जीवन का अनुशासन: जीवन का हर क्षण पर्युषण हो
आज पर्युषण पर्व प्रारंभ हो रहा है जो जैन परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उत्सव है। पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि और संयम का अभ्यास कराता है। इसमें उपवास, सामायिक, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान जैसे साधन किए जाते हैं ताकि मनुष्य अपने भीतर झाँक सके और कषायों (क्रोध, मान, मोह, लोभ) का क्षय कर सके। पर्युषण का चरम क्षण "क्षमापना" है, जब हम सब से क्षमा माँगते हैं और दूसरों को क्षमा करते हैं। यह पर्व हमें "उत्पाद" (नए पर्यायों का उदय), "व्यय "(पुराने का लय) और ध्रौव्य"(जो न कभी उत्पन्न होता है, न कभी व्यय होता है) के सिद्धांत को समझाता है. वर्ष में एक बार यह पर्व हमें याद दिलाता है कि धर्म केवल बाहरी क्रियाओं में नहीं, बल्कि आत्मा की ओर यात्रा में है। पर्युषण इस सिद्धांत का प्रतिपादन करता है कि जीवन में परिवर्तन तो होंगे ही, लेकिन आत्मा का शुद्ध स्वरूप सदा स्थिर है। साधना का लक्ष्य है कि हम उस स्थायी सत्य को पहचानें और उसी में टिकें। इन्हीं विषयों पर सभी कुछ जानने के लिए सुज्ञान मोदी के इस लेख को पढ़िए.
जीवन का अनुशासन: जीवन का हर क्षण पर्युषण हो
सुज्ञान मोदी
‘यह जगत सारा क्षणिक है, और आत्मा एक नित्य है।’ महान जैन दर्शन का यह एक सूत्र वाक्य ही अपने आप में चेतन आत्म-रूपांतरण की ओर ले जाने में सक्षम है। फिर पर्युषण का तो शाब्दिक अर्थ ही होता है- धर्माचरण करते हुए आत्मा के निकट आना। चैतन्य आत्मा, चैतन्य आत्मा, चैतन्य चैतन्य चैतन्य! यदि बस इसी का ध्यान, इसी का चिंतन, इसी की लगन लग जाए, तो फिर प्रत्यक्ष सद्गुरु की कृपा से चेतन आत्म-रूपांतरण होना ही है। यही ज्ञान मार्ग की सत् साधना है।
हमारे सत्पुरुषों ने किसी समय हमारे जीवन को संयमित और अनुशासित करने के लिए ही ऐसे उत्सवों का विधान किया होगा। शायद यह सोचकर कि चलो इन क्रियाओं, पर्व-त्योहारों आदि के माध्यम से ही सही, कुछ गहरे आध्यात्मिक व्रत हमारी लोक परंपरा में रच-बस जाएंगे, तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनका विकास होता जाएगा। लेकिन वास्तविक लक्ष्य तो आत्मसाधना, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यग्श्रद्धा ही थे। सत्पुरुषों के सान्निध्य में हम परद्रव्य और स्वद्रव्य का भेद जान सकें। ज्ञायक की ध्रुवता का अनुभव कर सकें। सच्चा प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान कर सकें। यही तो लक्ष्य था। सच्चा प्रतिक्रमण तो तभी होगा जब मिथ्या पर्यायों से लौटकर ध्रुव आत्मस्वरूप की ओर वापस चलेंगे।
हमारे तीर्थंकर भगवान जानते थे कि हमारा मन लगातार विषय-चाह के दावानल में जलता है। निज स्वरूप की पहचान होती नहीं। इन्द्रिय विषयों की चाह में परिभ्रमण होता रहता है। वृत्ति-प्रवृत्ति पर कभी विचार नहीं हो पाता। हम संसारी जीव पुण्यबन्ध तृष्णाओं में ही सुख चाहते हैं। जबकि तृष्णा से दु:ख संताप उत्पन्न होते हैं। इसलिए हमारे व्रत-त्यौहार भी कई बार इसी यांत्रिकता का शिकार हो जाते हैं। हम उपवासों को गिनना छोड़ें। प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान को गिनना छोड़ें। सामायिक को गिनना छोड़ें। हम तो यह देखें कि आज हमने आत्मा भगवान की ओर कितनी यात्रा तय की। हम हर क्षण बदलते पर्यायों में सीमित न रह जाएँ। द्रव्य की अनुभूति भी करें।
