हर साल बढ़ती हुई गर्मी पर डॉ नमिता शर्मा की सलाहें
वैसे तो अब उत्तर भारत में तकनीकी तौर पर मानसून आने की तारीखें आने ज़्यादा दिन नहीं लेकिन हम सभी अपने पिछले कुछ वर्षों के अनुभव से जानते हैं कि गर्मीं अभी कहीं नहीं जा रही. इसलिए जब हमें डॉ नमिता शर्मा का यह लेख प्राप्त हुआ तो हमें ऐसा नहीं लग्गा कि कहीं कुछ देर हुई है.
हर साल बढ़ती हुई गर्मी पर डॉ नमिता शर्मा की सलाहें
पिछले कुछ वर्षों से पूरे विश्व में मौसम बदल रहा है। वातावरण के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। प्रकृति वातावरण के तापमान को संतुलित रखती है। सूर्य की जो ऊर्जा धरती पर आती है उसे वापस अंतरिक्ष में भेजती है। लगभग 30% ऊर्जा पहाडों की बर्फ, रेगिस्तान की रेत और बादलों की चमकीली सतह से प्रतिबिंबित रीफ्लेक्ट हो कर अंतरिक्ष में चली जाती है। बची सत्तर प्रतिशत ऊर्जा धरती की सतह और समुद्र सोख लेता है। वातावरण में जितना और जैसे इस ऊर्जा को कम होना चाहिये अभी की परिस्थिति में वह नहीं हो रहा है।
इस परिस्थिति के लिये काफी हद तक हम लोग ही जिम्मेदार हैं। यह पर्यावरण पर ठीक ध्यान न दे कर विकास और प्रगति के पथ पर चलने का परिणाम है। विकास के नाम पर हमने प्रकृति का बेहिसाब विनाश किया है। इसलिये मौसम पर इसकी मार पड़ रही है। दिन ब दिन गर्मी बढ़ रही है। हालत इतने खराब हो गये हैं कि इसे सम्हालना और बदल पाना हमारे लिये संभव नहीं है। फिर भी हम इसके प्रति सावधान नहीं हैं। गर्मी का असर सीधे-सीधे पर्यावरण पर पड़ता है। इंसानों को, कृषि को, पशुधन को, पक्षियों को इन सबके लिये अति गर्मी बहुत नुकसानदेह है।
हमारे शरीर को गर्मी से बचाना बहुत जरूरी है। स्वास्थ पर गर्मी का बुरा असर होता है। विश्व में अधिक तापमान के कारण हर वर्ष लगभग 489000 लोगों की मृत्यु होती है।
गर्मी के दुष्प्रभाव जान कर उनसे कैसे बचा जाये यह हमारे वश में है। शरीर का नॉर्मल तापमान 36.5 डिग्री से 37.5 डिग्री होता है। जब तक वातावरण का तापमान इस के आस पास रहता है शरीर के सभी अंग सुचारु रूप से चलते रहते हैं। 40 डिग्री से ज्यादा तापमान होने पर गर्मी का असर होना शुरू होता है। 4 वर्ष तक के बच्चे, बुजुर्ग, ब्लड प्रेशर, हार्ट, डायबिटीज, किडनी, फैटी लिवर के रोगियों में अधिक गर्मी का असर जल्दी और ज्यादा होने की सम्भावना होती है। इन सभी को इस मौसम में बहुत सावधानी रखनी चाहिये।
थोड़ी गर्मी में ज्यादा पसीने से शरीर खुद को ठंडा रखने की कोशिश करता है। कम पानी पीने से और ज्यादा पसीने से शरीर का पानी और एलेक्ट्रो लाइट कम होता है, जिसके कारण बहुत थकान, जी मिचलाना, बुखार, सिर में दर्द, चिड़चिड़ा पन सब शुरू होता है। हृदय गति बढ़ जाती है और नाड़ी धीमी चलने लगती है और ब्लड प्रेशर कम होने लगता है। हवा में गर्मी और नमी बढ़ जाने से विषाणु जल्दी पनपते हैं। फेफड़ों और पेट के इंफेक्शन बढ़ते हैं। अस्थमा के रोगियों की परेशानी बढ़ सकती है। इसी कारण त्वचा के संक्रमण भी ज्यादा होते हैं। ब्रेन में अत्यधिक तापमान बढ़ने पर तापमान केंद्र शिथिल हो जाते है। बच्चों और बुजुर्गों में तेज बुखार, सुस्ती, भ्रम, बेहोशी, फिट जैसे लक्षण हो सकते हैं।
श्रमिक, खेतों में काम करने वाले लोग, खिलाडी,तैराक जिम करने वाले लोगों को लगातार पानी और इलेक्ट्राल लेते रहना चाहिये। गर्मी से बचाव के लिये लगातार पानी पियें। प्यास न भी लगी हो तो भी। सादा सात्विक भोजन करें जिसे शरीर आसानी से पचा सके। खरबूजा, ककड़ी, तरबूज जिन फलों में पानी की मात्रा ज्यादा हो वो खायें। दही, मट्ठा नीबू पानी लें।
एक और ज़रूरी पेय है ओ आर एस। इसे जीवन रक्षक घोल भी कहते हैं। ये बाजार में आसानी से मिलता है। इसे घर में भी बनाया जा सकता है। छह चम्मच शकर, आधा चम्मच नमक और एक लीटर साफ पानी ले लें। पानी उबाल कर ठंडा कर के या फिल्टर का हो तो वैसा ही सब मिलाकर ओ आर एस घोल तैयार हो जाता है। इसे पियें। ये ऊर्जा देता है। थकान दूर करता है।
गर्मी में सूती, ढीले और हल्के रंग के कपड़े पहनें। पिछले कुछ वर्षों से युवाओं में काले रंग के कपड़े पहनने का चलन बढ़ गया है। यह हमारे देश के गरम मौसम के अनुकूल नहीं है। सिर, गर्दन और शरीर को पूरा ढक कर बाहर निकलें। बाहर के काम तेज धूप से पहले निपटाने की कोशिश करें। घर को ठंडा रखें।
जरूरत से ज्यादा थकान, मुंह का सूखना, कम पेशाब होना ,पसीना आना तेज़ बुखार आदि हो तो अपने चिकत्सक से तुरन्त सलाह लें।
पूरे देश में गर्मी पड़ रही है। अनेक शहर जहां तापमान ज्यादा नहीं होता था इस साल 40 डिग्री का पारा पार कर रहे हैं। देश भर में ऐसी ही हालत है। साथ ही तेज़ हवा, आंधी, तूफान और यहां तक कि बारिश के साथ ओले भी गिरे रहे हैं। चारों ओर मौसम की मार है। ऐसे में अपनी और अपने परिवार की जिम्मेदारी हमारी खुद की है। कुछ छोटी छोटी बातों कि ध्यान रख कर हम तेज गर्मी से अपना बचाव कर सकते हैं।

डॉ नमिता शर्मा पेशे से चिकित्सक हैं। 25 वर्ष तक कैंटोनमेंट बोर्ड, पुणे में बतौर मेडिकल ऑफिसर काम किया। अवकाश -प्राप्ति के बाद कुछ समय तक विभिन्न सामाजिक कार्यों से जुड़ी रहीं। पिछले लगभग पाँच वर्ष से रामकृष्ण मठ (पुणे) से संबद्ध एक चैरिटेबल अस्पताल में चिकित्सीय सेवाएँ दे रही हैं और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर पढ़ती-लिखती और गुनती रहती हैं।