हरसिंगार के फूलों के पास ही रहना माँ
विशाख राठी*
पिछले सप्ताह बृहस्पतिवार (17 दिसंबर) को पुस्तक आंदोलन से जुड़ी प्रमुख कार्यकर्ता और कई महत्वपूर्ण पुस्तकों की अनुवादक चंद्रकिरण राठी कोरोना के बाद उत्पन्न जटिलताओं के कारण चल बसीं। श्रीमती राठी हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि आलोचक गिरधर राठी की पत्नी और प्रख्यात पत्रकार एवं कवि प्रयाग शुक्ल की बहन थीं। उनके पुत्र विशाख से हमने अनुरोध किया कि यदि वह माँ से जुड़ीं यादों को हमारे पाठकों से साझा कर सकें तो शायद उनका भी मन हल्का हो और पाठकों तक भी उनके प्रेरक प्रसंगों की जानकारी पहुंचे। विशाख ने हमारे अनुरोध को माना और ये आलेख भेजा।
लिखूँ, या ना लिखूँ? किस बात, किस चीज़ को याद करूँ? लिखने से दुःख कम होगा या बढ़ेगा? फिर भी मन में आता है कि लिखना चाहिए। मम्मी को हमेशा अच्छा लगता था जब मैं लिखता था -- बहुत कहती थीं, "लिखा करो, लिखा करो, लिखा करो। इतनी फ़िल्में देखते हो, और कुछ नहीं तो उन्हीं के बारे में लिखा करो।"
1975 -- जून। रात का समय, मैं लगभग पाँच साल का, बहन मंजरी दो साल की। दिल्ली के हौज़ ख़ास इलाके में किराए के घर में हम चारों बैठे है - दूध-रोटी खिला रही हैं वह हम दोनों बच्चों को। बहुत धुंधली याद है - बाद में मम्मी ने कई बार उस रात का ज़िक्र किया इसलिए कुछ याद, कुछ सुनी हुई बातों से एक धुंधला चित्र मन में बरसों से बैठा ही हुआ है। पुलिस के कुछ अफ़सर दरवाज़ा खटखटाते हैं, कुछ बातचीत होती है, पापा को ले जाते हैं अपने साथ। मम्मी हमें कहती हैं की कल सुबह वह वापस आ जायेंगे। फिर MISA में गिरफ़्तारी, जॉर्ज फ़र्नांडेस के अख़बार 'प्रतिपक्ष' के सम्पादक के बतौर इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ सामग्री छापने के आरोप में। 16 महीने जेल।
दो छोटे बच्चों की परवरिश -- अकेले। आर्थिक तंगी, एक छोटी सी नौकरी का सहारा। मगर फिर भी मम्मी ने पापा से कहा कि माफ़ीनामा दाखिल कर के सज़ा कम करवाने की कोई ज़रुरत नहीं – ऐसा कुछ नहीं करना जो मन को बाद में बुरा लगे। मैं संभाल लूंगी घर को जब तक आप घर वापस नहीं आते।
सिर्फ 31 बरस की थीं तब मम्मी, उस समय किसी को नहीं पता था की इमरजेंसी कब उठेगी, कब रिहा होंगे पापा और उनके जैसे हज़ारों लोग। उसके बाद दिल्ली के केन्द्रीय कारागार तिहाड़ जेल (और बाद में जयपुर के जेल) में पापा से मिलने जाना, उनकी रिहाई के लिए बड़े-बड़े वकीलों से मिलना जो बिना पैसे के इन गिरफ़्तारियों के विरोध में जुटे हुए थे – वी. एम. तारकुंडे याद है मुझे उन नामों में से एक।
कभी पापा की कमी महसूस नहीं होने दी मम्मी ने उन 16 महीनों में। कितना मुश्किल रहा होगा उनके लिए सब अकेले संभालना, इस बात का ज़िक्र वह खुद कभी नहीं करती थीं। पूछने पर भी उस को कमतर करके ही बताती थीं। रो ज़रूर पड़ती थीं, उस समय की याद करते हुए। जैसे हंसती थीं, जितना हंसती थीं हमेशा, उस से बहुत कम उनको रोना आता था।
