अर्थव्यवस्था की चिंताएँ
आज की बात
अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएँ नई नहीं हैं। दरअसल नोटबंदी के बाद कभी कोई छोटा सा दौर भी ऐसा नहीं आया जब स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों ने देश की आर्थिक स्थिति के बारे में चिंता व्यक्त ना की हो। इस स्तंभकार की अर्थशास्त्र में कोई औपचारिक पढ़ाई नहीं है। लेकिन जब इतना कुछ हो रहा है और सरकार से दोस्ताना संबंध रखने वाले अखबारों में भी रोज़ देश की खराब होती जा रही आर्थिक स्थिति के बारे में खबरें आ रही हों तो एक आम आदमी के तौर पर भी इतना तो एहसास हो ही जाता है कि कुछ गड़बड़ हो गई है।
हालांकि लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के बारे में अर्थशास्त्रियों की चेतावनियाँ तो नोटबंदी के जल्द बाद ही आने लगीं थीं लेकिन आम चुनाव के कुछ महीने पहले ये चिंताएँ बहुत बढ़ गईं थीं। विरोधी दलों ने, खासतौर पर कांग्रेस ने अर्थव्यवस्था के मुद्दे को चुनाव में खड़ा करने की कोशिश भी की किन्तु मोदी जी का वोटर्ज़ पर ऐसा जादू चला कि मतदाताओं ने एक ना सुनी और वापिस मोदी जी को भारी बहुमत से जिताया। खराब अर्थव्यवस्था और भारी बेरोजगारी के बावजूद भी ये वोट के मुद्दे क्यों ना बन सके, इन पर अलग से चर्चा हो सकती है।
जब अर्थव्यवस्था की हालत काफी समय से खराब ही चल रही है तो फिर अब ऐसा नया क्या हुआ कि हम इस पर चर्चा करने चाहते हैं? आज की पहली नई बात तो ये है कि सरकार के बहुत बड़े समर्थक और नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने भी आखिरकार ये कह दिया है कि सरकार को अब कुछ ना कुछ ऐसा करना होगा जो लीक से हटकर हो। राजीव कुमार कहते हैं कि आज पूरी वित्तीय प्रणाली जोखिम में है और पिछले 70 सालों में कभी भी इतनी बुरी स्थिति नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद नकदी का संकट बहुत ज़्यादा बढ़ गया है।
ये वही राजीव कुमार हैं जिन्होंने चुनाव-प्रचार के दौरान चुनाव आयोग की डांट इसलिए खाई थी कि इन्होने नीति आयोग के उपाध्यक्ष के सरकारी पद पर होते हुए भी राहुल गांधी की ‘न्याय योजना’ की आलोचना की थी। तो सरकार के इतने उत्साही समर्थक होने के बावजूद उनका ब्यान जो आज तमाम अखबारों की सुर्खियां बना है, सचमुच चिंता में डालने वाला है। उन्होंने बहुत ज़ोर देकर कहा है कि सरकार को निजी क्षेत्र की चिंताएँ दूर करने के लिए जो भी वो कर सकती है, करना होगा क्योंकि लोग एक दूसरे पर विश्वास ही नहीं कर रहे हैं।
हालांकि उन्होंने समस्या का ठीकरा पिछली सरकार पर भी फोड़ा जब उन्होंने कहा कि 2009 से 2014 के दौरान बिना सोच-विचार के कर्ज बांटा गया, जिससे साल 2014 के बाद नॉन-परफोरमिंग एस्सेट्स (एनपीए) में बढ़ोतरी हुई और इस कारण बैंक अब नए क़र्ज़े देने में हिचक रहे हैं। राजीव कुमार ने जोड़ा कि नोटबंदी, जीएसटी और आईबीसी कोड के आने से सिस्टम में नगदी की कमी हो गई है। लोगों के पास कैश तो है लेकिन कोई किसी को देने को तैयार नहीं है क्योंकि आपसी विश्वास की कमी हो गई है। उन्होंने ये नहीं बताया कि इस आपसी विश्वास की कमी के पीछे भी क्या पिछली सरकार का कोई दोष है!
