जानिये अपने शरीर को - इस बार 'गट-हैल्थ'
आज यह स्वीकार करने में कोई हर्ज़ नहीं है कि इस वेब-पत्रिका की 'स्वास्थ्य' नमक कैटेगरी थोड़ा कमज़ोर चल रही थी और यह आदर्श स्थिति तो नहीं थी। डॉ नमिता शर्मा के हमारी पत्रिका में आगमन से यह उम्मीद की जा सकती है कि अब हम स्वास्थ्य पर नियमित रूप से कोई ना कोई लेख पाठकों को उपलब्ध कराते रह सकते हैं। इस बार का उनका लेख 'गट-हैल्थ'पर है जो आजकल काफी चर्चा में रहने वाला विषय है।
जानिये अपने शरीर को - इस बार 'गट-हैल्थ'
डॉ नमिता शर्मा
हमारा शरीर हमारा है। यह बिल्कुल सच है। फिर भी हम उसके प्रति बहुत लापरवाह रहते हैं और मज़ा ये है कि हम ये बात जानते हैं। ये शरीर अपने आप नहीं चलता। हमारे साथ हमारी आंतों में,त्वचा में तथा शरीर के कुछ और हिस्सों में अति सूक्ष्म जीवाणु याने बैक्टीरिया, विषाणु,फंगस,प्रोटोजा रहते हैं। बड़ी आंत और छोटी आंत के बारे में हम लोग कभी सोचते हैं क्या? शायद नहीं! पिछले कुछ समय से एक शब्द चलन में आया है वह है 'गट हैल्थ'। इसका मतलब है हमारी आंतों का स्वास्थ्य कैसा है। यदि हमारी आंतें अच्छी हैं तो शरीर भी अच्छा रहेगा। आंतों में रहने वाले जीवाणु हमारे मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़े हुए हैं। शरीर की आंतें इन अति सूक्ष्म जीवाणुओं याने बैक्टीरिया का घर हैं। इन सभी जीवाणुओं को हम माइक्रोब्स कहते हैं। शरीर में माइक्रोब्स अरबों खरबों की संख्या में पाये जाते हैं। इनकी सूक्ष्मता और विविधता के कारण इनके प्रकार और संख्या की पूरी पूरी जानकारी जुटा पाना थोड़ा कठिन है। शरीर में इनका वज़न एक से डेढ़ किलो के लगभग होता है। ये करीब हज़ार तरह के होते हैं। जीवाणु और विषाणु यानी संक्रमण फैलाने वाले तत्वों पर ये माइक्रोब्स गुड बैक्टीरिया हैं।
ये माइक्रोब्स हमारे जीवन के लिये बहुत ज़रूरी हैं। इनके बिना जीवन सम्भव नहीं है। प्रकृति ने हमारे शरीर में और वातावरण में इन्हें हमारी रक्षा के लिये रखा है। ये हमारी गट हैल्थ के रखवाले हैं। हमने इन्हें एक घर दिया है। ये माइक्रोब्स हमारा जीवन सुचारू रूप से चलते हैं। माइक्रोब्स और शरीर का रिश्ता सहजीवन याने सिम्बायसिस का है। सहजीवन जिसमें दो अलग तरह के प्राणी साथ रह कर एक दूसरे के काम करते हैं। एक दूसरे की पनपने में मदद करते हैं।
माइक्रोब्स छोटी आंतों, बड़ी आंतों और त्वचा में पाये जाते हैं। ये शरीर के लगभग हर अंग को व्यवस्थित रूप से चलाने में किसी न किसी तरह की मदद करते हैं। छोटी आंतों के माइक्रोब्स पाचन में सहायक होते हैं। कुछ का सहयोग रोटी,चावल, शक्कर जैसे कार्ब को पचाने में ,कुछ का दाल,दूध,अंडे, मांस, प्रोटीन और कुछ का भोजन में शामिल फैट को पचाने में होता है। पाचन की इस प्रक्रिया से शरीर को ऊर्जा मिलती है। यही ऊर्जा शरीर को सही तरीके से चलाती है।

ये तो हुई छोटी आंतों की बात। अब देखें बड़ी आंतों के माइक्रोब्स क्या करते हैं। बड़ी आंतों में सबसे ज्यादा तादाद में माइक्रोब्स पाये जाते हैं। यहां इनका काम बहुत विशेष और बारीक होता है। विटामिन K बड़ी आंतों में बनता है। ये खून का थक्का जमने या जमाने के लिये ज़रूरी है। यदि खून का थक्का नहीं जमेगा तो ब्लीडिंग अर्थात रक्तस्राव होगा जो जान लेवा साबित हो सकता है। विटामिन B बी के कुछ प्रकार भी यहीं बनते हैं। ये हमारी नसों और स्नायु को मज़बूत करता है।
कैल्शियम,आयरन, मैग्नीशियम का पाचन बड़ी आंतों में ही होता है।
लगभग पचास दवाएं ऐसी हैं जो यहां सक्रिय हो कर शरीर को लाभ पहुंचाती हैं। स्टेटिन लिपिड कम करने की दवा और डिजोक्सिन हार्ट फेल होने की दवा इनमें प्रमुख हैं। जो भोजन छोटी आंतों में पच नहीं पाता उसे बड़ी आंतों के माइक्रोब्स खमीर की प्रक्रिया से पचाते हैं। संक्रमण से बचाना ही इनका प्रमुख काम है। बड़ी आंतों में ही अच्छे जीवाणु बुरे जीवाणुओं की पहचान करते हैं और उन्हें नष्ट करते हैं।
