सत्ता और विपक्ष दोनों चूके जेन-ज़ी का मन पढ़ने में
राग दिल्ली में हमने कॉकरोच जनता पार्टी के उदय पर दो माह पूर्व एक लेख (लिंक) लिखा था जिसकी कुछ मित्रों ने इस बात के लिए आलोचना की थी कि हम विपक्ष में ही गलतियाँ निकालने पर आमादा हैं. सच कहें तो हम स्वयं भी अपराध-बोध से ग्रस्त हो गए थे. बहरहाल, उस लेख में हमारी जो हिचक थी, वह आज भी बरक़रार है. छात्रों और युवाओं का यह आन्दोलन आगे चलकर क्या रूप लेने वाला है, अभी किसी के लिए भी कुछ कहना कठिन है. वरिष्ठ पत्रकार राजकेश्वर सिंह जो राजनीति की नब्ज़ दशकों से जांच रहे हैं, इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी टिप्पणी दे रहे हैं.
सत्ता और विपक्ष दोनों चूके जेन-ज़ी का मन पढ़ने में
विपक्षी नेताओं के लिए भी बड़ा सबक है छात्रों-युवाओं का आंदोलन
राजकेश्वर सिंह
देश की राजधानी दिल्ली में इनका न कोई आफिस, न राज्यों और जिलों में कोई कार्यालय और न ही उनके कोई पदाधिकारी। इतना ही नहीं, न कोई राजनीतिक दल, न उसका अध्यक्ष और न उसका कोई चर्चित चेहरा, फिर भी अमेरिका में बैठे एक भारतीय युवक की सोशल मीडिया पोस्ट ने ऐसी चिंगारी का काम किया कि पूरे देश के जेन-जी में उबाल आ गया। सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान उपयोग में लाये गये ‘कॉकरोच’ शब्द से उपजी “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP) के आह्वान पर दिल्ली की सड़कों पर छात्रों और युवक-युवतियों का जो हुजूम उमड़ा, उसके संकेत साफ हैं कि अपने सवालों को लेकर देश के जेन-जी के भीतर एक आग पहले से सुलग रही थी, जो अब धधक उठी है। वह अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा मांगकर सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करवाना चाहती है। उबाल इतना है कि दिल्ली ही नहीं, जेन-जी देश के अलग-अलग शहरों की भी सड़कों पर उतर रहा है। सरकार मामले की गंभीरता को शायद समझ ही नहीं सकी, लेकिन युवकों-युवतियों के गुस्से का यह उबाल विपक्षी दलों के राजनेताओं के लिए भी कम बड़ा सबक नहीं है। ध्यातव्य है कि देश में जेन - ज़ी की संख्या 38 करोड़ होने का अनुमान है।
याद कीजिए उस दृश्य को, जब 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के समर्थक हजारों छात्र-छात्राओं, युवक-युवतियों पर पुलिस और उसके साथ सादे कपड़ों में मौजूद लोग निर्मम तरीके से डंडे बरसा रहे थे, तब एक युवक कैसे डटकर खड़ा हो गया था। उसके गुस्से की इन्तहा को ऐसे समझा जा सकता है कि वह और मार खाने को तो तैयार था, लेकिन वहां से हटने को कतई नहीं! देश के जेन जी के गुस्से और पीड़ा को समझने का वह एक बड़ा सच सबके सामने था, लेकिन जिन लोगों को आए दिन प्रतियोगी परीक्षाओं के पर्चे लीक होने और देश के युवक-युवतियों की पीड़ा का अहसास नहीं होगा, वह इसे नहीं समझ पाएंगे।
पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज के बाद भी जंतर-मंतर पर जिस तरह पूरे देश से बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, युवक-युवतियों, यहां कि परिजनों तक का दोगुने जोश से जुटान हो रहा है, वह बताता है कि देश के युवाओं में उनके अपने मुद्दों और सवालों को लेकर एक आग सुलग रही है और मौका पाते ही वह और तेज धधक सकती है। समझने के लिए यह काफी है कि सरकार और मुख्यधारा की मीडिया की पूरी अनदेखी के बावजूद बीते महीने 20 जून से जंतर-मंतर पर शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन तमाम दिक्कतों के बाद भी न सिर्फ चलता रहा, बल्कि उसकी धार दिनों-दिन तेज ही होती गई। वह भी तब, जब सरकार ने उसको कोई तवज्जो ही नहीं दी और विपक्षी दलों के नेताओं ने भी महज औपचारिकता निभाने के सिवा इसे कोई खास तरजीह नहीं दी। चूंकि, सीजेपी संसद सत्र शुरू होने के दिन 20 जुलाई को जंतर मंतर से संसद तक मार्च का ऐलान किया था, लिहाजा छात्रों-युवाओं के आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके भूख हड़ताल पर बैठे पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांचुक पुलिस ने ज्यादती के साथ धरना स्थल से उठा लिया। जाहिर है उसका मकसद आंदोलन की हवा निकालने की ही रही होगी, लेकिन हुआ उसका उलट। आंदोलन शांतिपूर्वक चलता रहा और 20 जुलाई को संसद तक मार्च के उनके ऐलान के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ा।
