भवानी भाई और बैतूल के बच्चों का तिरंगा
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हम अपनी वेब-पत्रिका के पाठकों के लिए यह विशेष संस्मरण लेकर आए हैं जिसे सुप्रसिद्ध कवि एवं लेखक शरद कोकास (इनका पूरा परिचय नीचे देखें) ने लिखा है। संस्मरण के केंद्र में प्रख्यात गांधीवादी चिन्तक एवं नामी कवि भवानी प्रसाद मिश्र के साथ-साथ जगमोहन कोकास भी हैं जिन्होंने ग्यारह वर्ष की आयु में ही यूनियन जैक उतारकर तिरंगा लहरा दिया था। यह घटना बैतूल की है जहाँ भवानी प्रसाद मिश्र के नेतृत्व में ९ अगस्त को जुलुस निकल रहा था और इसी भीड़ में कहीं बच्चे भी शामिल हो गए जिनमें से एक बच्चे ने तिरंगा लहराने के काम को अंजाम दे दिया ৷ इन सब घटनाओं का रोचक विवरण आपको इस संस्मरण में पढ़ने को मिलेगा ৷
भवानी प्रसाद मिश्र और बैतूल के बच्चों का तिरंगा
संस्मरण : शरद कोकास
सन उन्नीस सौ के आसपास मेरे परदादा विश्वेश्वर प्रसाद जी लाऊ पाठक का पुरवा जिला रायबरेली से निकले और काम धंधे की तलाश में मध्यप्रदेश के एक शहर बैतूल पहुँच गए ৷ उन्होंने तालाब के पास मुसलमानी मोहल्ले में एक मकान किराये से ले लिया और लकड़ी के व्यवसाय के लिए जंगलों का ठेका लेना शुरू किया ৷ बस ज़िंदगी अपनी राह पर आगे बढ़ती गई , बेटियों के शादी ब्याह हो गए और पांचों बेटे जंगल के ठेके व फर्नीचर के काम में लग गए৷
बैतूल में कोठी बाज़ार के अंतर्गत एक जगह है जहाँ आज भी हर इतवार और गुरुवार को हाट लगता है । बाज़ार के कारण सब इसे इतवारी बाज़ार कहते हैं । इसी इतवारी बाज़ार में परदादा जी ने अपना खुद का मकान भी बना लिया और मकान के एक हिस्से में लकड़ी का फर्नीचर बनाने का कारखाना भी खोल लिया।
इन्ही विश्वेश्वर प्रसाद जी के बड़े बेटे बाबूलाल के घर में तीसरे दशक के अंत में एक बेटी व दो बेटों के बाद चौथी संतान के रूप में मेरे पिता श्री जगमोहन कोकास का जन्म हुआ । जैसा कि उन दिनों पढ़े लिखे लोगों द्वारा अपने बच्चों को स्कूल भेजने का चलन शुरू हुआ था, बाबूलाल जी ने भी अपनी संतानों को स्कूल भेजना शुरू किया ৷
बैतूल के इतवारी बाज़ार मे भवानी दादा का घर
उन दिनों शहर में एक ही हाई स्कूल था जिसे मिश्रा हाई स्कूल कहते थे ৷ बाद में उसका नाम न्यू बैतूल हाई स्कूल हो गया ৷ यह संयोग की बात है कि सन चालीस के करीब हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र, मिश्रा हाईस्कूल में आ गये और उन्होंने हेडमास्टर के रूप मे कार्यभार ग्रहण किया ৷ भवानी दादा उस समय युवा थे और गाँधीजी से बहुत प्रेरित थे৷ गांधी जी की प्रेरणा से स्कूल की गतिविधियों के साथ साथ वे स्वतंत्रता आन्दोलन में भी रूचि लेने लगे ৷ उन्होंने वहीं इतवारी बाज़ार में एक मकान किराये से ले लिया और बैतूल के युवाओं और बच्चों को संगठित करने का काम शुरू कर दिया ৷ उनका यह मकान मेरे पैतृक मकान के बहुत ही करीब था ৷
छात्र जगमोहन पढ़ने में तो मेधावी थे ही लेकिन देशभक्ति की बातों में उनका मन अधिक लगता था ৷ “हवाओं में रहेंगी मेरे ख्यालों की बिजलियाँ” कहते हुए फांसी के फंदे पर लटक जाने वाले भगतसिंह को शहीद हुए एक दशक भी नहीं हुआ था और देश भर के बच्चे उन बिजलियों की रौशनी में आज़ादी की ओर जाने वाला मार्ग तलाश रहे थे ৷
