स्त्री-चेतना की खिड़कियाँ
ओम निश्चल*
पारुल बंसल की कविताएं इस वेबपत्रिका में प्रकाशित होती रही हैं और इस पत्रिका के पाठक स्त्री अस्मिता पर लिखी उनकी रचनाओं से बखूबी वाकिफ़ हैं। हाल ही में उनका कविता संग्रह 'ईश्वर सुन रहे हो ना' प्रकाशित हुआ है। इसकी समीक्षा कर रहे हैं वरिष्ठ साहित्यकार ओम निश्चल!
ज्यों ज्यों समाज में स्त्री चेतना के आयाम बढ़ते जा रहे हैं, स्त्री तालीम, कामकाज और स्वावलंबन के मार्ग पर जैसे ही अग्रसर हो रही है, उसके भीतर की रचनात्मकता एक विस्फोट के साथ सामने आ रही है। स्त्री को लेकर भारतीय मानस पहले से उत्तरोत्तर उदार हुआ है तथापि जैसे आजादी के बाद भी कहीं न कहीं गुलामी की मोहक जंजीरों से हम गुँथे हुए हैं, स्त्री स्वतंत्रता पर आज भी समाज का एक अलक्षित पहरा है। इसके पीछे समाज की अपनी सोच भी है जो समय के साथ परिपक्व नहीं हुई। एक जड़ीभूत किस्म की सौंदर्याभिरुचि के मारे समाज ने अपने को स्त्री के साथ बदलने की आदत नहीं डाली जिसका प्रतिफल यह हुआ कि स्त्री की रचनाशीलता में इन सारी जड़ताओं की गिरह धीरे धीरे खुल रही है। पारुल बंसल की कवि चेतना इस बात से अनुप्राणित है और स्त्री समस्याओं के तमाम विषयों को मार्मिकता से छूती हुई वे इस समाज, समय और संसार को अपने नज़रिये से देखती परखती हैं।
पारुल बंसल का यह संग्रह ' ईश्वर! सुन रहे हो न' उस समय आया है जब कविता में स्त्री रचनाकारों की कई पीढ़ियां सक्रिय हैं। शुभा से लेकर गगन गिल, अनामिका, निर्मला गर्ग, सविता सिंह, अनीता वर्मा, की पीढ़ी से लेकर बाबूषा कोहली, रूपम मिश्र, अनुपम सिंह और जोशना बनर्जी की पी़ढ़ी तक कविता ने अपने को इस तरह खोला है कि उसमें स्त्री जीवन के विराट अंतस्सत्य उजागर होते हैं।
यह भी कहना होगा कि हर कवि का सत्य अपना होता है उसे अपने सत्य को अपनी तरह खोजना होता है । तभी अज्ञेय ने लिखा था -- वह कहो, जितना तुम्हारा सच है। स्त्री कविता स्त्री जीवन की इन्हीं विविध रूपात्मक छवियों का अंकन है और यह सब वे जिस संबोधन के वशीभूत होकर कहती हैं वह है --- ईश्वर तुम सुन रहे हो न; सुनो हिचकियों तुम एकांत में आना -- यह एकांत में आना कहना भी एक तरह के सेंसरशिप की झीने अवरोधों के मद्देनजर कहना है। पारुल बंसल इस पौरुषेय समाज को सिरे से पहचानती हैं, इसलिए उसके हर ढीले नट बोल्ट पर प्रहार करती हैं संकेत करती हैं, जिस पर इस समाज की पुरुष-वर्चस्ववादी नींव टिकी है।
एक कविता ‘दृढ़ संकल्प’ में पारुल लिखती हैं, वेद मंत्र मेरे मिट जाने के बाद भी गुनगुनाए जाएंगे, प्रतिमाएं मेरे बाद भी तराशी गढ़ी जाती रहेंगी, रफी के गीतों की महक फिज़ा में रहेगी पर नहीं किया जाएगा याद तो वह होगा मेरा स्त्री होना--मेरे मिट जाने के बाद भी। वह समाज में बेटों को लेकर हमारी रूढि़यों में व्याप्त पूजा अर्चना ब्रत उपवास को लक्षित करते हुए यह बात दर्ज करती है कि वह भले अन्नपूर्णा हो, पर रसोई में वह केवल पकौड़े ही नहीं तलती, वह अपनी इच्छाएं छानती है, फेंटती है समस्त ब्रहमांड, स्त्री चौके में सिर्फ रोटियां ही नहीं बेलती। श्रेष्ठ मनुष्य देह मार्मिकता में बजती हुई कविता है। माना मनुष्य जीवन श्रेष्ठ है। नहि मानुषात् हि श्रेष्ठतरं हि किंचित्। किन्तु यदि कोई व्यक्ति विकलांग हो तो उसके लिए एक अपंग के रूप में इस मनुष्यता का बोझ असहनीय है। वह क्या करे इस मनुष्य देह का। इस तरह पारुल बंसल में प्रश्नाकुलता है जैसे जनरेशन गैप की प्रश्नाकुलता होती है। कवयित्री जगह जगह प्रश्नांकित करती हैं। यह उनकी ही नहीं, समूची स्त्री कविता का मिज़ाज है।