कई बार बचपन की कठिनाइयों भरे जीवन को याद करके, नानाजी या बड़े भाई राम मामा को याद करके, या किसी मार्मिक कहानी को पढ़ के सुनाते हुए, किसी फ़िल्म की कहानी को सुनाते हुए भी वह रो पड़तीं -- उनका बहुत विशाल ह्रदय, करुणा से भरा हुआ था। बच्चों की सी हंसी, बच्चों का सा रोना। अपने, पराये किसी का भी दुःख उनसे देखा नहीं जाता था।
उसके बाद कई साल तक घर की आर्थिक हालत बहुत कठिन रही। घर में मम्मी-पापा के कई मित्रों के आने जाने का तांता बंधा रहता था। रिश्तेदारों का भी। कम में गुज़ारा करने में माहिर थीं वह -- और कभी शिकायत नहीं की इस बात की। कभी किसी ज़ेवर, कपड़े, सजावट का ज़रा भी शौक नहीं रहा। कई बार भूखे पेट खुद सोये होंगे पापा-मम्मी, लेकिन हमको कभी भूखे पेट नहीं सुलाया।
कॉलेज खत्म हुआ तो उन्होंने कहा एम.ए. कर लो, मगर घर के हालात देख मेरा मन और पढ़ाई के लिए नहीं माना। जिस साल पहली नौकरी की, उसी साल बाबरी मस्जिद ढहाई गयी -- घर में सब बहुत दुखी थे। पापा ने जनसत्ता में लेख लिखा, तो धमकी भरे फ़ोन आने लगे -- उसी साल पहली बार हमारे घर में लैंडलाइन फ़ोन भी लगा था।
मेरी नौकरी मुझे घर से कई बार दो-दो, तीन-तीन दिनों के लिए अलग रखती थी। बहन कॉलेज में थी। एक रात मुझे घर आने में बहुत देर हो गई। मम्मी घर की बॉलकनी में खड़े मेरा इंतज़ार कर रहीं थीं, उनके मन में ख्याल आ रहे थे कि मेरी गिरफ़्तारी हो गई है शायद, जबकि ऐसा होना किसी भी तरह से संभव नहीं था क्योंकि मेरा सक्रिय राजनीति से दूर-दूर तक का सम्बन्ध नहीं था।
इमरजेंसी और जनता सरकार के वर्षों के बाद पापा ने भी सक्रिय राजनीति से जो हल्का-फुल्का नाता था, वह पूरी तरह तोड़ लिया था। मम्मी, पापा दोनों - किताबों, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया से पूरी तरह जुड़ गए थे। मम्मी ने कई साल 'केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो' में नौकरी करने के बाद ‘प्री-मैच्योर रिटायरमेंट’ ले लिया था, और अब वह घर से ही अनुवाद और लेखन का काम करने लगीं थीं। रविंद्रनाथ के निबंधों का अनुवाद, सत्यजीत राय की कहानियों का अनुवाद, ऋत्विक घटक की कहानियों का अनुवाद मूल बांगला से उन्होंने हिंदी में किया। हंगारी कहानियों का अनुवाद अंग्रेजी से हिंदी में किया, और भी बहुत कुछ।
1992 के कुछ वर्ष बाद तक मम्मी के मन में कई तरह के demons ने घर बना लिया। Paranoia जैसा, और लगातार Deja Vu की feeling आते रहना। आर्थिक रूप से जब घर की तंगी नहीं रही तो उनके मन की हालत बिगड़ने लगी। कभी सुधार, फिर बिगड़ाव ऐसा कई वर्षों तक चलता रहा।
