चाँद की बहकी नज़र कह रही है प्यार कर
मनोहर नायक का इस बार का लेख एक ऐसे विषय पर है जिस पर दुनिया की हर भाषा में संभवत: सबसे अधिक लिखा गया होगा। यदि आपने सोचा कि अच्छा, आज का उनका लेख प्यार/रोमांस और मुहब्बतों पर है तो आप लगभग ठीक हैं किन्तु पूरी तरह ठीक नहीं क्योंकि उनका यह लेख चाँद पर है। क्या 'प्यार-मुहब्बत' की कोई बात चाँद के बिना पूरी हो सकती है? मुम्बईया हिंदी फिल्मों के चाँद को केंद्र में रखकर लिखे गए हज़ारों गीत इस अटूट रिश्ते के गवाह हैं। अभी कुछ ही रोज़ पहले पौष की पूर्णिमा के चाँद को निहारते-निहारते मनोहर नायक का मन कहाँ-कहाँ भटका, यह जानने के लिए इस निबंध को पढ़िए।
चाँद की बहकी नज़र कह रही है प्यार कर
मनोहर नायक
अभी गयी पौष पूर्णिमा पर चाँद पृथ्वी के निकटतम और पूर्णरूपेण पूर्ण था। मन दूर के इस मुसाफ़िर चंद्रमा के गिर्द भटकता रहा, यह ख़याल करता हुआ कि वह दूर कहाँ ! वह इस बेतरह हम में रचा-बसा है कि बिल्कुल पास लगता है।
.......चाँद अंततः एक पहेली! कितने उसके रूप और कितने उसके रंग। सम्मोहित करता चाँद और घेरती-सी उसकी चाँदनी... चँद्र अनंत, चँद्र कथा अनंता! क्या चाँद एक मन:स्थिति है...जाकी रही भावना जैसी!... राम समुद्र को बाँध कर पार पहुँचे और जब रात्रि में साथियों से मंत्रणा कर रहे थे, तभी 'पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक।' . उन्होंने कहा चँद्रमा में यह जो मेचकताई (स्याहपन, स्यामता) है, यह क्या है? इसे सब अपनी मति अनुसार कहो। 'कह सुग्रीव सुनहु रघुराई/ ससि में पड़त भूमि की छांई'। किसी ने कहा कि राहु ने शशि को मारा तो उसके ह्रदय पर नील पड़ गया ... 'कोउ कह बिधि जब रति मुख कीन्हा / सार भाग ससि कर हरि लीन्हा ' और इससे इंदु के ह्रदय में छेद हो गया जिससे नभ की परिछाहीं दिखायी देती है।
अब राम कहते हैं, समुदमंथन से निकलने के कारण चाँद और विष सहोदर हैं और चाँद ने अपने भाई को अपने ह्दय में स्थान दे रखा है। इसके बाद राघव जो कहते हैं वह एक विरही का निवेदन है, 'बिष संजुत कर निकर पसारी / जारत बिरहवंत नर नारी '| गोसांईजी इस प्रसंग का समापन हनुमानजी के कथन से करते हैं, जो महावीर तो हैं हीं, भक्त शिरोमणि भी माने जाते हैं, 'कह हनुमंत सुनहु प्रभु, ससि तुम्हार प्रिय दास/ तव मूरत बिधु उर बसे, सोई स्यामता आभास'।
हम ख़ुशक़िस्मत हैं कि हमें चाँद मिला। शायर ने सही कहा है: 'चाँद का हुस्न ज़मीन से है /चाँद पर चाँदनी नहीं होती'। चाँद हमारे पास इस इफ़रात में है कि उसका लेखा-जोखा लेना असम्भव है। काव्य, महाकाव्य, साहित्य, गीत, संगीत, लोक साहित्य उससे भरा हुआ है। शंकरजी की जटाजूट से लेकर पूजित नवग्रहों तक। सप्ताह का आरम्भ उसी के सोमवार से है। महीना उसी को समर्पित है। उसके उपस्थित और अनुपस्थित होने के काल में विभाजित। उसकी पूर्णिमा-अमावस्याएँ पावन पर्वों वाली। वह प्रकाश की अजस्त्र प्रेरणा.... कार्तिक अमावस्या को दीपावली तो कार्तिक पूर्णिमा को प्रकाश वाला गुरु परब। राग दरबारी की बंदिश 'अनोखा लाड़ला खेलन को माँगत चाँद' को आप बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब से लेकर कोक स्टूडियो के संगीत में सुन सकते हैं।
