सुभाष सेतिया की तीन लघु कथाएं
हिंदी में लघु कथा की परम्परा ने साठ के दशक में जन्म लिया था। अब तक तो यह विधा कई रूप ले चुकी है। बहुत बार तो ऐसी लघु कथाएं लिखी जाने लगीं जिनका हर वाक्य अपने आप में एक सन्देश होता था। इस तरह कभी कभी तो ऐसी कथाएं साइज़ में लघु होने के बावजूद भी विचार के स्तर एक तरह से थका देतीं थीं। बहरहाल, हम उस तरह की कथाओं की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि सिर्फ यह कह रहे हैं कि कथाएं भी कभी कभी अपने कथा - तत्व में कटौती करके गंभीर विमर्श करने लगती हैं। हालाँकि आप कह सकते हैं कि इसमें हमें क्या आपत्ति है? सच कहें तो हमें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन हम आज जो लघु कथाएं प्रकाशित कर रहे हैं, वो सीधी-सादी हैं। हमारी इन लघु कथाओं को आप घटना प्रधान किस्सों की तरह पढ़ें। सहृदय श्रोताओं को जैसे किस्से आनंदित करते हैं, वैसा ही आनन्द यह लघु कथाएं भी देंगी।
सुभाष सेतिया की तीन लघु कथाएं
1. ममता
यादें जीवन का ऐसा ख़ज़ाना है जो साँसों की तरह जीवन भर हमारे साथ रहता है। ये यादें समय समय पर हमारे अनुभवों से उभर कर हमें खट्टे मीठे एहसास कराती रहती हैं। ऐसी ही एक स्मृति उस दिन मेरे मन के झुरमुट को चीरती हुई तब सामने आकर खड़ी हो गई जब मेरी पोती ईशिता अपनी कोई बात मनवाने की ज़िद कर रही थी और उसका पापा यानि मेरा बेटा उसे मानने को तैयार नहीं था।
यह बात तब की है जब मैं 13-14 साल का था। हमारा गांव दिल्ली से 30 किलोमीटर दूर है। हम चार दोस्तों ने दिल्ली जाकर गणतंत्र दिवस परेड देखने की योजना बनाई। उन दिनों 26 जनवरी की परेड का बहुत क्रेज़ होता था। लेकिन तब आज जैसी ट्रैफिक की पाबंदियाँ और सुरक्षा के लंबे चौड़े इंतज़ाम नहीं होते थे। हमारे स्कूल के सीनियर बच्चे पिछले साल परेड देखने गए थे और उन्होंने परेड की भव्यता का जो बखान किया , उसे सुनकर हमारे मन में भी परेड देखने की इच्छा जागी। हम चारों ने फ़ैसला किया कि कुछ भी हो इस साल हम दिल्ली ज़रूर जाएँगे।
लेकिन सोचने और करने में बहुत फर्क होता है। 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती मनाने के बाद स्कूल में आधी छुट्टी हो गई। घर पहुँच कर माँ को दिल्ली जाने की बात बताई तो उसका चेहरा फक्क हो गया। मशीन चलाते चलाते माँ का हाथ रुक गया। माँ मोहल्ले और आस पास के घरों के कपड़े सिल कर जो रुपये कमाती थी उसी से ही मेरी पढ़ाई और घर का खर्च चलता था। रेल दुर्घटना में मेरे पिताजी की मौत के बाद माँ ने सिलाई की ट्रेनिंग लेकर घर पर यही काम शुरु कर दिया था। माँ के चेहरे पर चिंता की लकीरें देखकर मैं भी उदास हो गया। माँ ने कहा- पहले खाना खा ले , फिर बात करती हूँ।
थोड़ी देर बाद माँ मेरे पास बैठ कर बोली कि दिल्ली जाओगे तो किराया लगेगा और दोस्तों के साथ जा रहे हो तो जेब में कुछ और पैसे भी होने चाहिए । पर बेटा, इस वक्त तो घर में पैसे हैं नहीं। यह सुनकर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे । माँ ने अपने दुपट्टे से मेरे आँसू पोंछते हुए कहा- तू दिल छोटा मत कर। अभी तो तीन दिन हैं। कुछ न कुछ हो जाएगा ।इसके बाद माँ रात को भी बैठ कर कपड़े सिलती रही।
अगले दिन मैं स्कूल से लौटा तो माँ ने माथे पर हल्दी का लेप लगाया हुआ था और चुपचाप मशीन चलाए जा रही थी। मुझे खाना देकर वह फिर मशीन चलाने लगी। शाम तक सारे कपड़े सिल गए। मैं जाकर घरों में सिले हुए कपड़े डिलीवर कर आया और सिलाई के पैसे ले आया। माँ ने सारे रुपये मेरी जेब में डालते हुए कहा- अब तो खुश हो? जाओ तैयारी करो। अगले दिन हम चारों दिल्ली पहुँच गए। पहली बार गणतंत्र दिवस परेड देखने की ख़ुशी के साथ- साथ माँ की ममता पर गर्व भी महसूस हो रहा था।