पटपड़गंज का घर बेच कर, ग्रेटर नोएडा में घर लिया। तब तक हम दोनों बच्चों की अपनी-अपनी गृहस्थी बस चुकी थी। हम सब अपने-अपने काम और भागदौड़ में व्यस्त रहते थे। पापा-मम्मी से मिलने का सिलसिला कभी नहीं थमा, कुछ कम ज़रूर हो गया।
स्कूल के टाइम से ले कर अब तक मेरे मित्र जब घर आते तो उनको बहुत अच्छा लगता था -- उनके लिए खाने-पीने के तरह तरह के व्यंजन बनाना, उनके लिए कुछ करना उनको बहुत पसंद था। सिर्फ पापा और अपने ही नहीं, मेरे और बहन के मित्रों से भी उनका आत्मीय सम्बन्ध बन जाता था। नाम याद रहते थे, उनके हालचाल की खबर लेती रहती थीं पूरी ज़िन्दगी।
मम्मी बिना काम के हमेशा बहुत बेचैन रहती थीं। किताबों और पौधों से बहुत प्रेम था उन्हें -- हौज़ खास का घर बहुत छोटा सा था, लेकिन वहाँ भी कई गमले थे। पटपड़गंज में ऊपर की छत पूरी गमलों से ही भरी हुई थी।
ग्रेटर नोएडा के घर में एक छोटा सा बगीचा था -- वहां बहुत लगन से बागवानी करने लगीं, और फिर तरह-तरह के पौधे अलग-अलग जगह से ला कर उनको लगातीं उगातीं।
किताबों और पौधों के प्रेम ने एक लघु-व्यवसाय का रूप लिया। स्कूलों, मेलों में पौधे और किताबें ले कर जातीं, stall लगातीं -- हम अपने व्यस्त जीवन के बीच जो थोड़ी बहुत मदद कर सकते वह करते, कई बार उनसे नाराज़ भी होते की आराम करने की जगह वह इस भागदौड़ में लगीं हैं। लेकिन उनका मन दृढ था।
उस काम को करने से उनके मन को शांति भी मिलती थी। ऐसा संघर्ष कई साल तक चलता रहा। फिर उन्होंने ग्रेटर नोएडा के एक मॉल में पहले एक स्टाल और फिर एक दुकान किराए पर ले ली - किताबों की दुकान बनाई।
बहन मंजरी ने बाद में उनके लिए एक छोटी दुकान खरीद दी। किताबें कम ही बिकती थीं, और वह स्कूलों, मेलों में स्टॉल लगाने के सिलसिले में तब भी लगी रहतीं थीं। हर हफ़्ते-दस दिन में वह पुरानी दिल्ली के कई प्रकाशक समूहों के चक्कर लगातीं - खुद एक-एक किताब चुन के खरीद करतीं, स्टेशनरी का सामान खरीद करतीं -- इसमें उनको पूरा दिन लग जाता था, घुटने में दर्द की तकलीफ़ के बावजूद, उम्र होने के बावजूद उनको थकान ज़रा भी नहीं होती।
मेरी नौकरी बम्बई में लग गयी थी, हर गर्मी और सर्दी में एक चक्कर दिल्ली का ज़रूर लगता था -- तब मैं उनके साथ एक दिन पुरानी दिल्ली का काम कराने जाने की कोशिश करता था। मैं थक जाता था शाम होते-होते, लेकिन वह नहीं थकती थीं। कई ग्राहकों के एक-दो पुस्तकों के ऑर्डर पूरा करने के लिए उनको अलग अलग जगह जा के ढूंढना पड़ता था, पर वह कोशिश नहीं छोड़ती थीं। ग्रेटर नोएडा में उनकी किताबों की दुकान का नाम काफ़ी फैल गया था, कई ग्राहकों से मित्रता जैसे सम्बन्ध हो गए थे -- घर तक बुला लेती थीं वह कितने ही लोगों को। कोई उनके लिए बड़ा-छोटा नहीं था -- सबसे सहज दोस्ती कर लेती थीं।
