हमेशा की तरह आज भी प्रासंगिक हैं तुलसीदास
यह माह तुलसी जयंती का माह है. 19 अगस्त को उनकी 529वीं जयंती देश भर में तो मनाई ही गई, हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एक ब्रिटिश सांसद द्वारा एक नौ दिन का कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें प्रसिद्ध कथा वाचक और रामचरितमानस के मर्मज्ञ मोरारी बापू के प्रवचन तो हुए ही, साथ ही विश्व भर से आये विद्वानों ने संत तुलसी दास और मानस पर अपने विचार रखे. समय रहते हमें ओंकार केडिया का यह लेख प्राप्त हुआ है जिसमें उन्होंने बहुत सारे उद्धरण देकर बताया है कि तुलसी आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने वह तब थे जब उन्होंने मानस एवं अन्य ग्रंथों की रचना की थी. ओंकार केडिया द्वारा इस लेख में दिए गए अनेकों उद्धरणों में से एक को हम यहीं उद्धृत करना चाहेंगे तो ताकि आपको लेख की सही बानगी मिल सके. "जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।" अर्थात जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी रहती है, उसकी जगह नरक में होती है।
तुलसीदास आज भी प्रासंगिक हैं
ओंकार केडिया
भारतीय साहित्य और संस्कृति के आकाश में गोस्वामी तुलसीदास एक अटल नक्षत्र की तरह हैं। वे भक्तिकाल के महान कवि ही नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन के ऐसे व्याख्याकार हैं, जो अपनी रचनाओं के माध्यम से आज भी हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को दिशा दे सकते हैं। कई शताब्दियाँ बीत जाने के बाद भी तुलसीदास के विचार पुराने नहीं लगते, क्योंकि उन्होंने अपनी रचनाओं में जिन मूल्यों की बात की थी, वे शाश्वत हैं।
तुलसीदास ने राम के रूप में एक आदर्श पुरुष और एक आदर्श राजा का चरित्र जनता के सामने रखा। उनके राम सिद्धांतों के लिए सहर्ष राजपाट छोड़कर वनवास चले जाते हैं, शबरी और केवट जैसे लोगों से भी प्रेम और सम्मान का व्यवहार करते हैं और मानवता की भलाई के लिए राक्षसों का नाश करते हैं। वे त्याग, धैर्य, साहस, प्रेम और मर्यादा के प्रतीक हैं।
राम को तुलसीदास ने ब्रह्म कहा है, पर रामकथा एक मानवीय धरातल पर प्रस्फुटित हुई है। राम का जीवन मानव-संघर्षों की कहानी है। जिस व्यक्ति को भी जीवन में संघर्ष झेलना पड़ता है, वह राम से प्रेरणा ले सकता है। प्रतिकूल परिस्थितियों और संसाधनों के अभाव में भी अंततः जीत राम की ही होती है। इससे हर उस व्यक्ति को उम्मीद बँधती है, जो सत्य और सिद्धांतों के रास्ते पर चलता है। इसका एक पक्ष यह भी है कि जो सच के रास्ते पर चलता है, उसके सामने बाधाएं भी आती हैं, पर वह राम की तरह अपनी बुद्धि, विवेक और आत्म-बल से इनका सामना कर सकता है।
राम की कथा हर उस आदमी की कथा है, जो आदर्शों और मूल्यों के लिए सुख-सुविधाओं का त्याग करने और दुख भोगने के लिए हमेशा तैयार रहता है। रावण के विरुद्ध राम का संघर्ष साधन-संपन्न के विरुद्ध साधन-रहित का संघर्ष है। यह अन्याय के खिलाफ न्याय का संघर्ष है। यह संघर्ष अनवरत चल रहा है। इसलिए रामचरितमानस आज भी प्रासंगिक है।
जिस रामराज्य की चर्चा तुलसीदास ने की थी, वह आज भी हमारा लक्ष्य है। रामचरितमानस में रामराज्य का वर्णन करते हुए वे कहते हैं—
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
अर्थात रामराज्य में किसी को शारीरिक, दैविक अथवा भौतिक कष्ट नहीं सताता। सुशासन, सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा आदि की बातें हम आज करते हैं, पर तुलसी के रामराज्य में ये पहले से मौजूद हैं ।
