यह सही है कि समकालीन हिंदी सिनेमा बहुत से नए प्रयोग कर रहा है औरअत्याधुनिक तकनीक एवं भारी निवेश के चलते बहुत उच्च-स्तरीय फ़िल्में बना रहा है लेकिन फिर भी पुराने हिंदी सिनेमा के कद्रदानों की कमी नहीं है. संभवत: ऐसे कद्रदानों की ज़रूरतों का ध्यान रखते हुए सुरेश पटवा ने यह पुस्तक लिखी है "हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग - कालजयी निर्माता-निर्देशक" जिसकी समीक्षा जाने-माने फिल्म समीक्षक और लेखक विनोद नागर ने हमारी वेब-पत्रिका के लिए की है. वैसे ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता केवल पुरानी फिल्मों के कद्रदानों के लिए ही नहीं है बल्कि हिंदी सिनेमा के इतिहास को सहेज रखने के लिए भी ऐसे अध्यवसायों की आवश्यकता है.


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