गौर करने वाली बात है कि सीजेपी के संसद तक प्रस्तावित मार्च के मद्देनजर प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए आसपास के पांच प्रमुख मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया था, फिर भी देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले युवाओं के हौसलों को तोड़ा नहीं जा सका। सरकार और प्रशासन की तमाम सख्ती के बाद सड़कें सूनीं नहीं रहीं। लोग देशभर से आए और प्रदर्शनकारियों ने संसद की तरफ कूच कर ही दिया। अमूमन, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों के लिए राजनीतिक दल और दूसरे संगठन लोगों को बसों, ट्रेनों से भरकर लाते हैं। आने वाले लोगों के लिए खाने पीने का इंतजाम करते हैं। प्रदर्शनकारियों के सामने उनके नेता का चेहरा होता है। सांगठनिक ताकत होती है, लेकिन सीजेपी के आंदोलन में जेन-जी देशभर से अपने खर्चे पर आये।
प्रदर्शनकारियों पर 20 जुलाई की घटना के बाद तो बहुत सारे परिजन भी अपने बच्चों के सार्थ उनके आंदोलन में भाग लेने जंतर-मंतर पहुंच रहे हैं। लोग इन आन्दोलकारियों के लिए अपने घरों से खाने-पीने का सामान लेकर आ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो विदेशों में बैठे लोग भी स्विगी और जोमैटो के जरिए खाने-पीने का सामान धरना स्थल पर भेज रहे हैं। इस आंदोलन के लिए यह सब तब हो रहा है, जब उसका कोई बड़ा नेता नहीं है। सीजेपी की शुरुआत करने वाले अभिजीत दीपके राजनेता नहीं हैं, लेकिन देश के जेन जी उनकी अगुवाई में अपनी लड़ाई लड़ने को आतुर दिख रहे हैं, जबकि देश की मुख्यधारा के मीडिया ने सीजेपी की खबरों को न पहले ठीक से कवर किया और 20 जुलाई की घटना के बाद उसकी कमियां ही गिना रहा है। अलबत्ता, विदेशी और सोशल मीडिया इसे देश-विदेश तक पहुंचा रहा है। लिहाजा बीते 12 सालों से हाशिये पर खड़े कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दल भी माहौल बनता देख अपनी राजनीति चमकाने के लिए कूदकर आगे आ खड़े हुए हैं। अब वे भी धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे हैं।
दरअसल देखा जाए तो सीजेपी के इस आंदोलन ने उन धारणाओं को तोड़ा है, जो हमारे राजनेता परंपरागत ढंग से अपनाते रहे हैं। बहुत चाहकर भी बीते 12 वर्षों में वे मोदी सरकार के खिलाफ ठीक से लड़ नहीं सके हैं। केंद्र ही नहीं, राज्यों के चुनाव में भी मोदी और भाजपा ने उसे धकियाकर किनारे ही रखा था, लेकिन महज सोशल मीडिया के भरोसे कॉकरोच जनता पार्टी केंद्र सरकार के लिए इतना बड़ा सिरदर्द पैदा कर देगी, ऐसा देश की सबसे बड़ी और हर तरह से सक्षम भारतीय जनता पार्टी ने भी नहीं सोचा होगा। इतना ही नहीं, विपक्षी दलों के लिए भी यह सबक है कि वे देश के जेन-जी और उनके मुद्दों और सवालों को ठीक से समझें और संवेदनशीलता के साथ उनसे सहयोग करें वरना यह जेन-जी अपने पर आ गया तो उनको भी उनकी जगह दिखाने में कोताही नहीं करेगा।
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लेखक राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने लंबे अर्से तक राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय रिपोर्टिंग की है। लगभग चार दशक की पत्रकारिता में उत्तर प्रदेश की राजनीति को उन्होंने प्रमुखता से कवर किया है। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।