प्रेमचंद प्रसंग: 'नशा' कहानी की समीक्षा
प्रेम चंद जयंती (31 जुलाई) पर विशेष
राजेंद्र भट्ट*
कथाकार प्रेमचंद की कथाओं - तावान और गुल्ली-डंडा पर प्राध्यापकों और समालोचकों की भाषा-शैली की बजाय साधारण पर संवेदनशील और ‘फोकस्ड’ पाठक के तौर पर हमने चर्चा की और इनसे कुछ नए, शायद ‘एमेच्योर’ निष्कर्ष निकाले (इन चर्चाओं को आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं)।
यहाँ आज हम नशा कहानी पर बात करेंगे। ‘गुल्ली-डंडा’ की ही तरह इस कहानी की भाषा-शैली में भी सरलता, सहजता और सरसता है और यह कहानी भी सहृदय-संवेदनशील पाठक तक पहुँचने की क्षमता रखती है – घटिया साहित्य और इलेक्ट्रोनिक माध्यमों के हल्केपन की चुनौती को दर-किनार करते हुए। इस लेख के सही परिप्रेक्ष्य और भाव-भूमि तक पहुँचने के लिए आग्रह है कि आप पिछले दो लेखों पर एक नज़र डाल लें।
अबकी बार भी, ‘नशा’ कहानी के सार-संक्षेप से गुजरते हैं । कहानी के कुछ उद्धरण बोल्ड में हैं, जो आगे चर्चा के आधार बनेंगे।
नशा’ कहानी भी ‘नरेटर’ द्वारा ‘मैं’ शैली में कही गई है। यह कहानी नरेटर के चरित्र का, उसके ही विवरणों के आधार पर मनोविश्लेषण करती है, इसलिए इन कथनों पर ध्यान देना ज़रूरी है। ‘नरेटर एक गरीब क्लर्क का फटेहाल बेटा है और गरीब के हक वाली विचारधारा का कॉलेज का विद्यार्थी है। कहानी आज़ादी से पहले के दौर की है। उसका दोस्त - ईश्वरी - एक अमीर जमींदार का बेटा है जहां गरीब किसानों, मजदूरों, नौकरों से सख्ती तथा डाँट-डपट आम बात थी। (कहानी में आया नहीं है पर स्पष्ट होता है कि दोनों मित्र हॉस्टल में रहते थे) दोनों में बहस होती रहती थी। नरेटर ज़मींदारों को ‘हिंसक पशु’, खून चूसने वाली जोंक’ कहता था जबकि ईश्वरी ‘हमेशा से लोगों के छोटे-बड़े होने की’ – नरेटर के शब्दों में ‘लचर दलील’ देता था। स्वभावतः उसका पहलू कुछ कमजोर होता था।
इस वाद-विवाद में नरेटर गुस्सा हो जाता, लगने वाली बात भी कह देता, लेकिन ईश्वरी हारकर भी मुस्कराता रहता था। मैंने उसे कभी गर्म होते नहीं देखा। (नरेटर की राय में) शायद इसका कारण यह था कि वह अपने पक्ष की कमजोरी समझता था। (नरेटर के अनुसार) अमीरों में जो एक बेदर्दी और उद्दण्डता होती है, इसमें उसे भी प्रचुर भाग मिला था। ...शायद उसकी जगह मैं होता, तो मुझमें भी वहीं कठोरताएँ पैदा हो जातीं, जो उसमें थीं, क्योंकि मेरा लोकप्रेम सिद्धांतों पर नहीं, निजी दशाओं पर टिका हुआ था। ... वह प्रकृति से ही विलासी और ऐश्वर्य-प्रिय था।
दशहरे की छुट्टी में नरेटर अपने घर नहीं गया क्योंकि उसके पास किराये के पैसे नहीं थे। ईश्वरी के कहने पर वह उसके घर छुट्टियाँ बिताने को तैयार हो गया। ईश्वरी ने उसे यह आगाह ज़रूर किया कि उसके घर पर ज़मींदारों की निंदा न करे, नहीं तो उनके नौकर-चाकर उद्दंड हो जाएंगे। नरेटर द्वारा अपनी आवाज़ न दबाने का तर्क दिए जाने पर ईश्वरी ने बात उसके विवेक पर छोड़ दी, जो शायद नरेटर को भी ठीक लगा।