जब बम्बई से घर आते, तो आने के दिन के इंतज़ार में उलटी गिनती शुरू कर देती थीं -- हमारे लिए खाने की चीज़ें बनाने का प्रोग्राम बनातीं। दिल्ली के मशहूर व्यंजन और खाने का इंतज़ाम करतीं -- अपने काम में व्यस्त होने के बावजूद उनको इस सब का ख्याल पूरे समय रहता था। जब वापस जाने का समय आता तब बहुत दुखी हो जातीं, और लड्डू, नमकीन घर में बना-बना के पैक करती रहतीं। लाख मना करने पर भी मानती नहीं, कहतीं ले जाओ तुमको अच्छा लगता है।
मम्मी का मन बहुत साफ़ था, छल-कपट ज़रा भी नहीं -- बल्कि सबसे सच बोलने की बेहद हठी आदत। कभी-कभी उस आदत की वजह से लोग बुरा भी मान जाते थे। लेकिन वह छुपा के कुछ नहीं बोलती थीं, सबके भले के लिए ही बोलती थीं, किसी को आघात हो ऐसी उनकी मंशा कभी भी नहीं रही। अपने जीवन के अनुभव से सीखे पाठ वह दूसरों की भलाई के लिए उनसे साझा करती थीं। अधिकतर लोगों को यह बात धीरे-धीरे उनके साथ रह कर समझ भी आ जाती थी -- तभी तो इतने लोगों से उनके इतने गहरे सम्बन्ध बने।
वो बहुत हठी थीं, शायद इसलिए इतने लोगों के हतोत्साहित करने के बावजूद वह अपनी किताबों की दुकान इतने सालों तक चलाती रहीं। शुरू के वर्षों में दुकान आमदनी का ज़रिया कम, और खर्च का कारण ज्यादा था। बाद में भी जितनी मेहनत वह करती थीं, उसकी तुलना में आमदनी बस इतनी होती थी की छोटे-मोटे खर्च ही उससे पूरे हो पाते थे। फिर भी उनके दिमाग में किताबों को कैसे बढ़ाया जाए, कैसे फिर से लोगों को पढ़ने की आदत हो, इसको ले कर उनके मन में जुगत चलती ही रहती थी।
सरकारी स्कूलों में जब स्टाल लगते तो सस्ती किताबें ज्यादा बिकती थीं - उनका मन यह देख पसीज जाता था कि कैसे गरीब माँ-बाप अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए तरसते हैं। ऐसे में वह घर लौट कर अक्सर रूआंसी सी हो जातीं थीं। वह याद रखतीं थीं और फिर वहाँ अगली बार 'एकलव्य', 'प्रथम' और 'NBT' की किताबें ज्यादा ले जातीं थीं -- जो सस्ती भी थीं और अच्छी भी।
नौ साल बाद, अभी करीब दो महीने पहले अक्तूबर में बम्बई छोड़ के हम वापस दिल्ली आ गए। यह सोच कर कि मम्मी-पापा के साथ अब कुछ साल बिताएंगे। जो भी थोड़ा बहुत काम हमारे पास था, वह हम वैसे भी घर से ही कर रहे थे।
दो महीने भी उन्होंने हमें अपने साथ पूरे नहीं दिए।
काम करने की लालसा मम्मी के मन में इतनी तीव्र थी, की हमारे लाख मना करने के बावजूद वह घर से निकल ही जाती थीं। पूरी ज़िन्दगी उनको किसी बड़ी शारीरिक बीमारी का सामना नहीं करना पड़ा, शायद इसलिए कोरोना से उनको कुछ नहीं होगा वह ऐसा सोचती रहीं। पिछले महीने कुछ दिन बुखार रहा, तब भी जाँच कराने से मना करती रहीं। जब ज्यादा ज़ोर देने पर टेस्ट करवाया तो Covid ही निकला। आखिरी के 20 दिन अस्पताल में रहीं -- जब तक फेफड़ों में शक्ति थी, बीमारी से लड़ती रहीं - अस्पतालों से उन्हें सख्त नफरत थी, और डर भी। Covid को तो उन्होंने हरा भी दिया, लेकिन निमोनिया ने फेफड़ों का बहुत नुकसान कर दिया था।
