यदि हमारे समाज के सबसे बड़ी बुराई जाति प्रथा, ऊंच-नीच और आडंबर के खिलाफ आवाज़ उठाने की बात की जाए तो उत्तर भारत में हमें कबीर, दादू, नानक और रैदास के समय के भक्तिकालीन युग की ओर देखना होगा। पिछले वर्षों में जयप्रकाश वाल्मीकि की कुछ कहानियाँ और कविताएं दलित-विमर्श साहित्य में विशेष चर्चित हुई हैं। कुछ समय पहले ही उनका एक कहानी संग्रह आया है, 'तुरुप का पत्ता' जिसका परिचय हमसे करा रहे हैं साहित्यकर्मी डॉ रामगोपाल भारतीय!



.jpg)