रामराज्य में शासन का अंतिम उद्देश्य नागरिकों का सुख और सुरक्षा है। तुलसीदासजी तो यहाँ तक कहते हैं कि जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी रहती है, उसकी जगह नरक में होती है।
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।
तुलसीदासजी जनता के बीच आपसी प्रेम को रामराज्य का आधार मानते हैं। यहाँ कोई असुरक्षित नहीं है, किसी को कोई भय नहीं है। दरिद्रता के लिए रामराज्य में कोई जगह नहीं है। वे कहते हैं-
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।
‘रामचरितमानस’ लिखे जाने के शताब्दियों बाद भी जनता को ऐसे शासन और ऐसे शासक की प्रतीक्षा है। चाहे कोई भी देश हो, कोई भी शासक हो, रामराज्य सबके लिए एक आदर्श है, जिसे पाने के लिए सबको प्रयासरत रहना चाहिए।
नेतृत्व के विषय में तुलसीदास का दृष्टिकोण उल्लेखनीय है। वे कहते हैं—
“मुखिया मुख सो चाहिए खान पान को एक।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक॥”
अर्थात जिस प्रकार मुंह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि शरीर के सभी अंगों के पोषण के लिए काम करता है, उसी प्रकार नेता का दायित्व भी पूरे समाज का पालन-पोषण और संरक्षण करना है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों और प्रशासकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण नैतिक कसौटी है। सत्ता अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है—तुलसी का यह संदेश आज भी उतना ही सार्थक है।
चाटुकारिता आज के समय की एक बड़ी बीमारी है। राजनीति में भी यह गहरे पैठ गई है। तुलसीदासजी चाटुकारों से सावधान करते हुए कहते हैं-
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।
अर्थात भय या स्वार्थ के कारण अगर सचिव, वैद्य और गुरु सच नहीं बोलते और चाटुकारिता में लिप्त हो जाते हैं, तो राज्य, शरीर और धर्म का जल्दी ही नाश हो जाता है।
तुलसीदास ने केवल राजा का ही नहीं, बल्कि भाई, माता, पिता, मित्र, सेवक, पत्नी आदि के आदर्श चरित्र भी जनसाधारण के सामने रखे, जिससे समाज की व्यवस्था, मर्यादा और अनुशासन बना रहे। ऐसा करके उन्होंने न केवल अपने समय और समाज का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि भावी समाज की बुनियाद भी रखी। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहें तो ‘आज साढ़े तीन सौ वर्ष बाद भी इस विषय में कोई संदेह नहीं रह गया है कि उन्होंने सचमुच ही भावी समाज की सृष्टि की थी। '
तुलसीदास व्यक्ति के चरित्र, गुणों और आचरण को अत्यंत महत्व देते हैं। रामचरितमानस में वे कहते हैं—
जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥
यह पंक्ति मनोविज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आदमी दुनिया को अक्सर अपनी मानसिकता के चश्मे से देखता है। सकारात्मक दृष्टि रखने वाला व्यक्ति संभावनाएँ देखता है, जबकि नकारात्मक दृष्टि वाला व्यक्ति संकट। आज के तनावपूर्ण जीवन में यह आत्म-निरीक्षण अत्यंत आवश्यक है।
तुलसीदास की प्रासंगिकता सामाजिक संबंधों के संदर्भ में भी दिखाई देती है। उन्होंने मित्रता और परिवार के महत्व को बार-बार रेखांकित किया। रामचरितमानस में उन्होंने कहा-
धीरज धरम मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिए चारी॥
संकट के समय धैर्य, धर्म, मित्र और जीवन-संबंधों की वास्तविक परीक्षा होती है। आज जब संबंध बहुत तेजी से बनते और टूटते हैं, जब आभासी संपर्क बढ़ गया है, पर भावनात्मक दूरी भी बढ़ रही है, तब तुलसीदास का यह विचार हमें संबंधों की गहराई का महत्व समझाता है।
