भक्ति और ज्ञान का अद्वैत : श्रवण से सिद्धि तक...
भक्ति और ज्ञान का अद्वैत : श्रवण से सिद्धि तक...
डॉ मधु कपूर
“...किन्तु स्वाभाविक रूप से दोनों (ज्ञान और भक्ति) में गंभीर मतभेद हैं। जहाँ वैष्णव वेदान्ती यह मानते हैं कि परमेश्वर की प्राप्ति केवल भक्ति से ही संभव है ... वहीँ दूसरी ओर शंकर की ज्ञानपरक व्याख्या यह प्रतिपादित करती है कि मोक्ष की प्राप्ति केवल ज्ञान से ही हो सकती है” —
बहरहाल, संपादक महोदयजी की टिप्पणी पुनः इसी विवेचना को केंद्र में ले आती है— जहाँ निर्विवाद रूप से ज्ञान को मोक्ष का द्वार कहा गया है, पर भक्ति उसमे प्रवेश करवाने की कला है, अन्यथा द्वारपाल मोक्षप्रार्थी को बाहर ही रोक देगा। इस प्रसंग में मुझे एक घटना याद आती है। मेरे पिताजी जब भी बनारस (अपने सुसराल) जाते थे तो उनको घर में घुसने के लिए सिर झुका कर घुसना पड़ता था क्योंकि दरवाजा बहुत छोटा था। उनको हमेशा यह शिकायत रहती थी कि दरवाजा थोड़ा ऊँचा होना चाहिए। इस पर हमारे मामाजी लोग हँस कर कहते थे, “तब आपका सिर नहीं झुकेगा।” फिलहाल अपने प्रसंग पर वापस आयें तो यही हाल ज्ञान और भक्ति के संपर्क का है।
'ज्ञान' और 'भक्ति' को लेकर अक्सर द्वंद्व की स्थिति पैदा हो जाती है। कुछ लोग ज्ञान को श्रेष्ठ मानकर भक्ति को 'मज़बूरी का भरोसा' कहते हैं, तो कुछ ज्ञान को ‘शुष्कं काष्ठं’ कह कर अवज्ञा करते हैं। एक ओर भक्ति को भावनात्मक और ज्ञान को बौद्धिकता जोड़ा जाता है, परन्तु परंतु थोड़ा ऊंचाई से देखने पर स्पष्ट होता है कि दोनों का लक्ष्य एक ही है— अपने आराध्य विषय के साथ तादात्म्य स्थापित करना।
पूर्व के लेख में कहा जा चुका है कि श्रवण — नवधा भक्ति का प्रथम सोपान है। बिना श्रवण के न ज्ञान संभव है, न भक्ति। श्रवण की भूमिका उपनिषदों और भक्त कवियों दोनों में समान रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है—यह ज्ञान और भक्ति के बीच एक सेतु का कार्य करता है।
श्रवण का अर्थ है—भगवान की कथा, गुण और लीला को सुनना। यह केवल कानों से सुनना नहीं है, बल्कि हृदय और बुद्धि से उसका ग्रहण भी करना होता है।
उपनिषदों ने ज्ञान प्राप्ति की तीन अवस्थाओं — श्रवण-मनन-निदिध्यासन – में श्रवण को अत्यधिक महत्व दिया हैं। गुरु से तत्त्वज्ञान का श्रवण करना, श्रवण से उत्पन्न शंकाओं पर विचार अथवा मनन करना और उनका निवारण कर उस विषय को आत्मसात करना ही निदिध्यासन का तात्पर्य है। बृहदारण्यक उपनिषद में मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से श्रवण के द्वारा ही आत्मज्ञान की दिशा पाई। लेकिन यदि श्रवण के बाद मनन और निदिध्यासन न हो, तो ज्ञान और भक्ति दोनों ही अधूरे रह जाते है। श्रवण 'आरंभ' है, 'अंत' नहीं। कानों से सुनना पर्याप्त तब होता है जब शब्द कान से होकर हृदय तक की यात्रा तय करे। यदि श्रवण के पश्चात आचरण में बदलाव न आये या विषय के प्रति प्रेम न उमड़े, तो वह श्रवण केवल सूचना मात्र रह जाता है। भक्ति और ज्ञान का समन्वय यही है कि हम जो श्रवण करें, उस पर मनन करें और उसे जीवन का अनुभव बना लें (निदिध्यासन)। यही वह मार्ग है जहाँ भक्त 'ज्ञानी' हो जाता है और ज्ञानी 'भक्त' बन जाता है।
