मतदाता सूची में नाम रहेगा या नहीं? एसआईआर और बढ़ती आशंकाएं
लोकतंत्र के संरक्षण के लिए चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पहली शर्त है। आज वही विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है । यह चिंताजनक घटनाक्रम है। राजकेश्वर सिंह अपने इस लेख में उन्हीं चिंताओं को रखांकित कर रहे हैं।
मतदाता सूची में नाम रहेगा या नहीं?
एसआईआर और बढ़ती आशंकाएं
राजकेश्वर सिंह
नतीजा क्या निकलेगा, यह तो आने वाले महीनों में ही पता चलेगा, लेकिन लोगों के मन में शंका तो पैदा ही हो गई है कि केंद्रीय चुनाव आयोग का दामन उतना पाक-साफ नहीं रह गया है, जितने कि दावे किए जाते रहे हैं। तभी तो अब साफ-सुथरी मतदाता सूची, पूरी तरह निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव का सवाल इतना बड़ा हो गया है कि उस पर बहस रुक ही नहीं रही है। एसआईआर - SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) समेत दूसरे मुद्दों पर आयोग के भीतर मतभेदों और मनमाने तरीके से कामकाज को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त, समूचे विपक्ष ही नहीं, बल्कि सामाजिक और नागरिक संगठनों के निशाने पर भी हैं। मामला इसलिए भी ज्यादा तूल पकड़ गया है, क्योंकि सत्तारूढ़ भाजपा चुनाव आयोग के बचाव में खुलकर बैटिंग कर रही है, जबकि आयोग पर चुनावों में भाजपा को ही परोक्षरूप से मदद पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं।
कहावत है कि बगैर आग के धुआं नहीं उठता। चुनाव आयोग के मामले में भी कुछ ऐसी ही स्थिति बन गई है। चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त व उनके सहयोगी दो अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच तालमेल न होने और मनमाने तरीके से काम करने के सवाल पर आई इंडियन एक्सप्रेस में रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के बाद लोगों में इस बात को लेकर ज्यादा चिंता देखी जा रही है कि क्या मौजूदा चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा किया जा सकता है? मतदाताओं के माथे पर इस आशंका से भी बल है कि क्या एसआईआर के बाद मतदाता सूची में उसका नाम रहेगा भी या नहीं? बदली परिस्थितियों में मतदाताओं में इस बात की चिंता नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा बल्कि उसे यह डर सता रहा है कि चुनाव में भाग लेने का उसका अधिकार सुरक्षित रह भी पाएगा क्या? दरअसल इसकी ज़मीन भी तो चुनाव आयोग ने ही तैयार की है। आखिर, यह बात किसी के गले कैसे उतरेगी, जब एसआईआर की प्रक्रिया के तहत देश के पूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़, सीएजी के. संजय मूर्ति, मौजूदा चुनाव आयुक्त एसएस संधू, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पत्नी कल्पना दास, विदेश मंत्री एस जयशंकर, सेबी चेयरमैन तुहिनकांत पांडे और पूर्व आर्मी चीफ़ उपेंद्र द्विवेदी जैसे शीर्ष पदों पर रहे सैकड़ों लोगों को मतदाता सूची में उनके नाम को रखने के लिए नोटिस जारी कर दिया जाये। ऐसे में आम नागरिकों के मन में मतदाता सूची में अपने नाम के बने रहने को लेकर फिक्र और आशंका होना लाजिम है।
इंडियन एक्सप्रेस में रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के अलावा अनुभूति विश्नोई की द इकनॉमिक टाइम्स में एक रपट छपी है जिसके अनुसार जनवरी 2024 के बाद से नए वोटरों को शामिल नहीं किया गया। 24 सितंबर 2026 को प्रकाशित इस रिपोर्ट का शीर्षक ही पूरी कहानी ब्यान कर रहा है - "Gen Z voting rights on hold as special summary revision stays stalled since January 2024". इसमें कहा गया है कि 2024 के चक्र के बाद से वार्षिक "Summary Special Revision" (SSR) नहीं कराया गया है और यह प्रक्रिया फिर शुरू नहीं हुई। रिपोर्ट के अनुसार SSR ही वह नियमित प्रक्रिया है जिसके माध्यम से नए 18 वर्ष के पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची में जोड़ा जाता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि SSR 1958 से चली आ रही परंपरा है, लेकिन 2024 के बाद इसे दोबारा शुरू नहीं किया गया। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इसे फिर शुरू करने की आवश्यकता पर जोर दिया है क्योंकि इसके बिना 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं का पंजीकरण प्रभावित होता है। आयोग ने अभी इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
