स्वप्न श्रृंखला में इस बार - सपने : स्व संपूर्णता की यात्रा
डॉ मधु कपूर की स्वप्न श्रृंखला जारी है। इस बार सपनों के बारे में बात करते हुए वह हमें प्रसिद्ध मनोविश्लेषक एवं दार्शनिक सी. जी. जुंग के सिद्धांतों से परिचित करा रही हैं। डॉ मधु कपूर के लेखों की यह विशेषता भी होती है कि जिज्ञासु पाठकों को इनसे आगे बहुत कुछ जानने का अवसर मिलता है। इसी लेख में हमारी रुचि सी. जी. जुंग में हुई और हमने पाया कि जुंग भारतीय दर्शन के भी गहन अध्येता थे और पाश्चत्य एवं भारतीय दर्शन का उनका तुलनात्मक अध्ययन महत्वपूर्ण माना जाता है। सपनों के सम्बन्ध में जुंग का मानना है कि जब व्यक्ति अपने सपनों की आंतरिक आवाजों को समझने लगता हैं, तो वह अपनी आत्मा के वास्तविक उद्देश्य को खोज लेता है।
सपने — स्व संपूर्णता की यात्रा
डॉ मधु कपूर
सी. जी. जुंग (C.G.Jung) की प्रसिद्ध पुस्तक Modern Man in Search of a Soul आधुनिक मनुष्य की चेतना का गहरा विश्लेषण करती है। यह पुस्तक यह संदेश देती है कि आधुनिक मनुष्य अपने अचेतन मन के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहा है, इसलिए उसकी आत्मिक शांति खोने के कगार पर पहुँच चुकी है। इसका कारण है —जब मनुष्य को अपनी सफलताएँ अधूरी लगने लगती है, तब वह अपने जीवन के वास्तविक अर्थ की खोज करता है। जुंग का मानना था कि आधुनिक समय में मानसिक बीमारियों का कारण अक्सर एक प्रकार के खालीपन से आती है। मनुष्य अपनी जड़ों से विच्छिन्न होकर वह दिशाहीन हो जाता है। मनोचिकित्सा का काम मनुष्य को उसके आंतरिक स्रोत से दोबारा जोड़ना है, जो उसकी रचनात्मक ऊर्जा के दायरे को विस्तृत कर सके।
उनके अनुसार, सपने हमारे अचेतन मन की भाषा हैं। वे कोई निरर्थक कल्पनाएँ नहीं हैं। वे मानते हैं कि हर मनुष्य के भीतर एक ऐसा अचेतन मन होता है जो उसे पूरी मानव जाति के इतिहास से जोड़ता है। हमारे पूर्वजों के अनुभव, कहानियां और प्रतीकों के संस्कार इस कदर हमारे दिमाग में छाये रहते हैं कि दुनिया भर की संस्कृति और उनसे जुड़ी कहानियों और सपनों में समानताएँ पाई जाती हैं, जिन्हें हम मूलरूप (Archetypes) कहते हैं।
सपनों के रहस्य को समझने से मनुष्य अपने अचेतन मन की भावनाओं को बाहर निकालता है ताकि उसका मानसिक संतुलन न बिगड़े और अपने वास्तविक व्यक्तित्व को सहजता से प्राप्त कर सके। उनके अनुसार कुछ सपने बहुत गहरे और असाधारण होते हैं। इनमें कुछ दृश्य, जैसे पुराना खंडहर, या कोई रहस्यमयी मूर्ति, दिखाई देती हैं जिन्हें व्यक्ति ने अपनी असली जिंदगी में कभी नहीं देखा। ये प्रतीक पूरी मानव जाति के साझा इतिहास (Collective Unconscious) से आते हैं।
अचेतन मन को जुंग 'छाया' (Shadow) सिद्धांत कहते हैं, जो हमारे व्यक्तित्व का ही हिस्सा होता है, पर उसे हम समाज के डर से स्वीकार नहीं करते, जैसे ईर्ष्या, क्रूरता, चोरी इत्यादि, जिन्हें हमारा सचेतन दिमाग नजरअंदाज करता है। अचेतन मन सपनों के माध्यम से उन छिपे हुए हिस्से को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का संकेत देता है। इस तरह सपने व्यक्ति को स्वयं की गहराई से परिचित कराते हैं। जब कोई व्यक्ति स्वयं को सपनों में बार-बार अंधेरे जंगल में भटकता हुआ देखता है, तो यह उसके भीतर की असुरक्षा और अनजाने भय का प्रतीक है। यदि उसी सपने में कोई मार्गदर्शक प्रकट होता है, तो यह एक संकेत है कि व्यक्ति अपने भीतर समाधान और प्रकाश खोज रहा है। इस प्रकार सपने आत्म-ज्ञान की यात्रा में दर्पण की तरह काम करते हैं—वे हमारे भीतर छिपे सत्य को दिखाते हैं और हमें संपूर्णता की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं।