बिना समझे सुनना कान की कसरत यानि एक शारीरिक क्रिया मात्र हो जाती है, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ से लोरी सुनता है—वह अर्थ नहीं समझता, परंतु भाव ग्रहण करता है। लेकिन बौद्धिक स्तर पर अर्थ समझने से श्रवण गहरा होता है और साधक को मार्गदर्शन मिलता है। इसलिए श्रवण का प्रभाव दो स्तरों पर होता है—भाव और ज्ञान। दृष्टान्तस्वरूप तुलसीदास कहते हैं— सुनत समुझत हरि कथा, मिटत मल मन माहि अर्थात भगवान की कथा सुनने और समझने से मन के विकार दूर हो जाते है। बिना समझे भी श्रवण भाव को शुद्ध करता है, परंतु समझकर किया गया श्रवण साधक को ज्ञान और भक्ति में समरस उत्पन्न कर देता है।
उदाहरण के लिए डॉक्टर रोगी को बतलाता है कि यह दवाई उसकी बीमारी ठीक कर देगी। उसने डॉक्टर के शब्दों पर विश्वास (भक्ति) किया। उसको मालूम है कि यह दवा शरीर में कैसे काम करती है। यदि कोई व्यक्ति बिना समझे दवाई ले ले, तब भी वह असर तो करेगी लेकिन यदि उसे पता हो कि यह दवा क्यों ली जा रही है और इसके साथ क्या परहेज करना है, तो वह दवा ज्यादा फायदेमंद होगी। श्रवण वह पहली सीढ़ी है जिसने उसे दवा लेने के लिए प्रेरित किया। इसी तरह एक छोटा बच्चा अपनी माँ से भाषा सीखता है। वह शुरू में शब्दों का अर्थ नहीं जानता। वह बस माँ की आवाज़ को श्रवण करता है। बिना अर्थ समझे भी, माँ की आवाज़ उसे सुरक्षा और प्रेम का अनुभव कराती है। यदि बिना समझे सुना जाए, तो भी भावात्मक शुद्धि तो होती है, पर ज्ञान नहीं होता है। धीरे-धीरे वह उन शब्दों का अर्थ समझने लगता है।
राजा परीक्षित के पास केवल सात दिन का समय था। उन्होंने न तप किया, न कोई बड़ा यज्ञ। उन्होंने केवल शुकदेवजी से श्रीमद्भागवत की कथा का श्रवण किया। उस श्रवण ने उन्हें मृत्यु के भय से मुक्त कर दिया। यदि व्यक्ति सुनकर भूल जाएँ, तो ऐसा श्रवण अर्थहीन हो जाता है। नारद बार-बार श्रवण और सत्संग को ही भक्ति का आधार बतलाते हैं। नारद ने कहा—“श्रवणं कीर्तनं विष्णोः”—श्रवण और कीर्तन ही भक्ति के मूल हैं। जो सुना जाता है, वही स्मरण में और आचरण में उतरता है।
कल्पना करें कि कोई व्यक्ति शास्त्रीय संगीतकार बनना चाहता हैं। सबसे पहले उसके लिए आवश्यक है कि वह बड़े गायकों को श्रवण करे, फिर रागों के नियम, सुरों का तालमेल और व्याकरण का तकनीकी ज्ञान अर्जन करे। धीरे धीरे ज्ञान और साधना मिल कर संगीत के प्रति भक्ति उत्पन्न करती है और साधक उसमे विभोर हो उठता है। नारद भक्ति-सूत्र में कहते हैं— “सा त्वस्मिन् परम-प्रेम-रूपा।” भक्ति का सार केवल प्रेम है—न तर्क, न कर्म। जहाँ न कोई
कामना है, न लोभ है, न अहंकार है—वही शुद्ध भक्ति कहलाती है। “यत्र न तु काम्यं, न तु लोभः, न तु अहंकारः।” यद्यपि शुरुआती दौर में लोभ, अहंकार आदि होते है पर जितनी उच्चता पर साधक पहुँचता है, वह लुप्त होने लगते है।
