रामत्व अनुभूति : अनीता गोयल की नई कहानी
अनीता गोयल की नई कहानी के बारे में पहले से कुछ कहना पाठकों से साथ अन्याय ही होगा क्योंकि इस कहानी की बुनावट ऐसी है कि इसके बारे में पहले से कुछ कहने से इसका आनंद कम हो सकता है। अपनी ओर से हम केवल यह भरोसा दिलाते हैं कि उनकी यह कहानी भी पाठक को भावनाओं के समुद्र में गोते लगवाती है। अगर आप इस वेब-पत्रिका के नए पाठक हैं तो उनकी पिछली कहानियां पढ़ने के लिए बस उनके नाम अनीता गोयल पर क्लिक करें।
रामत्व अनुभूति
अनीता गोयल
लंगड़े ने करवट बदली, धीरे से पैर सीधे किए, आँखे चिनमिनाई और फिर स्नेह से देखा कि उसका बच्चा जिसे सभी प्यार से कीनू कहते थे, पास ही बेफिक्री से सो रहा है। उसके सिर पर थोड़ा सा हाथ फेर कर, उसने गर्दन उचका कर, चारों तरफ़ देखा। सुबह के छह बजे थे और स्टेशन पर जनता-जनार्दन और रेलगाड़ियों का आना-जाना धीरे-धीरे बढ़ रहा रहा था। उसका और उसके बच्चे का कोई नाम नहीं था, बस जो स्टेशन परिवार ने उन्हें दे दिया, वो दोनों उसी संबोधन से जवाब देने लगे। उसने कीनू को अपने पास खींचा ताकि किसी आने-जाने वाले के पैरों से टकराये नहीं। साथ ही उचक कर उसने छाजू चायवाले के ठेले की तरफ़ देखा कि सुबह की चाय बनने का क्रम आरम्भ हो गया है कि अभी समय है।
जब से राम मंदिर बना है, अयोध्या स्टेशन पर काम करने वालो के जैसे कि चायवाला, फलवाला, पकौड़ेवाला के तो भाग ही खुल गए है। यहाँ के स्टेशन मास्टर कभी खुश और कभी खिन्नाये रहते है। सुबह होते ही, एक एक करके गाड़ियाँ आने लगी और दर्शनाभिलाषी श्रद्धालु उतरते और तृप्त होते और लौटने को वापस चढ़ जाते। सब का ध्यान केवल अपने लक्ष्य की तरफ़ होता। अयोध्या आते समय सभी को सर्वप्रथम मंदिर दर्शन की उत्सुकता होती। एक के बाद एक मंदिर के दर्शन करते और जाते समय अपने अपने घरों को लौटने के लिए आतुर होते। कई पर्यटक बीच में वाराणसी या लखनऊ या किसी अन्य शहर घूमने का अवसर निकाल लेते। किसी को क्या पड़ी थी कि स्टेशन पर लंगड़ा या कीनू साहब है भी या नहीं या किसी छाजूराम का चाय का ठेला भी है।
आते जाते लोगो को तकते रहना लंगड़े का सबसे प्रिय समय बिताने का काम था। अलसाया सा लंगड़ा सीधा बैठ गया और ध्यान से लोगों का अवलोकन करने लगा। आप ग़लत न समझे, उसे किसी से कुछ नहीं चाहिए था। वह रामजी का बड़ा ऋणी था कि उनकी नगरी में उसका जन्म हुआ। वो कई वर्षों से बिल्कुल अकेला था। रामजी की कृपा से अभागे कीनू की माँ एक दिन ग़ायब हो गई, बंदरों की टोली से परेशान हो वो रोता हुआ लंगड़े की गोद में आ गिरा। लंगड़े के जीवन का ध्येय जैसे अब कीनू ही बन गया है। रहने के लिए स्टेशन और खाने-पीने के लिए छाजू चायवाला, बाक़ी लंगड़े और कीनू की कोई और जरूरत ही नहीं है। वह दिन होते ही स्टेशन के एक कोने में जा बैठता और रात होने पर छाजू की बंद दुकान के आगे। स्टेशन के छाजू चायवाले के ठेले का वह धीरे धीरे हिस्सा सा बन गया है।