हालांकि विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है, पर मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ जैसे अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, असमानता, ताक़त का दुरुपयोग आदि अब भी पहले की तरह ही हैं। इन्हीं प्रवृत्तियों के कारण समाज, परिवार और व्यक्ति के सामने तरह-तरह की समस्याएं पैदा होती हैं। इन प्रवृत्तियों से निपटने के लिए तुलसीदास ने मानव-मूल्यों को बचाए रखने और बढ़ावा देने की वकालत की थी। उनका यह दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक हैं।
मानव जीवन को तुलसीदास एक दुर्लभ अवसर मानते हैं। आज तकनीकी विकास ने मनुष्य को अभूतपूर्व सुविधाएँ दी हैं, लेकिन उसी के साथ अकेलापन, तनाव और उद्देश्यहीनता भी बढ़ी है। तुलसी हमें याद दिलाते हैं कि जीवन का मूल्य केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसके सार्थक उपयोग में है।
बड़े भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥
तुलसीदास ने धर्म को कर्मकांड से नहीं, बल्कि मानवीय आचरण से जोड़ा। रामचरितमानस में वे कहते हैं—
परहित सरिस धरम नहि भाई।
पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥
अर्थात दूसरों के हित से बढ़कर कोई धर्म नहीं और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बढ़कर कोई अधर्म नहीं। आज जब समाज में व्यक्तिगत स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावाद बढ़ रहा है, तुलसी का यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
उनकी रचनाओं में आत्मसम्मान और स्वतंत्रता का महत्व भी दिखाई देता है। रामचरितमानस में वे कहते हैं —
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।
पराधीनता केवल राजनीतिक दासता नहीं होती। आर्थिक निर्भरता, मानसिक गुलामी, अज्ञान, भय और सामाजिक दबाव भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकते हैं। आज स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि शिक्षा की स्वतंत्रता, विचार की स्वतंत्रता, आर्थिक अवसर, सामाजिक सम्मान और निर्णय लेने की क्षमता भी है। इस व्यापक अर्थ में तुलसी की पंक्ति आज नए अर्थ ग्रहण करती है।
दुनिया ने तकनीकी रूप से बहुत प्रगति कर ली है। तकनीक मनुष्य को बेहतर साधन तो दे सकती है, पर बेहतर मनुष्य नहीं बना सकती। बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा उसे स्वयं खोजनी होगी। तुलसीदास इसी आंतरिक विकास की ओर संकेत करते हैं। उनके राम हमें बताते हैं कि शक्ति के साथ मर्यादा, ज्ञान के साथ विनम्रता और अधिकार के साथ कर्तव्य आवश्यक है।
तुलसीदास केवल अतीत के कवि नहीं हैं। वे वर्तमान के प्रश्नों के उत्तर खोजने में मदद करते हैं और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने का संबल देते हैं। उनकी प्रासंगिकता इस बात में है कि हम उनके शाश्वत मानवीय मूल्यों के सहारे आगे बढ़ सकते हैं। विज्ञान हमें सक्षम बनाता है और तुलसी का दर्शन संवेदनशील। यदि आधुनिक भारत इन दोनों में संतुलन स्थापित कर सके, तो विकास केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि मानवीय भी होगा। जब तक मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने की आवश्यकता रहेगी, तुलसीदास प्रासंगिक रहेंगे।
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ओंकार केडिया पूर्व सिविल सेवा अधिकारी हैं। भारत सरकार में उच्च पदों पर पदासीन रहने के बाद वह हाल तक असम रियल एस्टेट एपिलेट ट्राइब्यूनल के सदस्य रहे हैं और आजकल गुवाहाटी में रह रहे हैं। इनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.