इसी तरह जब हम किसी प्रसिद्ध व्यंजन के बारे में सुनते हैं तो पहले यह जानना जरूरी होता है कि यह व्यंजन किन तत्वों से बना है। केवल पकाने की विधि सुनने या पढ़ने से संतुष्टि नहीं होती है, जब तक उसे विधि के अनुसार पका न लिया जाए। वैसे ही बिना समझे सुनी गई बातें हृदय में नहीं उतरतीं। ज्ञान का अर्थ है—सत्य को जानना। भक्ति का अर्थ है—उस सत्य से प्रेम करना। पर जिसे हम जानते नहीं, उससे प्रेम कैसे कर सकते हैं? और जिससे हम प्रेम नहीं करते, उसे जानने की उत्सुकता ही क्यों होगी? इसलिए, ज्ञान को भक्ति का नेत्र और भक्ति को ज्ञान का प्राण कहा गया है। जितने भी महान वैज्ञानिक हुए उन सभी के अन्दर अपने कर्म के प्रति जो अटूट आस्था और प्रेम दिखाई देता है वह इसी बात का सबूत है कि वे अपनी विद्या के प्रति समर्पित होते है और समर्पण भक्ति की बुनियाद है।
प्रश्न उठता है कि श्रवण ही पहला सोपान क्यों है? श्रवण से जिज्ञासा पैदा होती है और फिर उसके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति बिना समझे मंत्रों या कथाओं को बार बार सुनता है, तो उसके संस्कार शुद्ध होते हैं, लेकिन वह भक्ति की परिपक्व अवस्था तक नहीं पहुँच पाता। जैसे गंदे बर्तन को बार बार रगड़ने से धीरे-धीरे साफ हो जाता है, वैसे ही निरन्तर भगवद्-चर्चा सुनने से हृदय के विकार (काम, क्रोध, लोभ) धुलने लगते है। जब हम ध्यान से या समझकर सुनते हैं, तो हमारी बिखरी हुई इंद्रियां एकत्रित होने लगती है।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में सुनने की महिमा को इतना महत्व दिया है कि वे कहते हैं श्रवन सुजसु सुनि आयहुँ प्रभु पाहीं - जो राम कथा नहीं सुनते हैं, उनके कान साँप के बिल के समान हैं। भक्ति सिर्फ ईश्वरभक्ति ही नहीं अपितु जिस किसी विषय से हो सकती है, जिसे हम अपने दैनिक जीवन से जोड़ सकते हैं—- किसी अनुभवी ड्राइवर से ड्राइविंग के बारे में जानकारी हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं है। कब क्लच दबाना है और कब गियर बदलना है इत्यादि का अभ्यास करना पड़ता है। लेकिन जब खुद स्टीयरिंग पर बैठते हैं तो निदिध्यासन आरम्भ होता है। ड्राइविंग की जानकारी ज्ञान है और सड़क पर गाड़ी चलाते समय सावधानी बरतना भक्ति है। यदि ये दोनों होंगे तभी यात्रा सुरक्षित हो सकती है।
नारद-भक्ति-सूत्र में भक्ति के विकृत रूपों का भी उल्लेख किया गया है। जब भक्ति चापलूसी और स्वार्थ, में बदल जाती है, तो वह वास्तविक भक्ति नहीं कहलाती है। ऐसी भक्ति काम्या भक्ति कहलाती है, जिसमें किसी प्रकार की कामना या स्वार्थ की इच्छा छिपी रहती है। जब साधक भयवश भगवान को पूजता है, तो यह भक्ति विशुद्ध नहीं कही जाती है। सूरदासजी कहते है कृष्ण की लीला का श्रवण और स्मरण तभी फलदायी है जब उसमें प्रेम हो, न कि स्वार्थ “प्रेम बिना न भक्ति होई।”
इन लौकिक उदाहरणों से स्पष्ट है कि श्रवण वह द्वार है जिससे सूचनाएँ भीतर जाती है। लेकिन जीवन में पूर्ण परिवर्तन तभी आता है जब सम्पूर्ण स्वीकार की आस्तिकता (भक्ति) भी जुड़ जाती है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।