भवानी प्रसाद मिश्र जी का घर बैतूल मे स्वतंत्रता की चाह रखने वाले लोगों के लिए एक जन जागृति केंद्र था । उनके घर मे गांधी जी का एक बड़ा सा चित्र था । स्कूल से लौटने के बाद मोहल्ले के बच्चे और युवा उनके घर एकत्रित हो जाते तथा भवानी दादा उन्हे 1857 की क्रांति, 1905 के स्वदेशी आंदोलन,1920 के असहयोग आंदोलन,1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन या दांडी मार्च तथा 1928 के साइमन कमीशन विरोधी आंदोलन जैसे आंदोलनों के बारे मे बताया करते थे। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन के लिए कार्यकर्ता तैयार करना था ।
सतपुड़ा पर्वत श्रंखला मे बसा बैतूल का क्षेत्र मूलतः आदिवासी क्षेत्र था । सन 1818 आते आते ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीति के तहत यह प्रदेश ईस्ट इण्डिया कंपनी के अधीन आ गया ৷ यहाँ की ठंडी जलवायु के कारण गर्मी से परेशान होने वाले अंग्रेज़ों को यह प्रदेश बहुत पसंद आया ৷ लेकिन व्यापारी अंग्रेज़ों को इस जगह से कोई विशेष लाभ नहीं था अर्थात इस जगह से उन्हें कोई आमदनी नहीं थी क्योंकि यह 'बेतूल' था ৷ बे यानि बिना और तूल यानि कपास, अर्थात यहाँ कपास नहीं होता था৷ फिर बचे हुए गोंड राजाओं के वंशज भी खेड़ला सरकार के रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए थे ৷ गोंडों को अंग्रेज़ी नहीं आती थी और अंग्रेज़ों को गोंडी से कुछ लेना देना नहीं था ৷ इसलिए यह प्रदेश उपेक्षित ही रह गया। लेकिन उस समय तक यहाँ टाउन हाल बन गया था और अंग्रेजी शासन की कई गतिविधियां यहाँ से संचालित होती थीं ।
भवानी प्रसाद मिश्र की टीम
भवानी दादा ने अपने शिक्षक साथियों मदनलाल चौबे, रामस्वरूप बाजपेयी, शम्भू प्रधान, लघाटे मास्टर आदि को लेकर एक टीम तैयार की और विभिन्न गुप्त योजनाओं को अंजाम देने के काम में लग गए ৷ इन कामों में प्रमुख काम थे अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करना, जुलुस निकालना, जहाँ अन्याय दिखे उस अन्याय का विरोध करना और अंग्रेज अधिकारियों के ख़िलाफ़ नारे लगाना ৷ एक टीम उन्होंने अपने स्कूल के छात्रों को लेकर भी बनाई थी जिसमें शामिल थे राममूर्ति चौबे, कोमल सिंह ,जगमोहन कोकास, रमेश कुमार बाजपेयी और उनके स्कूल के कई छात्र ৷ मेरे पिता जगमोहन कोकास उस समय सातवीं कक्षा में थे और रमेश बाजपेयी यानि रम्मू चाचा पांचवीं में पढ़ते थे ৷
यद्यपि यह बच्चे बहुत छोटे थे लेकिन उनमे जज़्बा ग़ज़ब का था ৷ आन्दोलन शब्द के विषय में उन्हें भले पता न हो लेकिन गुलामी का अहसास अवश्य था ৷ वे मजदूरों, किसानों और छोटे मोटे काम करने वाले कामकाजी लोगों को अंग्रेज़ों के हंटर से पिटते हुए देखते थे तो उनका बाल मन उद्वेलित हो जाता था ৷ देशप्रेम का यह जज़्बा अनुभव से उपजा था । ज़ाहिर है शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने की समझ पैदा होने के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं होता ৷ यह बच्चे भवानी दादा और उनकी टीम के लोगों के लिए प्रमुख रूप से सन्देश लाने ले जाने, सूचनाओं पर अमल करने और आन्दोलन सामग्री पहुँचाने का काम करते थे ৷ बच्चों पर अंग्रेज़ों की नज़र ज़रा कम रहती थी इसलिए सारे काम आसानी से हो जाते थे ৷