दूसरी नई बात अब ये सामने आ रही है कि कई दशकों में पहली बार अर्थव्यवस्था में मंदी का ऐसा दौर आया है कि लोग पाँच रुपए के बिस्किट के पैकेट खरीदने से पहले भी दो बार सोच रहे हैं। यह हम नहीं कह रहे बल्कि बिस्किट और अन्य खाद्य सामग्री बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी ब्रिटानिया के एम.डी. वरुण बेरी ने ये बात कही है।
इसका असर क्या हो रहा है, उसका पता तब चलता है जब हम ये खबर पढ़ते हैं कि देश की एक अन्य बिस्किट बनाने वाली बड़ी कंपनी ये संकेत दे रही है कि उन्हें दस हज़ार, जी हाँ, दस हज़ार कामगारों को नौकरी से निकालना पड़ सकता है। इसका कारण वो ये बता रहे हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग में भारी गिरावट आ गई है। इसका यही अर्थ निकाला जा रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आय का स्तर इतना गिर गया है कि वो बिस्किट जैसा सबसे सस्ता खाने का सामान भी नहीं खरीद पा रहे।
बात चूंकि आज ही खबरों में आई आर्थिक समस्याओं पर हो रही है तो एक खबर ये भी आज के अखबारों में दिख रही है कि सरकार ने कह दिया है कि राजस्व में कमी के कारण आर्थिक वृद्धि दर बढ़ाने के लिए जिन ‘प्रोत्साहक’ कदमों (stimulus) की इंतज़ार उद्योग जगत कर रहा था, वो नहीं आने वाले। सरकार के चीफ इकनॉमिक सलाहकार के इस वक्तव्य के आते ही शेयर बाज़ार औंधे मुंह गिर पड़ा। इस तरह ऐसा लग रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था एक दुष्चक्र में फंस गई है जहां से उसे निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा।
राजस्व में कमी एक बड़ा मुद्दा है और उसका असर दूर तक होने वाला है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश यानि आईएमएफ़ की नज़र में भी ये समस्या आ गई है और बिज़नेस स्टैंडर्ड अखबार में ये आज दूसरी बड़ी खबर है। इसके अनुसार आईएमएफ़ ने हमारे देश की आर्थिक स्थिति की सर्वेक्षण रिपोर्ट बनाने की प्रक्रिया के दौरान हमारे नीति-निर्धारकों से पूछा है कि हम अपने रेविन्यू एस्टीमटेस के लक्ष्य आखिर कैसे प्राप्त करेंगे। खबर के अनुसार हमें आईएमएफ़ की शंकाओं का जवाब इसी हफ्ते देना है।
प्रश्न ये है कि सरकार आखिर इस तरह की गंभीर आर्थिक स्थिति से कैसे निपटने वाली है? क्या सरकार के पास इसके लिए कोई कार्य-योजना है? ऐसा तो लग नहीं रहा क्योंकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने बजट रखने का कंटेनर तो ब्रीफ़केस की बजाय एक लाल बही को बना दिया लेकिन इसके अलावा वह कुछ विशेष कर पाईं हों, इसके संकेत नहीं है। इसके उलट इस बात के संकेत आए दिन आ रहे हैं कि सरकार ने तूफान को देखकर शतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन घुसा दी है और तूफान की तरफ से बेखबर होना चाहती है।
यदि ऐसा ना होता तो सरकार परंपरागत रूप से सार्वजनिक किए जाने वाले आंकड़ों को जारी करने से क्यों बच रही होती? कल ही हिन्दू अखबार ने अर्थशास्त्री पूजा मेहरा का एक लेख प्रकाशित किया जो लेख से ज़्यादा एक सनसनीखेज़ खबर थी। इस खबर में ये खुलासा किया गया था कि सरकार ने इस वर्ष के शुरू में 45 वर्षों में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी होने की रिपोर्ट छिपाने के बाद अब संभवत: एक और रिपोर्ट छिपाई है जिसमें ये खुलासा है कि भारतीय कंपनियों पर नोटबंदी का खराब असर कैसे पड़ा। आप चाहें तो पूजा मेहरा का ये लेख यहाँ देख सकते हैं। ये वही पूजा मेहरा हैं जिनकी बहुचर्चित पुस्तक “The Lost Decade – 2008-18” इस वर्ष के शुरू में पैंगविन ने प्रकाशित की है।
ऐसे में किसी भी सरकार से आम लोगों की ये उम्मीद होती है कि वो इस मंदी से निपटने के लिए कुछ कर रही होगी। हमें भी यही उम्मीद है लेकिन सरकार इसमें पूरी ईमानदारी नहीं बरत रही लगती। हमारी राय में सरकार को कम से कम अब तो पारदर्शी ढंग से नीतियाँ बनानी चाहिए ताकि आगे गलतियाँ ना हों और किसी एक की सनक का कुपरिणाम पूरे देश को ना भुगतना पड़े।
चिंता की बात ये है कि इस सरकार ने सारे ऐसे अर्थशास्त्रियों को दर-निकार कर दिया है या वो स्वयं इस सरकार से अलग हो गए हैं जो अर्थव्यवस्था के बारे में ईमानदारी से ठोस राय दे सकते थे। रघुराम राजन, ऊर्जित पटेल ही नहीं अरविंद सुब्रमण्यम और अरविंद पनगड़िया भी इन्हें छोड़ कर चल दिये। सरकार के टॉप लोगों को इस पर विचार करना चाहिए कि उन्हें कोई भी अर्थशास्त्री सलाह देने से क्यों बच रहा है? हम ये नहीं कह रहे कि सरकार इस बारे में कुछ कर नहीं रही होगी, हम तो सिर्फ ये कह रहे हैं कि आप जो भी कर रहे हैं, उसमें व्यापक विचार-विमर्श अवश्य कर लें ताकि पहले जैसी गलतियाँ ना हों।
अब तो आम चुनाव हो चुके हैं और सरकार को अर्थव्यवस्था की हालत पर एक श्वेत-पत्र लाना चाहिए। इस श्वेत पत्र में वह पिछली सरकारों का दोष तो निकालें ही अपनी गलतियाँ भी ना छिपाए और ना ही कोई आंकड़े छिपाने की कोशिश करे। गलतियाँ मानना गलतियाँ छिपाने से हमेशा ज़्यादा बेहतर रहता है खास तौर पर जब चुनाव हो चुके हों। उम्मीद करनी चाहिए कि जल्द ही सरकार व्यापक विचार विमर्श के बाद किसी कारगर कार्य-योजना जनता के सामने रखेगी।

विद्या भूषण अरोरा