इच्छा की स्वतंत्रता और नियति की पारदर्शिता
डॉ मधु कपूर के दार्शनिक निबंधों की श्रृंखला में इस बार चर्चा का विषय है डच दार्शनिक बेनडिक्ट स्पिनोज़ा (Benedict de Spinoza) द्वारा उनके ग्रन्थ एथिक्स में प्रतिपादित सिद्धांत जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड मनमर्जी से नहीं, बल्कि बुद्धिगम्य नियमों के द्वारा संचालित होता है। डॉ मधु कपूर का पिछला लेख वर्तमान लेख के साथ एक महीन धागें से बंधा है। ‘इसमें और उसमें’ कठपुतली का प्रसंग, नियति के चक्र में फंस कर, एक सांस्कृतिक मंच पर दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में उपस्थित हो गया, जिसमें वह न तो बंधी होती है, न ही पूरी तरह स्वतंत्र—वह केवल खेलती है अनभिज्ञ अदृश्य धागों से.
इच्छा की स्वतंत्रता और नियति की पारदर्शिता
डॉ मधु कपूर
यह हकीकत है कि अपनी जिन्दगी के कुछ छोटे-बड़े निर्णय हम खुद लेते हैㅡ जैसे क्या खाना है, किससे बात करनी है, क्या पहनना है, कौन-सा पेशा चुनना है आदि । ये निर्णय यह दर्शाते हैं कि व्यक्ति के पास सोचने और चुनने की स्वतंत्र इच्छा-शक्ति है । इच्छा-शक्ति की स्वतंत्रता आवश्यक है, अन्यथा किसी भी अपराध या कार्य के लिए उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है । लेकिन समाज में अपराध करने वाले व्यक्ति को दंडित करने का प्रावधान है । यदि मनुष्य के सभी कार्य पूर्व निर्धारित होते तो, कानूनी रूप से उसे 'दोषी नहीं' ठहराया जा सकता, क्योंकि उसने अपनी मर्जी से अपराध नहीं किया है स्पष्ट है कि हमारी इच्छा-शक्ति स्वतंत्र है ।
दूसरी तरफ किसी की आकस्मिक मौत, कोई प्राकृतिक आपदा या जान माल का भारी नुकसान इत्यादि का सामना मनुष्य ‘नियति को यही मंजूर था’ कहकर करता है । ‘नियति’ अर्थात जिसका होना निश्चित है, जिसे बदला नहीं जा सकता । सृष्टि में हर वस्तु और जीव की एक नियति होती है, उदाहरण के लिए लोहे की नियति स्वर्ण की नियति से भिन्न है । सांप की नियति कछुए की नियति से अलग है । मछली की नियति जल में रहना है, यदि वह उड़ना चाहे या ज़मीन पर रहना चाहे तो वह घातक सिद्ध होगा । हर जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है, लेकिन कहाँ जन्म लेंगे, माता-पिता कौन होंगेㄧ यह व्यक्ति की इच्छा द्वारा निर्धारित नहीं हो सकता है । यह भी तर्क दिया जाता है कि मानव मस्तिष्क अपनी जैविक संरचना के फलस्वरूप अथवा उसका अवचेतन मन इच्छा-शक्ति प्रयोग करने के पहले ही निर्णय ले लेता है । यह केवल भ्रम है कि व्यक्ति निर्णय लेने में स्वतंत्र होता है, ऐसे में स्वतंत्र इच्छा-शक्ति व्यर्थ तथा नैतिक दायित्व अर्थहीन साबित हो जाता है ।
यह दिल्स्चस्प है कि स्पिनोज़ा (Benedict de Spinoza) एक यहूदी दार्शनिक अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ एथिक्स को यूक्लिड की ज्यामिति के अनुरूप ढालते है, जिसमें—परिभाषाएँ, स्वयंसिद्धियाँ (Axioms), सिद्धांत, प्रमाण, उपसिद्धियाँ (Corollaries), तथा टिप्पणियाँ (Scholia)एक क्रमबद्ध ढाँचे के अनुरूप होते हैं। जिस प्रकार ज्यामिति में निष्कर्ष किसी अनिवार्य प्रक्रिया के तहत निकलते हैं, जिसमें आकस्मिकता का कोई स्थान नहीं होता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति आफिस देर से आने का कारण ट्रेन या बस की दुर्घटना को बतलाता है, तो वह स्वयं को एक व्यवस्था का हिस्सा समझता है, जिसमें उसे दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। जाँच करने पर पता चलता है कि दुर्घटना ब्रेक लगाने से हुई और ब्रेक लगाने का कारण था एक बच्चे को बचाना! बच्चा अकेला क्यों दौड़ रहा था, माँ साथ नहीं थी, वह काम पर निकल गई थी और बच्चा रास्ते में खेल रहा था. इस तरह यह सिलसिला अनंत काल तक सारी दुनिया को समेटता चलेगा। संक्षेप में, फिर यही कहना पड़ेगा कि देर से आने वाला व्यक्ति अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी को नकार नहीं सकता है ।
स्पिनोज़ा के अनुसार, स्वतंत्र इच्छाशक्ति का अर्थ चुनाव करने की क्षमता नहीं, बल्कि प्रकृति की ‘अनिवार्यता को गणितीय सत्यों की तरह समझना’ है । जैसे “त्रिभुज” शब्द सुनते ही हम तीन भुजाओं से विशिष्ट एक समतल क्षेत्र को स्वतः समझ लेते हैं, जो ‘त्रिभुज’ शब्द को समझने की अनिवार्यता का अन्तर्निहित अर्थ है, अर्थात जो चार भुजा विशिष्ट नहीं हो सकता है। ऐसा कहना स्वविरोध हो जायेगा। जो इस अनिवार्यता को नहीं समझते, वे अक्सर पूछ बैठते हैं: “मेरे साथ ही ऐसी दुर्घटना क्यों हुई?”
