सम्बन्ध की सत्ता: यथार्थ या मानसिक कल्पना
डॉ मधु कपूर के दार्शनिक निबंधों की श्रृंखला आज के निबंध के साथ सम्बन्धों की ओर मुड़ रही है. उन्होंने सूचित किया है कि इस विषय पर उनके इस पहले निबंध के बाद तीन से चार निबंध और आयेंगे. लेकिन पहला ही निबंध पढ़कर हम आपको आगाह कर दें कि यह निबंध व्यक्तिगत रिश्तों पर नहीं, बल्कि एक दार्शनिक विमर्श है कि "सम्बन्ध" की सत्ता यथार्थ है या केवल मानसिक कल्पना। दो व्यक्तियों, वस्तुओं या घटनाओं के बीच जो जुड़ाव हम अनुभव करते हैं—क्या वह वस्तुओं में निहित है, या हमारी चेतना द्वारा निर्मित? इसी प्रश्न के सहारे लेख यह दिखाता है कि सम्बन्ध चाहे यथार्थ हो या कल्पना, वही संसार को अर्थपूर्ण और जीने योग्य बनाते हैं। उनके आने वाले लेख क्या स्वरुप लेते हैं, हमारे लिए अभी कहना मुश्किल है लेकिन इसकी उम्मीद कम ही है कि उनका कोई आगामी लेख भी आज बहुप्रचलित 'रिलेशनशिप' समस्याओं जैसे चटपटे विषय को डील करेगा. बहरहाल, इस श्रृंखला से अगर हम संबंधों के दार्शनिक आयामों को थोड़ा भी समझ पायेंगे तो शायद दुनियावी रिलेशनशिप की गुत्थियों को भी कुछ हद तक शायद आसान बना सकें. आज का लेख पढ़िए और आगामी विमर्शों पर भी नज़र बनाए रखिए।
सम्बन्ध की सत्ता: यथार्थ या मानसिक कल्पना
डॉ मधु कपूर
समाज विज्ञानी कहते हैं —समाज सम्बन्धों का जाल है अर्थात—अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता है। इस कहावत को ध्यान में रखते हुए ‘सम्बन्ध’ एक ऐसा तत्त्व है, जो लौकिक व्यवहार में तथा ब्रह्माण्ड की व्यवस्था को संतुलित रखने के काम आता है। यूँ तो सम्बन्ध अनंत है और स्वतः सापेक्ष होते है—जैसे दोस्ती, माँ-बाप, पति-पत्नी, बहन- भाई, चिकित्सक-रोगी, शिक्षक-छात्र, इत्यादि। कहने का तात्पर्य है द्विनिष्ठता ही संबंध का मुख्य लक्षण है, अर्थात दो वस्तुओं या दो व्यक्तियों को जोड़ने का काम सम्बन्ध करता है। ‘सम्बन्ध’ स्वयं किसी एक वस्तु और व्यक्ति में नहीं रहता है। उदाहरण के लिए 'क’ और ‘ख’ दो स्वतंत्र व्यक्ति है पर उनका संपर्क दोस्ती का है। प्रश्न उठता है कि यह ‘दोस्ती का सम्बन्ध’ कहाँ रहता है? क्या वह 'क' के भीतर है, 'ख' के भीतर है, या उन दोनों के बीच रहकर भी नहीं रहता है?
