा हैरिसन और रमेन्द्र जी. सिन्हा के लिए पत्र लिखवाए। पश्चिम बंगाल के नये गवर्नर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी उनसे मिलने पहुँचे और गांधीजी ने जो चमत्कार कर दिखाया था, इसके लिए उन्हें बधाई दी। मगर गांधीजी ने उत्तर दिया कि मुझे तब तक संतोष नहीं होगा जब तक कि हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के साथ अपने को निरापद नहीं समझेंगे और लौटकर पहले की तरह अपने घरों में नहीं रहने लगेंगे। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि हिंदू-मुसलमानों का ह्रदय-परिवर्तन नहीं हुआ तो वर्तमान उत्साह के बावजूद भविष्य में स्थिति और खराब होने की संभावना रहेगी।
उस दिन उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधियों और विद्यार्थियों के एक दल के साथ भी मुलाकात की। उस शाम की प्रार्थना सभा में तीस हजार से ज्यादा लोग उपस्थित थे। उस सभा में सुहरावर्दी ने कहा कि जो चीज तीन-चार दिन पहले असंभव समझी जाती थी, वह महात्मा जी की कृपा चमत्कारिक रूप से सत्य बन गई है। इसी सभा में सुहरावर्दी ने मुसलमानों से जबरन जयहिंद बुलवाने का उल्लेख करते हुए कहा कि मुसलमान मजबूरी में नहीं खुशी से जयहिंद बोलेंगे और यह कहते हुए उसने खुद जयहिंद का नारा लगाया, जिसे उपस्थित भीड़ ने दोहराया।
यह उल्लेखनीय है कि गांधी ने हमेशा जितना महत्व स्वतंत्रता को दिया, उतना ही महत्व इस बात को भी दिया कि हमारे देश के सभी लोग उस स्वतंत्रता का उपभोग करने के काबिल भी बने। जिस दिन देश को स्वतंत्रता मिली, उस दिन भी सत्ता हस्तांतरण के किसी भी क्रिया-कलाप में शामिल न होते हुए गांधी कलकत्ता में दंगे की आग को बुझाने में व्यस्त रहे। यह दिन गांधी के लिए मिले-जुले भावों वाला दिन था। एक ओर जहाँ सदियों के गुलामी की जंजीरों से देश के मुक्त हो जाने की खुशी थी, वहीं विभाजन और साम्प्रदायिक दंगों में हो रही हिंसा से उपजा दुःख भी था। इन मिले-जुले भावों की कशमकश में ही गांधी का वह दिन भी समाप्त हुआ, जिस दिन एक लम्बे संघर्ष के बाद देश को आज़ादी मिली थी।
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*वाणिज्य और पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने के उपरांत पराग मांदले किसी ना किसी रूप में मीडिया से जुड़े रहे। देश भर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख, कहानियां, कविताएं और स्थायी स्तंभ प्रकाशित होते रहे हैं। उनके दो कहानी संग्रह भी प्रकाशित हैं। विगत अनेक वर्षों से वे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ शाश्वत व वैज्ञानिक जीवनशैली के प्रचार-प्रसार से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा गांधी उनके अध्ययन का प्रमुख केंद्र रहे हैं। गांधी विचारों पर उनके कई लेख प्रकाशित हुए हैं और देश के विभिन्न शहरों में व्याख्यान भी आयोजित हुए हैं। संपर्क - 8484999664