कुछ बरस हुए उसके दाहिने पैर के घुटने पर एक फोड़ा हो गया और वो लंगड़ाने लगा।एक समय स्टेशन पर उसका एक बड़ा परिवार था जो कभी बस अड्डे, कभी मंदिर, कभी प्रसाद और अन्य दुकानों पर चक्कर लगाकर स्टेशन पर लौट आता था। फोड़ा आने के बाद लंगड़े की गति धीमी और धीमी पड़ने लगी तो उसने स्टेशन के एक कोने को ही अपने ठिकाना बना लिया। वहीँ छाजू सुबह-सवेरे ही अपनी दुकान खोलता था।
उस दिन भी छाजू ने आते ही दुकान की सफ़ाई की और सारा सामन करीने से लगाया। हर रोज की तरह देखा, कुछ डबलरोटी पुरानी हो गई है और सूख गई है। छाजू ने कुछ पुराने और कुछ नए ब्रेड के पीस लंगड़े के पास डाले। लंगड़े ने पास में सोए कीनू को उठाया और उसमें से नर्म पीस निकलकर उसे खाने को दिये। कीनू ने ब्रेड खाई, पास के कटोरे से पानी पिया और खेलने चल दिया। लंगड़ा भी बची हुई सख़्त ब्रेड पाकर ख़ुश था, उसने कृतज्ञता से छाजू को देखा और खाने में मस्त हो गया। भोजन हृदय से कराया जाए तो रामजी भी शबरी के झूठे बेर खाकर मुदित थे और ये तो बेचारा और बेसहारा लंगड़ा था। पुरानी ब्रेड प्रेम से पाकर उसकी आत्मा छाजू के प्रति आभारी थी और मन आनंदित था।
मन के बहुत से कोनों की आशाएँ और इच्छाएँ लेकर देश-विदेश से यात्रियों का तांता अयोध्या आने लगा है। कुछ व्यापारियो को यहाँ पैसा कमाने का अच्छा अवसर मिल रहा है तो कुछ यहाँ सब छोड़कर वैरागी होने आ रहे है। हमारा लंगड़ा सबसे अनूठा है, उसने कीनू में एक दुनियाँ पा ली है। वैराग होना किसे कहते है वो कभी न समझ पाया। न अक्षर ज्ञान, न संतों की संगत! लंगड़े के बोल को भी केवल छाजू मियाँ समझते थे। अज्ञानी को अज्ञानी ही जान सकता है, संतों और भाग्यशालियों के पास लंगड़े के असप्ष्ट शब्द सुनने का कहाँ समय। अक्षर ज्ञान हो न हो पर छाजू मियाँ को चाय दुकान का व्यापार ज्ञान तो बहुत अच्छा था। छाजूजी ने अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए बिसलेरी चाय बेचनी शुरू की जिसे यात्री काफ़ी पसंद करते थे। बहुत से यात्री तो चाय की चुस्की लेते हुए, ज्यादातर अंग्रेजी में बातचीत करते जो छाजू की भी समझ से बाहर था। लंगड़ा उन्हें टुकुर टुकुर देखता और छाजु पतीले में उबलती चाय को गर्व से देखता रहता। उसके अनुसार अयोध्या में बनी उसकी ये अदरक इलायची की कढ़ी चाय यात्रियों की सारी थकावट उतार देती है। मूडमती का सोचना था कि प्रभु स्वयं उसकी दुकान की देखभाल के लिए लंगड़ा रूप में पधारे है तो उसकी चाय में मन को तृप्त करने वाला अद्भुत स्वाद आना ही था। और लंगड़ा ब्रेड, चाय और पानी के लिए अपने ईश्वर यानी छाजू का धन्यवादी था।
रामभक्त त्रिलोक भारद्वाज ईश्वर से रुष्ट थे। अयोध्या में राम मंदिर बनने के आसार जैसे ही तीव्र होने लगे, उन्होंने राजनैतिक तंत्र और साधु मंत्र दोनों पर अथाह पैसा बहाया कि उन्हें किसी तरह मंदिर परिसर के आस पास न सही, कहीं अयोध्या नगरी में या नगरी के नज़दीक ही सही दामों में कोई जमीन का टुकड़ा मिल जाये। नामी गिरामी लोगों की खूब चिरौरियाँ करने पर भी उन्हें वाजिब दामों पर कोई प्लाट नहीं मिला. दिल्ली वापस लौटने के लिए वे स्टेशन आए थे, साथ में उनके दो सलाहकार थे जो