भारतीय दर्शन में ‘सम्बन्ध’ को देखने की दृष्टि बहुस्तरीय है। यह केवल वस्तुओं के बीच का जोड़ नहीं, बल्कि वस्तु के अस्तित्व को समझने का माध्यम है। जैसे- 'दंडी पुरुष' (दंडधारी पुरुष) का ज्ञान जब उत्पन्न होता है तो यह एक विशिष्ट प्रतीति का नियामक है, जिसमें केवल पुरुष ही नहीं, दंड भी ज्ञान का विषय बनता है। उपर्युक्त अभिव्यक्ति में पुरुष विशेष्य है, दण्ड विशेषण है और दोनों के बीच का संबंध संयोग (contact) है, जिसके बिना ‘दंडीपुरुष’ का ज्ञान नहीं हो सकता है। दंड यदि व्यक्ति से दूर पड़ा हो तो व्यक्ति को दंडी नहीं कहा जायेगा। दंड के साथ व्यक्ति का सम्बन्ध ही उसे दंडी बनाता है, लेकिन वस्तुएঁ या व्यक्ति जब अलग हो जाते है, तो उनका सम्बन्ध भी टूट जाता है। उदाहरण के लिए मेज पर रखी हुई किताब, या दो व्यक्तियों का हाथ मिलाना— यह सम्बन्ध तब टूट जाता है जब मेज से पुस्तक हटा ली जाती है और औपचारिकता ख़त्म होने के बाद कुछ ही क्षणों में उनके हाथ अलग हो जाते है। सम्बन्ध खत्म हो जाने के बाद भी दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व लेकिन बना रहता है।
इस तरह ये सम्बन्ध अनित्य कहे जाते है। किन्तु अनित्य होने पर भी इस सम्बन्ध को एक वास्तविक स्वतंत्र सत्ता के रूप में देखा जाता है, जो दोनों वस्तुओं से पृथक रूप में रहता है। मेरे हाथ में एक कॉपी है एक कलम है, जिससे मैं सम्बंधित हूँ। बस या ट्रेन में पास बैठे यात्रियों के साथ मेरा सम्बन्ध है। एक जेल में रहने वाले दो कैदी भी आपस में सम्बंधित होते हैं। 'अमृता, राहुल से लंबी है‘ अथवा अमृता, राजीव से नाटी है’—'यहाँ अमृता, राहुल और राजीव तीन स्वतंत्र व्यक्ति हैं, और 'लंबा होना' तथा ‘नाटा होना’ एक ऐसा संबंध है जो दोनों के होने पर ही आश्रित होता है।
इसी तरह कुछ और दृष्टान्त — ‘आप मेरे दाहिनी तरफ बैठे है तो इसका अर्थ है, ‘दाहिने तरफ’ एक दैशिक सम्बन्ध है। आप उठ कर बायीं तरफ आ जाते है तो ‘बायीं तरफ’ एक दैशिक सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है। पड़ोसियों के परिवार से हमारा ‘दुश्मनी का रिश्ता’ है। कुम्हार मिट्टी का ढेर लेकर बैठा है जिससे वह घट बनाएगा, किन्तु अभी इस मिट्टी के ढेर में घट का अभाव है। जब तक मिट्टी से घट उत्पन्न नहीं होता है तब तक मिट्टी में घट का अभाव महसूस होता रहेगा इसलिए घट को इस अभाव का प्रतियोगी कहा जाता है और मिट्टी के साथ घटाभाव का ‘अभावीय प्रतियोगिता’ सम्बन्ध है।
दिलचस्प प्रश्न है सम्बन्ध कहाँ रहता है और वस्तुओं से कैसे जुड़ता है? क्या उसे भी एक नए सम्बन्ध की आवश्यकता होती है ? यदि सम्बन्ध को जुड़ने के लिए नया सम्बन्ध चाहिए तो उस नए सम्बन्ध को भी जुड़ने के लिए एक और सम्बन्ध चाहिए इस तरह यह प्रक्रिया अनन्त काल तक चलती रहेगी, जो हमारी समस्या का समाधान नहीं कर सकेगा। क्योंकि हमारे अनुभव में सम्बन्ध वस्तुओं से अलग नहीं दिखाई देता है। न्याय दार्शनिक कहते हैं कि हर संबंध को जोड़ने के लिए एक नए सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है; कुछ सम्बन्ध ‘स्वरूप सम्बन्ध' (self-linking) होते हैं, जो स्वयं ही जुड़ जाते हैं, उन्हें किसी तीसरे बिचौलिए की ज़रूरत नहीं होती। इसकी चर्चा करना भी आवश्यक है। फिलहाल प्रश्न उठता है यह सम्बन्ध कहाँ रहता है?