हरसिंगार के फूल उनके बहुत प्रिय फूलों में से थे। घर के ठीक सामने एक पेड़ भी था -- ग्रेटर नोएडा में। हौज़ खास और पटपड़गंज के घरों में भी गमलों में हरसिंगार का पेड़ था।
वह हमसे अक्सर फूल चुन के लाने को कहती थीं -- उनको एक छोटी सी स्टील की तश्तरी में सजा देतीं -- कहतीं यह पारिजात है, स्वर्ग में सिर्फ़ यही फूल उगता है। धर्म में थोड़ी बहुत आस्था ज़रूर थी उन्हें, लेकिन कर्म-काण्ड में कतई नहीं।
जब वह अस्पताल में थीं, तब हरसिंगार के फूल रोज़ सुबह उनके छोटे से बागान में गिरे दिखते। उनकी स्वर्ग में पारिजात वाली बात याद आती। शूजित सरकार निर्मित OCTOBER नाम की फ़िल्म याद आती। उनकी फ़िल्मों के बारे में लिखने की नसीहत याद आती।
उनका स्वस्थ हो के घर लौटने का इंतज़ार, प्रार्थना, उम्मीद हम सब परिवार और मित्रजन रोज़ करते। 20 दिनों में कितनी ही बार हम टूट के रो पड़ते, और कभी डॉक्टरों से कुछ अच्छी खबर सुन कर उम्मीद जगा बैठते। उन्होंने OCTOBER नहीं देखी थी, अगर देखी होती तो जैसे मैं जाऱ-ज़ार रोया था देखने के बाद, वह भी ज़रूर रोतीं। कहानी, फ़िल्म और असल जीवन में किसी को भी दुखी देख वह बहुत दुखी होती थीं।
हमारे मन में वह मम्मू, मम्मी, माँ, Mom, दादी, नानी के रूप में अंत काल तक जीवित रहेंगी। अपनी पोती और नातिन से उनको बेहद प्यार था, जैसा हर किसी दादी-नानी को होता ही है। उनके घर आने पर उन्हें विशेष ख़ुशी होती थी।
उनकी प्रफुल्ल हंसी याद रहेगी। उनका जीवन संघर्ष से भरा था लेकिन उसको बगैर शिकायत पूरी तरह जीने का पाठ वह हम सब को दे गयीं। उनका संवेदनशील, सौम्य, ममता से भरपूर मन हमारे लिए एक जीवित मूरत के रूप में हमेशा हमारे साथ रहेगा।
चूंकि उनकी धार्मिक आस्था बहुत प्रबल नहीं थी, और जिजीविषा बहुत थी इसलिए शायद उनको स्वर्ग से ज़्यादा हरसिंगार के फूलों को मनुष्य रूप में ही देखना ज्यादा सुहायेगा। स्वर्ग में पारिजात का वृक्ष होता है या नहीं पता नहीं। पुनर्जन्म होता है या पता नहीं। ईश्वर अगर है, तो उससे यही कामना है कि उनको जो ज़्यादा पसंद था उसी रूप-अवस्था का आशीर्वाद उन्हें दें।
MOM, we love you too much!!
*Mumbai-based Vishakh Rathi is a media professional with over two decades’ experience. He was formerly associated with news (Headlines Today, CNN-IBN) as well as non-news channels (Star TV) besides various reputed production houses. Presently, freelancing as a communication consultant for some NGOs. he has also been doing story development assignments for web-series based on factual events. He can be contacted at vishakhrathi@gmail.com