प्रदूषित पानी,भोजन या वातावरण में पाये जाने वाले जीवाणुओं से संक्रमण इन्फेक्शन होता है। सामान्य लोगों के लिए ये परिस्थितियां एक सी हैं। पर ये ज़रूरी नहीं कि हर एक आदमी को हर एक बीमारी हो। संक्रमण की हालत में ये माइक्रोब्स आपकी प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाते हैं। जब भी इम्यूनिटी कम हुई अच्छे जीवाणु बुरे जीवाणुओं को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाते और शरीर संक्रमण की लपेट में आ जाता है।
प्रकृति ने हमें बिना मेहनत,बिना कुछ किये बहुत दिया है। हमारा काम इसे सम्हाल कर रखना है। थोड़े नियम ,थोड़ी सावधानी से हम अपनी 'गट हैल्थ' को ठीक रख सकते हैं। मामला आंतों का है ज़ाहिर है हमें संतुलित भोजन की आदत डालनी होगी। भोजन में भरपूर फल और सब्जियों का समावेश करना होगा। अदरक,प्याज, लहसुन, पुदीना,हल्दी ये सब आंतों के लिये अच्छे हैं। भोजन में प्रोटीन जैसे दाल, फल्लियां और दूध लेना बड़ा फायदेमंद होता है। फाइबर में खड़े अनाज,फल और सब्जियां लें। फैट में घी के अलावा तले पदार्थ कम लें। कार्ब में मैदा ,आटा और चावल जैसे खाद्य पदार्थो से बचें। प्रोबायोटिक में दही मठा और खमीर वाली खाद्य सामग्री। इनमें अच्छे माइक्रोब्स होते हैं। लेक्टोबैसिलस खमीर वाली चीजों में पाये जाते हैं। ये अच्छे जीवाणु हैं। हफ्ते में दो-तीन बार डोसा, इडली, ढोकला,कांजी,अचार और कंबूजा का सेवन हमारे स्वास्थ्य के लिये बहुत अच्छा होता है। हमारे भोजन में पाये जाने वाले कैल्शियम,आयरन और मैग्नीशियम का पाचन बड़ी आंतों में माइक्रोब्स द्वारा ही होता है।
बहुत से लोग समझते हैं मंहगे खाद्य पदार्थ सेहत के लिये अच्छे होते हैं।ये एक भ्रम है। हमारे शरीर का बहुत बड़ा हिस्सा इम्यून सिस्टम आंतों से जुड़ा है। प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिये हमें शरीर को पर्याप्त आराम देना चाहिए। इसके लिये ठीक नींद लेना सबसे ज़रूरी है। खूब पानी पीना चाहिये। मौसमी फल और सब्जियों का समावेश अपने भोजन में करें।
आज के जीवन में बहुत भाग दौड़ है। सुबह से रात तक लगातार काम में लगे रहना पड़ता है।लोगों को चैन नहीं है। इन परिस्थितियों को हमें खुद समझना पड़ेगा कि जीवन में तनाव और भागदौड़ कैसे कम करें।हर एक के लिये पूरी नींद बहुत ज़रूरी है। शरीर में दिन भर की उठा पटक ,तोड़ मरोड़ की भरपाई नींद से ही पूरी होती है। टी वी और मोबाइल का उपयोग सोने से कुछ देर पहले बंद कर दें। ब्लू स्क्रीन से बचें। अपनी दिनचर्या में व्यायाम को शामिल करें। ये गट हैल्थ अच्छी रखने में मदद करता है।
आंतों के अच्छे माइक्रोब्स का सबसे बड़ा दुश्मन एंटीबायोटिक दवाएं हैं।इनसे दो बड़े नुकसान होते हैं। ये एंटीबायोटिक संक्रमण जीवाणुओं के साथ आंतों के अच्छे जीवाणुओं माइक्रोब्स को नष्ट कर देते हैं। दूसरा नुकसान है बार बार एंटीबायोटिक दवा खाने से बैक्टीरिया पर इसका असर धीरे धीरे कम होता जाता है और फिर वह दवा असर नहीं करती। इस तरह गुड बैक्टीरिया को हमने नष्ट कर दिया। बुरे को इतना बुरा बना दिया कि वो और वीभत्स हो गया। एंटीबायोटिक के ज्यादा उपयोग से प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है।
आने वाले समय में रोगों से नहीं बल्कि दवाओं के असर न होने से मृत्यु दर पर प्रभाव पड़ सकता है। ज़रूरत पड़ने पर ही एंटीबायोटिक लें और उसकी पूरी खुराक खायें। 'गट हैल्थ' को मज़बूत रखेंगे तो संक्रमण खुद ही टल जायेगा। अपने मन से और दवा विक्रेता से पूछ कर दवा लेने की आदत छोड़ना भी बहुत आवश्यक है। पैसा बचाने या लापरवाही वश हम ऐसा करते हैं। लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बहुत बुरे होते हैं। इनसे बचें। अपनी दिनचर्या में फेर बदल करना आपके हाथ में हैं।ऐसा करके आप अपने शरीर की स्वस्थ रहने में खुद मदद करेंगे। आपकी काया निरोग रहेगी और आप प्रसन्न!
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डॉ नमिता शर्मा पेशे से चिकित्सक हैं। 25 वर्ष तक कैंटोनमेंट बोर्ड, पुणे में बतौर मेडिकल ऑफिसर काम किया। अवकाश -प्राप्ति के बाद कुछ समय तक विभिन्न सामाजिक कार्यों से जुड़ी रहीं। पिछले लगभग पाँच वर्ष से रामकृष्ण मठ (पुणे) से संबद्ध एक चैरिटेबल अस्पताल में चिकित्सीय सेवाएँ दे रही हैं और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर पढ़ती-लिखती और गुनती रहती हैं।