अक्सर देखा जाता है कि जब हम किसी पदार्थ के स्वभाव को जानने की कोशिश करते है तो सबसे पहले विश्लेषक पद्धति के द्वारा उसको अवयवों में विभाजित कर लेते हैं। यद्यपि एक विशिष्ट पदार्थ अपने अंगों से स्वतंत्र नहीं रह सकता है। फिर भी किसी पदार्थ को वैचारिक धरातल पर विभाजित करते करते जब हम अणुओं तक पहुँच जाते है, जिसे फिर विभाजित नहीं किया जा सकता है, तो वे अणु भी संयोग सम्बन्ध से जुड़कर एक महत पदार्थ की रचना करते है। जैसे बालू के कण संयोग सम्बन्ध से जुड़कर बालू का ढेर बनाते है। अंगों और शरीर का सम्बन्ध भी कुछ इसी तरह अटूट होता है, क्योंकि अवयव के न रहने पर अवयवी भी लुप्त हो जाता है। जैसे घट का उपादान कारण मिट्टी है, उससे अलग होकर घट की सत्ता नहीं रह सकती है।
मिट्टी के टुकड़ों में परस्पर संयोग सम्बन्ध के द्वारा घट का निर्माण होता है, अतः घट का अस्तित्व मिट्टी से पृथक नहीं होता है। जबकि किताब के साथ मेरा संपर्क ऐसा नहीं है, सम्बन्ध विच्छिन्न होने पर मेरा और किताब का अस्तित्व स्वतंत्र रूप से बना रहता है। इसी तरह एक अंकुर जो अपने अस्तित्व के लिए बीज पर निर्भर करता है, जिसमें मिट्टी, पानी, हवा और अन्य आवश्यक परिस्थितियाँ इत्यादि कारण रूप से जुड़े रहते हैं। पर बीज और अंकुर का अस्तित्व पृथक पृथक नहीं रह सकता है। बांया, दांया, उत्तर, दक्षिण, पूर्व पश्चिम, बड़ा, छोटा आदि सम्बन्ध वस्तु के स्थान और काल के द्बारा निर्धारित किये जाते हैं, जो दैशिक और कालिक संयोग सम्बन्ध कहे जाते हैं।
संयोग सम्बन्ध अव्याप्यवृत्ति कहा जाता है। तात्पर्य है कि जब हम कहते है, ‘वृक्ष पर वानर बैठा है’ तो ‘कपिसंयोग’ वृक्ष के किसी एक हिस्से पर है, सम्पूर्ण वृक्ष पर संयोग सम्बन्ध नहीं हो सकता, यदि ऐसा होता तो वृक्ष के समस्त अंगों के साथ वानर के समस्त अंगों का सम्बन्ध होता। पर ऐसा होता नहीं है क्योंकि हम पूछते है —कहाँ बैठा है? उत्तर मिलता है — ऊपर वाली डाल पर बैठा है। कपिसंयोग सिर्फ उपरवाली डाल से सम्बन्धित है काण्ड या मूल से नहीं, इस तरह इसे अव्याप्यवृत्तिसंयोग सम्बन्ध कहा जाता है। कई बार यह सम्बन्ध व्याप्यवृत्ति भी होता है जैसे कटोरे में घी पूरा भरा हुआ है अर्थात घी का सम्बन्ध कटोरे के सभी अंगों से है। संयोग सम्बन्ध की जटिलता का अंत नहीं है।