हालांकि दलित स्त्री कविता का चेहरा शोषण की दास्तानों से भरा है। काटे जाते जंगलों, सभ्यता के नाम पर उनके खनिजों पर एकाधिकार और उनके दोहन की कोशिशों का प्रत्याख्यान कविता में किया जा रहा है तो दलित स्त्री समाज की पीड़ा लिखने वाली कवयित्रियां भी हमारे बीच है। पारुल बंसल ने ऐसी कई कविताएं लिखी हैं जो स्त्री चेतना को जगाती हैं और स्त्री वेदना को अपना स्वर भी देती हैं। स्त्री के अमूल्य प्रहार, बाट जोहती, कठिन डगर स्त्री की, स्त्री बनाम पुरूष, नारीत्व पर प्रक्ष्येपास्त्र, घुँघरू की अभिलाषा ऐसी ही कविताएं हैं। स्वाद मृत्यु का पढ़ते हुए लगता है कवयित्री का कवि ‘कंडीशंड’ चिंतन या रूढ़ियों से आबद्ध कवि नहीं है, वह स्वायत्त और निस्पृह है । वह जानता है मृत्यु का स्वाद भी कितना भला हो सकता है बशर्ते कि उसके पहले कुछ काम ऐसे किए जाएं जो मानव जीवन को सार्थक बनाते हैं। यह कविता कहती है ::
थाम लेना हाथ उस असहाय का
जिसकी प्रार्थना में फिर तुम ही रहोगे
कर लेना ब्याह उस कन्या से
जिसका पिता दहेज जुटाने में
परलोक सिधार गया
अगर यह सब चख लिया
तो इससे सुंदर कुछ नहीं (मृत्यु का स्वाद)
एक कविता में नर्तकी का स्वाभिमान से भर कर यह कहना कि मैं बताशा नही कि घोल कर पी जाओ, मैं वसा नहीं कि शरीर को समुचित आकार दे सकूँ। मैं तो बस मैं हूँ खुली तिजोरी नहीं, वक्त की छाती पर पांव जमाकर नर्तन करने वाली / नर्तकी से ज्यादा कुछ नहीं। (मैं हूँ) किसी पीड़ा के वशीभूत होकर ही कवयित्री कहती है कि स्त्री को विरासत में ही मिली है दर्द को ओक लगा कर पीने की कला तभी तो ईश्वर ने उसके भीतर गर्भाशय का रोपण किया है।
प्रतिरोध की यह चेतना पारुल की अन्य कविताओं में भी है। ‘अब और नहीं इसी तेवर की कविता है’ जो पुरुष के निर्देशों को मानने से इन्कार करती है और उसे यूटर्न की सलाह देती है। वह दूधो नहाओ पूतों फलो की लोकोक्ति का बहिष्कार करती है जिससे पितृसत्ता के पोषण की गंध आती है। वह समाज की इस मानसिकता का विरोध करती है जो पुत्र जन्म के लिए तो उत्सुक और लालायित दिखती है किन्तु कन्या जन्म के लिए नहीं। उसने लोकोक्तियां बेटों के लिए गढ़ीं, सोहर बेटों के लिए गाए गए। बेटी को पराया धन कह कर उन्हें जताया गया कि वे तो दूसरों की वंशबेल बढ़ाने वाली इकाइयां हैं। कवयित्री अपने इर्द गिर्द के समाज से कथ्य उठाती हैं। अपने आसपास के रहन सहन, चिंतन, लोकाचार, बात व्यवहार को कविता का हिस्सा बनाती हैं और इसके जरिए समाज में फैली बुराइयों को आत्मसात करती हुई उसे अपनी कविताओं में पिरोती हैं।
हालांकि स्त्री की व्यथा सुनने के लिए कोई नहीं होता तो वे अपनी व्यथा कविताओं में उड़ेल कर ईश्वर को ही सुनाना चाहती हैं। क्योंकि यह वह अदृश्य सत्ता है जिस पर उन्हें यकीन है कि वह उनकी व्यथा सुनेगा। ‘भवसागर का भाव बोध’ संतत्प स्त्री की पीड़ा का निर्दशन है। ‘प्रेम को दरकने दो’ के स्थायी बोध के साथ लिखी कविता पढ़ते हुए लगता है क्यों न प्रेम दरक जाए जब आपसी संबंधों में संबंधों की शुचिता का कोई स्थान न रह जाए। ‘सावधान’ तो जैसी स्त्री सुबोधिनी कविता है। हृदय की हथेली पर आवेग में आकर दोने पर प्रेम सजा कर प्रेमी के सम्मुख न रख देना, तब रखना जब प्रेमी अतृप्त और क्षुधा-व्याकुल हो। यह अरसिकेषु काव्यनिवेदनं की तरह प्रेम निवेदन की भी संहिता है।
'ईश्वर ! सुन रहे हो न' की कविताएं इसी भाव संवेद्य तरलता और स्त्री आकांक्षा का प्रतिफलन है। पारुल बसंल की ये कविताएं भले उतनी शिल्प सजग न हों किन्तु स्त्री चेतना और आधुनिकताबोध संपन्न स्त्री की स्वायत्त होती चेतना की खिड़कियां हैं जिनसे पूरी दुनिया की स्त्री का बिम्ब देखा जा सकता है।
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*कई पुरस्कारों से सम्मानित ओम निश्चल (मूल नाम डॉ ओम प्रकाश मिश्र) वरिष्ठ साहित्यकार हैं जिनके अनेक कविता संग्रह, दर्जनों निबंध एवं आलोचनाएं प्रकाशित हो चुके हैं। इनके सम्पादन में कई महत्वपूर्ण साहित्यकारों की रचनाएं भी प्रकाशित हुई हैं। हिन्दी के तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन जारी है।