दोनों ने ट्रेन में सेकंड क्लास (तब ट्रेनों में फ़र्स्ट, सेकंड, इंटर और थर्ड क्लास होती थीं) में यात्रा की। नरेटर तो कभी इंटर क्लास में भी नहीं गया था। ट्रेन आने से पहले, दोनों ने ‘रिफ्रेशमेंट रूम’ में भोजन किया। सारा खर्चा तो ईश्वरी का हो रहा था। उसने खानसामों को बख्शीस (टिप) भी दी। ‘मेरी वेश-भूषा और रंग-ढंग से पारखी खानसामों (वेटर्स) को यह पहचानने में देर न लगी कि मालिक कौन है और पिछलग्गू कौन; लेकिन न जाने क्यों मुझे उनकी गुस्ताखी बुरी लग रही थी। ....मैं उन सबों से उसी तत्परता और विनय की अपेक्षा करता था, जिससे वे ईश्वरी की सेवा कर रहे थे।...खानसामों ने ईश्वरी को सलाम किया। मेरी ओर देखा भी नहीं।
बाद में, जब ईश्वरी ने खानसामों की तारीफ की तो नरेटर ने बहुत चिढ़ कर उसे जवाब दिए। (ट्रेन में) एक आदमी ने हमारा कमरा खोला। मैं तुरंत चिल्ला उठा - दूसरा दरजा है- सेकेंड क्लास है। उस मुसाफिर ने डिब्बे के अंदर आकर मेरी ओर एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कहा- जी हाँ, सेवक इतना समझता है, और बीच वाले बर्थ पर बैठ गया। मुझे कितनी लज्जा आई, कह नहीं सकता।
ईश्वरी के घर वाले स्टेशन पहुँचने पर इन्हें लेने दो व्यक्ति आए थे। ईश्वरी ने झूठी कहानी गढ़ी कि नरेटर उसके मित्र हैं। आज़ादी के आंदोलन में गांधी जी के शिष्य हैं, इसलिए बड़ी जमींदारी के ‘कुंअर साहब’ होने के बावजूद सादगी से रहते हैं। नरेटर ने भी इस झूठ का विरोध नहीं किया। न जाने क्या बात थी कि यह सफेद झूठ उस वक्त मुझे हास्यास्पद न जान पड़ा। उसके प्रत्येक वाक्य के साथ मानो मैं उस कल्पित वैभव के समीपतर आता जाता था।
इस झूठ की वजह से नरेटर को ईश्वरी के घर में अतिरिक्त सम्मान मिल रहा था। लेकिन अब वह नौकर-चाकरों से ठीक उसी तरह सेवा करवा रहा था, जैसे दूसरे बिगड़ैल ज़मीदार करवाते हैं। ईश्वरी ने पाँव बढ़ा दिये। कहार ने उसके पाँव धोये। मैंने भी पाँव बढ़ा दिये। कहार ने मेरे पाँव भी धोये। मेरा वह विचार न जाने कहाँ चला गया था। बिस्तर पर चादर समय पर नहीं लगे होने पर उसने नौकरों को डांटा। उसने शाम का अंधेरा होने पर भी, दियासलाई पास होते हुए भी, उसने अपने हाथों से लैंप नहीं जलाया और एक आसामी को बुरी तरह डाँट दिया।
दूसरी ओर, गांधीवादी महापुरुष होने का तमाशा और रुतबा भी जारी था। भोले-भाले ग्रामीण ‘गांधी-भक्तों’ को ‘प्रेरणा देना’ जारी था। पाँव दबाने आए एक भोले ठाकुर को ‘कुँवर साहब’ ने बताया कि ‘सूरज’ आने के बाद जमींदारों की ज़मीन छीन कर भूमिहीनों में बाँट दी जाएगी। बेचारा ठाकुर इतना प्रेरित हुआ कि उस दिन ठाकुर ने खूब भंग पी और अपनी स्त्री को खूब पीटा और गाँव के महाजन से लड़ने पर तैयार हो गया।
