प्रासंगिकता खोता जा रहा है मुख्यधारा का मीडिया
महात्मा गाँधी पत्रकारिता का सबसे बड़ा उद्देश्य सेवा ही मानते थे। आज की पत्रकारिता उनके बताये उदात्त उद्देश्यों से दूर हो ही चुकी है, वह पत्रकारिता के मूल सिद्धांत सही सूचना देने के काम से भी कोसों दूर हो चुकी है। वरिष्ठ पत्रकार राजकेश्वर सिंहअपने इस लेख में बता रहे हैं कि मुख्यधारा का मीडिया धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है क्योंकि वह अपने मूल काम को ही ठीक से नहीं कर पा रहा। आइए, इस विषय पर उनकी बात नीचे के लेख में विस्तार से सुने।
प्रासंगिकता खोता जा रहा है मुख्यधारा का मीडिया
राजकेश्वर सिंह
“हम पत्रकारिता में लोकप्रिय होने के लिए नहीं आते। यह हमारा कर्तव्य होता है कि हम सच्चाई की तलाश करें और जब तक जवाब नहीं मिले, तब तक अपने नेताओं पर दबाव बनाते रहें।” — ये बात अमेरिका की चर्चित रिपोर्टर और लेखिका हेलेन थॉमस ने कही थी। उन्हें अमेरिका के दस राष्ट्रपतियों के प्रशासन के दौरान व्हाइट हाउस कवर करने का तजुर्बा था। वैसे भी किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पत्रकारों से ऐसी ही उम्मीद की जाती है। अपने देश में भी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, लेकिन विश्लेषकों को यह चिन्ता है कि अब यह स्तंभ दरक रहा है। मुख्यधारा की मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनल्स) की निष्पक्षता तो सवालों के घेरे में आई ही है, उससे भी ज़्यादा चिन्ता की बात ये है कि मुख्यधारा के मीडिया में यदि किन्हीं पत्रकारों ने या कभी कभी पूरे संस्थान ने सत्तापक्ष के प्रतिकूल स्टैंड लेने की हिम्मत दिखाई है तो उनके लिए खतरे भी बढ़े हैं। ऐसे में अब जो सूरत सामने आ रही है, उसमें मुख्यधारा की मीडिया करीब-करीब समर्पण जैसा कर चुकी है और दूसरी तरफ यूट्यूब, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म न सिर्फ उनकी जगह को तेजी से ले रहे हैं, बल्कि ज्यादा विश्वसनीय भी माने जाने लगे हैं।
मुख्यधारा मीडिया की दिनों-दिन बदरंग होती तस्वीर और घटती साख की हालिया नजीर बीते दिनों दिल्ली के जंतर‑मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की अगुवाई में जेन‑ज़ी के आंदोलन के दौरान दिखी। पूरे देश ने देखा कि किस तरह मुख्यधारा मीडिया ने आंदोलन की सच्चाई और युवाओं में उबाल को समझने और उसे रिपोर्ट करने के बजाय उसकी खामियों को इंगित करते हुए अलग नैरेटिव पेश करने की कोशिश की। उसने आंदोलनकारियों की फंडिंग से लेकर उनके पीछे देश‑विरोधी ताकतों के होने का सवाल बड़ा करने की भरपूर कोशिश की। नतीजा यह हुआ कि कई न्यूज चैनलों की इस चाल को समझते आंदोलनकारियों ने उन्हें प्रदर्शन स्थल में घुसने ही नहीं दिया और जो किसी तरह पहुंचे भी उन्हें खदेड़कर बाहर कर दिया गया। कह सकते हैं कि देश की मुख्यधारा मीडिया का युवाओं के इस आंदोलन में सकारात्मक रिपोर्टिंग न के बराबर रही, अलबत्ता खिलाफ माहौल बनाने में कोई कोताही नहीं की गई। बावजूद इसके आंदोलन पूरी तरह सफल रहा। यहां तथ्यों के मामले में भी जेन‑ज़ी का मुकाबला करने में मुख्यधारा मीडिया फेल ही हुआ है। एआई (आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस) ने भी मुख्यधारा मीडिया के झूठ से पर्दा उठाने में बड़ी भूमिका निभाई है। तभी तो महज़ ढाई‑तीन महीने पहले मज़ाक और व्यंग्य में बनी कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले चले आंदोलन ने केंद्र की मोदी सरकार के एक प्रमुख मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया।
देश की मीडिया की स्थिति पर नज़र डालें तो बीते कुछ वर्षों में फील्ड पर रिपोर्टिंग करने गए इक्का‑दुक्का पत्रकारों को ही जनता की ओर से दौड़ाए जाने की खबरें आती थीं, लेकिन अब मुख्यधारा मीडिया में अपनी खास पहचान रखने और सरकार‑परस्त न्यूज चैनलों के पत्रकारों को जिस तरह के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, वह आने वाले दिनों में उनके लिए बढ़ते खतरे का ही संकेत है। कुछ बरस पहले तक न्यूज चैनलों के स्टूडियो में डिबेट के दौरान शो के एंकर कभी कठघरे में नहीं खड़े किए जाते थे, अब यह स्थिति आम होती जा रही है। ऐसी भी नजीरें हैं कि सरकार और उसकी पार्टी के प्रवक्ताओं से कड़वे सवाल पूछने वाले एंकर्स के कार्यक्रमों में सत्तापक्ष के प्रवक्ताओं ने जाना ही बंद कर दिया है। दूसरी तरफ कई ऐसे न्यूज चैनल हैं जिनके एंकर्स विपक्षी दलों के प्रवक्ताओं के साथ अपने कार्यक्रमों में ऐसे पेश आते हैं जैसे उन्हें कोई शिकार मिल गया हो। इस श्रेणी के न्यूज चैनल सत्तापक्ष की पहली पसंद होते हैं।
