पिछले कई दशकों से संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि जब हमने विकास का पश्चिमी मॉडल ही चुना है तो सामाजिक ताना-बाना भी कुछ ना कुछ तो प्रभावित होगा ही। अगर बछे महत्वाकांक्षी हैं तो उन्हें माँ-बाप के शहर या कभी कभी तो एक ही शहर में मुहल्ले भी छोडने पड़ते हैं। एक माँ और बेटे की ऐसी ही विवशताओं की एक कहानी जिसका कालखंड आप 1980 का दशक मान सकते हैं जब इस प्रकार के 'विकास' का यह दौर अपने शैशव काल में ही था, नन्दिता मिश्र जी ने हमारे लिए लिखी है।