2. रिश्ते ऐसे भी
विवेक कपूर ने जब एक पत्रिका में मनीषा मिश्रा का स्त्री विमर्श पर लेख पढ़ा तो उसके नए तर्कों और सहज सरल भाषा से प्रभावित हो कर लेख के साथ दिए गए ईमेल ऐड्रेस पर रचना की प्रशंसा में कुछ शब्द लिख दिए। कपूर स्वयं रचनाशील लेखक व पत्रकार हैं और संभावना शील व उदीयमान रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहना उनका स्वभाव है। तीन चार दिन बाद उन्हें मनीषा का वापसी ईमेल मिला जिसमें उसने लिखा कि वह उनकी रचनाएं पढ़ती रही हैं और उन जैसे प्रतिष्ठित लेखक की सराहना पाकर वह स्वयं को धन्य मानती हैं। इसी क्रम में अनेक लेखक- लेखिकाएँ फ़ेसबुक पर भी उनके फ्रेंड बन गए थे। मनीषा मिश्रा का नाम भी कुछ दिन बाद कपूर जी की फ्रेंड लिस्ट में जुड़ गया।
रिटायर्ड जीवन बिता रहे विवेक कपूर का समय इन रचनाकार व पत्रकार मित्रों से वैचारिक और साहित्यिक चैटिंग में प्रसन्नता पूर्वक बीत रहा था। उनकी पत्नी का कई साल पहले देहांत हो गया था। उनका एक ही बेटा था जो विदेश में रहता था। उनकी गृहस्थी नौकरों के भरोसे ही चल रही थी। मनीषा अपने लेखन के साथ -साथ व्यक्तिगत समस्याओं पर भी उनसे चर्चा कर लेती थी। कपूर उसे बेटी कह कर संबोधित करने लगे और मनीषा उन्हें अंकल लिखने और कहने लगीं। कभी-कभार फ़ोन पर भी बात हो जाती।
एक दिन शाम को पार्क में सैर करते हुए पत्थर से पैर टकराने से विवेक कपूर पक्के फ़र्श वाले 'वाक-वे' पर गिर पड़े। वहाँ घूम रहे लोगों ने तुरत-फुरत उन्हें उठाया पर उनसे चला नहीं जा रहा था। उनके पड़ोसी सहारा देकर उन्हें घर तक ले गए। घर पहुंचते ही उन्होंने सोसायटी में ही रहने वाले मित्र प्रियदर्शन को फ़ोन करके चोट लगने की खबर दे दी। कोई दोस्त भला ऐसे मौक़े पर घर में कहाँ टिका रह सकता है! वह फौरन पहुँच कपूर के घर पहुँच गए और उन्हें अस्पताल ले गए। एमरजेंसी में जब एक्स-रे, एम आर आई जैसे टेस्ट हो रहे थे तो प्रियदर्शन ने बेड पर लेटे कपूर साहब का मोबाइल पर फ़ोटो लेकर उनके घायल होने की सूचना फ़ेसबुक पर पोस्ट कर दी। डाक्टरों ने कुछ दवाएँ दीं और अगले दिन आपरेशन करने की बात कही।
अगली सुबह विवेक कपूर अस्पताल के बेड पर चाय पी रहे थे कि एक दंपति उनके सामने आ खड़ा हुआ। दोनों ने एक साथ कहा- ‘अंकल नमस्ते, अब कैसे हैं आप? कपूर साहब ने संकोच करते हुए कहा - माफ करना बेटे, मैंने पहचाना नहीं। महिला ने उनके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा- पहचानेंगे कैसे, हम कभी मिले ही नहीं। अंकल, मैं हूँ आपकी बेटी मनीषा मिश्रा। ये मेरे पति डाक्टर समीर मिश्रा, आर्थो सर्जन। फ़ेसबुक पर आपके बारे में देखा तो आपसे मिलने आ गए। हमारा अपना मल्टी क्लिनिक है। हम अपने क्लिनिक में आपका इलाज भी करेंगे और देखभाल भी’ तभी प्रियदर्शन भी वहाँ आ गए। पूरी कहानी सुन कर वे बहुत खुश हुए। डाक्टर समीर ने अस्पताल से डिस्चार्ज कराने की औपचारिकताएं पूरी कीं और विवेक कपूर को एंबुलेंस में लिटाकर साथ ले गए। एंबुलेंस चली तो कपूर साहब की आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उधर बगल में बैठे प्रियदर्शन ऐसे अनोखे रिश्ते बनाने के लिए सोशल मीडिया पर गर्व कर रहे थे ।
3. सब का बेटा
