भारतीय आध्यात्मिक चेतना में भक्ति: जीवन की समग्रता में स्वीकृति
हमारे पाठकों के लिए दर्शन-शास्त्र की विभिन्न गुत्थियों को सुलझा रहीं डॉ मधु कपूर के दार्शनिक लेखों की अनवरत चल रही श्रृंखला में आप इस बार 'भक्ति' के अलग-अलग आयामों के बारे में पढ़ेगे। यह लेख भक्ति और दर्शन के उस गहरे अंतर्संबंध को रेखांकित करता है और स्वयं डॉ मधु कपूर के अनुसार उन्होंने यह प्रयास किया है कि दर्शन की शुष्कता और भक्ति की तरलता के बीच उस सेतु की तलाश करें जहाँ जीवन अपनी समग्रता में खिलता है।
भारतीय आध्यात्मिक चेतना में भक्ति: जीवन की समग्रता में स्वीकृति
डॉ मधु कपूर
भारतीय आध्यात्मिक चेतना में भक्ति का सम्बन्ध केवल पूजा-पाठ की विधि से न होकर जीवन की एक समग्र स्वीकृति और अस्तित्व के आनंद को अनुभव करने का मार्ग है। दुर्भाग्यवश हमने एक ऐसे समाज का निर्माण किया है जहां विचार को ही सबसे महत्वपूर्ण समझा जाता है। लेकिन हम भूल जाते है कि मनुष्य के विकास का आधार सिर्फ तर्क नहीं, 'भाव' भी होता है। सत्य को तर्क से कुरेदने पर वह क्षत-विक्षत हो जाता है, जबकि भाव से वह जीवंत हो उठता है, और अनुभूति का हिस्सा बन जाता हैं। भक्त होने का अर्थ मतिभ्रम नहीं, बल्कि विचारों की क्षुद्रता से ऊपर उठना है।
प्रस्तुत लेख भक्ति और दर्शन के उस गहरे अंतर्संबंध को रेखांकित करता है, जहाँ दर्शन उस 'निरपेक्ष सत्ता' को समझने का बौद्धिक मार्ग प्रशस्त करता है, तो भक्ति उसी समझ को प्रेम, सेवा और पूर्ण समर्पण के माध्यम से व्यावहारिक जीवन में उतारती है। आदि शंकराचार्य के अद्वैतवाद से लेकर रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैतवाद, मध्वाचार्य के द्वैतवाद, निम्बार्काचार्य के द्वैताद्वैत और वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैतवाद और पुष्टिमार्ग तक ने संदेह और अनास्था के बीज को नष्ट कर भक्ति को एक सुदृढ़ दार्शनिक भूमि प्रदान की । रामानुजाचार्य के दर्शन ने सगुणभक्ति को प्रपत्ति (शरणागति) का आधार प्रदान किया। शंकराचार्य के ज्ञान मार्ग ने तथा सूफियों के प्रेमतत्व ने निर्गुण भक्ति का प्रवर्तन किया। कबीर ने ब्रह्म को निर्गुण, निराकार, अजन्मा मानते हुए अवतारवाद, बहुदेववाद जात-पाँत, कर्मकाण्ड, शास्त्र का खण्डन किया। संतभक्तों ने भगवान के पोषण (अनुग्रह) को ही भक्ति की प्राप्ति का आधार माना। उस परमात्मा की भक्ति के लिए न तो शास्त्रज्ञान अपेक्षित है और न ही बाह्य विधि विधान।
भारतीय रस-शास्त्र के अनुसार, भक्ति-रस में पाँच तत्त्व होते हैं: जिनका संगम भक्ति को परिपूर्णता प्रदान करता है। यद्यपि भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में भक्ति को एक स्वतंत्र रस की मान्यता नहीं दी गई; तथापि इसे 'भाव' विशेष के रूप में माना जाता है। भक्ति को पूर्ण 'रस' के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय रूप गोस्वामी को जाता है। उन्होंने अपनी कृतियों 'भक्तिरसामृतसिंधु' और 'उज्ज्वलनीलमणि' में भक्ति को 'मुख्य रस' के रूप में स्थापित किया, जिसे' शांत रस' की श्रेणी के अंतर्गत स्थान दिया गया।