कोई व्यक्ति क्रोध में आकर किसी को अपशब्द कह देता है, तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति नहीं जानता है कि यह क्रोध किन कारणों से उत्पन्न हुआ है। लेकिन यदि वही व्यक्ति अपने क्रोध के कारणों को समझकर, क्रोधित होता है, तो उसका कार्य नैतिक माना जायेगा।
आइंस्टीन स्पिनोज़ा के इस नियतितत्त्व को एक उदात्त व्यवस्था के रूप में देखते है, जिसमें ब्रह्माण्ड मनमर्जी से नहीं, बल्कि बुद्धिगम्य नियमों के द्वारा संचालित होता है। नियमबद्धता एक बौद्धिक सौन्दर्य है, जिसमें ब्रह्मांड एक सूक्ष्म तार्किकता के साथ क्रमिक रूप से विकसित होता है। जिस तरह एक शिशु धीरे धीरे वृद्धावस्था को प्राप्त होता है या एक कली प्रस्फुटित होकर फूल में परिवर्तित हो जाती है, वैसे ही ब्रह्माण्ड भी समय के साथ स्वयं को अभिव्यक्त करता है। Deleuze, एक फ़्रांसिसी दार्शनिक, स्पिनोज़ा के नियति-तत्व को सृष्टि के गत्यात्मक प्रवाह रूप में देखते है । इस तरह एक ओर इसमें ब्रह्माण्डीय निःशब्दता (cosmic serenity) है, तो दूसरी ओर इसमें इच्छाओं का स्रोत है।
इसकी तुलना भारतीय दर्शन के ऋत और लीलातत्त्व की धारणा से की जा सकती है —ऋत ब्रह्मांडीय क्रमबद्धता और लीला चंचल गत्यात्मकता की ओर संकेत करता है । स्पिनोज़ा की स्वतंत्र इच्छाशक्ति की धारणा की समझ हमें इस व्यवस्था में कैद नहीं करती है, बल्कि एक गहरी समझ देती है । उदाहरण के लिए किसी को क्षमा करने का अर्थ यह नहीं है कि उसको क्षमा के योग्य समझा गया है, बल्कि हमने अपने क्रोध के स्रोत को पहचानकर, घृणा की जकड़न से मुक्त होने की चाहत को व्यक्त किया है । यहाँ विचार इतने पारदर्शी हो जाते हैं कि अभिव्यक्ति रहस्यात्मक भी नहीं होती है और बाहर से आरोपित भी नहीं होती है । यह ज्यामितिक नियमों की अनिवार्य परिणति होती है, जो हमारे ही स्वभाव से निकलती है । यह नियति पूर्व-निर्धारित कठोर नियमों में आबद्ध न होकर, एक रागात्मक अभिव्यक्ति होती है, जो किसी ठहराव की ओर अग्रसर होती है ।
इस तरह स्पिनोज़ा के लिए ब्रह्माण्ड एक सिम्फनी है, जो अनिवार्य रूप से स्वरों के उतार चढ़ाव से प्रस्फुटित होती है । जैसे कोई उस्ताद किसी शास्त्रीय गायन में तान और मींड की सहायता से स्वरों से बिना टकराए एक गूढ़ संवाद को स्थापितकर, उसमें विलीन होकर राग रचना प्रस्तुत करता है । यह चरम अवस्था विवेक और आवेग के संधिस्थल की होती है, जहाँ ज्यामिति के प्रारूप ताल और लय की स्पष्टता और उपस्थिति का एहसास शरीर में रक्त के बहाव और ह्रदय के स्पन्दन की तरह पूर्ण संगति के साथ प्रतिध्वनित होते हैं । शास्त्रीय रागों में स्वर एक अनुशासित स्वरपथ पर चलते है, लेकिन हर गायक या वादक उसे अपने भाव में अलग अलग पिरोता है। इस तरह नियति कठोर नहीं, बल्कि एक राग का व्याकरण है, जहाँ आरोह-अवरोह के नियम में बंधी रचना असंख्य कल्पनाओं को जन्म देती हुई राग और ताल (scale and the song) का अद्वैत संगम बन जाती है । भारतीय दर्शन में जिसे हम कर्म व्यवस्था की अभिव्यक्ति कहते है, वह नियति का उद्घाटन ही होता है ।