रसूख वाले लोगों में अपनी पकड़ का दावा करते थे। गुस्से से तमतमाये हुए त्रिलोक जी ने अपने पर काबू रखते हुए पूछा, “अभी तो गाड़ी आनी में आधा घंटा है, आप चाय पियेंगे?” बिना उत्तर दिए और लिए, तीनों छाजू की दुकान की तरफ़ बढ़ गए। त्रिलोकजी ने कहा, “तीन चाय बनाना भाई और साथ एक एक ब्रेड पकौड़ा भी दे दो”। फिर दोनों सलाहकारों की तरफ़ मुँह करके बोले, “क्या नाम था भगतराम का? बाबा दीनानाथ! अरे, काहे का बाबा, पाखंडी और एक नंबर का बदमाश! अयोध्या में क्यों है? भगवे वस्त्र पहनकर ठगता है, साला। पहले पच्चास पेटी में राज़ी हो गया और अब कहता है कि एक खोका लगेगा। और लेकर भी मुकर गया तो? और कहीं तुम दोनों भी तो नहीं मिले उससे? मेरा तो कोई काम यहाँ न बना। अब दिल्ली से सीधा इंदौर ही जाऊँगा। मेरे किसी काम की नहीं अयोध्या।“
अयोध्या और उसके भगवान ने छाजू को बहुत कुछ दिया है, उसे त्रिलोक जी का वार्तालाप अच्छा न लगा और धीरे से चाय तीनो को पकड़ा दी। लंगड़ा गर्दन उचका कर तीनों को देख रहा था। उसे न व्यापार समझ आता है और न ही श्रद्धा। वह तो देख रहा था कि अगर यात्रियों को ब्रेड पकोड़ा न समझ आए तो शायद उसे मिल जाये। छाजू ने चाय ख़त्म होने पर कहा, तीस रुपए चाय और तीस रुपए पकौड़े के हुए। त्रिलोकजी ने कहा, सब बदमाश यहाँ बसे है, बस छुरी चला रहे है, पकौड़ा दे के मारा! धरती पर गिरते ही पकौड़े को लंगड़े ने लपक लिया, और उसके अन्तःकरण से आवाज़ निकली,”कितने दयालु है राम जी!” चोरों की तरह चुपचाप खड़े सलाहकारों ने चाय पी और इतने में ही रेल का स्टेशन पर आगमन हुआ। साठ रुपये छाजू के ठेले पर फेंककर, त्रिलोकजी गाड़ी चढ गए और पीछे पीछे उनके साथी लटक लिए। छाजू ने यात्रियों के जाने के बाद लंगड़े को देखा और बोला “प्रभु! कृपा!”
इसी रेल से उतरी लक्ष्मी, अपनी माँ फूलमती के साथ। वह बड़ी कठिनाई से गया के कटासा गांव से आई थी। गांव से बस और फिर गया जंक्शन से से यहाँ पहुंचते पहुंचते पूरा दिन ही निकल गया। अयोध्या स्टेशन पर उतर कर दोनों को लगा कि स्वर्ग ही आ गए। दोनों की सस्ती सूती साड़ी और मैला पुराना ब्लाउज बता रहा था कि बस श्रद्धा ही उन्हें खीच कर लायी है। उतरते ही पहले दोनों ने सोचा कि चाय पी जाये। लक्ष्मी ने छाजू से पूछा, “कितने की है भाई?“ छाजू ने कहा, “पी लो पहले, पैसे बाद में दे देना।“ दोनों ने एक चादर निकाली और छाजू और लंगड़े के बीच दीवार के साथ बिछा कर थके पैर फैलाकर बैठ गई। छाजू ने कहा, “माई दस रुपये की एक चाय है।“ लक्ष्मी बोली, “चल फिर एक दे दे”। फिर अपने थेले में से एक पोटली निकाल कर खोली। बेटी बोली, “माई, रामजी के बड़ी महिमा बा। बापू जल्दी ठीक हो जाई हें। मंदिर जाये में देर लागी, त कुछ खा-पी लेह, फेर एही स्टेसन पर हाथ – मुंह धो कर चलीं।“ छाजू ने सुना और अनदेखा और अनसुना करते हुए, बड़ा सा गिलास भर के चाय का दिया और बोला, “माई, चाय के साथ पकौड़ा फ्री है, लोगी क्या?” लक्ष्मी बोली, “ला फिर दे दे, अब नाही तो बाद में खाही”। छाजू की चाय आधी पीकर कर लक्ष्मी ने माई को दी और आधा पकौड़ा भी साथ दिया। लंगड़े को कीनू के साथ देखकर लक्ष्मी का मन दया भाव से भर गया, “हे राम, बिचारे की टांग पकी है और और ये नन्ही सी जान को साथ चिपकाए बैठा है, कृपा करना प्रभु।