भक्ति-रस का स्थायी भाव प्रेम ही भक्ति का आधार है, जिसमें ईश्वर का स्वरूप, गुण, लीलाएँ, नाम-कीर्तन आदि विभाव या आलंबन कहे जाते है। उसका फल यानि अनुभाव भक्ति के बाहरी लक्षण, यथा नृत्य, गान, अश्रु, हर्ष, स्तुति है । उसका सात्त्विक भाव रोमांच, अश्रु, गद्गद वाणी, स्तब्धता है, जो आत्मा की गहराई से स्वतः उत्पन्न होते हैं। क्षणिक भाव जैसे उत्कंठा, लज्जा, धैर्य, विषाद स्थायी भाव प्रेम का पोषण करते हैं, जिसे व्यभिचारी भाव कहा जाता है। इस तरह भक्ति केवल ज्ञान का मार्ग नहीं, बल्कि प्रेम और आत्मीयता का मार्ग है। समाज में एक अस्थिरता और बेचैनी का माहौल पैदा होने की परिस्थिति में, भक्ति और आध्यात्मिकता ने लोगों को एक नया संबल और दिशा प्रदान की, उत्तर आधुनिक काल में नयी पीढ़ी का झुकाव इस ओर देखा जा रहा है।
सगुण भक्ति की दो प्रमुख शाखाएँ हैं: रामभक्ति शाखा और कृष्णभक्ति शाखा। कृष्णभक्ति काव्य ने जीवन के मधुर पक्ष को उजागर किया, तो रामकाव्य ने जीवन की मर्यादित लोकचेतना को मुखरित किया। कृष्ण-काव्य का केंद्र बिंदु उल्लास, प्रेम, राग और सौंदर्य की प्रधानता है। राम-काव्य का केंद्र बिंदु 'आदर्श' है। यहाँ ईश्वर एक 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में सामने आते हैं, जो समाज के लिए एक मानक स्थापित करते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी मर्यादा और कर्तव्यों का पालन कैसे किया जाए। यह काव्य व्यक्तिगत सुख के स्थान पर सामाजिक उत्तरदायित्व पर बल देता है। सगुण भक्ति से मन स्थिर होता है और धीरे-धीरे साधक निर्गुण अनुभव की ओर बढ़ता जाता है। सगुण भक्ति भावनात्मक और सांस्कृतिक रस की चरम पराकाष्ठा है, तो निर्गुण भक्ति दार्शनिक गहराई और आत्मानुभव का निचोड़ है। दोनों मिलकर भक्ति को पूर्णता प्रदान करते हैं।
सगुण भक्ति की तरह निर्गुण धारा की भी दो उप-शाखाएँ हैं: ज्ञानमार्गी और प्रेममार्गी। निर्गुण संतों ने बाह्याडंबर, रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर तीव्र आघात किया। वहीँ सूफी संतों ने अपने प्रेमाख्यानों द्वारा लोकमानस को भावना के स्तर पर प्रभावित करने का प्रयत्न किया। सूफी संत ईश्वर को अनंत प्रेम और सौंदर्य का भंडार मानते हैं। इस शाखा के कवियों ने ईश्वर को एक प्रियतम के रूप में देखा और उसे पाने के लिए प्रेम और विरह के मार्ग को अपनाया। सूफी दर्शन में आत्मा और परमात्मा के मिलन को प्रेम की उस पराकाष्ठा के रूप में देखा गया है जहाँ साधक स्वयं को पूरी तरह मिटाकर अपने प्रियतम (ईश्वर) में लीन हो जाता है। इसे इन दो पंक्तियों के माध्यम से बहुत सुंदर ढंग से समझा जा सकता है: "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
जब मैं भक्ति की बात करती हूँ तो यह आवश्यक नहीं है कि हम ईश्वर के बारे में बात करें, हम हर उस अनुभूति के प्रति लगाव की बात कर सकते है, जो हमे अपनी सृजनशील क्षमता से वाकिफ करा सकें। यह वह शून्यावस्था है, जो हर चीज को अपने भीतर समा सकने की क्षमता रखती है। भक्तियोग विचारों की क्षुद्रता, अस्तित्व की तुच्छ प्रकृति से प्रभावित नहीं होती है।
विज्ञान अपने अनुसंधानों से प्राणी के लौकिक अस्तित्व को जानता है, जबकि ज्ञान-भक्ति आत्मबोध की तरफ ले जाती है और रस हृदय के द्वारा आत्मीयता का पोषण करती है। मनुष्य अपने निरंतर विकास से जो जीवनाधार पाता है, वह तर्क नहीं, भाव है। तर्क में जड़ता है, भक्ति में भाव है जो समग्रता से जोड़ता है।