वापसी का समय आ गया। भीड़ की वजह से ऊंचे दर्जों में जगह न मिलने की वजह से, इन्हें थर्ड क्लास में जाना पड़ा। हमारे ऐश्वर्य ने वहाँ अपना रंग जमा लिया, मगर मुझे उसमें बैठना बुरा लग रहा था। आये थे आराम से लेटे-लेटे, जा रहे थे सिकुड़े हुए।
कुछ ‘पढे-लिखे’ लोग ब्रिटिश राज की न्याय-व्यवस्था की तारीफ कर रहे थे जिसमें राजा पर भी मुकदमा हो सकता है।
एक गरीब गठरी बांधे गाड़ी में जा रहा था। उसका बार-बार आकर मेरे मुँह को अपनी गठरी से रगड़ना मुझे बहुत बुरा लग रहा था। .... एकाएक मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे पकड़कर पीछे ठेल दिया और दो तमाचे जोर-जोर से लगाये।
उसनें आँखें निकालकर कहा- क्यों मारते हो बाबूजी, हमने भी किराया दिया है!
मैंने उठकर दो-तीन तमाचे और जड़ दिये।
इसके बाद तो नरेटर को लोगों से जम कर दुत्कार सुनने पड़े। यहाँ तक कि ईश्वरी ने भी डांटा - What an idiot you are, Bir!....और मेरा नशा अब कुछ-कुछ उतरता हुआ मालूम होता था।
यहीं कहानी खत्म होती है। यह कहानी बहुत सहजता से बताती है कि व्यक्ति के ईमानदारी, सचाई और न्याय के सिद्धान्त तब तक किताबी-सतही होते हैं, जब तक उसे सत्ता नहीं मिलती। सत्ता और अधिकार मिलने पर ही इन सिद्धांतों के प्रति सच्चे संकल्प की – ‘कमिटमेंट’ की परख होती है। कहानी के नरेटर को भी सत्ता और ऐश-आराम का ‘नशा’ मौका पाते ही चढ़ जाता है, जो अंत में तभी उतरता है जब उसे झिंझोड़ कर होश में लाया जाता है। ‘गांधी बाबा के चेले’ से गदगद हो कर , खुशी से ‘शाम को शराब पीकर, पत्नी को पीटने और महाजन से लड़ लेने वाले’ ठाकुर में हम भारतीय जनता के धूर्त सामाजिक-राजनैतिक-धार्मिक नेताओं द्वारा ठगे जाने वाले का उदाहरण भी प्रस्तुत करता है और साथ ही, एक अर्ध-सामंती समाज में, वंचित से भी चरम वंचित, स्त्री-जाति के ही अंततः पीटने के यथार्थ को भी दिखाता है।
यह खास तौर पर, सार्वजनिक जीवन से जुड़े नेताओं के आत्म-आलोचना की कथा है, सजग-सतर्क करने वाली कसौटी भी है। प्रेमचंद का तो आज़ादी के दस साल पहले निधन हो गया था – लेकिन उस दृष्टा, मनीषी लेखक की यह चेतावनी आज़ादी के बाद, नई सत्ता पाए अनेक छुटभैये नेताओं के नैतिक पतन में नज़र आती रही।
और आज भी – हम सभी, जहां पर भी – अधिकार और सत्ता के जिस भी स्तर पर हैं, हमें सजग-सतर्क रहना होगा कि कहीं अहंकार, विलासिता और अहंकार का ‘नशा’ हमें सच्चाई, ईमानदारी, करुणा और सह-अनुभूति की राह से विचलित न कर सके।
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*लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं।
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