अब आई तारीख नौ अगस्त
वह उन्नीस सौ बयालीस का साल था तारीख़ थी नौ अगस्त ৷ जिसे हम ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की तारीख़ के रूप में जानते हैं । उस दिन गाँधीजी के आव्हान पर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ प्रदर्शन करने और जुलूस निकालने के अलावा टाउन हाल की बिल्डिंग पर तिरंगा फहराने की योजना बन चुकी थी ৷ सुबह से ही जुलूस की तैयारी होने लगी ৷ जुलुस के लिए इकठ्ठा होने की जगह, प्रस्थान के समय की सूचनाएँ गुप्त रूप से एक दिन पूर्व ही पहुँचाई जा चुकी थीं ৷
भवानी दादा के नेतृत्व में निकलने वाले इस जुलूस में स्कूल के अनेक शिक्षकों और शहर के देशप्रेमियों ने अपना नाम लिखा दिया । उन्हें पूरा विश्वास था कि बैतूल जैसे छोटे से शहर से उठने वाली चिंगारी एक ज्वाला बनकर पूरे देश मे फ़ाइल जाएगी । भवानी दादा के नेतृत्व पर सभी को अगाध विश्वास था ।
जुलूस की तैयारी तो हो गई लेकिन छोटे बच्चों को जुलूस में आने की मनाही थी, डर था उनके साथ कोई अनहोनी न घट जाए लेकिन बच्चों के मानस में मचलती भावनाओं को कौन रोक सकता है ৷ वैसे भी बच्चों को जुलूस में जो आनंद आता है वह सब जानते ही हैं ৷
जुलूस की शुरुआत न्यू बैतूल हाईस्कूल से हुई और कोठी बाज़ार मेन रोड, गुजरी से होता हुआ वह टाउन हाल की ओर बढ़ने लगा ৷ भवानी प्रसाद मिश्र जी हाथ मे तिरंगा लिए हुए जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे । यद्यपि उन्होंने सारा कार्यक्रम योजनाबद्ध रूप से गुप्त रखा था लेकिन छोटे से शहर मे अंग्रेजों तक खबर पहुँचने मे देर कितनी लगती है। जैसे कि हम आज़ाद भारत में भी देखते आये हैं उस समय भी पुलिसवाले डंडे लिए जुलूस के साथ चलने लगे ৷ बिना आदेश के उन्हें कुछ भी करने की मनाही थी ৷
जुलूस आगे बढ़ने लगा ৷ बंकिमचंद्र की कविता ‘वन्दे मातरम’ ध्वनि में ढलकर स्वरयंत्र से बाहर आ रही थी और बिस्मिल अज़ीमाबादी का गीत ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ अपनी बुलंदी में आसमान छू रहा था ৷
यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन जुलूस जैसे ही डिस्ट्रिक्ट जेल के पास पहुँचा, गीत नारों में बदल गए .. ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ , ‘अंग्रेज़ी हुकूमत मुर्दाबाद’ जैसे जाने पहचाने शब्द जैसे ही सियासतदां लोगों के कानो में पड़े तुरंत एक फ़रमान जारी हुआ .. लाठी चार्ज ..৷ जुलूस का नेतृत्व कर रहे भवानी दादा और जुलूस में शामिल मदनलाल चौबे, रामस्वरूप बाजपेयी, शम्भू प्रधान, लघाटे मास्साब सभी ने चौंककर देखा .. अरे पुलिस की यूनिफ़ॉर्म में यह तो अपने पंडित जानकी प्रसाद दुबे हैं ৷ उन्हें थोड़ा अपनापन महसूस हुआ । लेकिन पुलिस दरोगा जानकी प्रसाद के चेहरे पर कोई दुविधा नहीं थी ৷ वे उस समय अंग्रेज़ सरकार के हिमायती मुलाज़िम की भूमिका में थे ৷
भवानी दादा पहले से ही जानते थे , अँग्रेज़ों का नमक खाने के बाद दुबे जी उनसे नमक हरामी नहीं करेंगे उन्होंने आगे बढ़कर कहा “ लो दुबे जी, श्रीगणेश करो। “ बस उसके बाद तो दना दन लाठियाँ चलने लगीं । भगतसिंह के ‘ख़यालों की बिजलियों’ पर अंग्रेजों की लाठियाँ भारी पड़ रही थीं । फूटे हुए माथों से बहता हुआ खून मुँह में भर आता था लेकिन जुलूस में शामिल हर व्यक्ति के मुँह से निकलने वाले “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो“ के नारों में वही जोश था, वही ताकत थी , वही प्रतिरोध जो बरसों ज़ुल्म सहने के बाद पैदा होता है ৷