भक्ति-योग में चार मार्ग समाहित हैं, जिनमें से प्रत्येक मार्ग भक्ति को अनूठी अभिव्यक्ति प्रदान करता है। कर्मभक्ति निस्वार्थ सेवा और विनम्रता का मार्ग है। कर्मयोगी होना तलवार की धार पर चलकर मंजिल तक पहुंचना है। ज्ञान-भक्ति, जो ज्ञान और भक्ति को आपस में जोड़ती है। ज्ञान से अहंकार मिटता है और भक्ति से प्रेम जागता है। ज्ञान से मन शुद्ध होता है, भक्ति से हृदय कोमल होता है। जब दोनों मिलते हैं, तो साधक को न केवल सत्य का बोध होता है, बल्कि उस सत्य से प्रेम भी होता है। जहाँ ध्यान-भक्ति में मौन और एकाग्रता पर जोर दिया गया है। संकीर्तन-भक्ति जप और गायन के माध्यम से सामूहिक उपासना का उत्सव मनाती है। एक साथ एकत्रित होने से भक्तों में बीच आत्मीयता और आध्यात्मिकता का स्रोत फूट पड़ता है। प्रत्येक मार्ग अलग-अलग होकर भी अंततः एक ही लक्ष्य की ओर ले जाता है: ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम और सम्पूर्ण समर्पण, विनम्रता का भाव विकसित करना और अपनी सीमाओं को पहचानना।
वैष्णव भक्ति मत में "पांच रास" का अर्थ पाँच मुख्य प्रेम-भाव (रस) का भी उल्लेख मिलता है, जिनमें भक्त भगवान के साथ विभिन्न आनंदमय संबंधों का अनुभव करते हैं; जो भक्तों के आध्यात्मिक विकास के विभिन्न चरणों को दर्शाता हैं। शांत रस में तटस्थ प्रेम, दास्य रस में सेवा भाव (जैसे हनुमान जी की राम के प्रति), सख्य रस में मित्रता (जैसे सुदामा), वात्सल्य रस में माता-पिता का मोह (जैसे यशोदा)। इस तरह माधुर्य रस प्रेम की सर्वोच्च और घनिष्ठ अवस्था कही जाती है।
समूची निर्गुण भक्ति परम्परा का नियामक सूत्र अनावृत प्रेम का दर्शन है। एक ओर सगुणोपासक कवि सृष्टि के कण-कण को इसलिए प्यार करता हैं कि उनमें उन्हें अंतर्चेतन की छाया मिलती है। सूर ने ‘भ्रमर गीत’ में ऊधों के तर्कवाद पर विजय प्राप्त कर उसे परमतत्त्व तक सीमित न रखकर, सांसारिकों तक पहुँचाने का प्रयास करता है। जैसे तुलसीदास के अयोध्या के राजप्रासाद में, जनकपुर की फुलवारी में, चित्रकूट की वनस्थली में, केवट की नाव में, शबरी के जूठे बेर में, लंका के महायुद्ध में देखा जा सकता है। सभी लौकिक उपादानों के पुष्पों का सार-तत्त्व रस है। दूसरी ओर निर्गुण-रहस्यवाद सर्वत्र ज्ञान का बीज़ छितरा देता है।
ज्ञान और प्रेम का अद्भुत समन्वय भगवद्गीता के मोक्ष-मार्ग में मिलता हैं, क्योंकि बिना ज्ञान के भक्ति अधूरी है और बिना भक्ति के ज्ञान अव्यावहारिक साबित होता है। दर्शन सिद्धांतों और तर्कों पर केंद्रित होता है, वहीं भक्ति उस सिद्धांत को जीकर, प्रेम और सेवा के माध्यम से अनुभव करने का मार्ग है, जो अहंकार को मिटाकर आंतरिक शांति और एकता की भावना पैदा करता है। दर्शन 'क्यों' और 'क्या' का उत्तर देता है, जबकि भक्ति 'कैसे' और 'किस भाव से' का उत्तर देती है और दोनों मिलकर आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण बनाते है। यहाँ कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों का समुच्चय ही साधना को पूर्णता प्रदान करता हैं। केवल ज्ञान से साधना शुष्क हो सकती है। केवल कर्म से साधना यांत्रिक हो सकती है। केवल भक्ति से साधना भावनात्मक हो सकती है। लेकिन जब ज्ञान, कर्म और भक्ति का समुच्चय होता है, तब साधना पूर्ण, संतुलित और जीवंत बन जाती है।
हम सत्य की खोज में तर्कों का सहारा लेते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में हम सत्य के सहज स्वभाव को ही घायल कर देते हैं, जिस पर मरहम लगाने का कार्य भक्ति ही कर सकती है। हमने इस लेख में प्रयास किया है कि दर्शन की शुष्कता और भक्ति की तरलता के बीच उस सेतु की तलाश करें जहाँ जीवन अपनी समग्रता में खिलता है। आप चाहें तो इस लेख को 'स्व' से 'सर्व' की ओर बढ़ने और तर्क की सीमाओं को लांघकर अस्तित्व के मधुर संगीत को सुनने का एक आमंत्रण मान सकते हैं।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।
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