“चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर, तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक करे रघुबीर!” यह दोहा चूंकि हम अपने बचपन से सुनते आ रहे थे, इसलिए मन में चित्रकूट के महत्व की कुछ ऐसी छवि थी कि यह तीर्थ-स्थल वाराणसी और प्रयागराज की तरह ना भी सही तो कम से कम ठीक-ठाक स्तर का विकसित नगर होगा।