बचपन में किसी खेल में हारने पर हारे दुखियारे को पड़ोस के एक कक्का कवि मुकुट बिहारी सरोज के गीत की इन पंक्तियों से शीतलता देते, 'इसमें रोने धोने की क्या बात है/ हार जीत तो सबके साथ है / वह चाँद कहाँ तक रोये/ जिसके आगे पीछे रात है'। ... परवीन शाकिर का शेर याद में उतर रहा है :
इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चाँद
चाँद परम प्रेमी है। न जाने किस प्रियतम को ढूँढने हर शाम निकल पड़ता है। वह प्रेम की प्रत्येक स्थिति का प्रतीक है... प्रेम का अगाध राग-विराग। उसकी महाछवि में प्यार की अनगिन अद्भुत छटाएँ और छवियाँ बिम्बित होती हैं। चाँद का नाता ओर-छोर, आद्योपांत प्रेम से है, चाहे वह प्रेम का सुख हो या दुख, दर्द,अभाव ,उलझन, निराशा, स्मृति, उमंग उछाह कुछ भी हो, मिलन का माधुर्य हो या बिछोह की टीस। प्रेम का यह महाज्ञानी सब स्थितियों, भावनाओ को व्यक्त करने में समर्थ है।
शायद हम नहीं हमारा मन चाँद को निहारता है और यह हमारा मन चाँद को अपने असर के असर में ले लेता है । वह हमें प्रेरित करता है ,सांत्वना देता और धीरज बँधाता है। वह हमें पूरी छूट देता है। इस हद तक कि हम उस पर तोहमत धर दें, उसे अपने महबूब से कमतर बताएँ, यहाँ तक कि नकार ही दें। 'बंदिनी' के लिए लिखे अपने पहले फ़िल्मी गीत में गुलज़ार चाँद को खरी खोटी सुना देते हैं : 'बदरी हटा के चँदा/चुपके से झाँके चँदा/तोहे राहू लागे बैरी/मुस्काये जी जलाइ के'। . .. फ़ैज़ कहते हैं : 'बज़्मे ख़याल में तेरे हुस्न की शमा जल गयी / दर्द का चाँद बुझ गया हिज़्र की रात ढल गयी'। और मीर साहब शम्स-ओ-क़मर यानि सूरज-चाँद को कुछ मानते ही नहीं, कहते हैं: 'फूल गुल शम्स क़मर सारे ही थे/ पर उनमें तुम ही भाये बहुत'। ... चाँद एकं विकल स्मृति भी है : क्या ज़माना था हम रोज़ मिला करते थे /रात-भर चाँद के हमराह फिरा करते थे ।
शैलेंद्र तो चाँद से मर्मांतक ग्रस्त हैं। चाँद को देख उसके जादू में खो जाते हैं। चाँद ही नहीं उसका पूरा परिवेश, आकाश और तारे सब उन्हें विमोहित , विस्मित करते हैं। शैलेंद्र चाँद और उसके कारोबार के अद्वितीय गायक हैं : 'हम खो गये चाँद है या कोई जादूगर है /या, मदभरी, ये तुम्हारी नज़र का असर है /... 'आकाश में ये हो रहे ये कैसे इशारे / क्या, देखकर, आज हैं इतने खुश चाँद-तारे /क्यों तुम पराये, दिल में समाये /ये बात क्या है, ये राज़ क्या है / कोई हमें बता दे'। यह 'अनाड़ी' का गाना है। इसी फ़िल्म के एक दूसरे गाने में शोलेंद्र चाँदनी और तारों के जाल से रात की रानी की तरह दीवाने हैं, सुधबुध खोये हुए : 'चाँदी सी चमकती राहें/वो देखो झूम झूम के बुलायें/किरनों ने पसारी बाहें/ कि अरमाँ नाच नाच लहराये/बाजे दिल के तार, गाये ये बहार/उभरे है प्यार जीवन में/ ... किरनों. ने चुनरिया तानी/बहारें किस पे आज हैं दीवानी/चन्दा की चाल मस्तानी/है पागल जिसपे रात की रानी/ तारों का जाल बेमिसाल/ पूछो न हाल मेरे दिल का'।