स्पिनोज़ा का दर्शन पुत्तल प्रज्ञा का एक अद्भुत स्वरूप है, क्योंकि व्यक्ति अनुभव करता है कि वह नाच रहा है पर वह नचाने वाले का हाथ नहीं देख सकता है । स्पिनोज़ा की ज्यामितिक पद्धति ऐसे ही धागों से बंधी होती हैं, जिसे हम देख नहीं पाते है, लेकिन समझते हैं कि हर हरकत हमारी अपनी है । जिस तरह अभिनय करने के लिए अभिनेता को यह समझना पड़ता है कि वह ‘वही व्यक्ति’ है जिसका किरदार वह निभा रहा है, जैसे गाँधी की भूमिका निभाने वाला व्यक्ति थोड़े समय के लिए गाँधी की तरह हाव-भाव करने लगता है। स्वतंत्र इच्छा से अभिनय करना एक भ्रम उत्पन्न कर सकता कि ‘वह गाँधी है’, पर यह आवश्यक है, क्योंकि यही भ्रम अभिनय को सफल बनाता है। उस्ताद अमज़द अली खान ने किसी साक्षात्कार में कहा था, ‘मैं कुछ समय तक सरोद बजाता हूँ, पर उसके बाद सरोद स्वयं मुझे बजाने लगता है’।
शूलर को लिखे एक पत्र में स्पिनोज़ा कहते है, यदि कोई पत्थर लुढकते हुए सोचने और जानने में समर्थ हो जाए कि वह अपनी गति को बनाए रखने का पूरा प्रयास कर रहा है—तो वह पत्थर यह विश्वास करेगा कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र है, फिर भी वह उस अनंत कारण-जाल से अनभिज्ञ रह जाता है, जो उसे गति देता है। हम क्रिया करते हैं स्वतंत्र रूप से, जबकि भीतर कहीं हमें वह सूत्रधार नचा रहा होता है। “हम चलते हैं, जबकि कोई हमें चला रहा होता है”—यह एक सांस्कृतिक और दार्शनिक संयोग मात्र है। एक ऐसी रचना जिसमें कठपुतली न तो बंधी होती है, न पूरी तरह स्वतंत्र—वह केवल अभिव्यक्त करती है। इस दृष्टि से जो इस खेल को जान लेता हैं, वे खेल-पट पर बंधता नहीं है, वह एक ऐसे प्रकाश-मंच का द्रष्टा बन जाता है जहाँ कठपुतली, खिलाड़ी और द्रष्टा—तीनों एक ही नाद में खो जाते हैं। लेकिन जो चौखटों से तादात्म्य कर लेते हैं, वे खेल से बंधे रह जाते हैं ।
एक विलक्षण दृष्टान्त से बात समाप्त की जा सकती है । हम सड़क पर चल रहे हैं और किसी पत्थर से टकराकर गिर पड़ते हैं, तो अगली बार संभलकर चलने की कोशिश करते हैं, लेकिन पत्थर पर गुस्सा नहीं करते हैं. पर जब किसी व्यक्ति से टकराते है, तो हाथापाई पर उतर आते है, ‘देखकर नहीं चल सकते हो’ या ‘अंधे हो क्या?’ – अक्सर लोगों के मुंह से निकल जाता है । इसका कारण है कि हम मानते हैं कि पत्थर सिर्फ़ एक कारणात्मक घटना थी, जबकि टकराने वाला व्यक्ति स्वतंत्र था । पर स्पिनोज़ा के लिए, वह व्यक्ति भी पत्थर से ज़्यादा स्वतंत्र नहीं है!!!
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।