संसदीय परंपराओं की उपेक्षा करना नहीं है ठीक
संसद के बजट सत्र का समापन एक तरह से अच्छा ही रहा। संसदीय परंपराओं का निर्वहन किया गया। इस बार संसद सत्र के समापन के उपरांत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कक्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी चाय पर उपस्थित हुए। इसकी तस्वीर भी सामने आई।
यह परंपरा रही है कि संसद सत्र के समाप्त होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष में सत्ता पक्ष और विपक्ष के प्रमुख नेता उपस्थित होते हैं और गपशप करते हैं।इस बार संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद सत्र के बाद जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की उसमें विपक्ष की आलोचना नहीं की। उन्होंने विपक्ष की भी प्रशंसा की। संसदीय कार्य मंत्री से ऐसी ही अपेक्षा की जाती है लेकिन इसका पिछले संसदीय सत्रों में पालन नहीं हो रहा था। इससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आलोचना की बजाय कटुता ज्यादा बढ़ रही थी। ऐसा दिखता था कि संसदीय कार्य मंत्री विपक्ष के नेताओं के साथ अच्छे रिश्ते नहीं रखना चाहते,उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि विपक्ष को विश्वास में लिए बिना विधेयक पारित कराने से हमारी संसद को लेकर क्या संदेश जा रहा है।वक्फ विधेयक पर सरकार का संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी बनाने के लिए मान जाना भी महत्वपूर्ण घटना है। मोदी सरकार ने पिछले दस सालों में विपक्ष के आग्रह पर किसी विषय पर जेपीसी नहीं बनाई थी।
खैर इस बार संसद में कामकाज हुआ।बजट और कोचिंग पर हुई अल्पकालिक चर्चा के बहाने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अच्छा संवाद देखने को मिला।विपक्ष ने भी सरकार की खिंचाई करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।संसद में विपक्ष कमजोर नहीं बल्कि सरकार पर भारी पड़ने लगा है। विपक्ष पीठासीन अधिकारियों यानी लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति से अपेक्षा कर रहा है कि उसे भी अपेक्षित महत्व दिया जाए। इसी अपेक्षा में राज्यसभा की सभापति जगदीप धनखड़ और विपक्ष के बीच तकरार हो गई।
इस तकरार का नतीजा यह हुआ कि विपक्ष राज्यसभा में सरकार से नहीं सभापति से खफा होकर वॉकआउट कर गया। यह संसद सत्र के अंतिम दिन की घटना है। इसके बाद सभापति ने विपक्ष के आचरण को अमर्यादित बताया और सरकार ने राज्यसभा में विपक्ष के खिलाफ प्रस्ताव पारित कराया। यही वजह है कि राज्यसभा में संसद का सत्र समाप्त होने के बाद सभापति के कक्ष में चाय पर विपक्ष नजर नहीं आया।
इस मामले में सपा सांसद जया बच्चन का उल्लेख आया है कि उन्होंने सभापति को कहा कि आपकी टोन ठीक नहीं है।असल वजह दूसरी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश, रणदीप सुरजेवाला और शक्ति सिंह गोहिल को आए दिन सभापति जगदीप धनखड़ खराब आचरण के लिए सदन में फटकार लगा रहे थे। ये बात कांग्रेस को काफी चुभ रही थी।वरिष्ठ नेता अजय माकन की इस बात को लेकर सभापति से बहस भी हो गई।दबाव बनाने के लिए कांग्रेस कहने लगी कि राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के बारे में भाजपा सांसद घनश्याम तिवाड़ी ने परिवारवाद को लेकर जो टिप्पणी की है, उसके लिए उनसे माफी मंगवाई जाए।सभापति ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि इस विषय पर उनके कक्ष में खरगे और तिवाड़ी के साथ चर्चा हो चुकी है। विपक्ष इससे संतुष्ट नहीं हुआ।
इसी क्रम में विपक्ष सभापति के विरोध पर उतर आया।सदन से बाहर राज्यसभा में कांग्रेस के उपनेता प्रमोद तिवारी और अजय माकन ने बाकायदा सभापति के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। आमतौर पर ऐसा होता नहीं हैं।विपक्ष ने संकेत दिए कि वह सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएगा।हालांकि संसद के अगले सत्र तक विपक्ष उनके खिलाफ बना रहेगा, कहना मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि सभापति जगदीप धनखड़ के मल्लिकार्जुन खरगे, प्रमोद तिवारी, रामगोपाल यादव समेत कई विपक्षी नेताओं से अच्छे रिश्ते हैं।खरगे के साथ तो सभापति का संसद के भीतर भी हास -परिहास चलता रहता है।
पिछले सत्र का वाकया है जब सदन में खरगे ने सभापति से कहा कि आप उपराष्ट्रपति के नए निवास में रहने चले गए हैं लेकिन आपने मुझे नहीं बुलाया। इस पर सभापति ने कहा कि नए निवास में प्रवेश करने के समय जिन तीन व्यक्तियों को फोन किया उनमें से आप भी एक हैं। उन्होंने आगे कहा कि खरगे जी आप चुनाव में व्यस्त थे, मैंने चुनाव लड़ रहे आपके परिवार के सदस्यों को भी शुभकामनाएं दी थीं।सभापति ने कहा आपका (खरगे) समय नहीं मिल पाने की वजह से उन्होंने राज्यसभा के नेता जेपी नड्डा को भी अपने निवास पर आमंत्रित नहीं किया है।
संसद में सत्ता पक्ष,विपक्ष और पीठासीन अधिकारियों के बीच सम्मान और शिष्टाचार का पालन हर हाल में होना चाहिए।पहले राज्यों की विधानसभा संसद से सीखती थीं, अब लगता है कि विधानसभाओं से संसद को सीखना पड़ सकता है। हाल में यूपी की विधानसभा में माताप्रसाद पांडे विपक्ष के नेता बने हैं। उनका सदन में विधानसभाध्यक्ष सतीश महाना ने जो स्वागत किया है वह इन दिनों प्रशंसनीय लगता है।लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा सभापति,विधानसभाध्यक्ष और विपक्ष के नेता के सम्मान की उच्च परंपरा रही है,उसका अब कम ही पालन हो रहा है।लोकतंत्र की मजबूती और सदन को उपयोगी बनाने के लिए ऐसी परंपराओं की हमेशा जरूरत रहेगी।

अजय तिवारी
(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं। रागदिल्ली.कॉम के संपादकीय मंडल का इन विचारों से कोई लेना-देना नहीं है।)