यही वह परिस्थितियां हैं जिसमें देश के विपक्षी दल ही नहीं, आम मतदाताओं, नागरिक, सामाजिक और छात्र संगठनों में भी बेचैनी देखी जा रही है। यह बेचैनी इसलिए भी और बढ़ गई है कि क्योंकि चुनाव आयोग ने एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सार्वजनिक हुई खामियों पर बिन्दुवार कोई स्पष्ट सफाई नहीं दी है। क्या बढ़िया होता कि देशभर में बहस का मुद्दा बने इस मसले पर मुख्य चुनाव आयुक्त व उनके दोनों सहयोगी चुनाव आयुक्त प्रेस कांफ्रेंस करके सब कुछ दूध का दूध और पानी का पानी कर देते, लेकिन अभी तक वैसा कुछ हुआ नहीं हुआ है। अलबत्ता चुनाव आयोग ने अपनी दो अलग-अलग प्रेस विज्ञप्तियों के ज़रिए कुछ मुद्दों को स्पष्ट करने की कोशिश ज़रूर की है, लेकिन उससे बात बनी नहीं। इस सबके बीच इस मामले में अब देश के उच्च पदों पर रहे लगभग सौ आईएएस, आईपीएस और दूसरे नौकरशाह भी कूद पड़े हैं। उन्होंने पत्र लिखकर एसआईआर को रद्द करने की मांग की है। पत्र में कहा गया है कि यदि यह एसआईआर जारी रहा तो उसका असर देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ेगा।
उधर, विपक्षी दलों के साथ कॉकरोच जनता पार्टी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई है जो अपने आप में एक बड़ा शिफ्ट है क्योंकि शुरू में जेन ज़ी का प्रतिनिधित्व करने वाली यह पार्टी सिर्फ शिक्षा के सवालों पर मुखर थी। एसआईआर और चुनाव आयोग के भीतर सर्वसम्मति या फिर बहुमत के आधार पर फैसले न लिए जाने की ख़बरें आने के बाद इस मसले पर राज्यों में भी आंदोलन हुए हैं। कांग्रेस ने भी प्रदेशों में अलग से आंदोलन किए हैं। ये स्थितियां इस बात की तसदीक करती हैं कि रास्ते भले ही अलग हों, लेकिन मौजूदा निजाम और चुनाव आयोग को लेकर अब राजनीतिक दलों में ही नहीं, बल्कि समाज के दूसरे हिस्सों में एक जैसी बेचैनी जरूर है।
चुनाव आयोग के संदर्भ में ताजा मामलों को लेकर विपक्षी दलों, विभिन्न नागरिक व सामाजिक संगठनों के लगातार विरोध को सामान्य राजनीतिक टकराव मान लेना उचित नहीं होगा, बल्कि इसे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और मतदाताओं के भीतर अपने मताधिकार को लेकर पैदा हुई चिंता के रूप में देखा जाना चाहिए। सीधे तौर पर और प्रामाणिक रूप से अभी यह भले नहीं कहा जा सकता कि हमारी चुनावी व्यवस्था पक्षपातपूर्ण हो गई है, लेकिन इस मामले में बीते कई वर्षों से लगातार गहराते संदेह के बाद अब जो स्थिति बन गई है, उसने मतदाताओं को नए सिर से सोचने को मजबूर तो कर ही दिया है। आखिर मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को क्यों ऐसा लगने लगा है कि उसका वोट सुरक्षित नहीं है। देश में कुल कितने मतदाता हैं, अभी चुनाव आयोग भी इस पर स्पष्ट नहीं है, लेकिन उसके मुताबिक यह संख्या 97 से 99 करोड़ के बीच हो सकती है, जिनमें से अलग-अलग राज्यों में लगभग 13 करोड़ लोगों को एसआईआर की प्रक्रिया के तहत चुनाव आयोग नोटिस दे चुका है।
चुनाव आयोग लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण संस्थान है क्योंकि जनता अपना प्रतिनिधि किसे चुनती है, जनता की इस इच्छा को मूर्त रूप देने की ज़िम्मेवारी चुनाव आयोग की है. जैसा कि पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने इंडियन एक्सप्रेस में ही अपने लेख में स्मरण कराया है कि सार्वजनिक पद पर बैठे लोग केवल सरकार या संस्था के प्रति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति शपथबद्ध होते हैं। उनकी सर्वोच्च निष्ठा संविधान और नागरिकों के हित के प्रति होनी चाहिए। समय आ गया है कि चुनाव आयोग आगे आकर स्थिति को स्पष्ट करे और यदि अभी कुछ खामियां हुईं हैं तो उन्हें दूर करके जनता का विश्वास फिर से जीते। देश में लोकतंत्र संरक्षण हेतु अब यह अनिवार्य हो गया है।

राजकेश्वर सिंह राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।
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