भवानी दादा ने देखा कि मना करने के बावजूद अचानक कहीं से उनकी वानर सेना के बच्चे जुलूस मे आ गए हैं । उन्हे चिंता होने लगी , जब जुलूस की शुरुआत हुई थी तब तो यह बच्चे नहीं थे । उन्होंने देखा कि लाठियाँ बच्चों पर भी पड़ने लगीं लेकिन उनका सर बचाया जा रहा था ৷ भवानी दादा ने सिपाहियों से कहा “ अरे, बच्चों को तो छोड़ दो ।“ अचानक नौ वर्षीय बालक रमेश बाजपेयी की जांघ पर भी एक लाठी पड़ी ৷ बाकी लोगों ने उसे कवर किया ৷ अर्जुन बने बालकों की दृष्टि में सामने वह यूनियन जैक था जो एक खम्भे के शीर्ष पर लहरा रहा था ৷ क्रांतिकारियों ने अपने हाथों में थामे तिरंगों को हवा में लहराना शुरू किया ৷ उनका अगला लक्ष्य उस खम्भे पर तिरंगा फहराना था ৷
भवानी दादा और उनके क्रांतिकारी साथी अपनी योजना अनुसार आगे बढ़ ही रहे थे कि अचानक एक बालक भगदड़ के बीच से निकला, उसके हाथ में एक तिरंगा था जिसमें एक लकड़ी लगी हुई थी ৷ लोगों ने देखा वह बालक तेज़ी से उस खम्भे की ओर बढ़ा जा रहा है ৷ “अरे जग्गू .. जगमोहन ..” जुलुस में शामिल वरिष्ठ लोगों ने आवाज़ दी ৷ लेकिन ग्यारह वर्षीय वह बालक रुका नहीं ৷ वह फुर्ती से खंभे की ओर बढ़ा, यूनियन जैक निकाल कर ज़मीन पर फेंक दिया और वहाँ बंधी रस्सी में लकड़ी खोंसकर तिरंगा फ़हरा दिया ৷
यह एक ऐसी हरकत थी जिस पर हर किसी का ध्यान था ৷ लाठीचार्ज करते हुए सिपाहियों के पास बंदूकें नहीं थी लेकिन जाने कहाँ से एक अंग्रेज़ पुलिस ऑफिसर आया और उसने झंडा फहराकर खम्भे पर नीचे फिसलते हुए जगमोहन पर गोली चला दी.. ‘ठांय’ ৷ ज़ाहिर है निशाना चूक गया ৷ जगमोहन को यह सब देखने की फुर्सत कहाँ थी उसने फुर्ती से नीचे उतरकर पैर ज़मीन पर रखे और पल भर में भीड़ के बीच कहीं गायब हो गया ৷
बाबूजी ने कभी मुझे विस्तार से इस घटना के बारे में नहीं बताया ৷ हमें बस इतना पता था कि वे अपने बचपन में कचहरी में झंडा फहराकर आये थे ৷ मैंने उनसे कहा भी कि “आप सरकार से यह सब क्यों नहीं कहते ?” उन्होंने कहा “ मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया है हज़ारों लोगों ने देश के लिए अपनी जान दी है ,मैंने तो बस झंडा फहराया था ৷” मैंने उनसे कहा .. “फिर भी .. ৷ “ बाबूजी समझ गए ৷ गंभीर स्वर में उन्होंने कहा “ मुझे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का तमगा लटकाकर घूमने का कोई शौक नहीं है ।”
मैं अपने पिता को जानता था , वे भवानी प्रसाद मिश्र जी के शिष्य थे और अपने गुरु की तरह ही प्रसिद्धी और सत्ता की चापलूसी और सत्ता द्वारा प्रदत्त सुविधाओं से दूर रहते थे और व्यवस्था की आलोचना करते थे । भवानी दादा के उन पर अनेक अहसान थे ।
उपसंहार
बाबूजी के निधन के बरसों बाद रम्मू चाचा यानि डॉ. रमेश कुमार बाजपेयी ने विस्तार से यह घटना बताई ৷ रम्मू चाचा से पूरी घटना सुनने के बाद मैं चुप हो गया ৷ फिर मैंने उनसे पूछा, “मान लीजिये बाबूजी को उस दिन गोली लग जाती तो?”