एक ओर चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से न्यूरोसाइंटिस्ट स्वप्न निर्माण और सपनों से जुड़ी विस्तृत जानकारियों को हासिल करने में रुचि रखते हैं, वहीं फ्रायड, जुंग इत्यादि मनोविश्लेषक सपनों के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करते है, जो मानवीय इच्छा से ताल्लुक रखते है। सपने यादृच्छिक नहीं होते हैं, बल्कि व्यक्तित्व के दमित पहलुओं को उजागर कर एक व्यवस्थित और बहुआयामी व्यक्तित्व को विस्तृत करने में मदद करते है। इसलिए सपनों की विषयवस्तु को व्यक्ति की विशिष्टता और व्यक्तित्व के आधार पर समझना और परखना आवश्यक होता है। हालांकि, सपनों का कोई एक निश्चित "शब्दकोश" नहीं होता है।
सपनों का अर्थ हमेशा सपना देखने वाले व्यक्ति के निजी जीवन और उसकी मानसिक स्थिति के संदर्भ में बदलते रहते हैं। सपनों की जटिलता को खोलने के लिए चिकित्सक इस बात पर जोर देते हैं कि व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा है, क्या सोच रहा है और उसके जीवन में और क्या चल रहा है? क्योंकि हम उन विषयों से बचना चाहते हैं जो हमारे मान-सम्मान और सद्गुणों पर संदेह पैदा करते हैं। वास्तव में अपनी आत्मकथा में जुंग एक पूरा अध्याय इसी विषय को समर्पित करते है कि किस तरह मनोविश्लेषणাत्मक पद्धति के माध्यम से वे सपनों की घटनाओं का अचेतन मन से चेतन मन का एक संवाद स्थापित करते हैं, ताकि मन के बंद दरवाजों को खोलने में मदद मिल सके।
शुरुआत में जुंग का मानना था कि दुनिया की हर घटना, हर चीज़ अचेतन में संग्रहीत रहती हैं। जिसके पास सही क्षमता हो, वह अचेतन में प्रवेश करके संग्रहीत सभी जानकारी प्राप्त कर सकता है। A cloud of associations जैसे प्रयोग उनके लेखन में मिलते हैं, अर्थात सामूहिक अचेतन में अनुभव और प्रतीक अक्सर मेघ या धुंध की तरह छाए रहते हैं, जिन्हें स्पष्ट करने के लिए मनोविश्लेषक की आवश्यकता पड़ती है, जिसे उस व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और उससे जुड़े इतिहास का ज्ञान हो तथा उनके आद्यरूपों (Archetypes) को समझने की क्षमता हो। । उनके जीवन के उत्तरार्ध में कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिससे उनका विश्वास दृढ हो गया कि हमारी आत्मा का कुछ अंश हमारी मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है, जिनके माध्यम से हम अपने सभी पूर्वजों के सामूहिक सार को देख सकते हैं, ताकि हम अपने जीवन की सही राह खोज सकें। अपनी अन्य पुस्तक “memories, dreams and reflections में एक ऐसी प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं, जो सपनों को एक कला का रूप दे देता है।
उनका मानना था किसी भी व्यक्ति में मौजूद अनेक क्षमताओं में से कुछ को ही उसे अपने जीवन में व्यक्त करने का मौका मिलता है, बाकी अनदेखी रह जाती हैं । ये क्षमताएँ किसी न किसी स्तर पर छाया के रूप में प्रकट होती हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की संगीत में रूचि है लेकिन किन्हीं कारणवश उसे सीखने का मौका नहीं मिलता है, तो संभवतः उसके मन में विद्रोह की प्रवृत्ति उठ खड़ी होती है। कोई व्यक्ति स्वयं को भले ही कमजोर और मानसिक रूप से दुर्बल समझता हो, लेकिन उसकी छाया यह दर्शाती है कि उस व्यक्ति में नेतृत्व के वास्तविक गुण हैं। सपनों में ऐसी आकृतियाँ दिखाई देंगी जो 'धुंधली' होंगी, जिन्हें पहचानना मुश्किल होगा लेकिन वे निश्चित रूप से उसे उसके असली रूप से मिलवाती है। स्वप्नावस्था में यह चेतन सत्ता स्वयं ही सृजन करती है, क्योंकि उस अवस्था में उसे अपने भीतर झांकने का अवसर मिलता है। जुंग की Analytical Psychology स्थापित करती है कि खुद को समझने का मतलब केवल यह जानना नहीं है कि हमें क्या पसंद है या नापसंद, बल्कि अपने मन के छिपे हुए हिस्सों को खोजना और उन्हें स्वीकार करना होता है। जितना हम अपनी इस छाया से भागते है, उतना ही वह हमारा पीछा करती रहती है और हमारे व्यवहार को अचेतन रूप से नियंत्रित करती रहती है।