इन स्थितियों के बीच यह मामला और महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर यह नौबत आई क्यों? मोटे तौर पर देश में छोटे‑बड़े कुल 400 के करीब न्यूज़ चैनल हैं। इनमें भी बड़े और हर लिहाज से मजबूत मुख्यधारा के ज़्यादातर न्यूज चैनल और प्रिंट मीडिया देश के कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों के पास हैं। मीडिया हाउस को चलाने के लिए उन्हें सरकार से बड़े विज्ञापन की दरकार तो है ही, दूसरी बात यह कि उनके मीडिया के अलावा भी दूसरे बड़े कारोबार हैं। ऐसे में हर तरह से उनकी निर्भरता सरकार पर है और जब वे सरकार पर ही निर्भर हैं तो फिर उसी सरकार की खामियों को उजागर करने का साहस उनमें कैसे आ सकता है। यही एक प्रमुख कारण है कि मुख्यधारा मीडिया वास्तविक खबरों को लोगों तक पहुंचा पाने में असफल है और क्रमश: ऐसी स्थिति आ रही है कि बहुत सारे दर्शक सोशल मीडिया, ख़ास तौर पर यू-ट्युबर्ज़ पर पारंपरिक मीडिया की अपेक्षा ज़्यादा भरोसा करने लगे हैं।
सत्ता‑प्रतिष्ठान और मुख्यधारा मीडिया घरानों के इसी गठजोड़ से वह स्थिति पैदा हुई जिसमें सोशल मीडिया की स्वीकार्यता बढ़ी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूट्यूब पर ज़्यादातर खबरें जस की तस दिखाई जा रही हैं। यही वजह है कि शायद उन पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। दूसरी बात यह कि मोबाइल फोन पर वीडियो क्लिप देखने की सुविधा होने के नाते इसकी पहुंच न्यूज चैनलों की रिपोर्टिंग से बहुत ज्यादा है। इसके साथ ही इंस्टाग्राम और एक्स भी सूचना और समाचारों को लोगों तक तेजी से पहुंचाने के सशक्त माध्यम बन चुके हैं। रही बात रेवेन्यू की तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कमाई इस पर निर्भर करती है कि कौन‑सा वीडियो कितना ज्यादा देखा गया। चूंकि मुख्यधारा मीडिया काफी हद तक वास्तविक सूचनाओं व समाचारों से कट गया है, दूसरी तरफ बहुत सारे यूट्यूबर्स सब कुछ जस का तस दिखा रहे हैं। हर हाथ का स्मार्ट मोबाइल फोन कैमरे का काम कर रहा है। लिहाजा उनके देखने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है।
हालिया FICCI–EY रिपोर्ट (2026) बताती है कि भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग लगभग 2.78 लाख करोड़ रुपये (₹2.78 ट्रिलियन) तक पहुँच चुका है, जिसमें डिजिटल मीडिया ने पहली बार टीवी को पीछे छोड़ दिया है। डिजिटल विज्ञापन अब कुल विज्ञापन बाज़ार का लगभग 63% हिस्सा बन चुका है। सोशल मीडिया उपयोगकर्ता लगभग 50 करोड़ (500 मिलियन) हैं। यह आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि दर्शकों का भरोसा और ध्यान तेजी से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की ओर खिसक रहा है। हालांकि,पारंपरिक मीडिया अभी भी लगभग 74.5 करोड़ (745 मिलियन) साप्ताहिक टीवी दर्शकों तक पहुँच रखता है, लेकिन जिस गति से सोशल मीडिया का प्रभाव पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है, उसे देखते हुए लगता है कि पारंपरिक मीडिया आने वाले दिनों में सोशल मीडिया के लिए और भी ज़मीन छोड़ेगा। फिलहाल यह कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया परिदृश्य अब दोहरी संरचना में विकसित हो रहा है—जहाँ डिजिटल और पारंपरिक दोनों ही लगभग साथ-साथ दौड़ रहे हैं।
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लेखक राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने लंबे अर्से तक राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय रिपोर्टिंग की है। लगभग चार दशक की पत्रकारिता में उत्तर प्रदेश की राजनीति को उन्होंने प्रमुखता से कवर किया है। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।