रम्मू चाचा ने कहा ..” तो क्या, देश के लिए शहीद हो जाते ৷” “क्या बाद में बाबूजी को गिरफ़्तार नहीं किया गया?" मेरा अगला सवाल था ৷ “अरे भवानी प्रसाद मिश्र जी और उनके साथियों के रहते किसकी हिम्मत थी जग्गू भैया को कोई हाथ भी लगाता ৷ उन्हें तुरंत अंडरग्राउंड कर दिया गया ৷ हाँ भवानी भाई, उनके शिक्षक साथी रामस्वरूप मास्साब और शम्भू प्रधान ज़रूर गिरफ़्तार कर लिए गए और उन्हें नागपुर जेल भेज दिया गया जहाँ वे उन्नीस सौ चौवालीस तक अर्थात लगभग पौने तीन साल जेल में रहे৷
“कभी कभी कैसा होता है ना .. बाबूजी से उनके रहते हुए मैंने एक दो बार इस घटना का विस्तार जानना चाहा था लेकिन मुझे उन्होंने कभी कुछ नहीं बताया । और मुझे क्या किसी को भी कुछ नहीं बताया । शायद उन्होंने कभी इस घटना को इतना महत्त्व ही नहीं दिया । क्या पता वे क्या सोचते थे ।“ मैंने रम्मू चाचा से कहा ৷
“अरे, तुम्हारे पिता जैसे ईमानदार, कर्मठ, प्रसिद्धि के मोह से कोसों दूर लोग कहाँ मिलते हैं । अगर प्रसिद्ध होने या नाम कमाने की इतनी ही ख्वाहिश होती तो आज सरकार से ताम्रपत्र लेकर स्वंत्रता संग्राम सेनानी की पेंशन नहीं पा रहे होते?“ चाचाजी ने कहा ।
“लेकिन बेटा, तुम इस बात को लोगों तक ज़रूर पहुँचाओ, हमारे बैतूल के ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों तक भी यह बात जानी चाहिए कि भवानी प्रसाद मिश्र जी के नेतृत्व मे उनके शहर के बेटे जगमोहन ने और वहाँ के इन गुमनाम लोगों ने स्वतंत्रता आन्दोलन में क्या योगदान किया है । मुझे भी आज तक बचपन के उस जुलूस में मार खाई उस एक लाठी का दर्द याद है ৷" चाचाजी ने गर्व से अपना भाल उन्नत करते हुए कहा ।
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सुप्रसिद्ध कवि, कथाकार, लेखक, दर्शन एवं मनोविज्ञान के अध्येता शरद कोकास का जन्म बैतूल (मध्यप्रदेश) में हुआ और इनकी प्रारंभिक शिक्षा भंडारा (महाराष्ट्र) में और उच्च शिक्षा भोपाल एवं उज्जैन में सम्पन्न हुई। नवें दशक के कवि शरद कोकास के छह कविता संकलन आ चुके हैं जिनमें पहला संकलन 'गुनगुनी धूप में बैठकर' 1993 में आ गया था और बीसवीं सदी की कविताएँ, ‘सुख एकम दुःख’ एवं बिजूका 2025 में प्रकाशित हुए। दो लम्बी कविताएँ "पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा" (2024) तथा "ओपेनहाइमर"(2026) "समालोचन" वेब पत्रिका में प्रकाशित। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इतिहास बोध को लेकर लिखी साठ पृष्ठों की लम्बी कविता ‘पुरातत्त्ववेत्ता‘(2005) तथा दीर्घ कविता 'देह' (2016) प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ में प्रकाशित हो चुकी हैं।
कविता के अलावा नवसाक्षर साहित्य के अंतर्गत शरद कोकास की तीन कहानी पुस्तिकाएँ ,चिठ्ठियों की एक किताब 'कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ' (2004), एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी (2025 ),‘बैतूल से भंडारा : एक जन इतिहास’(2025 ) भी प्रकाशित हैं। मनोविज्ञान एवं मस्तिष्क पर लिखी उनकी पुस्तक ‘मन मशीन’ (2023 ) इन दिनों बेस्ट सेलर है। इसके अलावा प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं व अखबारों में उनकी पाँच सौ से अधिक कविताएँ, समीक्षाएं व लेख प्रकाशित हो चुके हैं । कविताओं के लिए उन्हें वर्ष 2024 का ठा.पूरन सिंह स्मृति ‘सूत्र सम्मान’ प्राप्त हुआ है। प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जयिनी से परास्नातक, शरद कोकास स्टेट बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर साहित्य लेखन के अलावा अंधश्रद्धा निर्मूलन,वैज्ञानिक चेतना के विकास एवं मनोविज्ञान के विविध विषयों पर व्याख्यान देते हैं, ब्लॉग लेखन करते हैं, पॉडकास्ट करते हैं तथा मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर काउंसिलिंग व हिप्नोथेरेपी भी करते हैं । विविध विषयों पर उनके व्याख्यान व कविता पाठ के वीडियो उनके यू ट्यूब चैनल ‘शरद कोकास’ पर उपलब्ध हैं ৷ सम्प्रति वे दुर्ग छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं । मोबाईल – 8871665060*