इसलिए पर्युषण के अनुशासन से हमारा वर्ष में एक बार भी कुछ शिक्षण हो जाए, ऐसी हमारे सत्पुरुषों की योजना हुई होगी। हम सत्य धर्म को समझें। नित्य के धर्माचरण को समझें। उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य के निरंतर चल रहे चक्र को समझें जो वास्तव में अंततः एक सत्य में विलय हो जाते हैं। सत्य प्रभु भगवान आत्मा। उत्पाद के रूप में नए पर्यायों का उदय होता रहता है। व्यय के रूप में पुराने पर्यायों का लय होता रहता है और ध्रौव्य के रूप में द्रव्य का नित्यत्व कायम रहता है।
पर्युषण तो यही सिखाता है कि यदि उत्पाद होना ही हो, तो अधिक करुणा का उत्पाद हो। अधिक समत्व का उत्पाद हो। और अधिक क्षमा का उत्पाद हो। यदि व्यय ही होना है तो कषायों का व्यय हो। क्रोध का व्यय हो। मान घटे, मोह घटे, लोभ घटे। इस उत्पाद और व्यय के बीच सदा कायम रहनेवाला शुद्ध, चैतन्य आत्मा- वही तो ध्रौव्य है। वही समयसार है।
पर्युषण का वास्तविक मर्म यही है। प्रतिक्रमण के बहाने केवल अपने अतीत की भूलों में न फँस जाऊँ। बल्कि मेरी चेतना की दिशा बदले और भगवान आत्मा की ओर मुड़े। वास्तविक क्षमापना तो तभी होगी जब ध्रौव्य का अनुभव हो। मैं स्वयं को भी ध्रुव चेतना के रूप में देखूँ और सामने वाला भी शुद्ध आत्मा के रूप में दिखाई देने लगे। फिर द्वेष करें भी तो किससे करें? इस तरह ध्रौव्य की अनुभूति से ही सच्ची क्षमा का जन्म होगा। वह भी नित्य के सतत अभ्यास से। वर्ष में केवल किन्हीं विशेष तिथि का आग्रह रखकर नहीं।
‘उपेदश छाया’ में श्रीमद् राजचन्द्र जी ने कहा है— “तिथियों के लिए मिथ्याग्रह नहीं रखकर उसे छोड़ना ही चाहिए। कदाग्रह छुड़ाने के लिए तिथियाँ बनाई हैं, परन्तु उसके बदले उसी दिन कदाग्रह बढ़ता है। हाल में बहुत वर्षों से पर्युषण में तिथियों की भ्रान्ति चला करती है। तिथियों के नियमों को लेकर तकरार करना मोक्ष जाने का रास्ता नहीं है। क्वचित् पंचम का दिन न पाला जाय, और कोई छठ का दिन पाले और आत्मा में कोमलता हो तो वह फलदायक होता है। जिससे वास्तव में पाप लगता है, उसे रोकना अपने हाथ में है, यह अपने से बन सकने जैसा है; उसे जीव रोकता नहीं; और दूसरी तिथि आदि की यों ही फिक्र किया करता है। अनादि से शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श का मोह रहता आया है, उस मोह को दूर करना है। बड़ा पाप अज्ञान का है।”
बड़ा पाप तो अज्ञान का है। ऐसा श्रीमद् ने कहा। अज्ञान यानी भगवान चैतन्य आत्मा की विस्मृति। उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य की विस्मृति। नित्य द्रव्य को भूल मिथ्या पर्यायों में उलझने की अज्ञानता। जबकि पर्युषण के नित्य अभ्यास से ही भगवान चैतन्य आत्मा की महिमा प्रकट होने लगती है। पर्युषण के सतत अभ्यास से ही अव्यक्त आत्मा हमारी अनुभूतियों में व्यक्त होता है। राग-द्वेष आत्मा नहीं हैं। वे तो क्षणिक पर्याय हैं। उनका उत्पाद-व्यय चलता ही रहता है। क्षणभंगुर और नश्वर पर्यायों के रूप में। इसलिए उनसे क्या लिपटना। उनसे छूटने का अभ्यास ही सच्चा पर्युषण है। जीवन का हर क्षण पर्युषण है।
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श्रीमद राजचन्द्र, महात्मा गांधी एवं आचार्य विनोबा भावे जैसे संतों के आध्यात्मिक विचारों को समर्पित साधक सुज्ञान मोदी ने आध्यात्मिक और राजनैतिक सजगता का अद्भुत संतुलन साधा है। जहां पिछले एक दशक से वह श्रीमद राजचन्द्र सेवा-केन्द्र से संबद्ध मुमुक्षु के रूप में अपनी आध्यात्मिक चेतना को विस्तार देने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं वह बहुत सी सामाजिक-राजनीतिक संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं। इनमें से प्रमुख हैं, गांधी शांति प्रतिष्ठान, नर नारायण न्यास, राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट, सोसाइटी फॉर कम्यूनल हार्मनी, समाजवादी समागम, ज्ञान प्रतिष्ठान, और स्वराज पीठ।