इसके विपरीत बौद्ध दार्शनिकों की दृष्टि में सम्बन्ध की सत्ता को स्वतंत्र नहीं माना गया है बल्कि इसे कल्पित अध्यारोपण कहा गया है। चूँकि वस्तुएँ क्षणिक होती हैं, इसलिए उनके बीच कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं होता है। सम्बन्ध केवल विचार में है, वास्तविकता में नहीं। उदाहरण के लिए बीज से अंकुर उत्पन्न होता है, लेकिन बीज और अंकुर के सम्बन्ध को बौद्ध प्रतीत्यसमुत्पाद या कार्य कारण की शृंखला रूप में समझते हैं। धूम, अग्नि पर निर्भर करता है, परंतु यह सम्बन्ध कोई तीसरी वस्तु नहीं है। नागार्जुन का सूत्र: “न स्वतो न परतो न द्वाभ्यां नाप्यहेतुतः।” अर्थात् कोई भी वस्तु न तो स्वयं से, न दूसरों से, न दोनों से, और न ही बिना किसी कारण के उत्पन्न होती है। वस्तुएँ और उनके सम्बन्ध केवल चेतना की कल्पना या केवल अनुभवजन्य प्रतीति है। अन्यथा दो व्यक्तियों को देखकर हम कैसे कह सकते हैं कि इनमे से नीली शर्ट वाला व्यक्ति चाचा है और दूसरा भतीजा है? इस दृष्टि से सम्बन्ध, वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारी बुद्धि द्वारा निर्मित ढाँचे में होता है।
इस प्रसंग में पाश्चात्य दार्शनिक डेविड ह्यूम (David Hume) का वक्तव्य भी उल्लेखनीय है —वे मानते हैं कि बिलियर्ड खेल में जब एक गेंद दूसरी गेंद से टकराती है और दूसरी गेंद आगे बढ़ जाती है, तो हमें केवल दो 'घटनाएँ' दिखाई पड़ती हैं —पहली गेंद जो दूसरी को धक्का देती है और दूसरी गेंद जो आगे बढ़ जाती है, लेकिन उनके बीच का 'कारण-कार्य सम्बन्ध' कहीं दिखाई नहीं पड़ता है। इस तरह सम्बन्ध कोई बाहरी वस्तु नहीं है, बल्कि हमारी एक मानसिक आदत है जो बार-बार दो घटनाओं को घटते हुए देखकर उनके बीच संबध स्थापित कर देती है।
जैसे आग और धुएँ को कई बार एक साथ देख कर बुद्धि उनके बीच कारण-कार्य संबंध की कल्पना कर लेता है। यह सम्बन्ध वस्तुओं से स्वतंत्र जरूर होता है, पर बाहर कहीं न रह कर हमारी मानसिक अभ्यास का द्योतक होता है। अनुभव में हमें केवल वस्तुएँ या घटनाएँ दिखती हैं, सम्बन्ध अलग से नहीं दिखाई देता है। जैसे आकाश में केवल स्वतंत्र तारे हैं। वे अपने अपने स्थान पर हैं, उनके बीच कोई वास्तविक आकृति नहीं होती है। पर हमारी आँखें उन बिखरे हुए तारों में 'सप्तर्षि' या 'रोहिणी' नक्षत्र का आकार (सम्बन्ध) देख लेती हैं। वह आकार आकाश में नहीं है, वह केवल हमारी दृष्टि का संयोजन है। यही आकृतियाँ नक्षत्र कहलाती हैं। इसी तरह, समाज में सभी इंसान स्वतंत्र हैं, लेकिन उनके बीच 'चाचा-भतीजा' या 'मकान मालिक-किरायेदार' का जो संबंध है, वह हमारी मानसिक चेतना द्वारा खींचा गया एक सम्बन्ध है।
इन्हीं सम्बन्धों के सहारे मानवीय संवेदनाएं ज़िंदा रहती हैं। यदि ऐसी मानसिक प्रवृत्ति न हों, तो यह संसार केवल स्वतंत्र परमाणुओं का एक बिखरा हुआ स्तूप रह जाता। संबंध चाहे यथार्थ हो या कल्पना, यही इस संसार को सुंदर और जीने योग्य बनाते हैं।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।