सुकेश रात को देर से घर लौटा तो पापा विनय कुमार सो चुके थे पर मम्मी पार्वती अभी जाग रही थी। सुकेश हाथ मुँह धोकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया और मम्मी ने खाना लगा दिया। माँ की चुप्पी और चेहरे की संजीदगी से वह समझ गया कि माँ परेशान है। उसे यह भी एहसास हो गया कि सुबह पापा की डाँट ज़रूर पड़ेगी। वह भी अपराधबोध महसूस कर रहा था इसलिए चुपचाप अपने कमरे में गया और टेबल लैंप ऑन करके पढ़ने बैठ गया।
सुकेश युवा सेवा दल का सदस्य था। उसकी संस्था पास के जिले के बाढ़ पीड़ितों के लिए खाद्य सामग्री, कपड़े, दवाइयाँ वगैरह एकत्र कर रही थी। उसकी ड्यूटी धर्मशाला में रखी सहायता सामग्री को बाढ़ ग्रस्त जिलें में ले जाने पर थी। उसे शाम तक सामान भिजवाना था मगर टेंपो देर से आया तो घर आने में ख़ासी देरी हो गई। तीन- चार दिन पहले भी कुछ ऐसा ही हो गया था। उस दिन उनकी संस्था ने विकलांग बच्चों की खेल प्रतियोगिता आयोजित की ।विजेताओं को पुरस्कार देने के लिए ज़िलाधिकारी येशा यादव आमंत्रित थीं। समारोह और जलपान के बाद अतिथि को घर तक एस्कोर्ट करने का काम सुकेश और उसके साथी मोहित के जिम्मे था। ट्रैफिक जाम की वजह से वापस आने में काफ़ी समय लग गया तो देर रात घर लौटने पर पापा बहुत ग़ुस्सा हुए।
इकलौती संतान होने की वजह से सुकेश के मम्मी पापा को उसकी चिंता लगी रहती है जबकि समाज सेवा को शौक हो जाने की वजह से उसे घर की परवाह ही नहीं रहती। समाज सेवा की धुन के पीछे भी एक कहानी है। दो साल पहले उसकी माँ को एक कार टक्कर मार कर आगे निकल गई। वह बड़ी देर तक सड़क पर ज़ख़्मी हालत में पड़ी रही। अचानक वहाँ से गुज़र रही उसके कालेज की दो लड़कियां सुकेश की माँ को अस्पताल ले गईं । तब से बीए की पढ़ाई के साथ साथ समाज सेवा को उसने मिशन बना लिया। अब समाज सेवा जुनून बन चुका है। माँ को तो उससे सहानुभूति है पर पापा इसे आवारागर्दी और समय की बरबादी मानते हैं । इसलिए उसे बराबर डाँट पड़ती रहती थी।
दुर्घटनाएँ और आपदाएँ बता कर तो आती नहीं। कुछ ही दिन बाद लड़कियों के स्कूल के बाहर बम विस्फोट होने से कुछ बच्चियाँ बुरी तरह घायल हो गईं। संयोग से सुकेश और मोहित उस वक्त घटना स्थल से बहुत दूर नहीं थे। धमाका सुनते ही वे घटनास्थल की ओर भागे । इस बीच अपनी संस्था के कुछ दोस्त भी बुला लिए। सबने मिल कर घायलों को अस्पताल पहुंचाया। एक बच्ची की मौत भी हो गई। पुलिस केस बना और पूछताछ के लिए दोस्तों के साथ सुकेश को भी रात भर थाने में रुकना पड़ा। उसकी चिंता में मम्मी पापा की रात भी जागते कटी।
सुबह सुकेश घर पहुँचा तो पापा का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था। चिल्ला कर बोले-‘ बस यही कसर रह गई थीं? थाने का मुँह भी दिखा दिया? निकल जा मेरे घर से। आज से तुम हमारे बेटे नहीं हो।’ दरवाज़े के कोने पर खड़ी रुआँसी मम्मी को देख रोता हुआ सुकेश घर से बाहर आ गया। लेकिन दरवाज़े पर एक अलग ही नजारा था। स्कूल की प्रिंसिपल, कुछ अध्यापिकाएँ और बहुत सारी लड़कियां फूल मालाएँ लेकर स्कूल की घायल बच्चियों की मदद के लिए उसका अभिनंदन करने आई थीं। प्रिंसिपल ने कहा- ‘ मैंने तुम्हारे पापा की बात सुनी। अब तुम केवल अपने माँ-बाप के ही नहीं हम सबके बेटे हो’
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सुभाष सेतिया आकाशवाणी से अपर महानिदेशक(समाचार) पद से रिटायर । भारतीय सूचना सेवा (IIS) के अधिकारी के रूप में आकाशवाणी और दूरदर्शन में समाचार संपादन, प्रकाशन विभाग में आजकल. योजना और Employment News का संपादन, पत्रकारिता का अध्यापन । 10 पुस्तकों का प्रकाशन । आकाशवाणी के विशेष संवाददाता के रूप में कई देशों की यात्रा ।
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