शैलेंद्र चाँद के अप्रतिम चितेरे हैं उनके गीतों के मुखड़ों में वह है ... अचानक अंतरों में आकर हँसने चमकने लगता है : 'रात को जब चाँद चमके, जल उठे तन मेरा /मैं कहूँ, मत कर ओ चंदा, इस गली का फेरा/आना मोरा सैयाँ जब आये/ चमकना उस रात को जब तन-मन, मिलेंगे तन-मन'। ... 'चाँद की बहकी नज़र कह रही है प्यार कर'। ... 'क्या कहा है चाँद ने, जिसको सुनके चाँदनी/हर लहर पे झूमके, क्यों ये नाचने लगी/चाहत का है हरसू असर.... मेरी दोनों बाहों में, जैसे आस्मान है/चलती हूँ मैं तारों पर, फिर क्यों मुझको लगता है डर'। . .. ' चन्दा कहेगा हँस कर, सीने पर डाथ रख कर / वो जा रहे हैं देखो, दो प्यार करने वाले'... ' 'चाँद तारों के तले रात ये गाती चले'।
शैलेंद्र ही नहीं तमाम गीतकारों शायरों के अपने-अपने करिश्माई चाँद हैं। 'ये चांद कोई दीवाना है कोई आशिक़ बड़ा पुराना है/ पीछे किसके भागे सारी रात जागे / ' चाँद के पार चलो' , 'आधा है चंद्रमा,रात आधी', 'चाँद फिर निकला', 'चाँद को क्या मालूम', 'एक रात में दो दो चाँद खिले', ’कल चौदहवीं की रात थी', 'रुक जा रात ठहर जा रे चँदा', 'चँदा ओ चँदा' , 'मैं तेरा चाँद तू मेरी चाँदनी'। चाँद पर गाने ही गाने हैं... 'खोया खोया चाँद' से लेकर 'धीरे धीरे चल चाँद गगन में'', 'चौदहवीं का चाँद हो' , 'चाँद सा रोशन चेहरा' से 'चाँद सा मुखड़ा क्यों शरमाया' तक , 'चाँद सी महबूबा हो' , 'पल भर उधर मुँह फेरे ओ चँदा' से लेकर 'चाँद आहें भरेगा' तक ... 'पेड़ों की शाखों पर सोई सोई चाँदनी, तेरे ख़यालों में खोई खोई चाँदनी'...'चाँदनी आयी दिल जलाने.' ... 'चाँदनी ज़ुल्म है जुदाई सितम' से लेकर 'चाँदनी रातें प्यार की बातें, खो गयीं हैं जाने कहाँ' तक ....
इस गिनाने का कोई अंत नहीं... ये गीत याद ही आये चले जा जाते हैं।
प्रेम की ऊँचाइयाँ को चाँद थामे हुए हैं। उसे बाँधा नहीं जा सकता : 'साथी प्यार न बांधा जाये साथी प्यार न बांधा जाये/शशि को छूने उठे उदधि का ज्वार न बांधा जाये'। और जैसा कि प्रेम को नशा कहा गया है, इसलिए फ़ैज़ साहब ठीक ही चाँद-सूरज दोनों को शराब में ढाल लेते हैं
बामे मीना से माहताब उतरे
दस्ते साक़ी पे आफ़ताब आये।
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मनोहर नायक : जबलपुर, मध्य प्रदेश में १९५४ में जन्म। वहीं के स्कूल, कॉलेजों, विश्वविद्यालय में शुरू से अंत तक की पढ़ाई। दिसम्बर 1977 से पत्रकारिता में प्रवेश। इलाहाबाद से नव प्रकाशित 'अमृत प्रभात' पहला अख़बार। अंतिम अख़बार दिल्ली का 'आज समाज'। इनके दरम्यान कई पत्र- पत्रिकाओं में विभिन्न पदों पर नौकरियाँ, जिसमें सबसे अधिक समय, अठारह साल, बीता 'जनसत्ता' में। जबलपुर के 'ज्ञानयुग प्रभात' के लिए भोपाल रहा। दिल्ली में साप्ताहिक 'सहारा समय' में , पाक्षिक 'प्रथम प्रवक्ता' में भी काम किया। दिल्ली में घर-परिवार। साप्ताहिक 'समय की चर्चा' का साथ और स्वतंत्र लेखन। मोबाइल नम्बर : 9811511800.