“ फिर अपने थैले से आधी रोटी निकालकर उसके पास प्यार से रखी। छाजू ने लंगड़े की तरफ़ देखा और फिर कहा, “प्रभु दया!” लंगड़ा एक बार फिर से प्रभु राम का ऋणी हो गया। आज उसे सुबह से ब्रेड, ब्रेड पकोड़ा और अब ये रोटी बैठे=बैठे नसीब हो गई। थोड़ी देर बाद लक्ष्मी और उसकी माई उठी और मंदिर दर्शन की और जाने वाली भीड़ में विलुप्त हो गई।
दोपहर बढ़ चली और शाम घिरने लगी। यात्री आते गए और जाते भी रहे। छाजू ने लंगड़े के निकट जाकर उसके कटोरे में पानी भरा और फिर अपने काम में लग गया। अयोध्या अब विकास के बड़े द्वार पर खड़ा है। यहाँ बड़े बड़े अंतरराष्ट्रीय पाँच सितारा होटल और विशाल सड़को का निर्माण हो रहा है। वर्तमान अयोध्या स्टेशन आने वाले समय के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इसके संवर्धन के लिए दो सरकारी अधिकारी स्टेशन के निरीक्षण के लिए पहुँचे। छाजू अनपढ़ जरूर था पर देखते ही भाँप गया कि कोई बड़े अधिकारी है, उसके फट से उनके लिए अपनी स्पेशल चाय बनाई और गरमागरम पकौड़े भी परोस दिए।
अधिकारियों ने चाय की चुस्की लेकर आपस में बातचीत शुरू की, “अरे, बड़ा गंद मचाया हुआ है इन ठेले वालों ने। बीच में ही अटक कर खड़े हो जाते है, उतरने और चढ़ने वालों, दोनों को दिक्कत होती है। इनको उठाना पड़ेगा”। दूसरे अधिकारी ने घृणा से लंगड़े को देखते हुए सहमति में सिर हिलाया और कहा, “ सच पूछो तो सारी अयोध्या में सफाई की जरूरत है। मुझे तो यहाँ आना ही पसंद नहीं है”। छाजू ने सुना और सोचा कि मेरे राम की नगरी सबके भाग बनाती है तो कैसे कोई भी इसकी अवमानना कर सकता है।
लंगड़े को कुछ सुनाई दे या ना दे, कोई फर्क नहीं पड़ता पर हिक़ारत भरी नज़रों को वो भी खूब पहचानता था। उसने कीनू को अपने पास खींच लिया। पहले अधिकारी ने कहा, “भई, बात सारी ये है कि जब तक दौरे है, तब तक अच्छी मौज है और दोनों ज़ोर से हँस पड़े। दूसरे अधिकारी ने कीनू को लात मारकर ज़ोर से कहा, “ओय परे हट”। छाजू को तरस आ गया, “साहब बहुत छोटा है, इसकी माँ मर गई है, मैं इसे साइड पर बिठाता हूँ”। अधिकारी ने छाजू से कहा, “और हाँ भई, कब से ठेला लगा है? लाइसेंस है?” छाजू ने कहा, “ मैं तो ग़रीब आदमी हूँ साहब, मेरा बाप भी यही ठेला लगाता था और फिर मैं लगाने लगा”। अधिकारी ने कहा, “फिर इस ग़रीब आदमी ने आज कितना कमाया? तेरा ड्रम तो पत्तो से भरा है और चाय भी दी होगी?” जनता जनार्दन को सुन सुन कर छाजू कारोबारी हो गया था। उसे समझ थी कि अब स्टेशन पर जल्दी ही नए स्टाल लगेंगे। उसने बड़े विनम्र स्वर में पूछा, “साहब मैं तो अनपढ़ गवार हूँ, क्या जानू, आप बताएँ कि लाइसेंस कितने का बनेगा? मुझे नए बन रहे स्टाल में से एक कैसे मिलेगा?” उसने साथ ही एक लिफ़ाफ़े में बिस्कुट और कुछ पकौड़े बाँध दिए। “साहिब यहाँ बहुत शोर है, तनिक साइड पर बात करते है।