जैसे जैसे हम अपनी इस छाया को पहचानते हैं और स्वीकार करते हैं, वैसे वैसे हम खुद के प्रति अधिक ईमानदार और संपूर्ण बनते जाते हैं। समाज में रहने के लिए हम सब एक मुखौटा (persona) पहनते हैं— जैसे एक अच्छा कर्मचारी, एक आदर्श सन्तान या एक शांत व्यक्ति। जुंग का विश्लेषण हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारा सामाजिक मुखौटा अलग है और हमारी वास्तविक आत्मा उससे कहीं अधिक गहरी है।
जुंग के अनुसार, हर पुरुष के अचेतन मन में एक स्त्री का हिस्सा (Anima) होता है और हर स्त्री के भीतर एक पुरुष का हिस्सा (Animus) वर्तमान होता है। एक पुरुष के भीतर की 'एनिमा' उसे संवेदनशीलता, अंतर्ज्ञान और रचनात्मकता देती है। एक स्त्री के भीतर का 'एनिमस' उसे तर्क, साहस और दृढ़ता देता है। जुंग का विश्लेषण इन दोनों पक्षों को संतुलित करने की चेष्टा करता है। अर्द्धनारीश्वर का स्वरूप पाठकों को बतलाने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब व्यक्ति अपने सपनों की आंतरिक आवाजों को समझने लगता हैं, तो वह अपनी आत्मा के वास्तविक उद्देश्य को खोज लेता हैं। जुंग का विश्लेषण हमें खुद का न्यायाधीश बनने के बजाय खुद का अन्वेषक बनाना सिखाता है, मन के अंधेरे कोनों को साफ करने और अपनी आत्मा की अनूठी क्षमता को पहचानने का रास्ता दिखाता है। जुंग के अनुसार लेखक महान कृतियों का रचनाकार नहीं होता है, बल्कि रचनाएँ उसे महान लेखक की पहचान देती है—"It was not Goethe who created Faust, but Faust who created Goethe."
इस तरह सपने एक गंभीर दार्शनिक सवाल पैदा करते है ‘मैं कौन हूँ’ और इस प्रश्न का उत्तर है — व्यक्ति की अतल गहराइयों की खोज तथा उसे उसकी आतंरिक अचेतन सत्ता की पहचान करवाना। जीवन का एक मूलभूत नियम – Enantiodromia को कार्ल जुंग मनोवैज्ञानिक संतुलन का नियम मानते हैं। इसका तात्पर्य है कि हर अति अपने विपरीत को जन्म देती है। इस तरह किसी भी चरम स्थिति पर पहुँचकर व्यक्ति अपनी विपरीत सत्ता से दोस्ती कर लेता है, जो उसे सम्पूर्णता प्रदान करती है।
एकबार पुनः योग वाशिष्ठ के गाधि ब्राह्मण को स्मरण करे, जिसने एक डुबकी में पूरा जीवन भोग लिया था। घर वापस आने पर उसने देखा एक दुबला पतला ब्राह्मण उसके घर आया है और अपना परिचय देता है कि वह उस क्रांत देश से आ रहा है जहाँ कुछ दिन पहले एक अन्त्यज राजा राज्य करता था। मंत्रियों और प्रजा वर्ग को जब इसका एहसास हुआ तो उन्होंने आत्मदाह कर लिया और उनकों ऐसा करते देखकर राजा ने भी आत्मदाह कर लिया। इसके पश्चाताप स्वरूप वह चान्द्रायण व्रत कर रहा है और कृशकाय होता जा रहा है। यह सुनकर गाधि को आश्चर्य हुआ और वह क्रांत देश पहुंचा और वास्तव में देखा वहां ऐसी घटना थोड़े दिन पहले घटी थी —स्वप्न और जाग्रत अवस्था की क्षीण रेखा भी समाप्त हो गई थी।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। हाल ही में उनके दार्शनिक निबंधों का संग्रह "द्रष्टा, द्रश्य और दर्शन" प्रकाशित हुआ है. अंग्रेज़ी में दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance भी प्रकाशित हो चुका है।