“ स्टेशन के एक कोने पर जाकर नोटों का एक बंडल देते हुए कहा, “सरकार आज तो इतना ही कर पाऊँगा, पर मुझे स्टाल दिलवा दे तो मैं जैसे तैसे खर्चा उठा लूँगा। रामजी की बहुत कृपा है आप यहाँ पधारे।“ अधिकारियों ने बंडल तुरंत जेब के अंदर कर लिया। वे छाजू की विनम्रता से प्रसन्न हुए और कहा, “भई तुम्हारी चाय बहुत अच्छी है, हम देखते है कि क्या हो सकता है।" लेकिन फिर उनमें से एक ने मुड़कर लंगड़े और कीनू की तरफ़ इशारा किया और बोला, "पर तुमने तो चाय ब्रेड पानी के साथ ये गंद पाल रखा है, इसे साफ़ करो, यात्रियों को बहुत असुविधा होती है।“ छाजू ने कहा, ‘जी सरकार, बेजुबान जानवर है, एक बीमार है और एक बहुत छोटा है, आप कहते है तो मैं इन्हें हटा दूँगा।“
स्टेशन परीक्षण अधिकारी जाते जाते बिस्कुट और पकौड़ों का लिफाफा ले जाना न भूले। छाजू ने राहत की सांस ली और वापिस काम पर लग गया। अधिकारी जब जब स्टेशन आए छाजू ने उनकी अपनी औक़ात से ज़्यादा सेवा की। छाजू को इस बात का बहुत सुकून था कि उन्होंने फिर लंगड़े या कीनू की कोई बात नहीं की। रामजी की छाजू पर असीम कृपा रही। दो चार बार के आवागमन और खर्चे पानी के बाद, अधिकारियों ने उसके स्टाल के आवेदन को पास करवा दिया।
उधर लंगड़ा अब काफ़ी बीमार रहता है और और उसकी टोली के बंदर उसे काफ़ी तंग करने लगे थे। छाजू ने स्टाल के पीछे वाली जगह कुछ ढक कर लंगड़े का निवास बना दिया। कीनू अब बड़ा होकर एक बंदरों की टोली का नेता बन गया है। वह कभी कभी लंगड़े के पास आकर भी बैठ जाता है। कीनू के राम जी लंगड़े में थे। लंगड़े के राम तो छाजू चायवाले के रूप में थे जिसे निरीक्षण अधिकारी ठगने की फिराक में रहते थे। यात्रियों की बानी से छाजू ने समझा कि राम अयोध्या में है, हर घर में है, हर हृदय में है। भावनाओं और कामनाओं से भरे जगत में किसी ने लंगड़े को दया से देखा, किसी ने उपेक्षा से और केवल छाजू ने उसे करुणा और प्रेम दिया। घट घट में रहने वाले राम की कृपा से लंगड़े की एक दिन मृत्यु हो गई और उस दिन छाजू जी बहुत बहुत रोये और स्टाल बंद रहा। वो आज भी घर जाते हुए हर बेजुबान प्राणी को ब्रेड और बिस्कुट देता है चाहे कोई कुत्ता हो, बंदर हो या भिखारी हो। ऐसा करने से उसे लगता है कि उसके हृदय में बैठे हुए लंगड़े को भोजन अर्पण किया और उसके विह्वल मन को शान्ति मिलती है। वैसे आज तक छाजूराम को अपनी व्यस्तता के कारण मंदिर के दर्शन करने का सौभाग्य ही प्राप्त नहीं हुआ। क्या जाने छाजू को लंगड़े में क्यों राम दिखते थे।
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अनीता गोयल, दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती महाविद्यालय में 12 साल इतिहास पढ़ाने के बाद, मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) जा कर बस गई। वहाँ उन्होंने विक्टोरियन स्कूल ऑफ़ लैंगुएजिज़ के प्रोग्राम के अंतर्गत कई बरस माध्यमिक स्तर पर हिंदी पढ़ाने का कार्य किया। अपने आस-पास के परिवेश के प्रति सजग उनकी कविताएं सामाजिक संवेदना से सरोबर होती हैं।